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इस दफे लगा कि मजरूह और गुलज़ार ने गलत लिखा मुंबई के बारे में

29 अगस्त, 2017 का दिन मुंबई कभी नहीं भूल पाएगी. लगातार हो रही बारिश ने पूरे शहर को पानी-पानी कर दिया. मुंबई एक बार फिर उस दहशत की चश्मदीद बनी, जिसने 12 साल पहले उसे तितर-बितर कर दिया था. कैलेंडर में 365 (लीप ईयर छोड़कर) तारीखें होती हैं, लेकिन हर तारीख दिमाग में नहीं कौंधती. 26 जुलाई, 2005 मुंबई की पहचान के साथ नत्थी हो चुकी ऐसी ही एक तारीख है. 12 साल पहले आई 26 जुलाई वो तारीख है, जब पूरी मुंबई थम गई थी, जड़ हो गई थी. यादों का रिवाइंड बटन दबाएं, तो इस तारीख को मुंबई ने शायद बाढ़ का सबसे डरावना चेहरा देखा था.

ये तारीख देश की सबसे अमीर म्यूनिसिपैलिटी बृहनमुंबई महानगरपालिका (BMC) की अब तक की हस्ती का लिटमस टेस्ट था. आंकड़ों में दर्ज 350 के करीब मौतें ये बताने को काफी नहीं कि BMC इस टेस्ट में कितनी बुरी तरह फेल हुई. 12 साल बीत जाने के बाद भी लोग उस दिन की बातें करते हुए एकबारगी सिहर जाते हैं. हर किसी के पास इस दिन से जुड़ी कोई याद है. वो खुद या कोई उसका जानने वाला या फिर उस जानने वाले का कोई जानने वाला ऐसा निकल आएगा, जिसने 26 जुलाई का वो खौफ फर्स्ट-हैंड रिसीव किया. यादें जब आपबीती से जुड़ी होती हैं, तब ज्यादा पक्की हो जाती हैं. एक ये 26 जुलाई और एक 26 नवंबर 2008, ये दोनों ही तारीखें मुंबई और यहां रहने वाले लोगों को पानी के स्वाद की तरह हमेशा याद रहती हैं.

 

29 अगस्त, 2017 को मुंबई के कई इलाकों में कमर तक पानी भर गया था
29 अगस्त, 2017 को मुंबई के कई इलाकों में कमर तक पानी भर गया था

 

लगा जैसे 2005 का रिवीजन हो रहा है
इस साल एक बार फिर मुंबई ने ऐसा ही खौफ दोबारा महसूस किया. 29 अगस्त, 2017 को लगातार हो रही बारिश और इसकी वजह से हुए जलभराव के बीच मुंबई में जो जहां था, वहीं रुक गया. मजबूरन रुकना पड़ा. ट्रेन सर्विस रुक गई. बसें थम गईं. कारों के पहिये पानी में डूबे थे. 26 जुलाई की बुरी यादों का असर कहिए कि मुंबई पुलिस को लोगों से अपील करनी पड़ी कि 2 फुट पानी से ज्यादा जलभराव होने पर कार को वहीं छोड़कर बाहर निकल जाएं. दफ्तर बंद हो गए, लेकिन घर पहुंचने की राह नजर नहीं आ रही थी. किलोमीटर दर किलोमीटर, लोग पैदल ही सफर तय करने को मजबूर थे. ऐसा लगा कि जैसे 29 अगस्त, 2017 को किसी ने मुंबई की उसी 12 साल पुरानी दुखती रग पर धरकर जूता गड़ा दिया हो. लेकिन तमाम परेशानियों, दुश्वारियों और मुसीबतों के बीच भी जो चीज किसी सिल्वर लाइनिंग की तरह लगातार चमकती रही, वह थी मुंबई शहर की जीवटता. पांव न उखड़ने देने की जिद. तमाम तकलीफों के बीच भी मुंबई की वही जिंदादिली हंसती-मुस्कुराती हुई अपना काम करती रही.

