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दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं, एक जिन्होंने 'गुंडा' देखी है और दूसरे...

जब मैं कॉलेज में पढ़ने बक्सर से नॉएडा आया तो बनारस के लौंडों ने भी तंज कसा कि तुम तो बिहार से हो, मिथुन की फ़िल्में देखते होगे. देखी थी मैंने. और मुझे इस बात का कोई मलाल नहीं था. पर मैंने झूठ बोला. क्योंकि वो लौंडे मेरे सीनियर थे और मेरी रैगिंग चल रही थी. फिर वो मुझसे मिथुन का डांस करवाते. मुझे सनी देओल वाला आता था.

पर मेरे दिमाग में ये बात बैठ गई कि मिथुन बिहार का पर्याय है. उसकी फ़िल्में देखना या बिहारी होना एक गुनाह है. मतलब ये एक ऐसा पाप है जिससे तुम उबर नहीं सकते. एकदम जाति की तरह.

धीरे-धीरे मैंने बहुत फ़िल्में देखीं. अब मैं भी बड़े-बड़े नाम फेंकता हूं. जब कोई नोलान की बात करता है तो मैं बोलता हूं कि कोएन ब्रदर्स को भी उतनी ही इज्जत मिलनी चाहिए. बॉस, इसके आगे कोई कुछ नहीं बोलता. लोग समझ जाते हैं कि वो कुछ बोले कि इधर लौंडा पेला. फिर मैं ‘चरसी लौंडे’ का खिताब लेकर पास हो गया.

दुनिया में एक शख्स का अवतार हुआ जिसका नाम था कान्ति शाह. मेरे हिसाब से कान्ति शाह विष्णु के ग्यारहवें अवतार थे. धरती पर जब सिनेमा के आताताइयों का अत्याचार बहुत बढ़ रहा था, उस वक़्त हम इंजीनीयर जमात को राहत देने के वास्ते आई कान्ति शाह की गुंडा. मैंने गुंडा को देखा ही नहीं, जिया है. अपने इंजीनियरिंग के चार साल. और मैं उस दौर से निकल कर वहां आ पहुंचा था जब  दौर आ गया था अनुराग कश्यप का. हम कहने लगे कि ये रियल फ़िल्में बनाता है. समाज की नंगई उघार के रख देता है. एकदम हॉलीवुड की तरह. माजिद-मजीदी की तरह. अल्मोदोवर की तरह. रियल मतलब वही. जैसे सैराट पर बवाल मचा हुआ है. लोग देख रहे हैं, रो रहे हैं, फिर देख रहे हैं.

पर दर्शकों का एक तबका अभी भी ऐसा है जिसे इससे कोई मतलब नहीं. वो आज भी दस रूपये में पेन-ड्राइव में शपथ,गुंडा, चीता, मुजरिम और चांडाल ला के देखता है. दलाल देखता है.

Mitun-chakraborty

ये वो तबका है जिसे हमारे देश की बौद्धिक क्रांति ने चपेट में नहीं लिया है. ये ‘मोदी मे बी क्रुएल बट ही इज नेसेसरी फॉर इंडिया’ वाला तबका नहीं है. ये वो तबका है जिससे मोदी आज भी जा के पूछने की हिम्मत रखते हैं: ‘कितना दूं? 70हज़ार करोड़…80 हज़ार करोड़ कि एक लाख करोड़?’ ये लोग तालियां पीट देते हैं. राहुल गांधी इन लोगों को याद दिलाते हैं कि मेरे पापा ने, दादी ने आपके लिए कितना किया है. मम्मी ने फ़ूड सिक्यूरिटी दिया है. इन लोगों का क्या है न, कि इन्हें याद दिलाना पड़ता है. सब कुछ. फ़ूड बिल से लेकर बिजली पानी, देवी देवता तक. लेकिन इन्हें नहीं दिलाना पड़ता कुछ तो वो है गुंडा, चीता, शपथ और चांडाल. यहां चाय और ब्लैक में खरीदी लोकल शराब के साथ यही सब चलता है.

सवाल ये है कि ये लोग मिथुन को इतना क्यों चाहते हैं?

ये लोग मिथुन की फिल्मों में खुद को देखते हैं. उस वाले ‘खुद’ को जो वो होना चाहते थे. उस ‘खुद’ से वो अपने आप को जोड़ पाते हैं. अपना संघर्ष जीते हैं. अपना बदला लेते हैं. अपना मनचाहा प्यार पाते हैं. पहलाज निहलानी की तरह नहीं हैं ये लोग. निहलानी ने तो टॉमी सिंह की पेशाब में खुद को देख लिया.

‘गुंडा’ में मिथुन कुली था. जब चुटिया यानी शक्ति कपूर उसकी प्रेमिका का बलात्कार कर देता है तो मिथुन पुलिस के पास नहीं जाता. उसका लिंग काट देता है. फिर बुल्ला जो अपना परिचय ऐसे देता है: मेरा नाम है बुल्ला, मैं रखता हूं खुल्ला. उसको मिथुन गन्दी मौत मारता है. एक फिल्म-प्रेमी के लिए ये फिल्म वाहियात से भी दो लेवल आगे है. इसे ऐसे समझें कि रेटिंग देने वाला मीटर एक गोल घेरे में रख दिया गया है. अब घटिया वाले लेवल से आप जैसे ही आगे बढ़ेंगे, अच्छा वाला लेवल खुद ही चालू होई जायेगा. गुंडा वहीं बसती है. इस दुनिया में दो तरह की दुनिया हैं. एक जहां आपको ‘गुंडा ‘देखते हुए पकड़ा जाए तो आपकी तौहीन होगी. और दूसरी जहां चार साथी बैठ के फिल्म देखने लग जायेंगे. मुझे दूसरी वाली दुनिया से ही कुछ आस बाकी रह गयी है.

