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हाशिमपुरा में 42 मुसलमानों की हत्या में 16 जवानों को उम्र कैद

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22 मई, 1987 को हुए हाशिमपुरा नरसंहार का इंसाफ 31 अक्टूबर, 2018 को मिला है. दिल्ली हाई कोर्ट ने प्रोविंशल आर्म्ड कॉन्सटेबुलरी (PAC) के 16 पूर्व जवानों को दोषी करार दिया. सभी को उम्रकैद की सजा सुनाई. ये सभी सर्विस से रिटायर हो चुके हैं. इन्हें हत्या, किडनैपिंग, आपराधिक साजिश और सबूत खत्म करने का दोषी पाया गया. जस्टिस एस मुरलीधर और जस्टिस विनोद गोयल की बेंच ने फैसला सुनाया. कोर्ट ने कहा-

आर्म्ड फोर्सेज़ के लोगों ने निशाना बनाकर हत्या की. अल्पसंख्यक समुदाय के लोग कत्ल किए गए. उनके परिवार को न्याय पाने के लिए 31 साल तक इंतजार करना पड़ा. 

इससे पहले मार्च 2015 में एक ट्रायल कोर्ट ने इन सबको बरी कर दिया था. कहा था, उन्हें दोषी साबित करने लायक सबूत नहीं हैं.

ये सब कहां से शुरू हुआ?
बाबरी मस्जिद ढहाई तो गई 6 दिसंबर, 1992 को. लेकिन जैसे फसल काटने के लिए बीज बोने होते हैं, वैसे ही इस दिन की पौध लगाई गई थी 1986 में. जब बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाया गया. इसके बाद देश में तेजी से माहौल बदलने लगा. राम जन्मभूमि को लेकर लामबंदी होने लगी. जगह-जगह दंगे भड़कने लगे. ऐसा ही एक दंगा मेरठ में हुआ. अप्रैल 1987 में. कंट्रोल करने के लिए PAC बुलाई गई. हालात काबू में आए, तो PAC हटा दी गई. मगर शायद प्रशासन ने जल्दबाजी दिखाई थी. 19 मई को दोबारा दंगा शुरू हो गया. करीब 10 लोग मारे गए. सेना को बुलाया गया. साथ में CRPF की सात और PAC की 30 कंपनियां तैनात की गई. शहर में कर्फ्यू का ऐलान हो गया. मगर हालात नहीं सुधरे. 20 मई को भीड़ ने शहर के गुलमर्ग सिनेमा हॉल को फूंक दिया. मरने वालों की गिनती बढ़कर 22 हो गई. प्रशासन ने सख्ती दिखाई. देखते ही गोली मार देने का आदेश जारी हुआ.

मेरठ में दंगा भड़का ही हुआ था. इस घटना के बारे में पता लगते ही गाजियाबाद में भी दंगा शुरू हो सकता था. जिसमें और निर्दोष जानें जा सकती थीं. बाबरी मस्जिद का ताला खुलने और मस्जिद ढहाने के बीच देश में कई जगह दंगे हुए थे.
मेरठ में दंगा भड़का ही हुआ था. हाशिमपुरा में PAC ने जो भयंकर अपराध किया था, इसके बारे में पता लगते ही गाजियाबाद में भी दंगा शुरू हो सकता था. जिसमें और निर्दोष जानें जा सकती थीं. बाबरी मस्जिद का ताला खुलने और मस्जिद ढहाने के बीच देश में कई जगह दंगे हुए थे. छोटी-छोटी बातों पर दंगे हो रहे थे. ये तो फिर नरसंहार ही था. 

