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जब काबे की हिफ़ाज़त के लिए एक सांप तैनात करना पड़ा

20196805_10213145238562576_712062070_n_210717-073138-265x150ये आर्टिकल ‘दी लल्लनटॉप’ के लिए ताबिश सिद्दीकी ने लिखा है. ‘इस्लाम का इतिहास’ नाम की इस सीरीज में ताबिश इस्लाम के उदय और उसके आसपास की घटनाओं के बारे में जानकारी दे रहे हैं. ये एक जानकारीपरक सीरीज होगी जिससे इस्लाम की उत्पत्ति के वक़्त की घटनाओं का लेखाजोखा पाठकों को पढ़ने मिलेगा. ये सीरीज ताबिश सिद्दीकी की व्यक्तिगत रिसर्च पर आधारित है. आप ताबिश से सीधे अपनी बात कहने के लिए इस पते पर चिट्ठी भेज सकते हैं – writertabish@gmail.com


इस्लाम के पहले का अरब: भाग 3

ग्रहों और नक्षत्रों के देवी देवताओं के साथ अरबों का जिस एक मान्यता पर सबसे अधिक विश्वास था वो थी जिन्न/शैतान/डेविल की इबादत. ग्रहों और नक्षत्रों की पूजा अरब के आसपास के इलाक़ों से अरब में आई थी मगर जिन्न और अरबों का रिश्ता सबसे पुराना था. असफ और नायेलह की जो मूर्ति काबा के भीतर थी उसके बारे में अल-कलबी अपनी किताब, किताब-उल-अस्नाम में लिखते हैं कि ये दोनों प्रेमी थे. और जब तीर्थयात्रा के लिए काबा आए तो इन्होंने काबा के भीतर, अकेलापन पाकर, शारीरिक सम्बन्ध बना लिए और फिर दोनों पत्थर के हो गए. बाद में अरबी लोगों ने इनकी पूजा शुरू कर दी. इन्हीं दोनों की मूर्तियां बाद में काबा के पास स्थित सफ़ा और मरवा के पहाड़ों पर लगायी गईं थी. असफ़ और नायेलह उस समय के बड़े प्रतिष्ठित “कुह्हान” थे.

कुह्हान (Kuhhan) वो लोग होते थे जो जिन्न से संपर्क बनाते थे. ये एक तरह के भविष्यवक्ता होते थे. इनके पास जब कोई किसी सलाह या भविष्य जानने के लिए आता था तो ये कुछ कर्मकांडों के साथ जिन्न से संपर्क करके लोगों की शंकाओं का समाधान करते थे. अरब के लोग जिन्नों को अल्लाह के समकक्ष समझते थे. अल्लाह का मतलब अरबों के लिए “सबसे बड़ा देवता” होता था. जिन्न पूजा की अरब में कितनी गहरी पैठ थी इसका उत्तर आपको ढेरों हदीसों और इस्लाम से पहले के अरब की शायरियों में मिल जाएगा. अरबों के लिए पूज्य “जिन्नों” के वजूद को आगे चलकर इस्लाम में भी सम्मिलित किया गया और कुरान में 28 छंदों की एक “सूरह जिन्न” है जो पूरी तरह से जिन्नों को ही समर्पित है. अरबी लोग जिन्न और अल्लाह (सबसे बड़े देवता) को भाई मानते थे (स्रोत- क़ुरान 37:158)

Image: Reuters
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काबा का जो श्रेष्ठ पुजारी होता था वो एक काहिन (कुह्हान शब्द का एकवचन) होता था जो ज़रूरत पड़ने पर कर्मकांड के हिसाब से जिन्नों से संपर्क साधता था. जिन्नों से संपर्क होने के बाद काहिन लोग “अभिशप्त और अभिभूत” अवस्था में छंदों की तरह कविता के रूप में भविष्यवाणी करते थे. ये कविताएं उसी तरह से होती थीं जैसे क़ुरान की आयतें हैं. अरबी लोग इन “भविष्यवक्ताओं” द्वारा कही गयी वाणी को दैवीय वाणी मानते थे और अपनी समस्याओं का समाधान उनमें ढूंढते थे. इन भविष्यवाणियों और दैवीय कविताओं को काबा के ऊपर ढके हुए कपड़े (किस्वा) पर धागों से कढ़ाई के रूप में ठीक उसी तरह लिखा जाता था जैसे आज कुरान की आयतों को लिखा जाता है.

