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बेनजीर भुट्टो की भतीजी ने कहा इंडिया की गलती नहीं, इतिहास मत झुठलाओ

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अगर कोई किसी फिल्म से नाराज होता है, तो विरोध करने का तरीका है. आप उसके खिलाफ लिख सकते हैं. हालांकि इंडिया में आजकल प्रचलन कुछ और है. बोलने में जितनी ऊर्जा खर्च हो, उससे अच्छा है निर्देशक को धो दें. इससे अभी का तो पाप कटता ही है, भविष्य में भी खर्च होने वाली ऊर्जा बच जाती है. पर फॉरेन में ऐसा नहीं है.


भारतीय मूल की ब्रिटिश डायरेक्टर गुरिंदर चड्ढा ने Viceroy’s House नाम की एक फिल्म बनाई है. इस फिल्म पर प्रतिरोध हुआ है. बेनजीर भुट्टो की भतीजी फातिमा भुट्टो ने इन पर कई आरोप लगाए हैं. आरोप गंभीर हैं. फातिमा के मुताबिक फिल्म इंडियन्स के खिलाफ बनाई गई है. आरोप कुछ यूं हैं:

1. एक सीन में माउंटबेटन कहते हैं कि वो ड्रेस पहनने में दो मिनट लेते हैं. पर सीन में इंडियन्स 13 मिनट लेते हैं.

2. फिर ये दिखाया जाता है कि इंडियन्स ही बात कर रहे हैं कि द्वितीय विश्व युद्ध के चलते अंग्रेज थक गये हैं औऱ इंडिया छोड़ के जाना चाहते हैं. पर इसमें गांधी के आंदोलन, स्वतंत्रता संग्राम और जनता के प्रतिरोध को दिखाया ही नहीं गया है. कलकत्ता में अकाल से मौतें, नेताओं को जेल, अंग्रेजों की क्रूरता कुछ नहीं दिखाया गया है.

3. हर धर्म के नौकर रहते हैं माउंटबेटन के पास. वो बातें करते हैं कि माउंटबेटन साहिब हीरो हैं. बर्मा को आजाद करा दिए. अब इंडिया को कराएंगे. मतलब भारत की आजादी माउंटबेटन का गिफ्ट है. लड़ के नहीं लिया गया.

4. इंडिया के नेताओं का मजाक बनाया गया है. नेहरू जैसे आदमी को भी माउंटबेटन के सामने बौना दिखाया गया है. दिखाया जाता है कि इंडियन नेता ढंग से बात भी नहीं कर सकते. जिन्ना को तो माउंटबेटन हर बात में डांटते हैं. गांधी एक साधारण बूढ़े की तरह नजर आते हैं. बकरी के दूध की दही खिलाते हैं.

5. 1947 के दंगों की पूरी जिम्मेदारी जिन्ना और मुस्लिमों पर डाली गई है. अंग्रेजों के रोल को बिल्कुल दरकिनार किया गया है. ऐसा दिखाते हैं जैसे ये लोग बचा रहे थे. मतलब अंग्रेजों के राज में सब कुछ अच्छा था. ये तो इंडियन्स का काम था दंगे कराना और देश बांटना.

6. सारे दंगे मुस्लिम करते हैं. इंडियन्स अपने ही खिलाफ लड़ते हैं. अंग्रेजों से उनको दिक्कत नहीं है. अंग्रेजों का अत्याचार कहीं नजर नहीं आता. मतलब इतना कि इंडियन्स खुद को काटते हैं. पर वायसराय के पास सब सुरक्षित हैं. सिर्फ उनके सान्निध्य में ही ऐसा है.

7. एक जगह ये दिखाया जाता है कि एक बूढ़ी सिख औरत एक मुस्लिम लड़की को बचाती है. उस लड़की के अब्बा ने उसे ट्रेन से नीचे फेंक दिया था. फातिमा के मुताबिक फिल्म में ये दिखाया गया है कि एक अजनबी मुस्लिम बाप से ज्यादा समझदार है.

