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सांवळिंग की 'सऊं-पऊं' बॉल के आगे बड़े-बड़े बॉलर पानी भरते थे

गांव की हर गली, हर बात, हर आदमी अपने आप में एक किस्सा होता है. लोग बड़े ठाठ से बताते हैं. तो पढ़िए एक और किस्सा. हमारे गांव से.

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एक आदमी है हमारे गांव में. उनका नाम है सांवळिंग. गांव में इतना पढ़ते मैंने और किसी को नहीं देखा. हर वक्त किताब साथ में रखते. चाहे कुछ भी काम हो. मुझे तो दिल्ली आकर पता चला कि ये वाली चीजें पढ़ने से आदमी को सीखने को मिलता है. ये पढ़ने से दिमाग खुलता है. ये पढ़ने से लगातार  बैठकर पढ़ने की हैबिट बनती है. वो सब सांवळिंग पढते थे.

यहां लोग किस्सों में जो लिखते हैं वो मैंने अपने रेगिस्तान में तो उसी आदमी में देखा.

लुगदी साहित्य से लेकर संपादकीय की कटिंग तक उनके पास मिल जाती थी. 15 अगस्त या 26 जनवरी को स्कूल में जोशीला भाषण देते थे बच्चे. वो भाषण लिखवाने के लिए हम सांवळिंग के पास जाते थे.

उनके पास टेप रिकॉर्डर और कैसेटों का खजाना था. सारे उल्टे काम जो सबको अपने दिनों में करने चाहिए मैंने उनको ही करते देखा. बहुत ज्यादा मेहनती. हद से भी ज्यादा. कितना भी दर्द हो चाहे कितनी भी थकान, काम करना है तो करना है. हर चीज का जुगाड़ होता है उनके पास. रेडियो से लेकर ट्रैक्टर तक कुछ भी दे दो. सबका पोस्टमार्टम कर देंगे.

भांग से लेकर दारू तक सारे नशे किए उन्होंने. सही मायनों में सांवळिंग ही मेरे गुरू हैं. उनके लुगदी साहित्य वाले पोथे चुराकर ही मैंने पढ़ना सीखा. उनके दलेर मेंहदी और सांवली सलोनी वाले कैसेट लाकर मैंने गाने सुनना सीखा. जब मैं कहता हूं कि मेरा शहर में मन नहीं लगता मैं लौट आना चाहता हूं. भाऊ कहते हैं हमको देख लो. ऐसे हाल हो जाएंगे. भाऊ, मैं कहता हूं अगर आप को माहौल मिलता और आपने पढ़ाई पूरी की तो बहुत बड़े लिखने-पढ़ने वाले आदमी बनते आप.

ये रहे सांवळिंग के कुछ मजेदार किस्से-

1.

पापा गुड़ लाते, चुराकर दारू बना लेते थे- सांवळिंग के दो जिगरी यार थे स्कूल के दिनों में. मानसिंग और रासिंग. ये उन दिनों की बात है जब गांव के सारे लड़के रातभर तफरी करते फिरते थे. रेत पर कबड्डी खेलते थे. सांवळिंग के पापा गुड़ का बड़ा वाला पैकेट लाते. उसमें से सांवळिंग गुड़ चुरा लेते. बाकि सारा जुगाड़ आराम से हो जाता था. तीनों दोस्त मिलकर जंगल में खुद की ही देसी दारू बनाते और पीते. खूब मस्ती करते. पड़ोस के गांव में भांग की गोलियां मिलती थी. वो ले आते, खाते और अखबार में खोए रहते. अखबार ऐसे पढ़ते की उसको पूरा खोद डालते थे.

Manso

 

2.

सांवळिंग शहर गए थे. वहां कोई नई फिल्म लगी थी. उन दिनों गांव में फिल्म हॉल जाने वालों को आवारा माना जाता था. सांवळिंग फिर भी जाते थे. रात हो गई थी. जितने रुपए में फिल्म का टिकट आता था उतना ही ऑटो का गांव तक का किराया था. सांवळिंग के दिमाग में एक ट्रिक आई. मुस्कराए और घुस गए फिल्म हॉल में.

