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कहानी उस शख्स की, जिसने काबा पर कब्ज़ा किया था

20196805_10213145238562576_712062070_n_210717-073138-265x150ये आर्टिकल ‘दी लल्लनटॉप’ के लिए ताबिश सिद्दीकी ने लिखा है. ‘इस्लाम का इतिहास’ नाम की इस सीरीज में ताबिश इस्लाम के उदय और उसके आसपास की घटनाओं के बारे में जानकारी दे रहे हैं. ये एक जानकारीपरक सीरीज होगी जिससे इस्लाम की उत्पत्ति के वक़्त की घटनाओं का लेखाजोखा पाठकों को पढ़ने मिलेगा. ये सीरीज ताबिश सिद्दीकी की व्यक्तिगत रिसर्च पर आधारित है. आप ताबिश से सीधे अपनी बात कहने के लिए इस पते पर चिट्ठी भेज सकते हैं – writertabish@gmail.com


इस्लाम की चार में से तीन किताबों में नहीं है काबा का ज़िक्र

काबा के निर्माण की किवदंतियां बहुत दिलचस्प हैं. इस्लाम के आगमन से पहले अरबों का ये विश्वास था कि काबा प्रथम पुरुष और पैगंबर आदम द्वारा बनाया गया था. मगर बाद में यह नष्ट हो गया. फिर इसको पैगंबर इब्राहीम ने दोबारा बनाया. ये अरबों की अपनी मान्यता थी. मगर अरब और उसके आसपास के देशों में भी लिखी इतिहास की किताबों में काबा जैसी किसी पवित्र जगह और उसका इब्राहीम द्वारा निर्माण का कोई वर्णन नहीं मिलता है.

अगर मुसलमानों द्वारा स्वीकार्य आसमानी किताबों तोरह, बाइबिल और ज़ूबूर की भी बात करें, तो उसमें भी ऐसा कोई ज़िक्र नहीं मिलता है. हां आजकल के कुछ इस्लामिक विद्वानों ने तोरह के शब्दों को तोड़-मरोड़ कर अपनी बातें रखने का प्रयास किया है. मगर वो दलीलें सिर्फ़ इन्ही विद्वानों और इस्लाम के मानने वालों द्वारा ही सराही और सुनी जाती है. इन दलीलों की कोई विश्वव्यापी मान्यता नहीं है.

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कुरान क्या कहता है?

कुरान और हदीस का रेफरेंस मैं इस आर्टिकल में इसलिए नहीं देना चाहता क्योंकि बात इस्लाम से पहले के अरब की हो रही है. कुरान और हदीसें इस्लाम के बाद की चीजें हैं. फिर भी एक रेफरेंस हम ले लेते हैं कि कुरान क्या कहता है काबा के निर्माण के बारे में:

क़ुरान की आयत 3:96 कहती है: “वस्तुतः इंसानों की इबादत के लिए पहला घर बक्का में बना था.”

कुछ इस्लामिक विद्वान कुरान की इस आयत में आए बक्का शब्द को मक्का शहर का पुरातन नाम बताते हैं. जबकि कुछ कहते हैं कि काबा और उसके आसपास के क्षेत्र को क़ुरान में बक्का कहा गया है. बक्का के नाम की ये दलीलें पूरी तरह से खरी नहीं उतरती है. इन दलीलों पर संशय इसलिए उठता है क्योंकि आगे कुरान की एक और आयत 48:24 में कहा गया है:

“और ये वो है जिसने उनका हाथ रोक रखा है तुम से और तुम्हारा हाथ उनसे, मक्का के बीच में.”

मक्का का दुर्लभ स्केच. (Image: Native pakistan)
मक्का का दुर्लभ स्केच. (Image: Native pakistan)

कुरान की इस आयत में मक्का शहर को मक्का बोला गया है. इसलिए अगर ये कहा जाता है कि पिछली आयत में बक्का, मक्का का पुराना नाम था, तो ये बात सही नहीं बैठती है. क्योंकि फिर तो हर जगह कुरान में मक्का को बक्का ही कहा गया होता. चूंकि ऐतिहासिक प्रमाण के हिसाब से भी मक्का शहर का इतिहास बहुत पुराना नहीं है. उसके पुरातन नाम का प्रमाण अरब के आसपास के अन्य देशों की पुराने इतिहास की किताबों में भी नहीं मिलता है. यहां तक कि आज के सऊदी अरब के पुरातन शहरों की लिस्ट में भी मक्का का नाम कहीं नहीं मिलता है.

काबा मुसलमानों का सर्वोच्च धार्मिक स्थान है.
काबा मुसलमानों का सर्वोच्च धार्मिक स्थान है.

कुरान के अलावा बक्का शब्द Book of Psalms, Chapter 84 में आता है. ये वही किताब है जिसे मुसलमान ज़ुबूर के नाम से जानते हैं. इसे आसमानी मानते हैं. ज़ुबूर के इस उदाहरण को इस्लामिक आलिम अपनी समझ से पेश करते हैं. मगर इसमें बक्का शब्द जहां के लिए इस्तेमाल हुआ है, वो यहूदियों के जेरुसलम जाने की तीर्थयात्रा के रास्ते में पड़ता है.

