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कहानी काबा में लगे काले पत्थर की, जिसके बारे में अलग-अलग किस्से मशहूर हैं

20196805_10213145238562576_712062070_n_210717-073138-265x150ये आर्टिकल ‘दी लल्लनटॉप’ के लिए ताबिश सिद्दीकी ने लिखा है. ‘इस्लाम का इतिहास’ नाम की इस सीरीज में ताबिश इस्लाम के उदय और उसके आसपास की घटनाओं के बारे में जानकारी दे रहे हैं. ये एक जानकारीपरक सीरीज होगी जिससे इस्लाम की उत्पत्ति के वक़्त की घटनाओं का लेखाजोखा पाठकों को पढ़ने मिलेगा. ये सीरीज ताबिश सिद्दीकी की व्यक्तिगत रिसर्च पर आधारित है. आप ताबिश से सीधे अपनी बात कहने के लिए इस पते पर चिट्ठी भेज सकते हैं – writertabish@gmail.com


इस्लाम के पहले का अरब: भाग 7

काबा की बाहरी दीवार के पूर्वी कोने में एक काला पत्थर लगा हुआ है. इस्लाम के आने से पहले, हज के दौरान हाजी काबा की सात बार परिक्रमा करते थे. हर चक्कर के बाद वो रूककर काबा की बाहरी दीवार के कोने में लगे इस पत्थर को चूमते थे और ‘अल्लाह हु अकबर’ (अल्लाह सबसे बड़ा है) बोलते थे. ये परंपरा जैसी इस्लाम के पहले हज में थी, वैसी ही आज है. मगर आजकल भीड़ ज्यादा होने की वजह से हर व्यक्ति का इसको चूम पाना लगभग असंभव होता है. इसलिए हर चक्कर के बाद लोग इस पत्थर की तरफ़ सिर्फ इशारा करके बोलते हैं, ‘अल्लाह हु अकबर’. इस्लाम के पहले से भी इस परंपरा को ऐसे ही निभाया जाता था.

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एक पत्थर से जुड़े हैं बेशुमार किस्से

चारों ओर चांदी के फ्रेम में जड़ा हुआ ये काला पत्थर, जिसे अरबी में अल-हजरु अल-अस्वद कहते हैं, इतिहासकारों और अन्य धर्मों के लोगों के लिए हमेशा से कौतुहल का विषय रहा है. इस्लाम आने के बाद इस पत्थर को लेकर इतनी किवदंतियां गढ़ी गई हैं कि असल सच उनकी भूलभुलैया में कहीं खो कर रहा गया है. इस पत्थर को लेकर इंटरनेट पर और तमाम किताबों में इतिहासकारों, लेखकों ने अपने-अपने हिसाब से तर्क दिए हैं.

काबा के पूर्वी कोने में लगा है ये पवित्र पत्थर.
काबा के पूर्वी कोने में लगा है ये पवित्र पत्थर.

कोई इसे एक ‘धूमकेतु’ का टुकड़ा बताता है, तो कोई चांद से टूट कर गिरा एक टुकडा. ये सब अनुमान सिर्फ इसीलिए लगाए जाते हैं क्योंकि इसके बारे में सटीक जानकारी किसी को उपलब्ध नहीं है. इसलिए अगर हमे इस पत्थर की उत्पत्ति का सबसे सटीक अनुमान लगाना है, तो किवदंतियों और मान्यताओं से परे जाकर अरब और उसके आसपास के पुराने धार्मिक रीती-रिवाजों में झांकना होगा.

