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फिल्मों का सीरियल किसर, असल जिंदगी में कैंसर से जीतने वाले बच्चे का पिता

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दिबाकर बनर्जी की ‘शाघांई’ के पहले का एक इंटरव्यू था इमरान हाशमी का. सच बात ये है कि मैं वो इंटरव्यू अपने प्रिय निर्देशक दिबाकर बनर्जी की वजह से देखने बैठा था. इस ‘सीरियल किसर’ के तमगे वाले अभिनेता को सुनने में मेरी खास दिलचस्पी नहीं थी. लेकिन कुछ ऐसा हुआ उस इंटरव्यू में, कुछ ऐसा जो दिमाग़ में बने पूर्वनिर्मित खांचे तोड़नेवाला था. फिल्म में इमरान बहुत ही अलग लुक में नज़र आने वाले थे. उनका रंग गहरा किया गया था कस्बाई नायक के रोल के लिए. सिर्फ घड़ी के पट्टे के पीछे से असल गेहुंआ रंग झांकता था. फिर उनसे सवाल पूछा गया, दांतों को भी गहरे रंग का किया गया होगा? इमरान ने जवाब दिया वो बहुत कमाल था, उन्होंने कहा,

“नहीं वो तो मेरे असल दांत हैं. फिल्मों में उन्हें सफेद दिखाने के लिए मेकअप करना पड़ता है. इस फिल्म में तो कोई मेकअप नहीं करना पड़ा.”

सच बात है कि मैंने तभी पहली बार इमरान हाशमी को सीरियसली लेना शुरु किया था. वो सच कह रहे थे या झूठ, वो खास नहीं यहां. खास है उनका खुद को लेकर, अौर अपनी इमेज को लेकर कैजुएल एप्रोच. यही एप्रोच उन्हें सेल्फ कॉंशस समकालीन महानायकों की फेरहिस्त से अलग खड़ा करता है. लगता है जैसे उनको फिकर नहीं है मायानगरी की इस ‘चूहा दौड़’ की, लगता है कि वो बस अपना काम कर खुश हैं. ऐसा नायक जो खुद के ‘अौसत’ होने को खुशी-खुशी स्वीकार कर लेता हो, आज भी हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री के लिए दुर्लभ है.

डर के आगे जीत है बतानेवाली किताब

पिछले दिनों मैं इमरान हाशमी की किताब ‘दि किस अॉफ लाइफ़’ पढ़ रहा था, अौर ठीक यही बातें मेरे दिमाग़ में घूमती रहीं. लेखक बिलाल सिद्दीकी के साथ मिलकर लिखी ये किताब खास है क्योंकि ये एक सिनेमाई नायक का आत्मकथन नहीं, एक पिता के शब्दों में उसकी संतान के जीवन के लिए लड़ने अौर फिर उठ खड़े होने की कहानी है. इमरान हाशमी के तीन साल के बेटे अयान को 2014 की जनवरी में किडनी में ट्यूमर डिटेक्ट हुआ, जिसकी जांच के बाद पता चला कि वो खास बच्चों में होनेवाला कैंसर का एक प्रकार है. ‘विल्मस ट्यूमर’ नाम की इस बीमारी ने इमरान अौर उनकी पत्नी परवीन की ज़िन्दगी को हिला कर रख दिया.

कैंसर आज भी हमारे बीच एक ऐसा शब्द बना हुआ है, जिसका ज़िक्र मौत से भी बुरा समझा जाता है. इसको लेकर जितना डर है, उतनी ही गलतफहमियां भी फैली हुई हैं. हां, सच है कि कैंसर जानलेवा बीमारी है, लेकिन सही समय पर पता लगने पर इसका इलाज संभव है ये भी एक सच्चाई है. लेकिन हम अभी तक इसे एक सामान्य बीमारी की तरह ट्रीट करना नहीं सीखे हैं.

