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मेहसाणा ग्राउंड रिपोर्टः जहां सरकार जानवर चराने की ज़मीन लेकर निजी कंपनी को दे देती है

जिन परिवारों के पास जमीन का छोटा-सा भी टुकड़ा हो, उन्हें कम से कम अपनी जरूरत जितनी कपास उगा लेनी चाहिए…
– महात्मा गांधी

‘फाइव-एफ’ फॉर्मूले में फार्म टू फाइबर, फाइबर टू फैब्रिक, फैब्रिक टू फैशन और फैशन टू फॉरेन- वही कपास, कपास का धागा, धागे का कपड़ा, कपड़े से रेडिमेड गारमेंट, रेडिमेड गारमेंट से निर्यात! देखिए वैल्यू एडिशन की दिशा में हमको जाना होगा.

– नरेंद्र मोदी


 जिन किसानों से उनके जानवर चराने की जमीन ले ली जाए, उन्हें क्या करना चाहिए, किस दिशा में जाना चाहिए, इस विषय में न महात्मा गांधी ने कुछ बताया, न प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने.

मेहसाणा की कपास मिलों पर नोटबंदी और जीएसटी की बहुत बुरी मार पड़ी है. (फोटोः अमितेश सिन्हा/दी लल्लनटॉप)
मेहसाणा की कपास मिलों पर नोटबंदी और जीएसटी की बहुत बुरी मार पड़ी है. (फोटोः अमितेश सिन्हा/दी लल्लनटॉप)

पिछले साल नोटबंदी की वजह से बिज़नेस आधा रह गया था. इस साल GST से परेशान हैं. रोज दो लाख रुपए का अडवांस टैक्स भरते हैं, जितना लौटना होगा, हिसाब-किताब के बाद लौटेगा, बिना ब्याज़. भाजप (जिसे आप भाजपा या बीजेपी के नाम से जानते हैं) के समर्थक हैं. कहते हैं कि मोदी जी से बात चल रही है. उम्मीद है, कुछ न कुछ हो जाएगा.

अमदावाद (जिसे आप अहमदाबाद नाम से जानते हैं) से मेहसाणा के बेचराजी जाते हुए मैं कड़ी में खड़ा था. मेहसाणा का ही एक हिस्सा. जिसके लिए इंटरनेट पर कॉटन सिटी ऑफ इंडिया लिखा मिलता है. जिसके बारे में लिखा मिलता है कि 100 से ज्यादा कपास मिलें हैं, लेकिन पूछने पर ये संख्या 250 पार कर जाती है. उसी कड़ी की एक कपास मिल राधे इंडस्ट्रीज़. पिता ने शुरू की, अब परेशभाई पटेल और संदीप भाई पटेल चलाते हैं.

Video: आपके तन ढकने की शुरुआत इस जगह से होती है

कड़ी से कांग्रेस के रमेशभाई चावड़ा विधायक हैं. 84,276 वोट पाकर बहुत मामूली अंतर से जीते थे. बीजेपी के हीतू कनोदिया को मिले थे 83,059 वोट. लेकिन कॉटन मिल वाले पटेल भाई कांग्रेस की लीडरशिप से बहुत आश्वस्त नहीं लगे. कहते हैं कि कांग्रेस की लोकल लीडरशिप कुछ मजबूत हो, तो कुछ बात बने. कहते हैं –

”कांग्रेस का ऐसा मान लो कि ओपनिंग बैट्समैन अच्छा है, मिडिल ऑर्डर अच्छा है, लेकिन लोअर ऑर्डर खराब है. राहुल गांधी को इस पर खुश होना चाहिए या दुखी, इस पर विद्वानों में मतभेद हो सकता है.”

Video: बहुचरा जी मंदिर में देश भर से किन्नर क्यों आते हैं?