कुरान में नहीं है ज़िक्र

सबसे पहली बात जो इसमें ध्यान देने योग्य है, वो ये कि इस पत्थर का कोई भी ज़िक्र कुरान में नहीं आया है. ये सबसे अहम् हिस्सा है, जिस पर सबसे पहले गौर करना चाहिए. इसका ज़िक्र कुरान में न होना इस बात की तरफ़ इशारा करता है कि इस पत्थर को पूज्य या तो पैगंबर के इस दुनिया से जाने के कुछ ही दिनों पहले के दिनों में बनाया गया या फिर जाने के बाद. इसका ज़िक्र कुरान में न होकर सिर्फ हदीसों में मिलता है. और हदीसें बस कही-कहाई बातें हैं, जिनका कोई ऐतिहासिक आधार नहीं है. इसी वजह से हदीसों में क्या सच है, क्या झूठ कोई बिलकुल दावे से नहीं बता सकता है.

काबा मुसलमानों का सर्वोच्च धार्मिक स्थान है.
काबा मुसलमानों का सर्वोच्च धार्मिक स्थान है.

हदीसों में भी अलग-अलग बातें हैं

इस पत्थर की उत्पत्ति को लेकर बहुत सी इस्लामिक हदीसें हैं. कोई हदीस कहती है कि पैगंबर इब्राहीम जब काबा बना रहे थे तो दीवार में एक जगह खाली रह गयी थी. उसको भरने के लिए उन्होंने अपने बेटे इस्माईल को बोला कि कोई पत्थर ढूंढ के लाओ. इस्माईल जब ढूंढने गए, तो कोई पत्थर न मिला. मगर जब वो वापस आए तो देखा कि ये काला पत्थर दीवार के उस ख़ाली कोने में लगा है. इस्माईल ने जब अपने पिता से पूछा कि ये पत्थर कहां से आया, तो इब्राहीम ने कहा कि जन्नत से जिब्राईल नाम के फ़रिश्ते ने इसे लाकर दिया है. बस उसी दिन से ये काबा में लगा है और पूज्य हो गया.

ये तो हुई इस्लामिक किवदंती. इस किवदंती का कोई भी सुबूत इन हदीसों के सिवा दुनिया की किसी भी इतिहास की किताब में, यहां तक कि कुरान में भी नहीं मिलता है. तो फिर इस पत्थर को पूजने के पीछे छिपी मान्यता को आखिर कहाँ ढूंढा जाए?

ग्रीक भाषा का एक शब्द है बैतुलस (Baetylus). सेमिटिक धर्मों, यानी इसाईयत, यहूदी, और इस्लाम मानने वालों की मिली जुली भाषा, यानी सेमिटिक भाषा (अरबी, हिब्रू इत्यादि) में इसे ‘बैत-एल’ या ‘बैतुल’ कहा जाता है. जिसमे बैत का अर्थ होता है घर और एल मतलब ख़ुदा. इसी एल शब्द से आगे चलकर इलाह और फिर अल्लाह शब्द की उत्पत्ति हुई. बैतुल का पूरा अर्थ हुआ ख़ुदा का घर.

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बैतुल शब्द ऐसे पवित्र पत्थर के लिए इस्तेमाल होता था, जिसके बारे में ये मान्यता होती थी कि उस पत्थर में जान है. ऐतिहासिक जानकारी के अनुसार ये पत्थर या तो धूमकेतु के टुकड़े होते थे या फिर उस जैसे दिखने वाले लावा के पत्थर. जिनकी अरब और उसके आसपास के लोग पूजा किया करते थे.

बैतुल की इस पत्थर में जान होने की धारणा पर अगर हम आगे बढ़ें तो एक हदीस से इसे बेहतर समझा जा सकता है. एक बार जब खलीफ़ा उमर ने पत्थर को ये कहते हुए चूमा कि,

“तू सिर्फ एक पत्थर है. तू न किसी को कोई फायदा पहुंचा सकता है, न नुकसान. इसलिए, अगर तुझे मुहम्मद ने न चूमा होता तो मैं तुझे न चूमता.” (सहीह बुखारी हदीस Vol. 2, Book 26, Hadith 667).