बुल्ला और चुटिया
बुल्ला और चुटिया

मिथुन के लोगों को ये फिल्म अच्छी लगी थी. हिट थी. क्यों? क्योंकि असली जीवन में बुल्ला और चुटिया जैसे लोग होते हैं. हमारे आस पास. हर ओर. और विक्टिम इनसे जिस तरह का बदला लेना चाहते हैं, आप भी वैसा ही करना चाहते हैं. लेकिन कमाल इस सिनेमा के तंदूर का, ऐसी रोटियां और कहीं नहीं सिकतीं. लोगों को न्याय भी नहीं मिलता और फिल्म भी इनके लिए नहीं बनती. फिल्मों में तो बुल्ला जैसे लोगों को 3 साल की सजा मिलती है. कहीं किसी लड़की को अनिल कपूर मिल जाता है. वो सब ठीक कर देते हैं. गाना गाकर. लेकिन यहीं असली और फ़िल्मी जीवन का अंतर आता है. ऐसा असली जीवन में नहीं होता. असल ज़िन्दगी में लोग अपराधी का लिंग ही काटना चाहते हैं. ऐसे में ‘गुंडा’ इनके लिए ‘परस्यूट ऑफ़ हैप्पीनेस’ बन जाती है.

हमारे पिताजी ‘सुमित अवस्थी द्वारा प्रस्तुत राशिफल’ देखते रहे और हमको इंजीनियरिंग पढ़ा दिए. हम तोप हो गए. नौकरी कर ली. फ़िल्में देख लिए. किताबें पढ़ ली. दिल्ली-बम्बई हो आये. थोड़ा देश की अर्थव्यवस्था पर चिंता कर लिए.’गुंडा’ हमारे लिए नहीं है अब.

जब मिथुन ‘आई ऍम अ डिस्को डांसर’ पर नाच रहे थे तो उनको नहीं पता था कि ये गाना कहां पहुंच रहा है और किसे कहां पहुंचा रहा है. आपको जानना चहिये मिथुन कि आज भी एक तबका है जो शादी-विवाह में इसी गाने पर नाचता है. वो तबका जिमी-जिमी पर नाचता है. हम लोग दारु पी के डिस्कस करते हैं कि जिमी-जिमी ‘डांस नंबर’ नहीं है. उस वक़्त हम गिलास हाथ में लिए दरवाजे की तरफ देखते हैं और धीरे-धीरे बोलते हैं. पूरी बात भी नहीं बोलते. ‘जिमी-जिमी नाचने वाला गाना’ तक ही बोलते हैं. पर ऐसे अंदाज़ में कि सामने वाला समझ जाता है.

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मिथुन की निजी जिंदगी की कहानी भी उनके लिए दर्शकों का एक वर्ग खड़ा करती है. कहते हैं कि मिथुन नक्सलाइट थे. पढ़े-लिखे नहीं थे. भाई मर गया तो ये लाइन छोड़ दिए. ‘नीची’ जाति से आते हैं. हमको नहीं पता, जानना भी नहीं चाहते. सुना है ऐसा. जैसे ये सुना था कि माइकल जैक्सन एक मिनट में हजार बार पैर हिलाता है. वैसे ही.

मिथुन काले हैं. अमिताभ या धर्मेन्द्र की तरह नहीं थे. वो शहरी लुक नहीं था इनमें. अपनी तरह के एक आदमी को परदे पर देखना सदियों में एक बार होता होगा. और वो आदमी जब अपना होटल और फार्म हाउस खोलता है और वहीं अपने मन से शूटिंग करवाता है तो मामला बहुत सीरियस हो जाता है.

अपनी फिल्मों में वो कुली बनता है. मजदूर बनता है. जब एक पुलिस अफसर बनता है तो छोटे से घर में रहता है. प्यार करता है तो ‘बड़े’ घर वाली लड़की से ही. जब बड़े बाप का बेटा बनता है तो बाप से लड़ाई कर लेता है. फिर गरीब बन जाता है. और फिर बुल्ला को पटक के मारता है. तो सीटियां बजानी पड़ती हैं.

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अब फ़िल्में वैसी नहीं बनती. अब फिल्मों में गरीब नहीं होते. होते भी हैं तो फिलॉसफर टाइप के. बदला नहीं लेते. जानते हैं नहीं ले पाएंगे. बदला अब खाली वरुण धवन ले सकते हैं. वो लोग तो अब सपने में भी बस सल्लू की लैंडक्रूज़र का पेंट खुरच के सड़क पर खुरचन बन जाते हैं.

मिथुन अब टीवी पर आते हैं. एक सवाल मुझे मथता है. जब ये लोग सल्लू भाई को मिथुन के आगे ‘मिथुन दा’ कह के पांव छूते देखते हैं तो भरोसा कर लेते हैं क्या? मुझे तो ये मोदी-सिद्धांत लगता है. जो मोदी अम्बेडकर के पांव छू के इन लोगों के साथ करते हैं वही सल्लू टीवी पर मिथुन के पांव छू के करते हैं.

जो भी है, कुछ लोग हैं जो आज भी डिस्को-डांसर पर नाचना चाहते हैं. और अब मैं झूठ नहीं बोलता. मेरी तालीम ने इन चीजों का फायदा उठाना सिखा दिया है. वैसे थैंक यू मिथुन, फॉर गिविंग अस गुंडा. हैप्पी बड्डे.


दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं. एक जिन्होंने ‘गुंडा’ देखी है. और दूसरे….. उनके बारे में हम बात नहीं करते.


ये स्टोरी ‘दी लल्लनटॉप’ से जुड़े ऋषभ ने लिखी है.


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