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चीतल डायरीज़: गुजरात का ये मुसलमान क्यों पिछले 15 साल से वोट नहीं डाल रहा है?

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अहमदाबाद पहुंचने पर आपको पता चलता है कि इस शहर की स्पेलिंग का ‘एच’ सिर्फ दस्तावेज़ों में सजाकर रखे जाने वाली चीज़ है. यहां के लोगों के लिए इस शहर का नाम ‘अमदवाद’ है. आधी रात तक सड़कों पर टहलते, शर्बत पीते लोगों को देखकर यह अंदाजा लगा सकते हैं कि बनारस या कलकत्ते की तरह यह भी ‘फुर्सत’ वाला शहर है.

लेकिन सुबह होते ही आपके सारे कयास हवा हो जाते हैं. यहां के ट्रैफिक में अजीब सी बेचैनी है. ‘लाल बत्ती’ शहर के विकास का इश्तिहार है. आदमी तब तक नहीं रुकता जब तक सामने ट्रैफिक हवलदार न मिल जाए. पुराने अमदावाद में जब आप रिलीफ रोड से जीपीओ की तरफ मुड़ते हैं तब तीन दफा ऑटो से लगभग टकराते हुए आप एक भूल-भुलैयानुमा इमारत के सामने पहुंचते हैं. इस इमारत का नाम है, ‘सर्वोदय कमर्शियल कॉम्प्लेक्स’.

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चीतल दरअसल उमरकोट के राणा महेंद्र के तेज़ चाल वाले ऊंट का नाम था जिस पर बैठकर वो रेगिस्तान चीरते हुए,
रात को लौद्रवा (जैसलमेर) अपनी प्रेमिका मूमल से मिलने जाता था और सुबह होते-होते फिर उमरकोट (सिंध) लौट आता था.
उस चीतल ने न सिर्फ इस एपिक लव स्टोरी को विटनेस किया बल्कि जहां जहां उसके पैर पढ़े वहां का समय
और कहानियां देखीं. चीतल डायरीज़ सीरीज़ के जरिए हम गुजरात से ऐसी कहानियां लेकर आ रहे हैं 
जो इस समय और काल में आप तक पहुंचनी चाहिए.

 

सर्वोदय कॉम्प्लेक्स का कमरा नंबर 265. टेबल पर फाइलों का ढेर पड़ा हुआ है. पास ही पड़ी अलमारी में करीने से रखी हुई कानून की किताबें बता देती हैं कि आप किसी वकील के कमरे में हैं. शमशाद पठान इस चेंबर के मालिक हैं. वो पिछले 10 साल से गुजरात दंगा पीड़ितों के केस लड़ रहे हैं. आप कुछ पूछें, उससे पहले सवाल आता है, “चाय?” इसके बाद फोन को कान से सटाकर वो किसी से कहते हैं, “इस्माइल भाई, दो चाय.” कुछ देर बाद उनके फोन पर मिस्डकॉल चमता है. शमशाद उठते हैं और रस्सी के सहारे एक टोकरी नीचे लटका देते हैं. इस्माइल भाई उसमें चाय की थैली और दो काग़ज़ के कप डाल देते हैं. जैसे ही शमशाद इसे ऊपर की तरफ खींचने लगते हैं, टोकरी साबरमती एक्सप्रेस के जले हुए डब्बे में तब्दील हो जाती है. शमशाद बयान करना शुरू करते हैंः

“मैं उस समय ग्रेजुएशन के आखिरी साल में था. हमारे प्री-लिम्स के एग्जाम चल रहे थे. 27 फ़रवरी 2002 के रोज़, करीब 12 बजे पेपर से छूटने के बाद हम सारे दोस्त अगले दिन की प्लानिंग कर रहे थे. 28 तारीख को हमारा आखिरी एग्ज़ाम होना था. हमने यह तय किया कि हम एग्ज़ाम खत्म होने के बाद सिनेमा देखने जाएंगे.

दोपहर करीब 2 बजे, मैं घर पहुंचा. मेरी मां कहीं जाने के लिए तैयार हो रही थीं. मैं रात भर जागा था, तो थका हुआ था. मैंने उनसे कहा कि मैं सोने जा रहा हूं. आप बाहर से ताला लगाकर चले जाइएगा. करीब 5 बजे सोकर उठा तो देखा अम्मी घर पर ही थीं. मैंने पूछा, आप गईं क्यों नहीं? उन्होंने कहा कि गोधरा में कुछ धमाल हो गया है, अभी बाहर जाना ठीक नहीं है.

गोधरा में जली ट्रेन में कई कारसेवकों की मौत हुई थी. इसके बाद दंगा भड़का था
गोधरा में जली ट्रेन में कई कारसेवकों की मौत हुई थी. इसके बाद दंगे भड़के थे.

