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जब मशहूर सिंगर महेंद्र कपूर पंडित जसराज के कदमों में लेट गए

आज क्लासिकल सिंगर पंडित जसराज का जन्मदिन है. उन पर सुनीता बुद्धिराजा ने एक किताब लिखी है- ‘सात सुरों के बीच.’ वाणी प्रकाशन से छपी इस किताब में पंडित जसराज की जिंदगी के कई दिलचस्प किस्से हैं. पेश है किताब का एक हिस्सा. उसके पहले उनकी आवाज़ को पसमंज़र में लगा लेते हैं, फिर आगे बढ़ते हैं.

सुनीता लिखती हैं:

‘और राग सब बने बाराती, दूल्हा राग वसंत.’ गा रहे हैं पंडित जसराज. हैदराबाद में चांदबीबी की बावड़ी में पंडित मोतीराम और पंडित मनीराम संगीत समारोह की वह शाम. पंडित जसराज के पिता पंडित मोतीराम जी की पुण्यतिथि.

30 नवंबर. तीन दशक से ज्यादा हो गए, जसराज जी इसी दिन अपने पिता को अपनी श्रद्धा के फूल समर्पित करते हैं. अपने स्वरों के फूल. उस दिन, शीत ऋतु में फूलों के राग का नाम है वसंत.

बावड़ी में जगमगाते हैं दीये
बावड़ी में तैरते हैं दीये
बावड़ी में तैरता है प्रकाश
दिपदिप
बावड़ी में तैरते हैं प्रकाश के साथ सुर भी
आत्मा है इसमें सराबोर
नहाई है संगीत में
जादुई छड़ी घुमाई है किसी ने
वह और कोई नहीं, हैदराबाद का मानस-पुत्र जसराज है.

उस दिन कार्यक्रम सम्पन्न होने पर मैं बरबस मंच पर कह उठी थी, ‘वसन्त तब आता है जब पंडित जसराज उसे बुलाते हैं, वसन्त तब आता है जब पंडित जसराज उसे गाते हैं.’

यह अनुभव कोई एक बार का नहीं है. जितनी बार उन्हें सुनना होता है, जिस बिन्दु पर उनका गायन सम्पन्न होता है, वही जीवन का अन्तिम सत्य लगने लगता है. लेकिन, अन्तिम सत्य तो उस व्यक्ति के जीवन का होता है, जिसके जीवन का कोई प्रथम सत्य हो! उसका क्या, जिसका एक ही सत्य हो और वह सत्य हो संगीत!

पंडित जसराज कहते हैं,

‘यदि कहूं कि संगीत जीवन है, तब जीवन तो सबके पास है. यदि कहूँ कि संगीत आजीविका है, तो आजीविका भी सभी के पास होती है. यदि कहूँ कि संगीत प्राण है, तो प्राण भी हर जीवनधारी के पास है. मेरे लिए संगीत हर चीज से परे है. हर अभिव्यक्ति से परे है, हर भाव से ऊंचा है. बस संगीत ही संगीत है, और कुछ नहीं.”

पंडित जसराज से बात करके मुझे याद आने लगती हैं वे पंक्तियां, ‘हवा को जानना चाहते हो तो उसमें सुगन्ध की तरह रम जाओ तुम हवा को पा जाओगे. नदी को पाना चाहते हो तो उसमें धारा की तरह समा जाओ तुम नदी को पा जाओगे.’ जसराज जी से बात करके लगता है, उनका गायन सुनकर लगता है,‘तुम संगीत को पाना चाहते हो तो स्वयं संगीत बन जाओ, तुम संगीत को पा जाओगे.’


जसराज का गायन, जहां तू ही तू है

वृन्दावन में आयोजित स्वामी हरिदास समारोह. संगीत और कविता का रस प्रवाहित हो रहा है. आधी रात बीत चुकी है. मंच से मैं उद्घोषणा करती हूं. ‘जलालुद्दीन रूमी की एक प्रसिद्ध कथा है. एक प्रेमी गया प्रेयसी के द्वार पर. द्वार खटखटाया. भीतर से आवाज आई ‘कौन’? प्रेमी ने उत्तर दिया ‘द्वार खोलो, मैं हूं तुम्हारा प्रेमी.’ भीतर सन्नाटा हो गया. बड़ा खामोश उदास सन्नाटा. प्रेमी ने फिर द्वार खटखटाया. भीतर से आवाज आई ‘कौन’? प्रेमी ने उत्तर दिया, ‘क्या तू मुझे भूल गई? मैं हूं तुम्हारा प्रेमी. द्वार खोलो.’ भीतर से आवाज आई, ‘इस घर में दो के रहने लायक जगह नहीं. तुम तो प्रेम का अर्थ ही नहीं समझे. प्रेम गली अति संकरी, या में दो न समाय. जाओ, जब प्रेम का अर्थ समझ जाओ, तब आना.’ प्रेमी लौट गया, हताश, निराश, उदास. जंगल-जंगल, नदी-नाले, वादी-पहाड़ घूमता रहा. कई वसंत आए, चले गए. कई चांद उगे, डूबे.

