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विमेंस डे के परदे के पीछे होता है क्रूर खेल, वहां नजर नहीं जाती

आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है. हालांकि ये खुशी मनाने के लिए नहीं है. ये उन दिनों को याद करने के लिए है, जब औरतों को उतने भी अधिकार नहीं थे, जो कि आज हैं. तब वक्त बड़ा क्रूर हुआ करता था. अगर दुनिया टेक्नॉल्जी में आगे नहीं बढ़ती तो शायद वो वक्त नहीं बदलता. पर इस दिवस के साथ सबसे खास बात ये है कि ये किसी भी धर्म, समुदाय, जाति या क्षेत्र का प्रतिनिधित्व नहीं करता. इतना समरस और प्यारा दिवस शायद कोई नहीं है. इस दिन दुनिया की आधी आबादी बस बराबरी से जिंदा रहने के लिए चॉकलेट खाती-खिलाती है और सबसे मुस्कुरा के बात करती है. इस दिन को मनाने की शुरुआत भी इसी अंदाज में हुई थी. अगर अधिकारों की बाकी लड़ाइयों को देखें तो शुरुआत हिंसा से होती है, अंत भी हिंसा से होता है. महिला दिवस उस आंदोलन को दिखाता है जो शायद हर लड़ाई लड़ने वाले को फॉलो करना चाहिए. ये मीठी बातें हैं. औरतों को इन पर भरोसा नहीं करना चाहिए. असली बात आगे है.

सबसे पहले 28 फरवरी 1909 को अमेरिका की सोशलिस्ट पार्टी ने इसे मनाया था. क्योंकि न्यू यॉर्क में कपड़ा वर्कर्स की हड़ताल हुई थी और इसमें औरतों ने हिस्सा लिया था. औरतों ने वोटिंग के अधिकारों की भी मांग की थी. औरतों को तब तक वोट देने का अधिकार नहीं था.

# 1910 में क्लारा जेटकिन नाम की जर्मन सोशलिस्ट पार्टी की नेता ने इस दिन को हर देश में मनाने का प्रस्ताव रखा था.

# इसके बाद 1913 में रूस की औरतों ने पहले विश्व युद्ध के खिलाफ 28 फरवरी को ही विरोध किया था. यूरोप की औरतों ने 8 मार्च को विद्रोह किया था.

# 1975 में यूनाइटेड नेशन्स ने 8 मार्च को इंटरनेशलन वीमेंस डे मनाना शुरू कर दिया. उस साल को ही इंटरनेशनल वीमेंस इयर घोषित कर दिया गया.

# इंटरनेशनल वीमेंस डे 2017 की थीम है ‘Be Bold for Change’.

अगर वीमेंस डे के बारे में जानना है तो वाशिंगटन में औरतों की लड़ाई देखिए. जहां पर औरतों के खिलाफ लगातार बोलने के बावजूद डॉनल्ड ट्रंप राष्ट्रपति बन गए. वहीं पर औरतों ने वाशिंगटन समेत पूरी दुनिया की औरतों से आग्रह किया है कि 8 मार्च को A Day Without a Woman के नाम से मनाएं. मकसद है कि आज वो काम का बहिष्कार करें. क्योंकि पेमेंट में बराबरी नहीं है. वर्कप्लेस पर औरतों के साथ भेदभाव होता है. प्रमोशन में भेदभाव होता है. हमेशा उनसे एक परंपरागत लड़की की छवि में रहने को मजबूर किया जाता है. ये सिर्फ इसी साल की बात नहीं है. उनकी ये मांगें कई सालों से चल रही हैं. वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम के मुताबिक 2186 तक औरतों से पेमेंट में भेदभाव होता रहेगा. उसके पहले सुधार होने की संभावना नहीं है.