मेरा घर रानी बकरा मंडी के पास है. यहां करीब 500 मुस्लिम परिवार रहते हैं. बस्ती के ज्यादातर लोग दिहाड़ी मज़दूर हैं. उस समय पूरी बस्ती में 7-8 घरों में ही लैंडलाइन फोन था. उसमें मेरा घर भी एक था. शाम 7 बजे से मेरे कॉलेज के दोस्तों के फोन आने शुरू हुए. सब लोग एक ही सलाह दे रहे थे, कल एग्ज़ाम देने मत आना. इसके बाद मैंने टीवी देखी तब पता चला कि मामला काफी तूल पकड़ चुका है.

हमारी बस्ती के चारों तरफ हिंदू समुदाय के लोगों की बसाहट है. रात 10 बजे के आसपास करीब पांच हज़ार लोगों ने हमारी बस्ती को घेर लिया. उन्होंने बस्ती के किनारे के मकानों को जलाना शुरू किया. इसके बाद दोनों तरफ से पथराव शुरू हो गया. यह बीच में रुक-रुककर सुबह 4 बजे तक जारी रहा. सुबह 9 बजे के करीब भीड़ फिर से जमा होनी शुरू हो गई. लेकिन सही समय पर पुलिस पहुंच गई और कर्फ्यू लगा दिया गया.”

जिस समय रानी बकरा मंडी में कर्फ्यू लगाकर पुलिस गश्त कर रही थी, उसी समय अहमदाबाद के दूसरे हिस्से में पुलिस तमाशबीन बनी हुई थी. जगह का नाम था नरोदा गाम. नरोदा गाम की मुख्य सड़क पर 1938 में तामीर हुई इमारत थी – ‘बलूच बिल्डिंग’. इस इमारत से नरोदा पुलिस स्टेशन की दूरी महज़ 100 मीटर है. बलूच बिल्डिंग में तीन मुस्लिम परिवार थे जो कि पिछले 40 साल से यहां किराएदार के तौर पर रह रहे थे. सबसे निचली मंज़िल पर 52 साल के मोहम्मद हुसैन दुपहिया वाहनों की रिपेयरिंग की दुकान चलाया करते थे. उनके इस काम में उनका 32 साल का बेटा अलाउद्दीन भी मदद किया करता था. पहली मंज़िल पर मोहम्मद हुसैन का परिवार रहता था.

ट्रेन गोधरा में जली थी, लेकिन अहमदाबाद के आसमान को काला होने में ज़्यादा समय नहीं लगा. अहमदाबाद में दंगों के दौरान आगज़नी के बाद का दृश्य
2002 में अहमदाबाद दंगों के दौरान आगज़नी के बाद आसमान में उठता धुंआ.

इस इमारत के मालिकाना हक़ के लिए बिल्डिंग के मालिक सुल्तान ख़ान के बेटों और किराएदारों में कानूनी विवाद चल रहा था. लम्बी कानूनी कार्रवाही से आजिज़ आकर सुल्तान ख़ान बलूच के बेटों ने इस इमारत को औने-पौने दाम में दिनेश पटेल को बेच दिया. इस सौदे के बाद विवाद अदालत तक सीमित नहीं रहा था. मोहम्मद हुसैन को पिछले एक साल से बिल्डिंग खाली करने की धमकी मिल रही थी. अदालत का फैसला किसी भी करवट बैठ सकता था. एेतिहातन मोहम्मद हुसैन ने पास ही के कुम्हारवाड़ा में अम्बालाल दवे का मकान खरीद लिया था. हुसैन जानते थे कि अगर यह बात विरोधी पक्ष को पता लग गई तो उन पर बलूच बिल्डिंग खाली करने का दबाव और बढ़ जाएगा. चुनांचे इस बात की खबर घरवालों के अलावा किसी को नहीं थी. कम से कम उन्हें ऐसा ही लगता था.

27 फरवरी, 2002 की शाम नरोदा तक गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस का डब्बा जलाए जाने की खबर पहुंची. 28 की सुबह 9 बजे से ही नरोदा बाजार में तोड़-फोड़ और आग़जनी शुरू हो गई. मोहम्मद हुसैन के छोटे बेटे अब्दुल रज़्ज़ाक बताते हैंः

“जब हमारी बस्ती के चारों तरफ भीड़ इकठ्ठा होनी शुरू हुई तब अब्बा ने हमसे कुम्हारवाड़ा वाले नए घर में छुप जाने के लिए कहा. हमारा पूरा परिवार वहां जाकर छुप गया. वो घर काफी दिनों से बंद पड़ा था. कोई वहां रहता नहीं था. 12 बजे के करीब भीड़ नरोदा गाम में घुस गई थी. हमारे घर और दुकान को आग के हवाले कर दिया गया. यहां किसी ने दंगाइयों को बता दिया कि हमारा परिवार कुम्हारवाड़ा में छुपा हुआ है. कुछ देर बाद वो लोग हमारे नए मकान पर आ पहुंचे. जब वो दरवाज़ा तोड़ रहे थे, उस समय हमने घर की औरतों और बच्चों को अन्दर वाले कमरे में छुपा दिया.