हाशिमपुरा में क्या हुआ?
उत्तर प्रदेश के मेरठ में एक मुहल्ला है- हाशिमपुरा. वो 22 मई, 1987 की रात थी. देखते ही गोली मार देने का आदेश दिए दो दिन बीत गए थे. PAC की एक टुकड़ी का कमांडर था सुरिंदर पाल सिंह. वो अपने साथ 19 जवानों को लेकर हाशिमपुरा पहुंचा. उसने तकरीबन 47 मुसलमानों को धरा. फिर उन्हें PAC के एक ट्रक के पीछे भर दिया. PAC के 41वें बटैलियन के इस ट्रक में बैठाए गए मुसलमानों को लगा कि उन्हें थाने या फिर जेल ले जाया जा रहा है. ट्रक में बैठे-बैठे करीब 45 मिनट गुजरे होंगे कि रात के अंधेरे में ट्रक एकाएक रुक गया. ये मुरादनगर के गंगा ब्रिज के पास की जगह थी. PAC के जवान नीचे उतरे. उन्होंने अंदर बैठे मुसलमानों को नीचे उतारा. कुछ लोग ही उतरे थे कि एकाएक PAC के लोगों ने गोलियां चलानी शुरू कर दीं. जो लोग अभी ट्रक से नहीं उतरे थे, उन्होंने ओट लेकर छुपने की कोशिश की. रात के अंधेरे में गोलियों की आवाज अगल-बगल के गांवों में पहुंची. दंगे का समय था. लोगों के कान खड़े हो गए. हल्ला शुरू हो गया. PAC के जवान फटाफट ट्रक में बैठे और गाजियाबाद की तरफ बढ़ गए. रास्ते में माकनपुर आया. यहां एक नाला था. PAC ने फिर ट्रक रोका. अंदर जो लोग बचे थे, उन्हें नीचे उतरने को कहा. वो डरे हुए मुसलमान कांप रहे थे. वो नीचे क्या उतरते? तब PAC के जवानों ने उन्हें घसीट-घसीटकर नीचे उतारा. कुछ को नीचे उतारकर गोली मारी. कुछ जो ट्रक से नहीं उतरे थे, उन्हें अंदर भी गोली मार दी. फिर सबको नाले में फेंक दिया. PAC के उन जवानों को लगा था कि सारे लोग मर चुके हैं. मगर पांच लोग जिंदा बच गए थे. इनमें से कुछ ने जान बचाने के लिए लाशों के बीच लाश होने का नाटक किया. कुछ बुरी तरह घायल थे, मगर बच गए. शायद दुनिया को इस नरसंहार के बारे में बताने के लिए जिंदा बच गए थे वो. कुल मिलाकर 42 लोग मारे गए थे. उन्हें लोग क्यों लिखें? उन्हें इंसान भी क्यों लिखें? मारनेवालों ने उन्हें इंसान कहां समझा था? उन्हें बस इसलिए मारा गया था कि वो मुसलमान थे.

घटना के समय गाजियाबाद के SP थे विभूति नारायण रॉय. उन्होंने घटना वाली रात क्या देखा, क्या जाना, ये सब बहुत विस्तार से बताया है. इस केस में यही तो ट्रेजडी थी. ऐसा नहीं था कि गवाह नहीं थे. फिर भी न्याय मिलने में इतना वक्त लग गया. ये विभूति नारायण रॉय की हाशिमपुरा पर लिखी किताब का कवर पेज है.
घटना के समय गाजियाबाद के SP थे विभूति नारायण रॉय. उन्होंने घटना वाली रात क्या देखा, क्या जाना, ये सब बहुत विस्तार से बताया है. इस केस में यही तो ट्रेजडी थी. ऐसा नहीं था कि गवाह नहीं थे. फिर भी न्याय मिलने में इतना वक्त लग गया. ये विभूति नारायण रॉय की हाशिमपुरा पर लिखी किताब का कवर पेज है.

गाजियाबाद के SP रहे शख्स ने उस रात का पूरा हाल बताया है
घटना के समय गाजियाबाद के SP थे विभूति नारायण राय. उन्होंने बहुत ब्योरे से लिखा है इस घटना पर. उनके मुताबिक-