कई सूरज निकले, छुपे. एक दिन प्रेमी लौट आया प्रेमिका के द्वार पर. द्वार खटखटाया. भीतर से आवाज आयी ‘कौन’, प्रेमी ने उत्तर दिया, ‘द्वार खोलो, अब ‘मैं’, ‘मैं’ नहीं रहा, केवल ‘तू’ ही ‘तू’ है.’ कहते हैं, द्वार खुल गये, तत्क्षण द्वार खुल गये. प्रेमी-प्रेमिका का मिलन हो गया, यह मिलन आत्मा-परमात्मा का मिलन था. पंडित जसराज का गायन वह गायन है, जहाँ ‘मैं’ ‘मैं’ नहीं रहता, ‘तू ही तू’ हो जाता है.’


छुटपन में ‘दीवाना बना दे’ के दीवाने थे जसराज

पांच-छह साल के जसराज को न तो मालूम था कि गाना क्या होता है, और न ही मालूम था कि गाने में जो शब्द हैं, ‘दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे, वरना कहीं तकदीर तमाशा न बना दे’, उनका क्या अर्थ है. बस रिकॉर्ड की सुई की तरह उसके कदम चाय की दुकान के सामने जो रुकते, सो रुकते. बड़े भाई-राजा भैया और जसराज दोनों स्कूल की तरफ चलते, लेकिन उस होटल तक पहुँच कर जसराज बड़े भाई से कहते, अच्छा राजा भैया, तुम जाओ. राजा भैया बहुत समझाते, मां मारेगी, स्कूल से नाम कट जाएगा, लेकिन जसराज के कान जो ‘दीवाना बनाना है’, सुन रहे होते, राजा भैया की बात कहाँ सुनते! दिन भर सुनते रहते! वही रिकॉर्ड. कई बार होटल वाला दूसरा कोई रिकॉर्ड लगा देता तो उसकी मिन्नत मनौवल करके वापस ‘दीवाना बना दे’ को लगवा लेते.


बेगम अख्तर बोलीं, तुमसे छोटी होती तो तुमसे गाना सीखती

उसी आवाज को सुन-सुनकर नन्हे जसराज ने बचपन के न जाने कितने साल निकाल दिए. संगीत की यात्रा चलती रही, उस यात्रा में वह जसराज, जसराज जी और पंडित जसराज बन गये. सालों बीत चुके थे. बेगम अख्तर को, जिनका वह गीत उनके दिल की धड़कन को पचास साल बाद भी तेज कर जाता था, प्यार से जसराज जी उन्हें ‘अम्मा या अम्मी’ कहकर पुकरने लगे. एक दिन पूना में ‘आशियाना’, वसुन्धरा पंडित जी के घर, के निकट रात को जसराज का गायन था. बेगम अख्तर वसुंधरा जी के घर में ही ठहरी थीं. जसराज जी से कहने लगीं,‘‘हम सुनने आएंगे रात में. इन्होंने बहुत कहा, कि अम्मा देर हो जाएगी, आप मत आइए लेकिन वे आ गईं. रात साढ़े 10 – पौने 11 बजे जसराज जी का गायन शुरू हुआ और उधर बेगम अख्तर हाथ में लाठी पकड़ कर आ गयीं (उन दिनों वे लाठी पकड़कर चलने लगी थीं) और सवेरे 5 बजे तक सुनती रहीं.

गाना खत्म होने पर बेगम अख्तर बोलीं, ‘मैं क्या बताऊं अगर मैं तुमसे उम्र में छोटी होती, तो तुमसे गाना सीखती.’ मैंने कहा अम्मा, ‘आपका दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे’ तो अभी तक हम समझ नहीं पाये, तो वे बोली कि नहीं, हम सच कह रहे हैं. मगर वो तो वो थीं. उनका दिल भी कितना बड़ा रहा होगा, वरना कोई ऐसे थोड़े न कहता है. वह उनके साथ मेरी अन्तिम मुलाकात थी. बहुत बड़े दिल की महिला थीं“,


Pt jasraj book
किताब का कवर पेज.