8. 1947 के दंगों के बाद माउंटबेटन खाकी पहने भागते गरीब लोगों को खिला रहे हैं. लेडी माउंटबेटन चिल्लाती हैं कि बच्चों को पहले खिलाओ. इंडियन्स उसमें भी आपस में भिड़ते हैं. नेहरू को एक इंडियन थप्पड़ मार देता है कि देश तोड़ रहे हो. सारे इंडियन्स इन्फीरियर हैं, अंग्रेज हाई-क्लास.


अब सोचिए कि अगर किसी समुदाय की सेना होती तो क्या करती इसके जवाब में? फातिमा ने तो अपनी बात तरीके से रखी है.

गुरिंदर चड्ढा ने फातिमा की बातों का जवाब दिया है. पहले तो ये कहा है कि फातिमा को अपनी बात रखने का पूरा हक है. इतिहास को हर कोई अपने लेंस से देखता है. लोग वही देखते हैं, जो देखना चाहते हैं. कहती हैं कि ये फिल्म एंटी-मुस्लिम या एंटी-पाकिस्तान नहीं है. गुरिंदर ने फातिमा की बातों का कुछ यूं जवाब दिया है:

1. स्वतंत्रता संग्राम को मैंने इग्नोर नहीं किया है. बल्कि इसको सेलिब्रेट किया है. लेडी माउंटबेटन कहती हैं कि लंगोट पहने एक आदमी ने ब्रिटिश साम्राज्य को घुटनों पर ला दिया. नेहरू माउंटबेटन से कहते हैं कि आपने हम लोगों को बांट दिया और अब उपाय मांग रहे हैं.

2. मुस्लिम बाप वाली बात पर कहती हैं कि हिंदू भीड़ ट्रेन पर हमला करती है. तो बाप बेटी को उनसे बचाने के लिए धकेल देता है. ये मुस्लिमों के खिलाफ नहीं है.

3. मैंने हिंदू, मुस्लिम और सिख सबसे स्क्रिप्ट शेयर की है. मैंने सबका खयाल रखा है. मैं चाहती थी कि घटनाओं को सही चित्रण हो.

4. वायसराय के घर को मैंने केंद्र में रखा है. क्योंकि ब्रिटिश-इंडियन इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण वक्त था ये. 1947 की घटनाएं ब्रिटेन में भुलाई जा चुकी हैं. मैं ये नहीं कहती कि हर कोई मुझसे सहमत हो. पर फातिमा ने जिस तरह से लिखा है, लगता है कि ये चीज सांप्रदायिक ताकतों के हाथ में है. वो चीज जिससे इंडिया और पाकिस्तान दोनों जूझ रहे हैं.


फातिमा और गुरिंदर चड्ढा दोनों की बातें अपने-अपने तरीके से सही हो सकती हैं. पर इंडिया में हुए अत्याचार को किसी भी तरह से दरकिनार नहीं किया जा सकता. आजादी के वक्त लाखों लोग दंगों में मरे थे. आजादी से पहले लाखों लोग अकाल में मरे थे. इस मामले में फातिमा की बातें भारी पड़ती हैं. आखिर किस एंगल से अंग्रेजों के शासन को जनता के लिए दिखाया जा सकता है. पर यहीं पर एक एंगल मिलता है. अंग्रेजों के एंगल से दिखाया जा सकता है. कि वो किस तरह से अपने काम को डिफेंड करते हैं. इतिहास तो वाद-प्रतिवाद में ही देखा जाना चाहिए. इस विवाद से पता चलता है कि इतिहास, फिल्में और आलोचनाएं सब कुछ झेला जाना चाहिए. टॉलरेंस बढ़ता है. चीजों को देखने की समझ बढ़ती है. क्रोध कम होता है.

(दोनों लोगों के आर्टिकल द गार्जियन में छपे हैं.)

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