अपने इंडिया में देखना है तो यूपी के चुनावों में देखिए. दलित समाज की नेता मायावती का नाम आते ही कैसे लोग बिदकने लगते हैं. पूर्वांचल में औरतों से चुनाव पर राय लेना मुश्किल हो जाता है. वो जवाब भी नहीं देतीं. ज्यादा दूर ना जाएं तो हम अपने घरों में देख सकते हैं. कि कैसे हमारी मांओं को पूरा घर बेवकूफ समझा करता था. घर के मर्द कैसे उनका मजाक बनाते थे.

हम अपने घर की बहुओं को देख सकते हैं. जिनका आधा जीवन बस इस बात में निकल जाता है कि कप ना फूटे. जो हर वक्त कप टूटने के डर में घिरा रहेगा, वो अपनी जिंदगी में क्या ही सोच सकता है. जिसका जीवन नमक पर टिका हो, उससे चुनाव पर चर्चा की उम्मीद कैसे कर सकते हैं. ये इतना क्रूर खेल है कि हर बार एक औरत खुद ही साबित कर देती है कि वो किसी काबिल नहीं हो सकती. हमें जेंडर इक्वेलिटी को वहीं देखना है.

अगर हम महिला आंदोलन के इतिहास को देखें, तो हम कल्पना नहीं कर सकते कि ऐसा भी हो सकता है क्या. मोटा-मोटी अगर कहें तो 1792 में औरतों के अधिकारों पर पहली किताब आई थी. A Vindication of the Rights of Woman. ब्रिटेन की लेखिका मैरी वॉलस्टोनक्राफ्ट ने लिखी थी ये किताब. पर ब्रिटेन में औरतों के अधिकारों को लेकर राजनीति हलचल 1903 में शुरू हुई. औरतों ने एक पार्टी बनाई जो वोटिंग के अधिकारों की मांग कर रही थी. इनके साथ भी वही व्यवहार हुआ जो आंदोलन करने वालों के साथ हुआ था. जेल में ठूंस दिया गया. मीटिंग करने से मना किया गया. पार्लियामेंट के दरवाजे से फेंका गया. पहला विश्व युद्ध खत्म होने के बाद 1918 में वोट करने का अधिकार मिला. पर 30 साल से ऊपर की औरतों को. 1928 में ये उम्र घटा के 21 कर दी गई.

अमेरिका में 1848 में एलिजाबेथ स्टैंटन की नेतागिरी में पहली बार महिला अधिकारों को लेकर प्रदर्शन हुआ. बाद में इसमें लूसी स्टोन का ग्रुप भी जुड़ गया. 1878 में सूजन एंथनी ने संविधान में संशोधन का प्रस्ताव दिया. 1890 में वायोमिंग पहला राज्य बना जहां औरतों को वोट करने का अधिकार मिला. एंथनी का अमेंडमेंट 1920 में कानून बन गया.

बाकी देशों में भी स्थिति बदलती रही. भारत में भी स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान औरतों की स्थिति बदली. दुनिया में असली बदलाव यूनाइटेड नेशन्स के आने के बाद हुआ. इन लोगों ने अपनी शुरुआत से ही औरतों को बराबरी देना शुरू किया. उसी दौरान अमेरिका में फेमिनिस्ट आंदोलन अब बातों से उठकर एक्शन में आ गया और तनाव पैदा करने लगा. सिमोन डी बूवे की The Second Sex और बेट्टी फ्रिडन की The Feminine Mystique ने एकदम से धार दे दिया इसको. वीमेंस लिबरेशन मूवमेंट चलने लगा वहां पर. हालांकि इसको कई तरीके से कमजोर भी किया गया. पर फिर भी सीनेट और कांग्रेस में औरतें पहुंच ही गईं. पर आज भी अमेरिका में कोई औरत प्रेसिडेंट नहीं बन पाई. ट्रंप जैसे कैंडिडेट के सामने हिलेरी क्लिंटन हार ही गईं.

वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में मात्र 20 प्रतिशत पॉलिटिकल पावर है औरतों के पास. महत्वपूर्ण पदों पर मर्द ही बैठे हैं. आइसलैंड, नार्वे इस मामले में ठीक हैं. एशिया से फिलीपींस थोड़ा ठीक है. इंडिया 105 नंबर पर है. चीन 69 नंबर पर है. पाकिस्तान 134 पर. अरब देश बहुत नीचे हैं.