इमरान की किताब की खासियत मुझे यही लगी कि वो अयान की बीमारी के दौरान अपनी इस ‘अपरिचित डर’ से ‘जागरुक देखभाल’ की अोर की गई यात्रा को बहुत ही सरल शब्दों में दर्ज करते जाते हैं. उनका शुरुआती डर भी यहां सच्चा है अौर जब वो किताब के आखिर में किसी दुर्गम सफ़र से जीतकर लौटे यात्री की तरह ज्ञान देने लगते हैं, उसमें भी एक कमाल की भोली ईमानदारी है.

बैटमैन बनकर जीता कैंसर से मैच

तीन साल के बच्चे को कैसे समझाएं की उसे कैंसर है, अौर कीमोथैरेपी की जटिल प्रक्रिया के लिए उसे कैसे राज़ी करें? माता-पिता के लिए शायद यही सबसे बड़ी चुनौती थी. इमरान का फिल्मी अनुभव शायद इससे बेहतर काम नहीं आ सकता था. एक दिन उन्होंने अयान को बैटमैन बनकर फोन किया, जो अयान का फेवरिट सुपरहीरो था. अौर छोटे से अयान को बताया एक गेम के बारे में, जिसे जीतने पर अयान भी सुपरहीरो आयरनमैन की तरह ‘अयान-मैन’ बन जाएगा. अयान गेम के लिए फौरन तैयार हो गया. फिर हिन्दुस्तान में अौर आगे कनाडा में चले लम्बे इलाज में, जब भी ट्रीटमेंट के लिए अयान को तैयार करना होता, इमरान वहीं दूसरे फोन से उसे बैटमैन बनकर फोन करते अौर अयान को यूं मना लेते. मुझे किताब का ये हिस्सा पढ़ते हुए ना जाने क्यूं ‘लाइफ इस ब्यूटीफुल’ बहुत याद आती रही, अौर इमरान पर अौर उनके बच्चे पर अौर प्यार आता रहा.

शुगर हैवी जंक फूड असली विलेन है

इलाज के बाद भी बेटे को जंक फूड खाने से रोकने के लिए पिता ने सुपरहीरो की सीख का सहारा लिया. लेकिन अच्छी अौर सीखनेवाली बात इमरान अौर परवीन ने की, उन्होंने भी अपने बेटे के साथ हमेशा के लिए जंक फूड अौर शुगर हैवी फूड खाना छोड़ दिया. हमारे लिए भी किताब के अंत में इमरान की यही सलाह है, say no to sugar heavy food! दरअसल कैंसर को लेकर लोगों के मन में डर की एक बड़ी वजह ये भी है कि उसके होने का ठीक-ठीक कारण अभी तक हमें नहीं मालूम है. लेकिन जो हम कर सकते हैं वो ये कि लाइफ़स्टाइल में कैंसर का खतरा कम करने के लिए जो कुछ किया जाना चाहिए वो करें. इमरान आगे बढ़कर ये भी बताते हैं कि सिर्फ़ ‘विज़िबल शुगर’ को खाने से कम करना उपाय नहीं, बल्कि ऐसे हर किस्म के भोजन को ना कहना होगा जिसमें शुगर का इस्तेमाल है. तकरीबन हर किस्म के पैकेज्ड फूड में उसकी उम्र बढ़ाने के लिए शुगर का इस्तेमाल होता है. बहुत सी बड़ी कॉर्पोरेट इंडस्ट्री का धंधा लोगों की इन्हीं जंक फूड अौर रेडिमेड फूड खानेवाली आदतों के चलते फल-फूल रहा है.

इमरान इशारा करते हैं कि आज जो अवेयरनेस की कमी देखी जा रही है, कहीं इस बिग फूड इंडस्ट्री का भी हाथ है उसके पीछे. उनकी लिखी कई बातें सच में आंखें खोलनेवाली हैं, इसलिए भी क्योंकि इसे लिखनेवाला एक चिंतित पिता है.