कहा जाता है कि दंगाइयों के पास टैक्स रिकॉर्ड थे, जिसके आधार पर वो निशाना बनाकर मुस्लिमों की सम्पत्तियों को निशाना बनाते थे.
कहा जाता है कि दंगाइयों के पास टैक्स रिकॉर्ड थे, जिसके आधार पर वो मुस्लिमों की प्रॉपर्टी को निशाना बनाते थे.

उन्होंने घर का दरवाजा तोड़ा तब मैं, मेरा भाई और अब्बा आंगन में खड़े थे. वो लोग हमें खींचकर बाहर ले आए. उस घर के आगे तीन-चार सीढ़ियां हैं. मुझे खींच रहा शख्स मेरे से एक सीढ़ी आगे चल रहा था. मैंने उसे धक्का दिया और वहां से भाग छूटा. भागते-भागते जब मैंने पीछे देखा तो मेरे भाई को मारा जा रहा था. इस बीच एक आदमी ने गुप्ती (एक तरीके का खंजर) मेरे पिता के पेट में भोंक दी.”

अब्दुल रज़्ज़ाक वहां से भागते-भागते पास ही की बस्ती भरवाडवास पहुंच गए. भरवाड हिंदू बिरादरी है जिनका खानदानी पेशा पशुपालन है. आस-पास घर होने की वजह से भरवाडवास और नरोदा के बाशिंदों के सम्बन्ध अच्छे थे. पचास के करीब मुसलमान जान बचाने के लिए इस बस्ती में घुस गए थे. लेकिन कुछ पीछे छूट गए थे. इनमें से एक थे आबिद मियां. आबिद नरोदा गाम केस के 187 गवाहों में से एक हैं. वो बताते हैंः

”कुम्हारवास में मोहम्मद हुसैन के नए मकान के सामने इदरिस का घर हुआ करता था. बीच में बस 15 फीट की सड़क थी. उसकी छत पर दीवार की ओट थी. मैं वहां से सारा नज़ारा देख रहा था. एसआईटी ने उस जगह का मुआयना किया था जहां से मैं यह सबकुछ देख रहा था. हुसैन भाई गुप्ती लगने के बाद जमीन पर गिर गए. इसके बाद उस आदमी ने अलाउद्दीन को भी गुप्ती मारने की कोशिश की. इस दौरान अलाउद्दीन एक तरफ हो गया और गुप्ती अलाउद्दीन को पकड़े हुए घनश्याम पटेल के पेट में घुस गई. इसके बाद अलाहुद्दीन को नीचे गिराकर गुप्ती भोंक दी गई.   

दंगों में कई लोगों की पूरी ज़िंदगी की कमाई जलकर खाक हो गई
दंगों में हज़ारों लोगों की पूरी ज़िंदगी की कमाई जलकर खाक कर दी गई.

दंगों के टाइम चारों तरफ कर्फ्यू था. लेकिन थोड़ी ही देर में वहां एम्बुलेंस आई. घनश्याम पटेल को उन लोगों ने एम्बुलेंस में डाला. उस समय तक अलाउद्दीन में थोड़ी रूह बाकी थी. एम्बुलेंस वाले उसे भी उठाने लगे. दंगाइयों ने उनके हाथ पकड़ लिए और स्ट्रेचर से उतारकर फिर से जमीन पर पटक दिया.

पुलिस चौकी से बस 60 फीट की दूरी पर पांच लोगों को जलाया जा रहा था और पुलिस खड़े-खड़े देख रही थी. इन पांचों को जलाने के दौरान सुनील कुमार नटवरलाल एंड कंपनी नाम की एक किराना की दुकान में भी गलती से आग लग गई. मेरे सामने फायर बिग्रेड की गाड़ी आई और दुकान की आग बुझाकर चली गई. उसके पास ही पांच आदमी जल रहे थे लेकिन फायर बिग्रेड ने उन पर पानी की एक बूंद तक नहीं डाली. मैं ये सब देख रहा था और रो रहा था.”

अब्दुल रज़्ज़ाक की तरह ही नरोदा गाम के पचास के करीब मुस्लिम भरवाडवास में घुस गए थे. दंगाइयों की भीड़ भरवाडवास के सामने बने अर्जुन कॉम्प्लेक्स पर चढ़ गई. वहां से दंगाई भरवाडवास में रहने वाले लोगों को चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे थे कि छुपे हुए मुस्लिमों को बाहर निकालो नहीं तो हम तुम्हें भी नहीं छोड़ेंगे. यह दोपहर में करीब 2 बजे की बात है. तीन घंटे के करीब दंगाइयों और भरवाडवास के बाशिंदों के बीच मुसलमानों को लेकर हुज्जत चलती रही.