धीरे-धीरे विमेंस डे का कॉन्सेप्ट चॉकलेट और खुशियां मनाने तक आ गया है. इसका राजनीतिकरण भी हो रहा है. जिसमें कुछ लोग अपने फायदे के लिए इसका इस्तेमाल कर रहे हैं. वो इसका कार्ड खेलकर ताकतवर हो जाना चाहते हैं. उनको जमाने की औरतों से मतलब नहीं है. अपना काम हो जाने के बाद कह देंगे कि मैंने तो अपनी लड़ाई खुद लड़ी, वो औरतें जानें उनको क्या करना है. फेमिनिज्म सिर्फ एक इंसान की प्रतिष्ठा का सवाल नहीं है, ये उनकी निजी योग्यता से भी नहीं जुड़ा है. ये जुड़ा है बराबर अधिकारों से जहां पर लोग किसी को सिर्फ इस वजह से नहीं आंकें कि वो एक औरत है.

पर फिर भी समझें कि वो एक औरत है. क्योंकि औरत होने की अपनी बायोलजी है. इसके हिसाब से जैसे बच्चे, जवान और बूढ़ों में फर्क होता है, उसी तरह हर सेक्स का भी अपना फर्क होता है. बराबरी होने का मतलब ये नहीं होता कि एक बूढ़े से जवान प्रतिस्पर्धा करने लगे. सबकी अपनी योग्यताएं हैं. पर जिंदा रहने के लिए बूढ़े और जवान के अधिकार जरूर बराबर हैं.

अब बात मैरी वॉलस्टोनक्राफ्ट की जिन्होंने फेमिनिज्म का कॉन्सेप्ट दिया था:

मैरी एक गरीब घर में पैदा हुई थीं. पिता शराबी थे. हिंसक थे. मैरी की ये जिंदगी जारी रही. पहले पति ने फ्रांस की क्रांति के वक्त उनको छोड़ दिया. तब तक एक बच्चा हो चुका था. मैरी की पढ़ाई नहीं हो पाई थी, पर पढ़ना उनको पसंद था. उन्होंने खूब पढ़ा. पर उस वक्त औरतों के लिए अवेलेबल करियर से वो नाखुश रहती थीं. उस वक्त मैरी ने राइटर बनने का डिसीजन लिया. उस वक्त औरतों के लिए ये स्पेसक्राफ्ट बनाने जैसा डिसीजन था. मैरी को तुरंत ना-औरत कह दिया गया. कहा गया कि इनके अंदर स्त्रियोचित गुण नहीं हैं. मैरी जब बात करतीं कि औरत और मर्द दोनों को बराबर पढ़ाई के मौके मिलने चाहिए और बराबर इज्जत का व्यवहार होना चाहिए तो लोग आश्चर्य से देखते. मैरी ने कहा था कि औरत और मर्द दोनों को बच्चे पालने चाहिए. एबॉर्शन, भ्रूणहत्या और सेक्स को लेकर डबल स्टैंडर्ड पर मैरी ने अपने कड़े विचार रखे थे. वो समझ जाती थीं कि कहां दिक्कत है और यही चीज लोगों को अच्छी नहीं लगती थी. मैरी की दूसरी शादी भी हुई. बच्चा हुआ. फिर शादी टूटी. तीसरी शादी हुई. बच्चा होने वाला था, उसी में उनकी मौत हो गई. 38 साल की उम्र में. उनके दूसरे बच्चे का नाम मैरी था. उस लड़की ने बाद में एक किताब लिखी. Frankenstein. ये बहुत फेमस उपन्यास बना. इसमें उसने अपनी मां की फिलॉसफी का इस्तेमाल किया था. पर मैरी वॉलस्टोनक्राफ्ट की जिंदगी कभी अच्छी नहीं रह पाई थी.

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