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गुजरात चुनाव: कहानी उस जगह की, जहां खुद नरेंद्र मोदी भी बीजेपी को नहीं हरा सकते

अहमदाबाद गुजरात की कैजुअल राजधानी है. इस अहमदाबाद में एक जगह है, खादिया. पतली-संकरी गलियों वाला बेहद पुराना इलाका. बीजेपी के साथ इतना गहरा रिश्ता है इस जगह का कि अगर किसी दिन नरेंद्र मोदी बीजेपी छोड़कर चुनाव लड़ें, तो खादिया उनको भी हरा देगा. इस लाइन को एक उपमा की तरह पढ़िएगा. क्योंकि मोदी कभी बीजेपी छोड़ेंगे, ऐसी गुंजाइश है नहीं. इस इलाके का इतिहास बहुत गजब का है. अंधेरे और उजाले जितना अलग-अलग. इसके बारे में मशहूर है कि गुजरात में जब भी कोई आंदोलन शुरू होता तो खादिया उसको लेकर आगे-आगे उड़ जाता है. ये खादिया ही था, जो अंग्रेजों के खिलाफ गुजरात का इकलौता अंडरग्राउंड अखबार निकालता था. गुप-चुपकर निकाला जाता था. जान हथेली पर लेकर. अखबार एकदम बगावती. अंग्रेज सरकार को खरी-खोटी सुनाने वाला. लोगों को अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत करने को भड़काने वाला. इसका नाम था- गुजरात सत्यागमहा पत्रिका.

कहने को बस एक पन्ने का अखबार, मगर एकदम बारूद का गोला. कहता, किसी भी कीमत पर आजादी के लिए लड़ो. उस जमाने में अंग्रेजों के सिपाही भी यहां घुसने से डरते थे. ये खादिया ही था, जिसने पहले-पहल सोडे की सामान्य सी दिखने वाली बोतल को खतरनाक हथियार की तरह इस्तेमाल करना शुरू किया. पिछले कई साल से ये जगह देश में बीजेपी की सबसे मजबूत जगहों में से एक है. कहा जाता है कि खादिया को कांग्रेस से नफरत है. खादिया कभी किसी कांग्रेस वाले को नहीं जिता सकता है. मगर 2009 में इस सीट की किस्मत बदल गई. खादिया का मेल हुआ जमालपुर से. दोनों को मिलाकर एक विधानसभा क्षेत्र बना दिया गया. जमालपुर मुस्लिम-बहुल इलाका है. खादिया हिंदू मेजॉरिटी इलाका. 2009 के बाद ये जगह कहलाने लगी जमालपुर-खादिया. 62 फीसदी मुस्लिम आबादी वाला इलाका. फर्क दिखा आपको? खादिया और जमालपुर खादिया में? जमालपुर खादिया में जमालपुर की पहचान ज्यादा बड़ी है. ये फर्क इस इलाके के वोटों की ताकत बदलने की कहानी है.

80 के दशक में एक सरकारी अधिकारी ने कहा था कि अगर खदिया को मिट्टी में मिला दिया जाए, तो अगले दस साल तक गुजरात में कोई दंगा-फसाद नहीं होगा.
80 के दशक में एक सरकारी अधिकारी ने कहा था कि अगर खदिया को मिट्टी में मिला दिया जाए तो अगले दस साल तक गुजरात में कोई दंगा-फसाद नहीं होगा.

बीजेपी के सबसे मजबूत इलाकों में है ये जगह

ये जगह बीजेपी के सबसे मजबूत गढ़ों में से एक है. यहां के मौजूदा विधायक हैं भूषण भट्ट. पिछले 40 साल से ये पार्टी बीजेपी की सबसे मजबूत जमीनों में से एक रही है. मगर अब हालात बदल गए हैं. अब यहां मुसलमानों की तादाद ज्यादा है. भूषण भट्ट से पहले उनके पिता अशोक भट्ट यहां के बड़े नेता थे. बीजेपी के ही थे. अक्सर विवादों में ही फंसे रहते थे. अशोक भट्ट आठ बार यहां से चुने गए. ये विरासत भूषण को भारी पड़ती है. हर बार उनके ऊपर अपनी सीट बचाने का दबाव मंडराता रहता है.