रियाज़ न करनी पड़े इसके लिए बहाने बनाते थे

बेगम अख्तर का गाना सुन-सुन कर जसराज जी के हाथ उस पर ताल देने लगे. बड़े भाई प्रताप नारायण जी ने सोचा कि अरे, यह तो तबला बजा सकता है, सो ‘ना धिन धिन ना ना धिन धिन ना’ बजाना सिखा दिया. धीरे-धीरे हाथ तबले पर सीधा पड़ने लगा. कभी किसी बस में बैठकर, कभी चाय की दुकान पर, कभी फुटपाथ पर खड़े हो तो कभी बाहर दरी पर बैठकर कलकत्ते में गाना सुनते रहे. वह था कलकत्ता शहर जिसमें लोग संगीत के ऐसे शौकीन कि 1000 आदमी यदि पंडाल के भीतर बैठते तो 8-10 हजार लोग पंडाल के बाहर खड़े रहकर रात-रात भर गायन सुनते. ऐसे बाहर खड़े होकर सुनने वालों में जसराज भी थे. कभी-कभी कोई आदमी बच्चे की शिद्दत को देखकर तरस खा लेता और कहता कि भई मेरा पास ले जाओ. बसुश्री, बिजली सिनेमा, इन्दिरा सिनेमा में संगीत सम्मेलन होते, सिनेमा को बन्द कर दिया और बड़े-बड़े कलाकार कार्यक्रम देने आते.

jasraj

एक बार आयोजकों ने बड़े गुलाम अली खाँ साहब के बाद माणिक वर्मा जी को बिठा दिया गाने के लिए. उनकी हवा उड़ गयी कि मैं अब क्या गाऊँगी! मगर इतना खूबसूरत ‘ललित’ गाया कि सुनने वाले अवाक्. ऐसा लगा ही नहीं कि कार्यक्रम में कुछ उलट-पुलट हुआ है. उस दिन जसराज ने जाना ‘इसको’ कहते हैं तालीम ”हम जो सवेरे उठकर राजी नहीं थे रोज सवेरे रियाज के लिए उठने लगे. माँ ऐसी थी कि रियाज करने के लिए सुबह-सवेरे उठा देतीं. हमें जल्दी उठना अच्छा नहीं लगता और वह चार ही बजे जगा देती. एक-आध दिन को उठ जाते थे, बाकी दिन गले को इस तरह कुछ अव्यवस्थित करते कि आवाज ही बैठ गयी है. इस प्रकार दो-चार बार तो माँ को बना गये कि भई, उसका गला ही ठीक नहीं रहता. उसके बाद से उन्होंने कहा कि कोई बात नहीं, ठीक नहीं रहता है गला तो, रियाज करना तो जरूरी है. फिर गले का तो कोई दोष था नहीं, दोष तो हमारा ही था. धीरे-धीरे समझ में आने लगा कि अपने-आप से चोरी करना कोई अच्छी बात नहीं. जब इसी पतवार को पकड़ना है, उदरपूर्ति से लेकर सभी आशाओं-आकांक्षाओं की पूर्ति का माध्यम संगीत ही है, तो फिर उसी को अपनाऊँ. तब मुझे माणिक वर्मा जी की तालीम याद आयी. ‘दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे’ सिर पर दीवानगी की तरह चढ़ गया और मेरा संगीत से प्रेम हो गया.“


तय किया कि अब तबला नहीं बजाऊंगा

कभी-कभी प्रताप नारायण जी अपने साथ तबला बजाने ले जाते जसराज जी को. एक बार किसी कार्यक्रम में आयोजकों ने गायक के लिए मंच पर ऊंची जगह पर आसन बनाया और संगीतकारों के लिए नीचे. जसराज जी को बहुत बुरा लगा और मन में ठान लिया कि यदि तबला-वादक का उतना ही आदर नहीं होता जितना कि गायक का, तो मैं अब से तबला नहीं बजाऊंगा. उन्हीं दिनों एक बड़े गायक कलकत्ते आये. उनका कोई कार्यक्रम था. उनके तबला-वादक की तबीयत खराब हो गयी और वे जसराज जी के बड़े भाई साहब से गुजारिश करके इन्हें तबला बजाने के लिए साथ में ले गये. उन्होंने बहुत अच्छा गाया. अगले दिन कोई सज्जन जसराज जी के यहाँ आये और उन गायक के गायन में मीन-मेख निकालने लगे. थोड़ी देर तक तो जसराज जी सुनते रहे, लेकिन फिर नहीं रहा गया और उन सज्जन से बोले कि नहीं, राग का निर्वाह तो बहुत अच्छा किया गया था.