बेचराजी में माता का मंदिर है. कोई बेचराजी माता कहता है, तो कोई बहुचराजी. देवी दुर्गा का ही एक रूप. सवारी मुर्गा. किन्नरों का खास जुड़ाव है इस मंदिर से. मंदिर में कई मुर्गे घूमते रहते हैं. लोग मन्नत मांगते हैं, जिनकी मन्नत पूरी हो जाती है, वो मुर्गा छोड़ जाते हैं. टेम्पल इंस्पेक्टर (हां, ये एक सरकारी पद है) गुणवंत भाई एक रोचक कहानी सुनाते हैं. कि खिलजी यहां आया था. उसके सैनिकों ने मंदिर में घूम रहे मुर्गों को पकड़कर खा लिया. एक मुर्गा किसी तरह बच गया. सुबह उसने बांग दी. सभी सैनिकों का पेट फाड़कर मुर्गे निकल आए.

पद्मावती का विवाद और बढ़ने से पहले एक मुर्गा खिलजी को भी खिला ही दो.

बेचराजी में माता मंदिर से किन्नरों का खास लगाव है (फोटोः अमितेश सिन्हा/दी लल्लनटॉप)
बेचराजी में माता मंदिर से किन्नरों का खास लगाव है (फोटोः अमितेश सिन्हा/दी लल्लनटॉप)

बेचराजी की वर्तमान राजनीति भी रोचक है. यहां से भाजपा के विधायक रजनी पटेल हैं. जब आनंदी पटेल मुख्यमंत्री थीं, तब ये गृहमंत्री हुआ करते थे. पटेल आंदोलन भड़का. इनका मंत्री पद चला गया. लेकिन मंदिर के आस-पास लोग भाजप का जप करते मिले.

गुजरात में अगर मुझसे देखने लायक दो सबसे खूबसूरत चीजें पूछी जाएं, तो मैं पहले नंबर पर पाटन में रानी की वाव बताऊंगा, दूसरे नंबर पर मोढेरा का सूर्य मंदिर.

Video: गुजरात में घूमने लायक दूसरी सबसे खूबसूरत जगह

ये मत कहिएगा कि मैंने मोदी जी का नाम क्यों नहीं लिखा. वो इस देखने-दिखाने से ऊपर की चीज हैं. प्रधानमंत्री के लिए चीज शब्द का इस्तेमाल करने पर आपत्ति जताने वाले जान लें कि चीज हमेशा खराब चीज नहीं होती है. जैसा कि मरहूम मोहम्मद जहूर खैय्याम ने कहा है कि दिल चीज क्या है… दरअसल जिसे आप रेखा के होंठों और आशा भोसले के गले से सुनते रहे हैं, वो चीज खैय्याम की ही है.

ये मात्र संयोग है कि मेरी बताई दोनों जगहों के खंभों और दीवारों पर इरॉटिक मूर्तियां हैं. ये वाक्य पढ़कर आपके मन में जितनी वासना आ गई होगी, उन मूर्तियों को देखकर इसकी अंशमात्र भी नहीं आती. गाइड के हिसाब से वहां एएसआई ने बहुत अच्छा काम किया है. हमें ये नहीं पता कि एएसआई ने वहां क्या से क्या कर दिया है, लेकिन ये जरूर लगा कि क्या नहीं होना चाहिए था. मसलन मंदिर की दीवार में एक पत्थर की जगह नए सीमेंट की ईंटनुमा चीज दिखी, जिस पर ASI गुदा हुआ था. मंदिर से जुड़ी कई विखंडित मूर्तियां म्यूज़ियम के रास्ते के दोनों तरफ खुले में रखी थीं. दिक्कत ये है कि ये दिक्कत करीब साढ़े तीन साल पहले भी हमें दिखी थी.

मोढेरा का सूर्य मंदिर के बाहर बनीं इरॉटिक मूर्तियां (फोटो फोटोः अमितेश सिन्हा/दी लल्लनटॉप)
मोढेरा का सूर्य मंदिर के बाहर बनीं इरॉटिक मूर्तियां (फोटोः अमितेश सिन्हा/दी लल्लनटॉप)

मैं करीब साढ़े तीन साल पहले भी यहां आया था. उस वक्त मैं वहां के कुछ लोगों के साथ एक जमीन पर गया था. आज मैं वहां उन लोगों के साथ इतनी आसानी से नहीं जा सकता. ये जगह है हंसलपुर और जिस जमीन की मैं बात कर रहा हूं, वो मारुति को प्लांट के लिए दे दी गई.