उस रात मैं अपने घर आ रहा था कि गेट पर मुझे दिखे सब इंस्पेक्टर बी बी सिंह. सिंह के मुंह से पता चला कि PAC के लोगों ने कुछ मुसलमानों को मार डाला है. रात के नौ बजे का वक्त था. बी बी सिंह थाने में बैठे थे. कि एकाएक उन्हें माकनपुर की तरफ से गोलियां चलने की आवाज आई. SHO और कॉन्स्टेबल को साथ लेकर वो बाइक से गांव की तरफ बढ़े. रास्ते में देखा, एक ट्रक बढ़ा आ रहा है. बी बी सिंह ने अपनी बाइक एक किनारे को बचाई. वरना शायद वो लोग भी कुचल दिए जाते. खुद को बचाते-बचाते भी बी बी सिंह और उनके साथियों ने भर नजर ट्रक को देख लिया था. पीले रंग का ट्रक, पीछे की तरफ 41 लिखा हुआ. वो समझ गए कि ये PAC की 41वीं बटैलियन का ट्रक है. उसमें कुछ अफसर भी दिखे बैठे. गांव से पहले एक नाला पड़ता था. वहां पहुंचे, तो बाइक की हेडलाइट से नीचे नाले में रोशनी हुई. सब तरफ खून फैला था. कुछ लाशें थीं, जिनके ऊपर ताजा घाव थे. बी बी सिंह ने कॉन्स्टेबल को वहीं छोड़ा और मेरे पास पहुंचे. मैं जिलाधिकारी नसीम जैदी, ASP और कुछ डेप्युटी SP और मैजिस्ट्रेट को साथ लेकर माकनपुर स्ट्रीम पर पहुंचा. टॉर्च और गाड़ियों के हेडलाइट की रोशनी में वहां देखा, तो ताजा खून बिखरा था. नाले में, झाड़ियों में, इधर-उधर लाशें बिखरी थीं. ये सोचकर कि शायद कोई जिंदा बचा हो, हमने तलाश शुरू की. बहुत तलाश के बाद भी कोई नहीं मिला. हम लोग लौटने ही वाले थे कि नाले से किसी के खांसने की आवाज आई. पास जाकर देखा तो दोनों हाथों के सहारे एक झाड़ी से लटकता एक इंसान दिखा. आधा शरीर नाले में. उसे लगा, हम भी मारने आए हैं. मगर हमने उसे भरोसा दिलाया. उस आदमी का नाम था बबुद्दीन. उसे गोली बस छूकर निकल गई थी. बेहोश होकर वो झाड़ियों में गिर गया. संयोग से PAC के उन हत्यारों का ध्यान उसकी तरफ नहीं गया. 

विभूति नारायण रॉय ने इस घटना पर एक किताब भी लिखी है- हाशिमपुरा 22 मई. इस एक रात का ब्योरा आपके शरीर के तिनके-तिनके को खौफ से ढक देगा. जिन जवानों का काम लोगों की जान बचाना था, उन्होंने खुद बिना वजह निहत्थों की जान ले ली! सांप्रदायिकता के घिनौनेपन की सबसे नृशंस मिसालों में इस घटना की भी गिनती होनी चाहिए.

खूब राजनीति हुई इस पर
प्रधानमंत्री राजीव गांधी हाशिमपुरा के दौरे पर पहुंचे. वीर बहादुर सिंह, जो उस UP के मुख्यमंत्री थे, 1988 तक अपनी कुर्सी पर बने रहे. जस्टिस राजिंदर सच्चर और इंद्रकुमार गुजराल की सदस्यता वाली एक जांच समिति बनी. 1994 में इस समिति ने अपनी रिपोर्ट फाइल की. 1 जून, 1995 को PAC के 19 अधिकारियों को दोषी मानकर मुकदमा शुरू किया गया. मगर ये केस खिंचता ही रहा, खिंचता ही रहा. कई साल बाद 21 मार्च, 2015 को जब फैसले की घड़ी आई, तो दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने 16 आरोपियों को बरी कर दिया. 27 साल और 161 गवाहों के बयान के बाद भी अदालत को उन आरोपियों के खिलाफ कोई मजबूत सबूत नजर नहीं आया था.

इसमें कोई शक नहीं था कि 22 मई की उस रात मुरादनगर और माकनपुर के उन दो नालों में लाशें तो तैर रही थीं. मगर जो मरे थे, उन्हें मारा किसने था, इसका फैसला नहीं हो पा रहा था. ट्रायल कोर्ट से आरोपियों को रिहाई मिलने के बाद लगा कि शायद न्याय भी उस रात मुर्दा होकर उन्हीं दो नालों में बह गया था. दिल्ली हाई कोर्ट के ताजे फैसले से हिम्मत तो मिली है. मगर ये इतनी देर से मिली है कि जख्म पूरा भर नहीं पाएगा शायद.


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