तब वे सज्जन जसराज जी को झड़प कर बोले, ‘तुम चुप रहो. तुम मरा हुआ चमड़ा बजाते हो, बजाते रहो. गाना समझना तुम्हारे बस का नहीं.’ बस तभी निर्णय हो गया कि अब गाना ही सीखूँगा. दोनों बड़े भाई,पंडित मनीराम जी और पंडित प्रताप नारायण जी से गाना सीखना शुरू किया तो फिर 60 वर्ष से अधिक समय व्यतीत हो गये गाते हुए. वह स्वयं भी अपने गायन में खो जाते हैं और श्रोता को भी भाव-विह्वल कर देते हैं.


महेंद्र कपूर आए तो चरणों लेट गए

एक बार बेगम अख्तर, लक्ष्मीशंकर जी और जसराज जी, तीनों को शिमला में समर फेस्टिवल में गाने के लिए बुलावा आया. तब ऑल इंडिया रेडियो वालों ने कहा कि शिमला तो आ ही रहे हैं, ए.आई.आर में भी गा दें, पैसा दुगना मिल जाएगा. यूं पैसा तो मिलता ही कितना था. कार्यक्रम के ठीक पहले उन्होंने महेन्द्र कपूर का गाना रख दिया. 1970 में महेन्द्र कपूर बड़े लोकप्रिय थे. टिकटें इतनी बिकीं कि जितनी बैठने की व्यवस्था थी, उससे दुगनी. सवेरे आयोजकों की नींद खुली कि ऐसे में इन शास्त्राीय संगीतकारों से भी बातचीत कर ली जाए, तो पहले लक्ष्मीशंकर जी के पति से आग्रह किया कि यदि लक्ष्मी जी अपना गाना थोड़ा छोटा कर दें तो अच्छा होगा. उन्होंने कहा कि ठीक है, एक-आध भजन गाकर ही उठ जाऊँगी.

जसराज जी से भी आग्रह किया. ”हमें कोई भजन-वगैरह तो तब आता नहीं था, हम खयाल-स्थाई गाते थे. गाना शुरू किया,श्रोता बिल्कुल शान्त भाव से सुन रहे थे. इतने में आयोजक महोदय भागे-भागे आये माइक पर कि कृपया शांति बनाए रखिए, महेन्द्र कपूर जी अपने होटल से यहाँ आने के लिए चल चुके हैं. फिर क्या था, पब्लिक में जोर से अशान्ति हो गयी. हमने कहा कि हम तो उठ ही जाएँगे, लेकिन जब तक महेन्द्र कपूर जी आएँ, तब तक स्टेज खाली पड़ा रहेगा, तब तक दस मिनट हम गाते हैं. सामने एक सरदार जी बैठे थे, बोले कि ये पक्के गाने वाले तो एक दफे गाना शुरू करते हैं तो बन्द ही नहीं करते. लड़कों ने मसखरी करना शुरू कर दिया. दुर्गा (बेटी) छोटी थी, रोने लगी कि बापू ने ‘माता कालिका’ गायी तो भी सारे हँसी कर रहे हैं. इतने में महेन्द्र कपूर आये, देखा कि शोर हो रहा है. जूते खोल कर मंच पर आये और माइक पकड़ कर बोले कि आपको पता है कि ये (जसराज जी) कौन हैं? ये मेरे गुरु हैं. जो हम इनके चरणों में बैठकर थोड़ा-बहुत गाना सीखे हैं, तो आप लोगों को सुनाते हैं. एकदम साष्टांग लेट गये कि गुरुदेव, आप गाइए. मैं सुनूँगा, ये लोग सुनें या न सुनें. फिर क्या, 45 मिनट तक गाया, महेन्द्र कपूर के कारण. ऐसी होती है कलाकार की विनम्रता और अग्रज गुरुजनों के प्रति भक्ति.