 

Ashfaq, 10, carries his two-year-old brother Farhaan through a flooded pathway in a Mumbai slum June 6, 2011. REUTERS/Danish Siddiqui (INDIA - Tags: SOCIETY IMAGES OF THE DAY)
मुंबई को बाढ़ की आदत है. जून 2011 में आई बाढ़ में अपने 2 साल के भाई को गोद में लेकर जाता 10 साल का एक लड़का. (फोटोःरॉयटर्स)

 

माफ कीजिए, लेकिन मुंबई के बारे में सरासर गलत लिख गए हैं मजरूह सुल्तानपुरी

हादसे कहां नहीं होते. कभी इंसानों के बनाए, तो कभी कुदरत के दिए हुए. झेलते कमोबेश सभी हैं. मुंबई भी इससे अछूती नहीं. लेकिन कई मायनों में मुंबई सबसे अलहदा है. अपनी लीग में सबसे अलग नजर आती है. लाल जूतों से भरे किसी दुकान में रखे इकलौते सफेद जूते की तरह अलग. आप कोशिश करिए एक ऐसी मिसाल तलाश करने की जहां लोग अपने घर-गली में भरे कमर तक पानी में घंटों खड़े रहें, ताकि आने-जाने वाले राहगीरों को आगाह कर सकें कि सामने ठीक उस जगह पर एक खुला मेनहोल है. क्या ऐसी कोई दूसरी मिसाल याद आती है जहां किसी महानगर के लोग अजनबियों की मदद के लिए अपने घर के दरवाजे खोल दें.

 

 

हां, ये सब उस मुंबई की कहानियां हैं जिसके बारे में अनगिनत किस्से मशहूर हैं कि वहां जिंदगी हर सेकंड रिले रेस दौड़ती रहती है. वही मुंबई जिसके बारे में लोग कसम खाकर कहते हैं कि वहां कोई किसी के लिए नहीं ठहरता. वही मुंबई जहां रहने वाले अकेलेपन की शिकायत करते-करते थकते नहीं. इसी मुंबई के बारे में गुलजार ने लिखा था-

एक अकेला इस शहर में, रात में और दोपहर में… आशियाना ढूंढता है आबोदाना ढूंढता है.

इसी मुंबई जिसके लिए मजरूह सुल्तानपुरी लिख गए हैं- ए दिल है मुश्किल जीना यहां, जरा हट के जरा बच के, ये है मुंबई मेरी जान. अगर मजरूह होते, तो यकीनन मुंबई के लिए ‘मिलता है यहां सब कुछ बस मिलता नहीं दिल’ नहीं लिखते. जिस मुंबई की मसरूफियत और ‘ठंडेपन’ पर कई गाने-मुहावरे और किस्से बने, वही मुंबई मुश्किल की घड़ी में यूं पेश आती है कि मिसाल बन जाती है.

 

नौसेना ने भी लोगों के लिए खाने के स्टॉल लगाए
नौसेना ने भी लोगों के लिए खाने के स्टॉल लगाए

 

इतनी मसरूफियत में भी सोलह आने इंसानियत दिखाती है मुंबई

हम पर यकीन नहीं है, तो आप खुद मीडिया और सोशल मीडिया को खंगाल लीजिए. कितने इंच बरसात हुई, मौसम विभाग ने क्या चेतावनी दी है, आने वाले 48 घंटे बारिश का मिजाज कैसा रहेगा, आसमान अपने सुराख से कितना पानी बरसाएगा, इन सब चीजों पर आपको कई खबरें मिलेंगी. लेकिन सबसे ज्यादा बात जिस चीज की हो रही है, वह है ‘Spirit of Mumbai.’ ये वही स्पिरिट है जो अजनबियों की मदद में हाथ आगे बढ़ाती है. यही स्पिरिट है जो पहिये तक डूबी कार के अंदर घंटों बंद बैठे मजबूर अजनबियों को खाना बांटती है. यही तो है कि लोग सोशल मीडिया पर अपने घर का पता बताते हुए लिख रहे हैं कि कोई भी इंसान जो आस-पास कहीं फंसा हुआ है, वो उनके यहां आ सकता है.