पराए मुल्क पाकिस्तान में दादा की खोज

इमरान यहां कहानी के बीच बीच में अपने जीवन, परिवार अौर करियर से जुड़े भी कई दिलचस्प किस्से सुनाते हैं. उनमें से ही एक दिलचस्प वाकया है जो उन्होंने अपने पिता से सुना. किस्सा शुरु होता है इमरान के पिता अनवर हाशमी की पहली पाकिस्तान यात्रा से, जिसकी वजह थे देश के प्रधानमंत्री राजीव गांधी. दरअसल अनवर एयर इंडिया में काम किया करते थे. साल 1986 में उन्हें एयरलाइंस की अोर से दो दिन के लिए कराची भेजा गया, क्योंकि उस दौरान देश के प्रधानमंत्री का विमान पाकिस्तान के ऊपर से उड़नेवाला था. उन्हें भेजा जाना प्रोटोकॉल का हिस्सा था, कि कहीं प्राइम मिनिस्टर के विमान को आपातकालीन लैंडिंग करनी पड़े तो वे वहां ज़मीनी इंतज़ाम पूरा रखें. लेकिन पाकिस्तान पहुंचकर अनवर हाशमी को अपने पिता की याद आई, जो उन्हें अौर उनकी मां को छोड़कर 1951 में पाकिस्तान में आ बसे थे. अनवर की उम्र उस वक्त बस 7 साल की थी. बात दिल में घर कर गई, अौर अनवर दोबारा लौटे पिता की तलाश में.

कहीं से पता चला की वे अब अपने नए परिवार के साथ लाहौर में रहते हैं, अौर अनवर तलाश करते उनके दरवाज़े पर जा पहुंचे. दरवाज़ा खटखटाया. उनके ही कद के एक वृद्ध सज्जन ने दरवाज़ा खोला अौर कुछ देर दोनों एक-दूसरे को देखते रहे. अौर फिर वृद्ध शौकत हाशमी बोले, “आ गए ना तुम. आखिर में, आ ही गए.” दोनों बाप-बेटों की सूरतें इकसार थीं. वो एक ही दिन का साथ था. इसी मुलाकात में अनवर ने शौकत हाशमी को इमरान के बारे में बताया होगा, उनका पोता. दोनों से साथ नमाज़ पढ़ी होगी अौर फिर मिलने के वादे हुए. लेकिन वो दिन फिर कभी नहीं आया. 1992 में अनवर को खबर मिली कि शौकत हाशमी का पाकिस्तान में इंतकाल हो गया है.

इमरान का पहला सीन, अौर 45 रीटेक

इमरान हाशमी सेंडनहम कॉलेज में कॉमर्स पढ़ा करते थे. लेकिन पढ़ाई में उनका मन नहीं लगता था. इमरान लिखते हैं कि परीक्षा के दिनों में भी वो बस इसीलिए थोड़ा पढ़ लेते थे जिससे परीक्षाएं दोबारा ना देनी पड़ें.  एक दिन उनके अंकल मुकेश भट्ट घर आए अौर उन्हें ऐसे ही वेल्ला घूमता देखकर अॉफिस आने को कहा. हालांकि इमरान ने बचपन में कई एड फिल्मों में काम किया है, लेकिन एक्टर बनना उनका लक्ष्य नहीं था. विक्रम भट्ट के साथ टीवी सीरियल ‘धुंध’ में असिस्टेंट के रूप में उनका फिल्मी सफ़र शुरु हुआ. बाद में वो विक्रम भट्ट की फिल्म ‘कसूर’ में भी असिस्टेंट बने. लेकिन वो डाइरेक्शन में लगनेवाली मेहनत संभाल नहीं पा रहे थे. इमरान बहुत ईमानदारी से बताते हैं कि जब वे लाइफ में कुछ भी ठीक से नहीं कर पा रहे थे तो भट्ट साहब ने कहा था, “लगता है इसे हमें एक्टर ही बनाना पड़ेगा”.