महादेवी वर्मा से परिचय

कलकत्ते में एक न्यू एंपायर थिऐटर है. पुराना, ब्रिटिश जमाने से. उसमें एक कार्यक्रम हुआ. महादेवी जी आयी थीं. हम गाकर उठे और उनसे मिलने गये, बहुत खुश हुईं. बोलीं,इलाहाबाद नहीं आते, मैंने कहा आता तो हूँं. बोलीं-तब मिला करो. फिर जब उनके घर गया तो कहने लगीं, ‘अनुज. जसराज नहीं, पंडित जसराज नहीं. अनुज! अनुज, तुम गाते तो बहुत अच्छा हो, पर थोड़ा-सा प्यार करो न!’ हमको पहले तो समझ में नहीं आया, कहें,‘इतना अच्छा, स्पष्ट बोलते हो, पीछे भावना भी लाओ न!’ अब साहब, इतनी बड़ी, इतनी महान व्यक्ति ने यह बात कही तो थोड़ा-सा गौर किया. सच में पाया कि हम कुएँ पर तो जरूर खड़े हैं, मगर मुँडेर पर खड़े हैं, नीचे पानी में नहीं उतरे. बस आँख के आगे से पर्दा हट गया.“ जसराज जी महादेवी जी के विषय में बात करते-करते आँखें पोंछ रहे हैं. यही है उनकी विनम्रता, यही है उनका प्यारा-सा दिल जो उनके गायन में ही नहीं, व्यक्तित्व के एक-एक पक्ष में भी है.


जब सूरदास के पद गाए

जसराज जी बताते हैं, 1977 में सूरदास पंचशती कमेटी स्थापित हुई तो सोचा गया कि सूरदास को कौन गाएगा. ”हमारा भाग्योदय हुआ कि सारे हिन्दुस्तान में सभी ने कहा कि इस काम के लिए जसराज ठीक रहेगा. हमने सूरदास जी पर काम करना शुरू किया और इस आयोजन की सभानेतृ भी महादेवी जी ही थीं. 23-24 साल बीत चुके थे पहली भेंट को. हमने सूरदास जी के पद चुने, सात-आठ पद गा चुके तो महादेवी जी बीच से उठी. हमने तो जो क्रम बनाया था, उसी के अनुसार हम गा रहे थे. हमने गाना शुरू किया, ‘ऊधौ मन न भये दस-बीस.’ महादेवी जी जहाँ खड़ी थीं, वहीं बैठ गयीं और फिर गाने में उनकी जो समाधि लगी कि क्या बताएँ, उनकी अश्रुधारा बह रही थी, और हम गाये जा रहे थे.“

कुंवर नारायण जी, डॉ. धर्मवीर भारती, श्री केशवचन्द्र वर्मा, महादेवी जी, पंडित श्रीलाल शुक्ल,जाने कितने-कितने साहित्यिक नाम हैं जिन्हें जसराज जी के करीबी बन्धुओं में रखा जा सकता है.


भक्ति-संगीत से परिचय

भक्ति-संगीत के साथ जसराज जी का पहला परिचय उनके आध्यात्मिक गुरु सानंद बापू जी ने करवाया. ”1944 में मुझे ऐसा आभास हुआ कि यह जो मूर्ति है, ऐसी नहीं है जैसी दिखाई देती है. हम चिल्ला-चिल्लाकर कहें,भगवान, भगवान. उसका भी कोई अर्थ है क्या? मैं ‘माता कालिका’ वगैरह गाता था. बापू साहब समझाते कि ‘कृष्ण’ और ‘काली’ एक हैं. दोनों में कोई अन्तर नहीं है. तुम कृष्ण गाओ चाहे काली. तो यह उन्हीं की देन है. धीरे-धीरे इस भाव का विस्तार होता गया. आसकरण जी पुष्टिमार्गी हैं. श्याम बाबा की बहुत देन है. उन्हें तो हम अपना गुरु मानते हैं. मैंने हवेली-संगीत या पुष्टिमार्ग में पाया कि वह पूर्ण संगीत है. जो हम लोग गाते हैं, जो शास्त्राीय संगीत या खयाल गा रहे हैं वह तो अधूरा है. पहली बात तो यह है कि अनेक बंदिशें हैं, जिसे कलाकार कहते हैं कि ये फलाँ उस्ताद की या लेखक की हैं, उनकी अपनी नहीं है.

