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इस्लाम से पहले अरब के लोग शारीरिक संबंधों को लेकर खुली सोच के थे

20196805_10213145238562576_712062070_n_210717-073138-265x150ये आर्टिकल ‘दी लल्लनटॉप’ के लिए ताबिश सिद्दीकी ने लिखा है. ‘इस्लाम का इतिहास’ नाम की इस सीरीज में ताबिश इस्लाम के उदय और उसके आसपास की घटनाओं के बारे में जानकारी दे रहे हैं. ये एक जानकारीपरक सीरीज होगी जिससे इस्लाम की उत्पत्ति के वक़्त की घटनाओं का लेखाजोखा पाठकों को पढ़ने मिलेगा. ये सीरीज ताबिश सिद्दीकी की व्यक्तिगत रिसर्च पर आधारित है. आप ताबिश से सीधे अपनी बात कहने के लिए इस पते पर चिट्ठी भेज सकते हैं – writertabish@gmail.com


इस्लाम के पहले का अरब: भाग 10

इस्लाम के पहले अरब में यौन संबंधों और अभिव्यक्ति की आज़ादी लगभग उसी तरह से थी, जैसे आज  विकसित देशों में है. यौन संबंधों के लिए एक से अधिक व्यक्तियों से संबंध की छूट थी. मगर लोग शादीशुदा ज़िंदगी भी उसी तरह जीते थे, जैसे आज जीते हैं. इस्लाम के पहले अरब में वेश्यावृत्ति की आज़ादी थी.  इस तरह के यौन संबंधों को किसी पाप की श्रेणी में नहीं रखा जाता था.

इस्लाम के पहले वाले अरब में स्वछन्द और उन्मुक्त वातावरण की बात को हम इस उदाहरण से भी समझ सकते हैं. हज के दौरान लोग काबा की परिक्रमा कम से कम कपड़ों या फिर पूरी तरह से नंगे होकर करते थे. काबा के पवित्र क्षेत्र में प्रवेश से पहले आपको अपनी सभी पुरानी चीज़ों और सामान को बाहर छोड़ना होता था. फिर काबा की परिक्रमा के लिए आपको भीतर ही नया कपड़ा लेना होता था. जो लोग कपड़ा नहीं ले सकते थे, वो नंगे ही काबा की परिक्रमा करते थे. ज़्यादातर लोग नंगे ही परिक्रमा करना पसंद करते थे. हर एक परिक्रमा के बाद स्त्री पुरुष के जोड़े एक दुसरे का चुम्बन लेते थे. ये भी उदाहरण मिलता है कि हज के दौरान लोग यौन संबंध भी स्थापित कर लेते थे. काबा के भीतर भी संभोग करने के इतिहास में उदाहरण मौजूद हैं.

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वेश्याएं, जिन्हें अल-बगाया कहा जाता था, अपने टेंट में रहती थीं. जब वो संभोग के लिए तैयार होती थीं, तो अपने टेंट के बाहर एक झंडा लगा देती थीं. जिसे देखकर मर्द उनके पास जाते थे. जब तक झंडा न दिखे, तब तक कोई भी आदमी उनके समीप नहीं जाता था. इसी तरह से शादी शुदा औरतों को भी छूट थी कि वो अपने मर्द के साथ रहना चाहती है या नहीं. कोई शादीशुदा औरत अगर अपने मर्द से तलाक़ लेना चाहती थी तो अपने टेंट का रास्ता बदल देती थी. यानि वो टेंट का मुह उलटी दिशा में खोल देती थी. जिस से उसका मर्द समझ जाता था कि अब उसकी औरत उसमे उत्सुक नहीं है. ये एक तरह का तलाक़ था, जो औरतें अपने मर्दों को देती थीं.

खुले यौन संबंधों के कई उदाहरण इस्लाम के पहले के अरब में मिलते हैं. इन यौन संबंधों को कई नामों से जाना जाता था. नामकरण मिलने का मतलब ही यही है कि इस तरह के यौन संबंध प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थे. समाज में स्वीकार्य थे. उदाहरण के लिए एक यौन संबंध था अर-रहत, जिसमे दस आदमी एक औरत से मिलते थे और यौन संबंध स्थापित करते थे. जब वो औरत गर्भवती हो जाती थी, तो वो उन दसों मर्दों के पास जाती थी. और फिर उनमें से किसी एक मर्द को बच्चे का पिता चुनती थी. फिर उसी मर्द को उस बच्चे के लालन पालन का भार उठाना होता था. वो औरत जिस किसी मर्द को भी चुने, उसे स्वीकार ही करना होता था. वो मर्द अपनी ज़िम्मेदारी से भागता नहीं था.