कुछ इलाकों में तो दंगाई चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे थे कि छुपे हुए मुस्लिमों को बहार निकालो नहीं तो हम तुम्हें भी नहीं छोड़ेंगे.
कुछ इलाकों में दंगाई चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे थे छुपे मुसलमानों को बाहर निकालो नहीं तो तुम्हें भी नहीं छोड़ेंगे.

रज्जाक बताते हैंः “मैं रघुभाई भरवाड के घर में छुपा हुआ था. मेरे अलावा वहां 15 और आदमी रहे होंगे. दंगाइयों ने भरवाडवास के चारों तरफ घेरा डाल रखा था. वो लोग जोर-जोर से चीख रहे थे. रघुभाई की पत्नी इस बात से डर गई. उन्होंने हमारे सामने ही रघुभाई से कहना शुरू कर दिया कि मुसलमानों के पीछे अपनी जान जोखिम में डालने का क्या फायदा? ऐसे में हम लोगों ने रघुभाई से हाथ जोड़कर विनती की कि हमें वहां से न निकालें. शाम 5 बजे के करीब उन पर बहुत ज्यादा दबाव बनने लगा.”

“रघुभाई और भरवाडवास के दूसरे लोगों ने तय किया कि वो हमें 100 मीटर दूर बने नरोदा पुलिस स्टेशन में छोड़ देंगे. रघुभाई ने अपनी बस्ती के सभी लोगों को इकठ्ठा किया. भरवाड बस्ती के सारे लोग हमारे दोनों तरफ लाइन बनाकर खड़े हो गए. बीच में हम 50 लोग थे. जैसे ही हम बस्ती से बाहर निकले, दंगाइयों को ये वहम हुआ कि हम लोग उन पर हमला करने आ रहे हैं. इस वहम के चलते वो लोग एक बार के लिए पीछे हट गए. हमने ये देखा तो पुलिस स्टेशन की तरफ दौड़ लगा दी. 

दंगों की सुनवाई में अमित शाह ने माया कोडनानी के पक्ष में गवाही दी थी
दंगों की सुनवाई में अमित शाह ने माया कोडनानी के पक्ष में गवाही दी थी

मैं जिस रास्ते से भागा था उसी रास्ते भागकर पुलिस स्टेशन जा रहा था. मेरे सामने मेरे अब्बा और भाई की जली हुई लाश पड़ी हुई थी. आप अंदाज लगाइए कि मुझे कैसा लगा होगा?”

शाम 5 से 6 के बीच नरोदा गाम के लगभग सभी मुस्लिम परिवार पुलिस स्टेशन के भीतर पहुंचने में कामयाब रहे. सिवाय उन 11 लोगों के जिन्हें दंगाई भीड़ ने मार डाला था. इस बीच दंगाइयों ने पुलिस स्टेशन को भी घेर लिया था. दो बार उन्होंने दरवाज़े तोड़कर अंदर घुसने की कोशिश भी की. बकौल आबिद मियां उन्होंने एक पुलिस अफसर को फोन पर यह कहते हुए सुना कि हमने आपको पूरा टाइम दिया था. अब ये लोग पुलिस स्टेशन में घुस गए हैं तो आप लोग मेहरबानी करके यहां से चले जाओ. यह बात ह्यूमन राइट्स कमीशन के सामने दिए गए आबिद के बयान में दर्ज है. रात करीब 3 बजे उन्हें अलग-अलग गाड़ियों में भरकर शाह आलम कैम्प भेज दिया गया.

गुजरात सरकार में राज्यमंत्री माया कोडनानी पर नरोदा में दंगे भड़काने का आरोप था
गुजरात सरकार में राज्यमंत्री माया कोडनानी पर नरोदा में दंगे भड़काने का आरोप था

इस आदमी ने दो बार दंगा झेला

दंगों से पहले आबिद ‘केशिका हर्बल’ के डिस्ट्रीब्यूटर हुआ करते थे. यह कंपनी उन्होंने अपने दोस्त के साथ मिलकर शुरू की थी. इसमें प्रोडक्शन का काम उनके दोस्त के ज़िम्मे था जबकि सेल्स आबिद खुद संभालते थे. काम शुरू किए ज़्यादा वक़्त नहीं हुआ था. धंधा पटरी पकड़ ही रहा था कि उनकी दुकान दंगे की चपेट में आ गई. जब आबिद शाह आलम कैम्प पहुंचे तब उनके और उनके परिवार के लोगों के पास बदन पर पहने हुए कपड़ों के अलावा कुछ भी नहीं था. उनका लाखों का माल जलकर ख़ाक हो गया.

