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हिंदुत्व और इस्लामिज़्म का ये रिश्ता जानकर चौंक जाएंगे आप

इस्लाम की खूबसूरती यह है कि ये अपने मानने वालों के लिए लगभग हर चीज तय करता है. मसलन क्या खाना है, क्या पहनना है, कैसे सोना है और यहां तक कि किसके साथ सोना है. लेकिन अब इस खूबसूरती पर सिर्फ इस्लाम की ठेकेदारी नहीं रही. हिंदुत्व अब हिंदू धर्म में भी यही सौंदर्य पैदा करने में लगा हुआ है. कभी सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि हिंदू एक ‘जीवन शैली’ है. अब हिंदुत्व हिंदू के आगे लगे शब्द ‘धर्म’ को मायने देने में लग गया है. जैसे इस्लाम के पास कट्टर इस्लाम है, हिंदू धर्म के पास भी हिंदुत्व है. यह कट्टर इस्लाम की तरह दुनिया भर के लिए सिर दर्द तो नहीं बना है लेकिन भारत के लिए माइग्रेन जरूर साबित हो रहा है.

अगर आप भारत में रहते हैं तो आपको इस बात की चिंता करने की कोई खास जरूरत नहीं कि अरब में क्या हो रहा है. जब तक इस नई खूबसूरती की लपटें आप तक नहीं पहुंच रही हों और आपको इसमें मजा आ रहा हो.

‘हिंदू’- इस शब्द के बारे में बात करने से पहले देवी प्रसाद मिश्र से चार लाइन उधार ली जा सकती है-

“वे मुसलमान थे
उन्होंने अपने घोड़े
सिन्धु में उतारे
और पुकारते रहे हिन्दू! हिन्दू!! हिन्दू!!!
बड़ी जाति को उन्होंने
बड़ा नाम दिया
नदी का नाम दिया”

हिंदू धर्म की सुंदरता थी (थी शब्द को थोड़ी देर के लिए अपने जे़हन में जमा कर रखिए) कि एक हिंदू को अपनी परवरिश के दौरान प्रकृति से जुड़ी लगभग हर चीज को पूजना सिखाया जाता है. मसलन जानवर, पेड़, नदी, पक्षी वगैरह. इस परवरिश का ही नतीजा है कि एक हिंदू को ईसा मसीह के सामने मोमबत्ती जलाने में और दरगाह पर चादर चढ़ाने में कोई खास दिक्कत महसूस नहीं होती. शायद यही वजह है कि इस देश की गंगा-जमुनी तहजीब को गढ़ने और बनाए रखने का श्रेय बहुसंख्यक हिंदुओं को दिया जाता है. अपनी परवरिश के चलते एक हिंदू को पैगम्बर और ईसा मसीह को भी पूजनीय मानने में कोई दिक्कत नहीं होती. इसकी छाप यहां आने वाले मुसलमानों और बाद में मुसलमान हुए लोगों पर हमेशा के लिए बनी रही.

फाइल फोटो

ऐसा नहीं था इससे पहले कभी दिक्कत नहीं थी. लेकिन तमाम दिक्कतों और विरोधाभासों के बावजूद एक साझी तहजीब बुनी गई. इस महीन बुनाई का ही नतीजा था कि दुनिया के लोग इस मुल्क की विभिन्नता और एकता को देखकर रश्क खाते, दांतों तले उंगलियां दबा लेते.

ये भारत का हिंदुत्व 2.0 है. वाट्सएप के जरिए फिर से इतिहास लिखा जा रहा है. मामला बाबरी और सम्प्रदायों के छोटे-मोटे झगड़ों से काफी आगे निकल चुका है. ISIS अगर लेवांत में अत्याचार कर रहा है तो यह लातूर के हिंदुओं को जंगजू बनाने का तर्क मुहैया करवा रहा है. अगर बगदादी घड़ी के कांटे खींचकर  समय को सातवीं सदी में ले जाना चाहता है तो उसके जवाब में हमारे यहां भी लोग पुराने समय के ‘शुद्ध और सनातन’ की वापसी की कोशिश में लगे हुए हैं.