कविताएं या शेर-ओ-शायरी अरब की संस्कृति में सबसे उंचा स्थान रखती थी. अरबों के समाज में शायर सबसे अधिक प्रतिष्ठित व्यक्ति होता था. जो व्यक्ति अपनी बात को सबसे कम और असरदार शब्दों में कह पाता था वो उनके लिए सबसे अच्छा शायर होता था. प्रतिवर्ष मक्का में शेर-ओ-शायरी की प्रतिस्पर्धा होती थी और जीतने वाले शायर के सबसे अच्छे शेर को भी काबा के ऊपर बड़े अक्षरों में लिख कर टांगा जाता था. शायरी अरबों के लिए दैवीय होती थी क्यूंकि काहिन भी जिन्नों से संपर्क के बाद शेर-ओ-शायरी में ही अपनी बात कहते थे जो अरबों के लिए देवताओं का सन्देश होती थी.

शेर और शायरी की अरबों के जीवन में महत्ता पर हमें ध्यान देना होगा और गहरे से समझना होगा. कुरान की शुरुआती आयतें छोटे छंदों के साथ साथ लयबद्ध थीं. लेखक जवाद अली अपनी किताब Mufassal fi tarikh al-ʻArab qabla al-Islam, के छठवें खंड के 723 पेज में आठवीं शताब्दी के लेखक अल-जाहिज़ की किताब किताब-उल-हैवान से उदाहरण देते हुए लिखते हैं कि, अल-जाहिज़ कहते हैं “क़ुरान प्रतिनिधित्व करता है मुहम्मद के पहले के अरबों के ऐसे साहित्य का जो जिन्नों के लिए होते थे.”

क़ुरैश, मुहम्मद के अपने घराने के लोग और बाक़ी अरब शुरुआत के दिनों में मुहम्मद को काहिन ही कहते थे. क्यूंकि जिस तरह भाषा और छंद मुहम्मद के द्वारा उद्घृत क़ुरान के होते थे वैसी ही भाषा और छंद मक्का और उसके आसपास के जिन्नों और इंसानों के बीच संवाद स्थापित करने वाले कुह्हनों के होते थे.

किताब अल मकातुब
किताब अल बुल्हान में कुह्हान

जिन्न और अरबों के बीच के रिश्ते को एक घटना के द्वारा हम बहुत अच्छी तरह समझ सकते हैं. अल-तब्रई अपनी किताब तारीख़-अल-तब्रई (जिसे तारीख़-अल-रसूल-व-अल-मुलुक के नाम से भी जाना जाता है) में ज़िक्र करते हैं एक सांप का, जो काबे के भीतर बने हुए एक गड्ढे में रहता था. अरब के लोग उस गड्ढे में अपनी दान/चढ़ावा उस सांप को चढ़ाते थे. जिसमें कीमती गहने के साथ साथ हर चीज़ होती थी. इस बात से ये पता चलता है कि अरब के लोग उस सांप की पूजा करते थे और जिसे वो जिन्न/डेविल समझते थे. सांप को जिन्न का ही रूप समझा जाता था.

इस सांप के बारे में इब्न-इस्हाक़ ने भी लिखा है और इमाम अल-कुर्तुबी अपनी किताब “तफ़सीर अल-कुर्तुबी” में इब्न अब्बास के हवाले से इसी बात को और विस्तार से लिखते हैं कि “काबा के भीतर घुसने पर दाहिनी तरफ़ एक गड्ढा/कुंआ था जिसे इब्राहीम ने अपने बेटे इस्माईल के साथ खोदा था. (अरबों की ये मान्यता थी और है कि काबा का निर्माण मुहम्मद से बहुत पहले आये पैगम्बर इब्राहीम ने किया था) ये गड्ढा काबे में आने वाले चढ़ावे को सुरक्षित रखने के लिए था. जब काबा जुर्हुम कबीले के लोगों के हाथ में था तो चढ़ावे में आये हुए सोना और चांदी अक्सर चोरी हो जाते थे.