 

 

लोग लिख रहे हैं- हमारे घर आओ. खाना खिलाएंगे, वाई-फाई देंगे और सोने की जगह भी मिलेगी. मुंबई पुलिस के सिपाही-हवलदार घुटने भर पानी में लगभग तैरते हुए लोगों की मदद करते रहे. नेवी ने लोगों के लिए मुफ्त खाने-पीने का स्टॉल लगाया. गुरुद्वारों, चर्चों, मंदिरों और मस्जिदों ने लोगों के लिए अपने दरवाजे खोल दिए. दफ्तरों में फंसे कर्मचारियों को वहीं नाश्ता-खाना मुहैया कराया जा रहा था. लोगों ने सोशल मीडिया पर लिखा कि कैसे लोग लोकल ट्रेन्स में जरूरतमंदों को खाने-पीने की चीजें बांट रहे थे. कुल मिलाकर मुसीबत की इस घड़ी में मुंबईवाले जिस तरह एक-दूसरे का सहारा बने, उसे देखकर लगा कि वे खुद अपनी मदद के लिए काफी हैं.

कहां मुंबई और कहां दिल्ली… कोई मुकाबला ही नहीं है

मुंबई और दिल्ली का नाम अक्सर एक-दूसरे के साथ आता है. एक मुल्क की राजधानी, एक आर्थिक राजधानी. एक जिससे देश चलता है, दूसरा जहां से देश चलाने का पैसा आता है. सिवा इस अहमियत के इन दोनों शहरों में शायद कुछ भी एक जैसा नहीं मिलेगा. मुंबई की जिंदादिली की हम जहां मिसाल देते थक नहीं रहे, वहीं दिल्ली का दिल ही गायब है. यहां मरते हुए को लोग नहीं बचाते, बगल से देखकर निकल जाते हैं. अव्वल तो निकलते भी नहीं, तमाशा देखने के लिए खड़े हो जाते हैं. दिल्ली में लोग इतने बेगैरत हैं कि सरकार यहां किसी जरूरतमंद की मदद करने वाले को 2,000 रुपये का इनाम देती है. इस उम्मीद में कि इंसानियत नहीं, तो कम से कम रुपयों के लिए ही सही, लेकिन लोग आगे आकर दूसरों की मदद तो करेंगे. इसी दिल्ली में एक घायल शख्स 12 घंटे तक सड़क पर पड़ा रहता है, लेकिन उसे मदद नहीं मिलती. मिलते हैं तो बस चोर, जो उसकी जेब में रखे फोन पर हाथ साफ कर लेते हैं. और तो और, उसके 12 रुपये तक भी नहीं छोड़ते. किसी जख्मी इंसान की जेब से 12 रुपये चुराने की नीचता दिखाने वाले लोग कहां रहते हैं?

 

दिल्ली में एक्सिडेंट के बाद घायलों से पैसे चुराने के मामले सामने आए हैं
दिल्ली में एक्सिडेंट के बाद घायलों से पैसे चुराने के मामले सामने आए हैं

 

जिंदा इंसान को लाश बनते देखने के लिए दिल्ली जैसा ‘मरा’ हुआ कलेजा चाहिए
पिछले साल दिल्ली के ही विवेक विहार इलाके में एक घायल इंसान सरेआम सड़क पर पड़ा रहा, लेकिन किसी ने उसकी जान नहीं बचाई. लोग देखकर गुजरते रहे, कतरा कर आगे बढ़ते रहे, लेकिन एक भी भला इंसान ऐसा नहीं था जिसने सोचा हो कि घायल को अस्पताल पहुंचा दें, ताकि वो बेचारा मृतक बनने से बच जाए. जी जाए. पिछले साल ही दिल्ली के कनॉट प्लेस एरिया में एक आइसक्रीम ट्रॉली वाला सड़क पार कर रहा था, जब एक तेज रफ्तार से आ रही कार ने उसे जोर से टक्कर मारी. लोग जमा हो गए और सबने मिलकर कार को जबरन रुकवाया. लोगों की नाराजगी से बचने के लिए ड्राइवर ने कहा कि वो उस शख्स को अस्पताल पहुंचाएगा और उसका पूरा इलाज कराएगा. लोगों ने आइसक्रीम ट्रॉली वाले को कार की पिछली सीट पर लिटाया और ड्राइवर को जाने दिया. आपको पता है उस ड्राइवर ने क्या किया? आगे जाकर उसने उस घायल इंसान को सड़क किनारे फेंक दिया. पूरी रात वो वहां पड़ा रहा, लेकिन किसी ने उसकी मदद नहीं की.