वापस निकले. एक ऑटो वाले से बोला भैया चलोगे. ऑटो वाले ने पूछा कहां. तो अपने गांव से आगे वाले गांव का नाम बता दिया. गांव के पास एक नदी है जहां खूब सारी झाड़ियां हैं. वहां तक पहुंचे तो ऑटो वाले से कहा जल्दी रुको जोर से पेशाब लगी है. ऑटो वाला रुका. सांवळिंग ने उतरकर एक झाड़ी की ओट ली. जूते हाथ में लिए और जितनी देर पेशाब करने में लगती है उतनी देर में घर की छत पर पहुंचकर सो गए. सुबह किसी ने बताया कि रात को एक ऑटो वाला चिल्ला रहा था, भाई कहां गया आजा.

3.

हमारे यहां शिवरात्रि पर रात को जागरण होता है. बड़े लोग भजन गाते है. बच्चे एक जगह इकट्ठे होते हैं. खेलते हैं, और खीर, पूड़ी बनाकर खाते हैं. इस दिन सबको डराया जाता है कि भूतों कि रात है बाहर नहीं निकलना चाहिए. सांवळिंग के लिए क्या भूत क्या प्रेत. अपनी मंडली के साथ निकलते और जिनके भी आंगन में बाहर दूध-मक्खन रखा मिलता उठा लाते. शक्कर भी उठा लाते. फीकी खीर कौन खाए. फिर रात भर भांग खाकर पत्ते खेलते और पीते खीर. सुबह कहते फिरते की दूध तो सारा रात को बिल्लियां पी गई.

4.

सांवळिंग बीच में खूब दारू पीने लगे. नशे में टुन्न रहते. एक दिन किसी बात पर नाराज हो गए घरवालों से. झगड़ा कर लिया. आस पास से काकीयां-बड़ी माएं मनाने आईं तो माने ही नही. ज्यादा हो गया तो चिल्लाने लगे. काकी प्लींज मेरे को छोड़ दो. मैं मान जाऊंगा अपने आप ही. आप चले जाओ प्लींज. सब डर कर वापिस आ गईं. पूछा तो बताया कि सांवळिंग प्लींज-प्लींज पता नहीं क्या कह रहे हैं. उनको लगा ‘प्लींज’ कोई बड़ी बला है.

5.

सांवळिंग क्रिकेट बहुत खेलते थे अपने दिनों में. उनकी बॉलिंग से सब खौफ खाते थे. उन का बॉल फेंकने का तरीका गांव में सऊं-पऊं नाम से फेमस था. बॉल या तो ऊपर से जाती थी या मुंह तोड़ती थी. स्कूल के दिनों में ये लोग कॉर्क बॉल से खेलते थे. एक दिन खेल चल रहा था. बैटिंग कर रहे थे माड़साब्ब और बॉल थी सांवळिंग के हाथ में. सांवळिंग ने घुमाकर सऊं-पऊं फेंकी. दे माड़साब्ब की आंख पर. गनीमत थी कि ज्यादा चोट नहीं आई. उसके बाद तो सऊं-पऊं गांव में जबान पर चढ़ गया. कोई भी थोड़ी सी इधर-उधर बॉल फेंकता तो कहते, ये सांवळिंग से सऊं-पऊं सीखकर आया है.

Sanwling

तो भइया ऐसे हैं हमारे सावळिंग. एक बार उनका कोलतार से भरा ड्रम किसी ने गिरा दिया. तो उन्होंने उससे कहा कि ‘डंबर ढोळा तो ढोळाज क्यों’(कोलतार गिराया तो गिराया क्यों) इसके बाद ये लाइन सारे गांव के बच्चों का तकिया कलाम बन गई. अब एक दम सोफी आदमी हो गए हैं. एक हाथ काम करते टाइम थ्रेसर में घुस गया. अंगुलियां खराब हो गई. पर मेहनत अब पहले से डबल करते हैं. पढ़ना और गाने सुनना जीयाजूण के जंजाळों में छूट सा गया है. फिर भी कभी कभार अखबार खंगाल लेते हैं. चर्चाएं चल रही हैं कि अब सोशल मीडिया पर भी एक्टिव होने वाले हैं. तो उनके स्वागत में ये किस्से  गुरू पुर्णिमा के दिनों में उनके लिए.


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