क़बीले वालों ने चढ़ावे की हिफाज़त के लिए एक चौकीदार रखा मगर एक दिन उस चोर को लालच आ गया और वो गड्ढे में उतर गया. चोरी के इरादे से. उसी समय अल्लाह के हुक्म से गड्ढे का मुह एक पत्थर से बंद हो गया. उसी दिन से अल्लाह ने एक सांप को भेजा जिसने काबा के चढ़ावे की पांच सौ साल तक हिफाज़त की. एक समय में काबा इतना जर्जर हो चुका था कि कुरैश के लोगों ने उसे दुबारा बनाने का सोचा. मगर जब क़ुरैश के लोगों ने जर्जर हो चुके काबा को फिर से बनाने का सोचा तो वो वहां रहने वाले इस बड़े से सांप को लेकर बहुत डरे हुए थे और उनकी हिम्मत नहीं थी कि वो काबा को हाथ लगाएं. इब्न इस्हाक़ लिखते हैं कि “ये सांप रोज़ सुबह काबा के भीतर के उस गड्ढे से निकलकर बाहर आ कर काबा की दीवार से सटकर धूप का आनंद लेता था.”

अरब में इस्लाम से पहले के अवशेष
अरब में इस्लाम से पहले के अवशेष

अल-कुर्तुबी ने अरबों की उस सांप के बारे में बनी धारणा को विस्तार रूप दिया. मगर पीछे की कहानी जो भी हो. बाद में ये अरब उसे जिन्न का रूप मान कर उसकी पूजा करने लगे थे. इब्ने इस्हाक़ लिखते हैं कि अरब उसी सांप के डर से काबा के पुनर्निर्माण का नहीं सोच रहे थे. उस सांप को हटाने के लिए उन्होंने अल्लाह से दुवा की. और जब एक दिन वो सांप काबा की दीवार से सटकर धूप का आनन्द ले रहा था तभी एक बाज़ उसे ले कर उड़ गया और अरबों ने ये समझा कि ये अल्लाह के तरफ़ से इशारा है कि काबा का पुनर्निर्माण किया जाए.

यहां एक और देखने वाली बात ये है कि इमाम अल-कुर्तुबी का ये लिखना कि “काबा में चढ़ावे के लिए एक गड्ढा इब्राहीम और उनके बेटे द्वारा खोदा गया” क्या इस बात की तरफ इशारा करता है कि काबा में उनके समय से ही चढ़ावा आता था? और अगर ये दावा किया जाता था कि हज़रात इब्राहीम “एक निराकार अल्लाह” की उपासना करते थे तो ये चढ़ावा किसके लिए आता था फिर?

एक और बहुत दिलचस्प हवाला ये है कि अट्ठारवीं शताब्दी के इस्लामिक लेखक मुर्तज़ा अल-ज़बीदी अपनी किताब ताज अल-उरुस (ये एक बहुत मान्य क्लासिक अरेबिक डिक्शनरी है) के पहले और नौवें खंड में बताते हैं कि “अलाहा शब्द, जिस से अल्लाह बना है उसको एक बड़े सांप के लिए इस्तेमाल किया जाता था. अरब उसे सर्प-जिन्न/शैतान/डेविल समझते थे. एक और उपाधि जो डेविल/शैतान को अरब के लोग देते थे वो थी अज़ाब और इसे भी सांप ही समझा जाता था.”
क्रमशः

(Source: Ibn-Ishaq/Hisham, Martin Lings – Muhammad, Aziz Al-Azmeh – The Emergence of Islam in Late Antiquity: Allah and His People )


इस्लाम का इतिहास की पिछली किस्त:

Part 1: कहानी आब-ए-ज़मज़म और काबे के अंदर रखी 360 मूर्तियों की

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