बुखारी की हदीस में ये हदीस यहीं तक है. मगर हदीस कंज उल-उम्माल में ये हदीस और आगे तक जाती है. जो कहती है कि उमर की ये बात सुनकर अली उनसे कहते हैं,

“बिलकुल ये पत्थर नुकसान भी पहुंचा सकता है और फायदा भी. अल्लाह क़ुरान में कहता है कि उसने आदम की संतानों से इंसान बनाया और उसने इसके लिए सबसे कहा कि तुम सब गवाही दो इस बात की. और सभी ने गवाही दी. उस गवाही को अल्लाह ने लिख लिया. इस पत्थर के भी आंख, नाक, कान और मुंह थे. अल्लाह के हुक्म पर इसने भी अपना मुंह खोलकर गवाही दी थी. उसी दिन से अल्लाह ने वो गवाही इस पत्थर के भीतर रख दी और इसे हुक्म दिया कि उस गवाही को वो हर हाजी को दे, जो यहां हज करने आएगा.” (ibn Abd-al-Malik al-Hindi, Ali (1998). Kanz al-Ummal)

Image: Reuters
Image: Reuters

इस हदीस के हवाले से इस बात का पता चलता है कि इस पत्थर को उसी तरह जीवित समझा जाता था जैसा पुराने अरब के मूर्तिपूजक लोग बैतुल को समझते थे. अन्य कई हदीसों में भी इस बात का ज़िक्र है कि पैगंबर इस पत्थर को अल्लाह के दाहिने हाथ की उपमा देते थे. इन सभी बातों में जो सबसे अधिक सही प्रतीत होती है, वो है इस पत्थर को बैतुल समझ के पूजना, जिसे इस्लाम के पहले के अरबी लोग करते थे. इसे वो ‘जीवित पत्थर’ और अल्लाह का ही एक अंश समझते थे.

पत्थर में जीवन की इस बात को तिरमिज़ी की ये हदीस और आगे बढ़ाती है: (अल-तिरमिज़ी 961; Ibn Maajah, 2944) “इब्न-अब्बास कहते हैं कि पैगंबर ने कहा कि हश्र (judgement day) के दिन अल्लाह इस पत्थर को सामने लाएगा. उस दिन इस पत्थर के दो आखें और एक मुंह होगा. उस दिन ये पत्थर गवाही देगा उन लोगों की जिन्होंने इसे नेकनीयती के साथ चूमा था.”

इस्लाम के आने के बाद बैतुल को चूमने की इस परंपरा को जस का तस उठा लिया गया है. पुराने अरब का इतिहास इस्लाम आने के पहले बहुत कम मात्रा में लिखा गया था और जो लिखा गया था वो भी इस्लाम आने के बाद की लड़ाईयों में नष्ट हो गया. जो कुछ बचा हुआ इतिहास है, उसमें इस पत्थर की कोई ख़ास जानकारी उपलब्ध नहीं है. सिवाए इसके कि ये पूजनीय है. इसलिए इस पत्थर की असल कहानी शायद ही कोई जानता हो. हम सब कुछ एक ऐतिहासिक तथ्यों और उस दौर की पूजा पद्धति के अनुसार सिर्फ अनुमान ही लगा सकते हैं.

क्रमशः


‘इस्लाम का इतिहास’ की पिछली किस्तें:

Part 1: कहानी आब-ए-ज़मज़म और काबे के अंदर रखी 360 मूर्तियों की

Part 2: कहानी उस शख्स की, जिसने काबा पर कब्ज़ा किया था

Part 3: जब काबे की हिफ़ाज़त के लिए एक सांप तैनात करना पड़ा

पार्ट 4: अल्लाह को इकलौता नहीं, सबसे बड़ा देवता माना जाता था

पार्ट 5: ‘अल्लाह’ नाम इस्लाम आने के पहले से इस्तेमाल होता आया है

पार्ट 6:अरब की तीन देवियों की कहानी, जिन्हें अल्लाह की बेटियां माना जाता था

हज में ऐसा क्या होता है, जो वहां खंभों को शैतान बताकर उन्हें पत्थर मारे जाते हैं, जानिए इस वीडियो में:

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