नए सिरे से ज़िंदगी शुरू करना आसान काम नहीं था. आबिद ने दंगों के महीने भर बाद अपने लिए काम की तलाश शुरू की. शाह आलम कैम्प के पास बॉम्बे होटल के सामने उन्होंने किराए का नया मकान ले लिया. वो ट्रक चलाना जानते थे. उन्हें बतौर ड्राइवर नौकरी भी मिल गई. इस बीच राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सामने उनका बयान भी दर्ज हो चुका था. वो जब ट्रक चलाकर वापस लौटे तब उन्हें खबर मिली कि पुलिस उनके ससुर को पकड़कर ले गई है.

गुजरात दंगों के दौरान गुजरात पुलिस पर आरोप लगे कि उसने दंगाइयों का खुला साथ दिया
गुजरात दंगों के दौरान गुजरात पुलिस पर आरोप लगे कि उसने दंगाइयों का खुला साथ दिया. (फोटोः रॉयटर्स)

यह जनवरी 2003 की बात है. वो अपने दो भाइयों युनुस और मक़सूद के साथ नरोदा गाम पुलिस स्टेशन पहुंचे. उन्हें और उनके दो भाइयों को वहां गिरफ्तार कर लिया गया. इन तीन भाइयों के अलावा बस्ती के आठ और लोगों को गिरफ्तार किया गया था. इन लोगों पर इल्ज़ाम था कि इन्होने दंगों के दौरान घनश्याम पटेल की हत्या की थी. 2006 में सभी 11 लोग इस केस में बरी कर दिए गए लेकिन इस केस के सिलसिले में जो साढ़े चार महीने का समय आबिद ने अहमदाबाद सेंट्रल जेल में बिताया वो उनकी स्मृति से स्थाई तौर पर चिपक गया है. वो याद करते हैंः

“साहब क्या बताएं? जेल में तो हम पर दंगों से भी बुरी बीती. साढ़े चार महीने में मुझे कम से कम दस बार बैरक में, साथ रहने वाले कैदियों ने और सिपाहियों ने मारा. क्या-क्या हुआ बता नहीं सकते. गुलबर्ग सोसाइटी वाले कैदी भी हमारे साथ ही थे. वो खुलेआम बोलते थे कि हमने लोगों को इस तरह मारा. औरतों की अस्मत लूटते वक़्त वो कैसे चिल्ला रही थीं. मुझे पीटते वक़्त वो कहते कि हमने उस औरत का सीना काट लिया, बोल भेन** तू क्या कर लेगा?”

लंबी लड़ाई

दंगों की वजह से शमशाद ग्रेजुएशन के फाइनल एग्ज़ाम नहीं दे पाए. वो अकेले ऐसे छात्र नहीं थे. कोई भी मुस्लिम छात्र उस साल परीक्षा में नहीं बैठ पाया था. इस बात को लेकर जब हंगामा बढ़ने लगा तब गुजरात यूनिवर्सिटी ने जुलाई में मुस्लिम छात्रों के लिए अलग से एग्ज़ाम रखे. नतीजे आते-आते काफी देर हो गई. तब तक आगे की पढ़ाई के सारे विकल्प  समाप्त हो गए थे. शमशाद ने बड़ी हुज्जत के बाद उसी साल वकालत में एडमिशन लिया.

बजरंग दल के नेता बाबू बजरंगी को नरोदा पाटिया में दंगे भड़काने के आरोप में सज़ा हो चुकी है
बजरंग दल के नेता बाबू बजरंगी को नरोदा पाटिया में दंगे भड़काने के आरोप में सज़ा हो चुकी है

वकालत की पढ़ाई के दौरान ही शमशाद प्रसिद्द मानवाधिकार वकील और एक्टिविस्ट मुकुल सिन्हा के काम में हाथ बंटाने लगे. 2006 में वकालत पूरी करने के बाद जो पहला केस उनके हाथ लगा, वो एक फर्जी मुठभेड़ का मुकदमा था. बाद में इसे ‘सादिक जमाल फर्जी मुठभेड़ केस’ के नाम से जाना गया. शमशाद आज अहमदाबाद में दंगा पीड़ितों और फर्जी एनकाउंटर केस के पीड़ितों के लिए केस लड़ने वाली ज्यूडिशियल एक्टिविस्टों की टीम का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. न्यायपालिका की पेचीदा प्रक्रियाओं और थका देने वाली इस अदालती लड़ाई के बारे शमशाद कहते हैंः

“गुजरात में आज़ादी के बाद दंगों का इतिहास 1969 से शुरू हो जाता है. 2002 के बाद गोधरा दंगे एक मात्र ऐसे दंगे हैं जिनमें अदालती कार्रवाहियां किसी सकारात्मक नतीजे पर पहुंची हैं. यह सब संभव हो पाया ज्यूडिशियल एक्टिविस्टों के सांझे प्रयास से.