ऐसे न जाने कितने वाकये आए दिन होते हैं दिल्ली में. कई को अखबारों में जगह मिलती है, कई गुमनाम ही रह जाती हैं. अखबार में पढ़कर, टीवी पर देखकर लोग पिच्च-पिच्च करते हैं और बस, इतना ही करके रह जाते हैं. अगर आप दिल्ली के रहने वाले हैं, तो आप जानते होंगे कि सड़क पर कोई ऐक्सिडेंट देखकर किस तरह वहां से गुजरने वाले लोग अपनी कार-बाइक रोकते हैं, टहलते हुए थोड़ा पास आते हैं, किसी दर्शक की तरह ‘मजा’ लेते हैं और फिर अपनी राह आगे बढ़ जाते हैं. ऐसे मौकों पर दिल्ली वालों (ऐसे दाग कलेक्टिव होते हैं) का बर्ताव ऐसा होता है, मानो आपदा मनोरंजन का लुत्फ उठा रहे हों.

 

दिल्ली में पिछले दिनों एक ज़ख्मी लड़के को लोगों ने पानी तक नहीं पिलाया था
दिल्ली में पिछले दिनों एक ज़ख्मी लड़के को लोगों ने पानी तक नहीं पिलाया था

 

मुसीबत में फंसे लोगों को नोच-खसोटकर भी मुनाफा कमाते हैं लोग

कुछ नजीरें केदारनाथ हादसे के बाद की भी हैं, जिनको सुनकर एकबारगी आपको मितली सी आने लगेगी. जून 2013 में जब केदारनाथ त्रासदी हुई, तो आस-पास के इलाकों में रहने वाले कई स्थानीय लोगों ने खूब फायदा उठाया. आपदा को कैश करते हुए लोगों ने वहां फंसे तीर्थयात्रियों से जैसे हो सका, वैसे पैसे बनाए. 5 रुपये के पारले-जी बिस्किट के लिए लोगों ने 200 रुपये वसूले. 20 रुपये की पानी की बोतल तीर्थयात्रियों को 100 रुपये में बेची गई. एक महिला ने उस समय मीडिया को बताया था कि उसे और उसके ग्रुप के 5 लोगों को एक वक्त का खाना खाने के लिए 5,000 रुपये खर्च करने पड़े. स्थानीय लोग तीर्थयात्रियों की मजबूरी का जितना फायदा उठा सकते थे, उतना फायदा उठाया.

हालत खराब है, लेकिन इंसानियत मरी नहीं है अभी

हालांकि सारी तस्वीरें निराश करने वाली ही नहीं हैं. कुछ अच्छी नजीरें भी हैं, लेकिन उन पर अक्सर बात नहीं की जाती. अक्सर ऐसा होता है कि जब किसी शहर से किसी बड़े हादसे (इंसानी या कुदरती) की खबर आती है, खासतौर पर बड़े शहरों से, तो उसके पीछे-पीछे भयंकर डिप्रेस्ड करने वाली खबरें भी तैरती आती हैं. छोटे शहर और गांव थोड़े अपवाद हैं. गांवों में दूसरों की ओर बढ़ाई जाने वाली रोटी गिनी नहीं जाती. कहते हैं कि जब वास्कोडिगामा भारत से वापस लौटा तो लोगों ने उससे पूछा कि उसे इस मुल्क की कौन सी बात सबसे अच्छी लगी. वास्कोडिगामा का जवाब कुछ यूं था, ‘वहां लोग बड़े प्यारे हैं. अजनबी को भी गुड़ की डली के बिना पानी नहीं देते.’