मुक़द्दस काबा की एक पुरानी तस्वीर. (इमेज सोर्स: Destination Economy.com)
मुक़द्दस काबा की एक पुरानी तस्वीर. (इमेज सोर्स: Destination Economy.com)

एक संबंध होता था अल-मुदामादा, जिसमें एक औरत अपने असली पति के अलावा एक या दो और पति चुनती थी. ये सूखे और लड़ाई की स्थिति के लिए होता था ताकि एक मर्द के न रहने पर दूसरे से काम चलाया जा सके. इस संबंध को बहुत अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता था. मगर फिर भी ये संबंध पुराने अरब की संस्कृति का एक हिस्सा था. अल-मुकादाना गुप्त संबंधों को कहा जाता था. जिसका ज़िक्र कुरान (Quran 4:25) में भी आया है. गुप्त प्रेम संबंध हर समाज की तरह अरब की सभ्यता का भी हिस्सा थे. उस वक़्त इन्हें पाप की श्रेणी में नहीं रखा जाता था. इस बात की सत्यता पुराने अरब की इस कहावत से होती है कि “जो किसी को दिखाई न दे, वो गुनाह नहीं है मगर जो दिख जाए वो पाप है.”

इस्लाम से पहले के अरब में यौन संबंधों की एक प्रथा जो अल-इस्तिब्दा कहलाती थी, इसमें एक मर्द अपनी पत्नी को किसी ऊंचे ओहदेवाले या वीर के पास यौन संबंध बनाने के लिए भेजता था. अरब के लोग उस समय शायर और योद्धा को बहुत सम्मान देते थे. अल-इस्तिब्दा में मर्द अपनी औरत को ज़्यादातर इन्ही लोगों के पास भेजता था. ताकि उनके घर में भी कोई कवि या योद्धा पैदा हो सके. वो औरत तब तक उन लोगों के पास रहती थी, जब तक वो गर्भवती न हो जाए. गर्भवती होने पर वो अपने पति के पास वापस चली आती थी.

मक्का का दुर्लभ स्केच. (Image: Native pakistan)
मक्का का दुर्लभ स्केच. (Image: Native pakistan)

उस दौर में उत्तेजक कविताओं के बहुत उदाहरण मिलते हैं. कवि औरतों के अंगों का वर्णन, प्रेम और गुप्त संबंधों पर खूब कविताएं लिखते थे. उन्हें लोग चटखारे लेकर पढ़ते थे. ये दौर पैगंबर मुहम्मद के समय तक रहा. कई कवियों ने पैगंबर मुहम्मद को भी लेकर उत्तेजक कविताएं लिखी थीं. बाद में एक कवि, जो पैगंबर और उनके संबंधों को लेकर लगातार कविताएं लिख रहा था, पैगंबर के अनुयायियों द्वारा मार डाला गया. उसके बाद उत्तेजक कविताओं का सिलसिला समाप्त हो गया.

इस्लाम से पहले के अरबों की मनःस्थिति का इब्न-क़ुताय्बह अपनी किताब “किताब उन्युन अल-अखबार” में एक घटना का ज़िक्र करते हुए बताते हैं कि एक व्यक्ति ने एक अरबी बद्दू व्यक्ति से पूछा,

“तुम्हारी दृष्टि में व्यभिचार क्या है?”

इसके जवाब में अरबी व्यक्ति कहता है, “किसी को चूमना और गले लगाना.”

ये जवाब सुनकर दूसरा आदमी कहता है, “ये तो व्यभिचार नहीं है हमारी नज़र में.”

फिर अरब उस आदमी से पूछता है, “तुम्हारी नज़र में व्यभिचार क्या है फिर?”

जिसके जवाब में पहला आदमी कहता है, “एक मर्द का औरत की दोनों जांघों के बीच तब तक रहना, जब तक वो थक के चूर न हो जाए.”

ये सुनकर अरबी कहता है, “ये हमारी नज़र में व्यभिचार नहीं है, बल्कि संतानोत्पत्ति का तरीका है.”

इस छोटी सी घटना से इस बात की झलक मिलती है कि इस्लाम से पहले के अरबों की निगाह में व्यभिचार की क्या परिभाषा थी. यौन संबंध स्थापित करना व्यभिचार की श्रेणी में नहीं आता था. बल्कि किसी औरत/मर्द को उत्तेजित कर के छोड़ देना उनके लिए व्यभिचार होता था.

क्रमश…


‘इस्लाम का इतिहास’ की पिछली किस्तें:

Part 1: कहानी आब-ए-ज़मज़म और काबे के अंदर रखी 360 मूर्तियों की

Part 2: कहानी उस शख्स की, जिसने काबा पर कब्ज़ा किया था

Part 3: जब काबे की हिफ़ाज़त के लिए एक सांप तैनात करना पड़ा

पार्ट 4: अल्लाह को इकलौता नहीं, सबसे बड़ा देवता माना जाता था

पार्ट 5: ‘अल्लाह’ नाम इस्लाम आने के पहले से इस्तेमाल होता आया है

पार्ट 6:अरब की तीन देवियों की कहानी, जिन्हें अल्लाह की बेटियां माना जाता था

पार्ट 7: कहानी काबा में लगे काले पत्थर की, जिसके बारे में अलग-अलग किस्से मशहूर हैं

पार्ट 8 : सफा और मारवा पहाड़ियां, जहां से देवता आसिफ और देवी नायेलह की मूर्तियां हटाई गईं

पार्ट 9: इस्लाम के आने से पहले औरतों की स्थिति कैसी थी?

वीडियो: अयोध्या में उस आदमी का इंटरव्यू जिसने बाबरी मस्जिद तोड़ी थी!

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