कानूनी लड़ाई लड़ने में कोई दिक्कत नहीं है. इसके साथ जुड़ी दूसरी परेशानियां हैं जो आपको थका देती हैं. पिछले 15 साल में कोई ऐसा दिन नहीं गया जब किसी शुभचिंतक ने यह केस छोड़ देने की सलाह नहीं दी हो. सिस्टम के पास डराने के अपने हथियार होते हैं. आपको कदम-कदम पर डीमॉरलाइज़ करने की कोशिश होती है. मसलन कोर्ट-रूम के बाहर लोग आपको देखकर कहते हैं ‘मियाओं का वकील आ गया” या फिर ये कि “आतंकवादियों का वकील आ गया”. पेशी के दौरान आरोपी आपको देखकर आंखें तरेरता है. पुलिस अॉफिसर आपको देखकर अपनी पिस्टल पर हाथ फेरने लगता है. यह सब आपके इर्द-गिर्द हो रहा होता है और आपको इनके बीच अपना काम करना है.

दंगाई भीड़ ने जो मिला, जहां मिला, उसे नुकसान पहुंचाया. सड़क पर जलता एक ट्रक
दंगाई भीड़ ने जो मिला, जहां मिला, उसे नुकसान पहुंचाया. सड़क पर जलता एक ट्रक.

आप अक्सर सुनते हैं कि गुजरात बहुत सुरक्षित है. क्या सच में ऐसा है? दरअसल 2002 के बाद से माइनॉरिटी के दिमाग में एक डर घर कर गया है और 15 साल बाद भी वो निकलने का नाम नहीं ले रहा है. अगर आप खिलाफ बोलने की हिम्मत दिखाते हैं तो आपको नतीजे भुगतने के लिए तैयार रहना होगा. आप मुझे ही लीजिए. 2016 के साल में ऊना दलित आन्दोलन के वक़्त पुलिस ने मुझे 16 बार गिरफ्तार किया लेकिन मेरे खिलाफ कोई शिकायत दर्ज नहीं हुई. मुझे कुछ घंटों के लिए थाने बैठाकर छोड़ दिया जाता. क्योंकि मैं कानून जानता हूं इसलिए मुझे इससे ख़ास फर्क नहीं पड़ा लेकिन आम आदमी को तोड़ने में इस किस्म के हथकंडे अक्सर काम कर जाते हैं.”

अब्दुल रज़्ज़ाक नरोदा गाम मामले में फरियादी हैं. 15 साल से चल रही अदालती कार्रवाई में वो केवल एक मर्तबा अदालत गए हैं. वो इसकी वजह बताते हैंः

“28 तारीख (फरवरी 2002) को दंगा हुआ था साहब. 3 तारीख को उन लोगों ने जेसीबी बुलाकर बलूच बिल्डिंग को ज़मींदोज कर दिया था. हमारा जो बचा-खुचा सामान था वो भी उसी के साथ मलबे में चला गया. उसके बाद मैं उस इलाके में गया भी नहीं. सुनते हैं उस जमीन पर अब कोई बड़ा कॉम्प्लेक्स बना हुआ है. एक दफा अदालत गया था. जिन लोगों ने मेरे अब्बा और भाई को मारा वो मेरे सामने खड़े थे, हंस रहे थे. घर लौटा तो तीन-चार दिन तक ठीक से सो नहीं पाया. उसके बाद अदालत जाना ही छोड़ दिया.”

कई जगह इतना वीभत्स दंगा हुआ कि मरने वालों का पता भी नहीं चला. गुलबर्गा सोसायटी में पूर्व सांसद एहसान जाफरी के अवशेष तक नहीं मिले
कई जगह इतने वीभत्स दंगे हुए कि मरने वालों का पता भी न चला. गुलबर्गा सोसायटी में पूर्व सांसद एहसान जाफरी के अवशेष तक नहीं मिले. (सांकेतिक फोटो)

एसआईटी ने इस मामले में कुल 70 चश्मदीद गवाहों के बयान अदालत के सामने पेश किए हैं. उसमें से एक गवाह आबिद मियां भी हैं. पिछले 15 साल में आबिद मियां ने अहमदाबाद में होने वाली हर कानूनी कार्रवाई में भाग लिया है. वो कहते हैंः

“जब से मामला बोर्ड पर आया है, मैं हर कार्रवाई देखने के लिए जाता हूं. 11 बजकर 52 मिनट पर अदालत शुरू होती है और 2 बजे तक चलती है. देखिए हमें इंसाफ मिलने की कोई ख़ास उम्मीद नहीं है लेकिन शमशाद भाई और उनके जैसे दूसरे लोग हमें इंसाफ दिलवाने के लिए अपने को जोखिम में डालकर लड़ रहे हैं. हम उनका साथ देने के लिए अदालत चले जाते हैं.”