तर्क दिया जा सकता है कि वो जमीन किसानों की थी ही नहीं. लेकिन ये मामला शासन-प्रशासन के काम करने के तरीके को दिखा देता है. ये मामला बहुत पेचीदा है. मुझे बताया गया कि यहां 647 एकड़ जमीन मारुति को दी गई है, जिसमें से 270 एकड़ जमीन किसानों की थी. यह जमीन सरकार ने किसानों को 1954 में लीज़ पर दी थी. किसानों को लीज़ रिन्यू कराने के बारे में कुछ पता नहीं था. लीज़ रिन्यू न कराने पर फाइन लगता था, जिसे किसान टैक्स-लगान जानकर अदा कर देते थे.

हंसलपुर में गुजरात सरकार ने चरावन की ज़मीन मारुति के प्लांट के लिए दे दी है (फोटोः अमितेश सिन्हा/दी लल्लनटॉप)
हंसलपुर में गुजरात सरकार ने चरावन की ज़मीन मारुति के प्लांट के लिए दे दी है (फोटोः अमितेश सिन्हा/दी लल्लनटॉप)

किसानों ने 1992 तक फाइन दिया. उन्हें 2006 तक नोटिस दिया गया. 2007 में एक सरपंच, जो बीजेपी के आदमी थे, ने बिना किसी से पूछे जमीन जीआईडीसी को दे दी. जीआईडीसी माने गुजरात इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन. जीआईडीसी ने 2011-2012 में जमीन मारुति को दे दी. इस जमीन को सरकार ने अनुपजाऊ बताया, जबकि वहां किसान खेती करते थे, उनका गौचर था मतलब कि वहां उनके जानवर चरते थे.

तमाम मुकदमेबाजी हुई. प्लांट के ऐलान से पहले ही कई नेताओं ने अगल-बगल की सस्ती जमीनों को खरीदवा लिया था, जिसका रेट प्लांट का ऐलान होते ही बढ़ गया. जो पहले उस जमीन का इस्तेमाल करते थे, उन्हें जमीन और पैसा तो दूर की बात, आस-पास के इलाके तक से किसी को नौकरी पर नहीं रखा गया. जबकि ऐसा कोई भी प्लांट स्थानीय लोगों को रोजगार के वादे के साथ आता है.

Video: हंसलपुर के किसान क्या सोचते हैं सरकार के बारे में

शाम थी. अंधेरा हो रहा था. उनके किचन से धुआं उठ रहा था. मैंने गैस सिलिंडर के बारे में पूछा, तो पता चला कि उन्हें ज्यादा पैसे वाला बताकर सब्सिडी वाला गैस सिलिंडर देने से मना कर दिया गया है. ये वो लोग हैं, जिनके बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं, जो अपने जानवर चराने दूसरे गांव जाते हैं.

ये गांव वीरमगाम विधानसभा क्षेत्र में आता है. यहां दो बार से कांग्रेस की तेजश्री बेन पटेल जीत रही हैं. इस बार वो भाजप में चली गई हैं. यहां कोई नेता वोट मांगने नहीं आया. लोग कहते हैं कि नेता जानते हैं कि वो उन्हें वोट नहीं देंगे. लोग कहते हैं कि वो किसी को वोट नहीं देंगे. वो वोट दें या न दें, कोई न कोई तो जीतेगा.

ज़मीन जाने और प्लांट में नौकरी न पाने वाले परिवारों के पास अपने भरण-पोषण के लिए काफी कम साधन हैं (फोटो फोटोः अमितेश सिन्हा/दी लल्लनटॉप)
मोढेरा में घूमने आए एक बुज़ुर्ग (फोटोः अमितेश सिन्हा / दी लल्लनटॉप)

जब बड़े-बूढ़े गुजराती में ये कहें कि वो अपने बच्चों को अब क्या खिलाएं और वही बच्चे हंसते हुए उसे हिंदी में ट्रांसलेट करके आपको सुनाएं, तो इसके बाद चीजें समझ में आनी बंद हो जाती हैं, पूरे दिन की थकान दोगुनी महसूस होने लगती है.

मैं लौटकर कपास का वो फाहा छूता हूं, जो सुबह मिल से ले आया था.

वह जो आपकी कमीज है
किसी खेत में खिला
एक कपास का फूल है.

– केदारनाथ सिंह


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