इस उपमहाद्वीप के पश्चिमी छोर से ‘शुद्धता’ का जो अंधड़ चला है वो अब तेजी से पूरब की तरफ बढ़ रहा है. पाकिस्तान के इस्लाम को यह अंधड़ पहले ही खा चुका है. भारत में अभी इसकी शुरुआत है. इस्लाम के बारे में कहा जाता है कि वो पांच खम्भों पर खड़ा है. ये पांच खम्भे हैं, शहदा (विश्वास), सलत (प्रार्थना), ज़कात (दान), रोजा और हज. इसके उलट हिंदू धर्म के पास ऐसा कोई खम्भा नहीं है जिस पर इसे टिकाया जा सके. अब हिंदुत्व नए खम्भे खड़े करने में लगा हुआ है. दूसरे शब्दों में समझें तो एक तरह से हिंदू धर्म के इस्लामीकरण (इस शब्द को कट्टरता के मायने में ही समझे) की तैयारी शुरू हो गई है. मसलन-

ये खाओ 
इसकी शुरुआत बीफ से हो चुकी है. आपकी थाली से बीफ गायब हो चुका है. लेकिन कत्तई इस मुगालते में मत रहिएगा कि मामला बीफ पर खत्म हो जाएगा. अब मांस की दुकानों के बाहर महिलाओं के प्रदर्शन की तस्वीरें माहौल में तैर रही है. अब इस फिजूल की बहस में
जाने से कोई फायदा नहीं है कि हिंदू धर्म में बीफ खाने की इजाज़त है कि नहीं. क्योंकि अब चीजें तर्कों से तय नहीं हो रही हैं. लेकिन मेरी चिंता बीफ बिग्रेड को लेकर है. ये पागलपन बीफ तक सिमट कर नहीं रह जाएगा. यह शाकाहार को हम पर थोपने की शुरुआत भर है.

ये पहनो
जो संगठन बीफ बैन के नाम पर शाकाहार ठेल रहे हैं, वो औरतों के लिए ‘सही कपड़े’ भी तय कर रहे हैं. हालांकि शहर अब इनकी पकड़ से निकल चुके हैं. लेकिन गांव और छोटे कस्बों में इन संगठनों का असर है. कस्बे और गांव जहां भारत की बहुसंख्यक आबादी रहती है. यहां जींस पहनने वाली लड़कियों का उपहास किया जाता है. लड़कियां यहां कायदे से खुद को ढककर बाहर निकलती हैं. ये लोग एक तरफ बुर्के और हिजाब को जाहिलियत की निशानी बताकर इसका विरोध कर रहे हैं, वहीं चुन्नी/ दुपट्टा को सही बताते हुए इनकी जबान एक बार भी नहीं लटपटाती. वैसे भी औरतों को गुलाम बनाने के लिए ही मर्द ने धर्म ईजाद किया.

चूहे बन जाओ

आप खुद ही सोचिए कि क्या इस्लाम सिर्फ इसलिए फैला कि मुसलमान ज्यादा बच्चे पैदा करते हैं. इस्लाम के फैलने के दो कारण हैं, पहला उसका वैचारिक आग्रह और दूसरा जबरदस्ती का धर्म परिवर्तन. लेकिन हमारे यहां मुसलमानों को लेकर एक जुमला अक्सर सुनने को मिलता है, “हम पांच, हमारे पच्चीस.” तो क्या मुसलमान चार शादी करके अपनी आबादी बढ़ाने के षड़यंत्र में लगे हुए हैं? इसे आप सरल ऐकिक नियम से समझ सकते हैं. चूंकि एक महिला एक साल में एक ही बच्चा पैदा कर सकती है, इसलिए किसी मर्द के चार शादी करने पर भी औरत की उत्पादकता में कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता है. आप अपने चारों तरफ नजर घुमाकर देखिए. कितने मुसलमान चार शादियां करते हैं. हिंदुत्व के रथ को खींच रहे साधु-साध्वी लगातार इस बात का प्रचार कर रहे हैं कि हिंदुओं को भी चूहों की तरह बच्चे पैदा करने शुरू कर देने चाहिए ताकि संख्या बल के तौर पर वो इस्लाम का मुकाबला कर सके.

ये खोखली धमकी नहीं है

हिंदू अतिवादी संगठनों की धमकी को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए. इतिहास की खिड़की हमें इसके लिए जरूरी कारण मुहैया करवाती है.

6 अप्रैल 1929, इतवार का दिन था. 19 साल का एक नौजवान आंखों में खून लिए लाहौर की गलियों में घूम रहा था. आखिरकार उसको अपना शिकार मिल गया. उसने एक के बाद एक ताबड़तोड़ तरीके से अधेड़ उम्र के एक शख्स के पेट और सीने में खंजर भोंकना शुरू कर दिया. आसपास के लोग भौंचक्के खड़े रहे. इस शख्स पर इससे पहले भी जानलेवा हमले हो चुके थे. लेकिन वो हर बार बच निकला था. इस बार उसका काम तमाम हो गया.