 

उत्तराखंड में आई बाढ़ के दौरान सैलानियों को बहुत महंगे दाम पर सामान बेचने के मामले सामने आए थे
उत्तराखंड में आई बाढ़ के दौरान सैलानियों को बहुत महंगे दाम पर सामान बेचने के मामले सामने आए थे

 

अक्सर जब कोई रेल हादसा होता है, तब घटना वाली जगह पर सबसे पहले आस-पास के गांवों में रहने वाले लोग पहुंचते हैं. घायलों की मदद करना, उन्हें बाहर निकालना, लोगों की तीमारदारी, ये लोग प्रशासन से पहले वहां मौजूद होते हैं. इक्का-दुक्का खबरों के अलावा इन लोगों का कभी जिक्र नहीं होता. इनकी स्पिरिट पर पन्ने नहीं खर्च किए जाते. इनके नाम पर सोशल मीडिया में कोई हैशटैग नहीं चलता. बिना वाहवाही और पहचान के ही ये लोग इंसानियत का सबसे जरूरी फर्ज निभाते हैं. ऐसे निभाते हैं जैसे यही स्वाभाविक हो. कि जैसे ऐसे मौकों पर इंसान को यही तो करना चाहिए. सही भी है. किसी जरूरतमंद की मदद करना और बतौर इंसान इंसानियत दिखाना, कोई ऐसी बात नहीं कि उसकी तारीफ में किताबें लिखी जाएं. लेकिन मौजूदा वक्त थोड़ा अलग है. यहां लोग बुनियादी चीजें ही नहीं करते. शायद इसीलिए मुंबई की वाहवाही करना इतना जरूरी हो गया है.

अपने पैर उखड़ने नहीं देता ये शहर
मुंबई की जिंदादिली बस इतने पर ही खत्म नहीं होती. बड़ी से बड़ी मुसीबत के बाद भी ये शहर पलक झपकते ही शरीर पर लगी गर्द झाड़कर खड़ा हो जाता है. मुंबई के लिए लोकल ट्रेन ऐसे ही है जैसे हमारे जिस्म के लिए धमनियां. 11 जुलाई, 2006 को हुए सिलसिलेवार धमाकों की अगली सुबह आपको मुंबई में होना चाहिए था. अगली सुबह फिर से मुंबईवाले रोजमर्रा के अपने किरदार निभाने घर से बाहर निकले. 24 घंटे से भी कम वक्त में लोग डर को ठेंगा दिखाकर अपनी स्वाभाविक जिंदगी में लौट चुके थे. 26/11 हमले के बाद भी मुंबई शहर का यह रिवाज सलामत था. ऐसे जैसे कि डरकर मुंह चुराना उन्हें मंजूर ही नहीं.

 

Pedestrians holding umbrellas walk through a market during monsoon rains in Mumbai June 18, 2013. The rains are at least twice as heavy as usual in northwest and central India as the June-September monsoon spreads north, covering the whole country a month faster than normal. REUTERS/Vivek Prakash (INDIA - Tags: ENVIRONMENT SOCIETY)
मुंबईकर बारिश-बाढ़ से डर कर घरों में बंद नहीं होते. बारिश उनके दिन का हिस्सा बन जाती है. (फोटोःरॉयटर्स)

 

बहुत से लोगों को यह ‘स्पिरिट ऑफ मुंबई’ शायद अतिश्योक्ति टाइप लगेगा, लेकिन अगर कोई इंसान हर बार हर इम्तिहान में डिंस्टिक्शन से पास होकर दिखाए, तो उसके लिए ताली बजाना तो बनता है. शायद इन तालियों की गूंज दिल्ली जैसी जगहों को इंसान होने की अहमियत समझा सकें. शायद मुंबई को मिल रही ये वाहवाही बाकियों को भी बेहतर होने का सबक दे सके. ऐसा नहीं कि मदद का हाथ बढ़ाने और जिंदादिली दिखाने वाले शहरों में मुंबई अकेला है. और भी हैं, लेकिन उनकी तादाद कम है.


 

ये स्टोरी स्वाति ने की है.


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