बहुत सारे पद पुष्टिमार्गी कवियों की रचनाओं में से लिए गये हैं और कह दिया कि फलाँ उस्ताद या फलाँ पंडित की बंदिश हैं. आपको ताज्जुब होगा कि ‘लट उलझी सुलझा जा बालमा हाथन मेंहदी लगी’, सूरदास जी का पद है. एक जगह उसकी अगली पंक्तियाँ पढ़ीं. लोगों ने पदों का शृंगारिक अंश ले लिया लेकिन जहाँ भक्ति आती है, पद का वह अंश काट दिया. हम सब लोग गाते हैं,‘मेरो पिया रसिया’, यह वास्तव में कीर्तन है. मुझे पता चला कि गायन में शब्दों का बहुत महत्त्व है. मैंने पहले कहा न कि मुझे वह श्लोक मिल गया, ‘नाहम् वसामि वैकुंठे…मद्भक्ताः यत्रा गायंति तत्रा तिष्ठामि नारदः.’ भगवान स्वयं कहते हैं कि मेरे भक्त जहाँ गाते हैं, मैं वहीं पर होता हूँ. मैंने समझ लिया कि ‘आ…आ’ करने से भगवान भी नहीं बोलेंगे. मुझे ‘कृष्ण’ कहना पड़ेगा, ‘विष्णु’ कहना पड़ेेगा.


मंदिर तलाश रहे थे, मजार पर पहुंच गए

पंडित जी एक घटना सुनाते हैं. ”दिल्ली में कला, गार्गी, सुमन और मैं,हम चारों इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के बगीचे में भाग-दौड़ कर रहे थे. इसी में हम एल बी डब्ल्यू हो गये,लुंगी बिफोर विकेट. गिर गये तो सबने पूछा गुरु जी सब ठीक तो है. हमने कहा कि हाँ सब ठीक ही है. शाम को, एक हमारे बहुत चाहने वाले बुजुर्ग हैं,बलबीर नाथ जी माथुर. उन्होंने हमें चाय पर बुलाया था. कला को साथ लेकर मैं वहाँ गया. उन्होंने चाय के साथ सामने रसगुल्ले परोस कर रख दिए. मैंने कहा कि मैं खाऊँगा नहीं लेकिन उन्होंने बहुत इसरार किया कि एक रसगुल्ला तो खाना ही पड़ेगा. रसगुल्ला मुँह में रखा ही था कि उसका रस विंड पाइप में चला गया. खाँसते-खाँसते हम बेदम हो गये. साँस लेने में इतनी मुश्किल कि क्या बताएँ. साँस बाहर तो निकले लेकिन हम अन्दर न ले पाएँ. जैसे-तैसे कुछ प्राणायाम की विधियाँ कीं और थोड़ा हालत में सुधार आया. माथुर साहब से विदा लेकर बाहर आये तो कला ने कहा कि आज एक दिन में यह दूसरी घटना हो गयी है. तीसरी और नहीं होनी चाहिए, पहले यहाँ से सीधे मन्दिर में चलेंगे और प्रसाद बाँटेंगे. ड्राइवर साहब एक सरदार जी थे. उनसे कहा कि गाड़ी किसी मन्दिर को ले चलें. जाते हुए रास्ते में हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह आ गयी. मैंने उनसे कहा कि सरदार जी, गाड़ी यहीं ले चलें. वे बोले कि पंडित जी, यह तो दरगाह है मैंने कहा कि क्या फर्क पड़ता है, एक ही बात है. वे हमें दरगाह में ले गये. हमने हजरत निजामुद्दीन की मजार पर सिर रखा ही था कि कहीं भीतर से आवाज आयी,हिन्दू-मुसलमान क्यों सोचते हो? एक ऐसे बड़े पीर-फकीर की मजार से ऐसी आवाजें आती हैं कि यह ठीक नहीं है कि हम हिन्दू हैं या हम मुसलमान हैं. वाकई, हमें लगा कि हम क्या हैं, हम अगर इंसान बन जाएँ तो बहुत अच्छा है. तो हमें इस तरह की अनुभूतियाँ मन्दिर-मस्जिद में होती ही रहती हैं जहाँ ‘एक’ की भावना से परिचय होता है.“

पंडित जी, स्वयं ‘जब तक रहें, गाते रहें’, ऐसी प्रार्थना करते हैं. हमारी प्रार्थना भी तो यही है पंडित जी क्योंकि आप स्वयं गायन हैं, आप स्वयं संगीत हैं.

 

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