अगस्त 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने अहमदाबाद में इस मामले की सुनवाई कर रही एसआईटी कोर्ट को निर्देश दिए थे कि तीन महीने के भीतर सारे मामले की सुनवाई पूरी कर ली जाए. कुल 82 लोग इस मामले में आरोपी हैं, जिसमें माया कोडनानी, बाबू बजरंगी और जयदीप पटेल का नाम शामिल है. 18 सितम्बर, 2017 को अमित शाह इस मामले में माया कोडनानी के बचाव में अदालत के सामने बतौर गवाह पेश हो चुके हैं.

नरोदा पाटिया में रहने वाले बाशिंदों में से कई नाउम्मीद हो चुके हैं, वो अब चुनाव वगैरह में दिलचस्पी नहीं लेते
नरोदा पाटिया में रहने वाले लोगों में से कई तो नाउम्मीद हो चुके हैं, वो अब चुनाव वगैरह में दिलचस्पी नहीं लेते.

सुप्रीम कोर्ट की दी हुई चार महीने की डेडलाइन भी साल खत्म होने साथ ही खत्म हो जाएगी. सूबे में गरम चुनावी माहौल के बीच 27 नवंबर 2017 की रोज़ एसआईटी अदालत में तहलका स्टिंग ऑपरेशन की स्क्रीनिंग होनी है. आबिद मियां हर बार की तरह इस सुनवाई को देखने के लिए अदालत जाएंगे. शाम को कोर्ट से लौटने के बाद वो अब्दुल रज़्ज़ाक के पास जाकर उन्हें इतिल्ला देंगे कि आज कोर्ट में क्या हुआ? 14 दिसम्बर, 2017 को अहमदाबाद में वोट पड़ने हैं, अब्दुल रज्जाक वोट डालने जाएंगे लेकिन आबिद मियां नहीं. दोनों के पास अपनी अलग-अलग वजहें हैं. आबिद मियां कहते हैंः

“यहं पर सारा चुनाव एच-एम (हिंदू-मुस्लिम) पर होता है. ऐसे में हमारे वोट डालने से क्या ही फरक पड़ेगा. 2002 के बाद से मैंने अब तक किसी भी चुनाव में वोट नहीं दिया. सच पूछो तो इंडिया में कोई पार्टी है ही नहीं जो हमारा भला कर सके.”

इसके उलट अदालत की कार्रवाई से बचने वाले अब्दुल रज़्ज़ाक हर बार वोट डालने जाते हैं. वो कहते हैंः

“मैं हर बार यह सोचकर वोट डालने चला जाता हूं कि कहीं अपने एक वोट की वजह से कोई अच्छा आदमी आने से रुक नहीं जाए. बाकी सियासत से मेरा कोई ख़ास लेना-देना नहीं है.”

उम्मीद की एक तस्वीर. रिफ्यूजी कैम्प में पैदा हुए बच्चे.
उम्मीद की एक तस्वीर. रिफ्यूजी कैम्प में पैदा हुए बच्चे.

दंगों के इतने साल बाद इस कहानी के तीनों किरदारों के दिमाग में इस हवाले से केवल कड़वी यादें नहीं है. मसलन शमशाद पठान को याद है कि उनकी 700 की बस्ती में महज 7-10 घर मराठी हिन्दुओं के थे. दंगों के समय जब बस्ती का कोई आदमी बस्ती से बाहर नहीं निकल पाता था तो हफ़्तों ये परिवार पूरी बस्ती के लिए रोज़मर्रा का सामान लाकर देते रहे. मसलन अब्दुल रज़्ज़ाक अपनी जान बचाने के लिए आज भी रघुभाई के शुक्रगुज़ार हैं. मसलन आबिद मियां आज भी नहीं भूले हैं कि दंगों के बुरे वक़्त में धंधे में उनके साझेदार रूपसिंह भाई ने शाह आलम कैम्प आकर उन्हें कपड़े-लत्ते, बर्तन, अनाज और पैसे दिए ताकि वो नए सिरे से ज़िंदगी शुरू कर पाएं. आबिद मियां कहते हैंः

“दंगों से किसी को फायदा नहीं होता सिवाय सियासी पार्टियों के. दंगों से पहले जिन हिन्दुओं के साथ मेरी दोस्ती थी, दंगों के बाद वो मुसलसल जारी रहीं. वो नहीं होते तो शायद फिर से खड़े होने में और कई साल लग जाते.”

रिपोर्ट के अंत में कोई उपसंहार लिखने का मन नहीं है. आबिद मियां के इस बयान को ही इस रिपोर्ट का अंत मान लिया जाए.


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गंदी बात

'इस्मत आपा वाला हफ्ता' शुरू हो गया, पहली कहानी पढ़िए लिहाफ

उस अंधेरे में बेगम जान का लिहाफ ऐसे हिलता था, जैसे उसमें हाथी बंद हो.

PubG वाले हैं क्या?