इस नौजवान हत्यारे को जब यह तसल्ली हो गई कि उसका शिकार मारा गया तो उसने अपना खंजर लाश के पास ही गिरा दिया. वो भागने के बजाय अपने पकड़े जाने के इंतजार में मौका-ए-वारदात पर खड़ा रहा. इस नौजवान का नाम था इल्मुद्दीन और मरने वाले शख्स का नाम था महाशय राजपाल.

उस दौर में पंजाब और हरियाणा आर्य समाज का बड़ा गढ़ हुआ करता था. 1927 में सीता को वेश्या बताते हुए एक पर्चा लाहौर की गलियों में बंटा. किसने बंटवाया किसी को पता नहीं था. इसके जवाब में आर्य समाज ने भी एक छोटी सी किताब छपवाई. नाम था ‘रंगीला रसूल.’ इस किताब में मोहम्मद और उनके वैवाहिक संबंधों के बारे में काफी ‘खुल’ कर लिखा गया था. इल्मुद्दीन ने किताब को छापने वाले राजपाल के सीने में खंजर भोककर रसूल की बेअदबी का बदला लिया था.

यह घटना इस पूरे उपमहाद्वीप में ईशनिंदा के चलते की गई पहली हत्या थी. 31 अक्टूबर 1929 को इल्मुद्दीन को इस हत्या के चलते फांसी पर लटका दिया गया. लोग कहते हैं कि मरते वक्त इल्मुद्दीन को अपने किए पर कोई मलाल नहीं था. आज पाकिस्तान में इल्मुद्दीन को एक ‘गाजी’ की तरह याद किया जाता है. भारत में मुसलमानों को इल्मुद्दीन याद भी नहीं है. न ही कभी महाशय राजपाल को कभी याद किया जाता है. मुगलों के समय में औरंगजेब को छोड़ कर लगभग सब बादशाहों ने हिंदू-मुस्लिम एकता को बड़े जतन से सहेज कर रखा. चांदनी चौक की प्रसिद्द रामलीला की शुरुआत आखिरी बादशाह बहादुर शाह जफ़र ने की थी. खैर अब उन्हें भी याद नहीं रखा जाता.

arya samaj

आजादी के कुछ दशक के भीतर ही हम एकबार फिर से उस मोड़ पर खड़े हैं जहां इल्मुद्दीन अपने खंजर पैने कर रहा है. एक दशक पहले तक हिंदूवादी संगठनों की तरफ से कौमी एकता की तमाम बहसों में यह बात बड़े जोरदार तरीके से उठाई जाती थी कि देखिए मुसलमानों के मुकाबले हिंदू कितना सहिष्णु है. जबकि अरब और अफ्रीका में मुलसमान अपने मजहब को लेकर कैसे मार-काट मचाए हुए हैं. अब हिंदू खुद को सहिष्णु नहीं कह रहा है. वो अब अपने धर्म के नाम पर किसी को भी क़त्ल करने लिए तैयार है.

ज्यादातर हिंदू मानते हैं कि गाय उनके लिए पवित्र है. लेकिन इनमें से भी गौकशी को लेकर अपने-अपने मत हुआ करते थे. अब ऐसा नहीं है. अब लोगों को समझ में ही नहीं आ रहा है कि गाय को मां कहने वाले कब बैल बन जा रहे हैं. यहां तक कि वो जानवर के प्रति अपना प्रेम जाहिर करने के लिए किसी भी इंसान को मौत के घाट उतार सकते हैं. पहलू खान जोकि गायें पालता था, उसे सिर्फ इस जुर्म में मार डाला गया क्योंकि वो मुसलमान था और उसके पहलू में गाय खड़ी थी.

अतिवादी हिंदू संगठन एक चीज से परेशान हैं. वो इस बात का दावा भी नहीं कर सकते कि इस्लाम की तरह हिंदू भी एक किताब और अल्लाह में भरोसा करने लगे. सैंकड़ों दर्शनों और हजारों सम्प्रदायों में बंटे एक धर्म को एक छतरी के नीचे लाना आसान नहीं है. हालांकि वो बार-बार असफल होने के बावजूद अपनी कोशिश जारी रखते हैं. इस कोशिश में ही नए खम्भे खड़े किए जा रहे हैं, जिसे इस नए किस्म के हिंदुत्व को टिकाया जा सके. उन्होंने खून में खूबसूरती खोज ली है. उन्हें एकता चाहिए लेकिन वो अब विविधता को बर्दाश्त नहीं करना चाहते.


यह लेख इंडिया टुडे ग्रुप के मैनेजिंग एडिटर कमलेश सिंह ने लिखा है. The lallantop के लिए इसका अनुवाद विनय सुल्तान ने किया है.


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