एक्टिंग का सफ़र शुरु हुआ ट्रेनिंग से. पहले पृथ्वीराज दुबे की कठोर थियेटरवाली ट्रेनिंग अौर फिर रौशन तनेजा एक्टिंग स्कूल से सिनेमाई ज्ञान. उसके बाद उन्हें अमीषा पटेल के साथ ‘ये ज़िन्दगी का सफ़र’ में कास्ट किया गया था. लेकिन इमरान तैयार नहीं थे. उन्होंने मना कर दिया. वो भट्ट साहब की डांट थी जिसने इमरान को ‘फुटपाथ’ के लिए तैयार किया. वो उसे अपने साथ ऊटी ले गए, जहां वो नई फिल्म की स्क्रिप्ट तैयार कर रहे थे. भट्ट साब इमरान के करियर अौर उनके जीवन का भी आधार स्तंभ रहे हैं. फिर आया दिन पहले शॉट का, जिसके 44 टेक पर भी इमरान एक डॉयलॉग सही तरह से नहीं बोल पाए. लेकिन दूसरे दिन उन्होंने पहले ही टेक में पर्फेक्ट शॉट दिया. फिल्म के कैमरामैन ने उस दिन भट्ट साब को मैसेज किया था, जो भट्ट साब ने बाद में इमरान को दिखाया.

मैसेज था, “Congrats, we have a star in the family!”

चोरी की थी ‘सीरियल किसर’ वाली टीशर्ट

ये किस्सा तब का है जब इमरान हाशमी मौरिशस में ‘जवानी दीवानी’ की शूटिंग कर रहे थे. उनके जिगरी दोस्त ने उन्हें वहीं लोकल मार्केट से खरीदी टीशर्ट दिखाई,  जिसे देखते ही इमरान के चेहरे पर बदमाशी वाली चमक आ गई. हरे रंग की इस फुलस्लीव टीशर्ट पर लिखा था, ‘सीरियल किसर’. इमरान देखते ही बोले, “भाई, इस कंट्री में तो किसी को इस टीशर्ट को पहनना चाहिए, तो वो मैं हूं.” उस समय तक इमरान ऐसी कम से कम पांच फिल्में कर चुके थे, जिसमें उनके काफ़ी बोल्ड सीन थे.

लेकिन दोस्त टीशर्ट देने से इनकार हो गया. पर इमरान भी कहां मानने वाले थे. उन्होंने दोस्त के पीछे से उसके होटल के कमरे में एंट्री ली अौर टीशर्ट चुरा ली. अगले ही पल वो ‘सीरियल किसर’ वाली टीशर्ट पहनकर कैमरे के सामने थे. निर्देशक मनीष शर्मा भी टीशर्ट पर वो कैप्शन देखकर खुश हो गए अौर सीन एक ही टेक में अोके हो गया.

इमरान अपनी किताब में लिखते हैं कि उन्हें तब इस बात का अंदाज़ नहीं था कि वो अपने को किस भारी मुसीबत में गिरा रहे हैं. क्योंकि वो दिन है अौर आज का दिन है, मीडिया ने ये ‘सिरियल किसर’ का नाम इमरान हाशमी के साथ नत्थी कर दिया है. इमरान किताब में लिखते हैं, “मैंने खुद ही अपनी कब्र खोदी अौर इसके लिए मैं ही ज़िम्मेदार हूं. लेकिन सच बात ये है कि मुझे इस टैगलाइन से ज़्यादा दिक्कत भी नहीं. बल्कि कुछ फिल्मों में तो इसने मुझे मदद भी पहुंचाई है. दर्शकों का एक बड़ा हिस्सा है जो सच में ‘सीरियल किसर’ इमरान हाशमी को देखने ही सिनेमाहाल में आता है.”

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