जबसे वीडियो गेम्स आए हैं, तबसे ही वे पॉपुलर कल्चर का हिस्सा रहे हैं. ये सोचते हुए डर लगता है कि जो पीढ़ी आज बड़ी हो रही है, उसके नास्टैल्जिया का हिस्सा पबजी होगा.

बायां हाथ 'उल्टा' ही क्यों हैं, 'सीधा' क्यों नहीं?

मां-बाप और टीचर बच्चों को पीट-पीट दाहिने हाथ से काम लेने के लिए मजबूर करते हैं. क्यों?

फेसबुक पर हनीमून की तस्वीरें लगाने वाली लड़की और घर के नाम से पुकारने वाली आंटियां

और बिना बैकग्राउंड देखे सेल्फी खींचकर लगाने वाली अन्य औरतें.

'अगर लड़की शराब पी सकती है, तो किसी भी लड़के के साथ सो सकती है'

पढ़िए फिल्म 'पिंक' से दर्जन भर धांसू डायलॉग.

मुनासिर ने प्रीति को छह बार चाकू भोंककर क्यों मारा?

ऐसा क्या हुआ, कि सरे राह दौड़ा-दौड़ाकर उसकी हत्या की?

हिमा दास, आदि

खचाखच भरे स्टेडियम में भागने वाली लड़कियां जो जीवित हैं और जो मर गईं.

अलग हाव-भाव के चलते हिजड़ा कहते थे लोग, समलैंगिक लड़के ने फेसबुक पोस्ट लिखकर सुसाइड कर लिया

'मैं लड़का हूं. सब जानते हैं ये. बस मेरा चलना और सोचना, भावनाएं, मेरा बोलना, सब लड़कियों जैसा है.'

ब्लॉग: शराब पीकर 'टाइट' लड़कियां

यानी आउट ऑफ़ कंट्रोल, यौन शोषण के लिए आमंत्रित करते शरीर.

औरतों को बिना इजाज़त नग्न करती टेक्नोलॉजी

महिला पत्रकारों से मशहूर एक्ट्रेसेज तक, कोई इससे नहीं बचा.

सौरभ से सवाल

दिव्या भारती की मौत कैसे हुई?

खिड़की पर बैठी दिव्या ने लिविंग रूम की तरफ मुड़कर देखा. और अपना एक हाथ खिड़की की चौखट को मजबूती से पकड़ने के लिए बढ़ाया.

कहां है 'सिर्फ तुम' की हीरोइन प्रिया गिल, जिसने स्वेटर पर दीपक बनाकर संजय कपूर को भेजा था?

'सिर्फ तुम' के बाद क्या-क्या किया उन्होंने?

बॉलीवुड में सबसे बड़ा खान कौन है?

सबसे बड़े खान का नाम सुनकर आपका फिल्मी ज्ञान जमीन पर लोटने लगेगा. और जो झटका लगेगा तो हमेशा के लिए बुद्धि खुल जाएगी आपकी.

'कसौटी ज़िंदगी की' वाली प्रेरणा, जो अनुराग और मिस्टर बजाज से बार-बार शादी करती रही

कहां है टेलीविज़न का वो आइकॉनिक किरदार निभाने वाली ऐक्ट्रेस श्वेता तिवारी?

एक्ट्रेस मंदाकिनी आज की डेट में कहां हैं?

मंदाकिनी जिन्हें 99 फीसदी भारतीय सिर्फ दो वजहों से याद करते हैं

सर, मेरा सवाल है कि एक्ट्रेस मीनाक्षी शेषाद्री आजकल कहां हैं. काफी सालों से उनका कोई पता नहीं.

‘दामिनी’ के जरिए नई ऊंचाई तक पहुंचा मीनाक्षी का करियर . फिर घातक के बाद 1996 में उन्होंने मुंबई फिल्म इंडस्ट्री को बाय बोल दिया.

ये KRK कौन है. हमेशा सुर्खियों में क्यों रहता है?

केआरके इंटरनेट एज का ऐसा प्रॉडक्ट हैं, जो हर दिन कुछ ऐसा नया गंधाता करना रचना चाहता है.

एक्ट्रेस किमी काटकर अब कहां हैं?

एडवेंचर ऑफ टॉर्जन की हिरोइन किमी काटकर अब ऑस्ट्रेलिया में हैं. सीधी सादी लाइफ बिना किसी एडवेंचर के

चाय बनाने को 'जैसे पापात्माओं को नर्क में उबाला जा रहा हो' कौन सी कहानी में कहा है?

बहुत समय पहले से बहुत समय बाद की बात है. इलाहाबाद में थे. जेब में थे रुपये 20. खरीदी हंस...

सर आजकल मुझे अजीब सा फील होता है क्या करूं?

खुड्डी पर बैठा था. ऊपर से हेलिकॉप्टर निकला. मुझे लगा. बाबा ने बांस गहरे बोए होते तो ऊंचे उगते.