अगर कुरान किसी बक्का की बात कर रहा है, तो क्या वो ज़ुबूर वाला बक्का हो सकता है? जेरुसलम से मक्का की दूरी लगभग पंद्रह सौ किलोमीटर है. जो उस समय के हिसाब से बहुत ज़्यादा दूरी थी. जिस दौरान ज़ुबूर लिखी गई, उस समय मक्का का कोई वजूद भी था या नहीं ये भी अपने आप में खोज का विषय है.

वो कौन था जिसने मक्का को महत्वपूर्ण बनाया?

बहरहाल, बात काबा के बारे में अरबों की मान्यताओं की हो रही थी. उन मान्यताओं को हम उसी दौर की उपलब्ध जानकारियों से हासिल करेंगे. काबा और मक्का को व्यापारिक और धार्मिक केंद्र बनाने में जिस इंसान का सबसे बड़ा हाथ था, वो था चौथी सदी के अंत का एक व्यक्ति, कुसय्य (Qusai ibn Kilab ibn Murrah).

कुसय्य, काबा पर कब्ज़े से मक्का शहर काबू में किया.
कुसय्य, काबा पर कब्ज़े से मक्का शहर काबू में किया.

कुसय्य जो कि कुरैश घराने से था, उसने अपने कुछ कबीलों को इकठ्ठा कर के काबा पर अपना आधिपत्य स्थापित किया और स्वयं को राजा घोषित किया. इस से पहले काबा कुरैश के विरोधी घरानों के हाथों में था. कुसय्य जानता था कि मक्का शहर को अगर अपने हाथ में लेना है, तो काबा की बागडोर अपने हाथ में लेनी होगी. उन दिनों पवित्र महीने में दूर-दराज़ के लोग हज के लिए मक्का आते थे. व्यापारिक दृष्टि से हज मक्का वासियों के लिए बहुत फ़ायदे का सौदा रहता था.

इतिहासकार काबा को धार्मिक के साथ एक व्यापारिक क्षेत्र बनाने का श्रेय कुसय्य को देते हैं. कुसय्य ने अपने आप को राजा घोषित करने के साथ काबा की चाभी अपने हाथ में रखी और जर्जर हो चुके काबा को फिर से बनवाया. दूरदराज़ क्षेत्रों में बसे अपने कुरैश रिश्तेदारों को मक्का में ला कर बसाया. तीर्थयात्रियों से मक्का में प्रवेश से पहले कर वसूल करने का प्रावधान रखा. ज़मज़म के पानी पर अपना प्रभुत्व रखा. कर चुकाने के बाद तीर्थयात्रियों के खाने और पीने की ज़िम्मेदारी कुसय्य के प्रशासन की होती थी.

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कुसय्य की हुकूमत के दौरान मक्का

कुसय्य ने अपना घर काबा से सटाकर बनाया और काबा के भीतर प्रवेश करने के दरवाज़े को अपने घर के भीतर से रखा. जिस किसी को भी काबा में प्रवेश करना होता था, उसे कुसय्य के घर के भीतर से होकर जाना होता था. घर इस तरह बनाने से काबे की परिक्रमा करने वाले लोगों को कुसय्य के घर की भी परिक्रमा करनी होती थी. अपने ज़माने के सबसे बड़े इतिहासकार इब्न इशाक, जिन्होंने पैगंबर मुहम्मद की जीवनी लिखी है, लिखते हैं कि कुसय्य का प्रभुत्व उसके अपने क़बीले क़ुरैश में इतना अधिक था कि उसके जीवन में और उसकी मृत्यु के बाद लोगों ने उसे धर्म की तरह माना.

कुसय्य के कई बच्चे हुए. जिनमें से दो अब्द-मनाफ़ और अब्द-उल-उज्ज़ा थे. इन दो नामों को सिर्फ इस उदाहरण के लिए यहां बताना ज़रूरी है, क्योंकि ये दोनों नाम देवियों के नाम पर रखे गए थे. मनाफ़ और उज्ज़ा अरब की सबसे प्रतिष्ठित और पूज्य देवियां थीं. क़ुरैश घराने की ये देवियां क़ुरैश लोगों के लिए पूज्य थीं और काबा के भीतर इनकी मूर्तियों को विशिष्ट स्थान प्राप्त था.

सारा अरब उस समय क़बीलों और वंशों में बंटा हुआ था. हर क़बीले का अपना ओहदा और पहचान होती थी अरब समाज में. कुसय्य के घराने कुरैश की प्रतिष्ठा  उसकी नीतियों और काबा की दावेदारी की वजह से बहुत बढ़ गई थी. बाद के समय में ये घराना अरब के सबसे प्रतिष्ठित घरानों में गिना जाने लगा. इस घराने की प्रतिष्ठा उस समय और बढ़ गई, जब इसमें पैदा होने वाले एक शख्स ने ख़ुद को पैगंबर घोषित किया. आगे चलकर वो दुनिया भर के लिए मुहम्मद के नाम से जाना गया.

क्रमशः


इस्लाम का इतिहास की पिछली किस्त:

Part 1: कहानी आब-ए-ज़मज़म और काबे के अंदर रखी 360 मूर्तियों की

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