2012 के चुनाव में भी भूषण को जीत गए थे. कैसे? हिंदू और दलित वोट से. उन्होंने कांग्रेस के समीरखान सिपाई को हराया था. महज 6,331 वोटों से. तीसरे नंबर पर रहे थे सबीरभाई काबलीवाला. इस बार गुजरात के दलित वोटों पर जिग्नेश मेवानी का असर होने की संभावना है. ऐसा हुआ तो भूषण भट्ट के लिए मुश्किल पैदा हो सकती है. पिछले चुनाव में अगर काबलीवाला ने समीरखान के वोट नहीं काटे होते तो कांग्रेस यहां से जीती होती. खैर, ये तो पिछले बार की बात थी. इस बार बीजेपी यहां खूब ध्यान दे रही है. मुसलमान वोटरों को रिझाने के लिए ‘अल्लाह-हू-अकबर’ के नारे भी लगा रही है. मुख्यमंत्री विजय रुपानी ने अपने ‘गुजरात गौरव महासंपर्क अभियान’ रोड-शो की शुरुआत इसी खदिया से की थी.

बहुत मशहूर है खादिया की ‘कांग्रेस नफरत’

खादिया के ‘कांग्रेस नफरत’ का किस्सा भी बहुत मशहूर है. एक नेता थे यहां. ब्रह्मकुमार भट्ट. जनता पार्टी हुआ करती थी उस समय. तो ये ब्रह्मकुमार भट्ट जनता पार्टी के सचिव थे. खादिया में बहुत बड़ा कद था उनका. प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर जीतकर वो दो बार विधानसभा भी पहुंचे. फिर 1967 में वो कांग्रेस में चले गए. इंदिरा से हाथ मिला लिया. उनके कांग्रेस में जाते ही खादिया ने उनसे आंखें फेर लीं. खादिया ने माफ ही नहीं किया उनको. आलम ये था कि जब ब्रह्मकुमार भट्ट चुनाव प्रचार करने खादिया जाते तो पुलिसवाले उनकी हिफाजत में साथ चलते. जाहिर था, वो हार गए. वजह बस इतनी कि वो कांग्रेस में चले गए थे.

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ब्रह्मकुमार भट्ट जब तक जनता पार्टी में थे, तब तक खदिया ने उन्हें खूब समर्थन दिया. फिर जब वो कांग्रेस में चले गए तो जनता ने उन्हें पूरी तरह से नकार दिया. उन्हें पुलिस सुरक्षा की ज़रूरत पड़ गई.

अगर खादिया न हो तो गुजरात में कोई दंगा नहीं होगा!

खादिया की पतली गलियां दंगों के मुफीद हैं. इन संकरी गलियों में पुलिस की गाड़ियां घुस भी नहीं पाती हैं. पुलिसवाले पैदल घुसने की कोशिश करते हैं. जैसे ही अंदर आते हैं, उनके ऊपर चारों तरफ से पत्थरों की बारिश होने लगती है. एक-दूसरे से सटे घर भी दंगा करने वालों के खूब काम आते हैं. यहां चढ़ो और मिनटों में खूब दूर पहुंच जाओ. दंगे के समय खादिया में किसी के भी घर घुस जाओ. अगर वो एक खास धर्म का है तो उसे पनाह मिल जाएगी. लोग उसे पुलिस से बचा लेंगे. इसके बारे में एक और कहावत मशहूर है. कहते हैं कि खादिया के चूहों से बिल्लियां भी डर जाती हैं. एक बात में समझ जाइए इस जगह को. 1985-86 में एक SRP कमांडेंट अहमदाबाद में पोस्टेड थे. नाम था, आर के वशिष्ठ. उन्होंने कहा था एक बार:

अगर खादिया को मिट्टी में मिला दिया जाए तो गुजरात राज्य में अगले 10 साल तक कोई उपद्रव नहीं होगा.

2008 में जब खदिया और
2008 में जब खादिया और जमालपुर को मिलाकर एक निर्वाचन क्षेत्र बना दिया गया, तब इस जगह के वोटिंग पैटर्न में बदलाव आ गया. जमालपुर मुस्लिम-बहुल इलाका है, जबकि खदिया हिंदू मेजॉरिटी इलाका है.

आजादी की लड़ाई में दिल से लड़ा था खादिया

1985-86 के गुजरात दंगों में माधव सिंह सोलंकी सरकार के खिलाफ जमकर लिखने वाले ‘गुजरात समाचार’ का भी खादिया से रिश्ता था. ये अखबार जब शुरुआत में निकला, तब इसका नाम ‘प्रजाबंधु’ हुआ करता था. इसे शुरू किया था ठाकुरलाल ठाकुर ने. ये ठाकुरलाल यहीं खादिया के रहने वाले थे. एक और गुजराती अखबार था. संदेश. ये भी शुरुआत में खादिया से ही निकला. सत्ता का विरोध करना इस जगह की पहचान थी. जो गलत हो रहा है, वो क्यों हो रहा है? खादिया को ये सवाल पूछने की लत थी जैसे.

18वीं सदी में इस जगह को अहमदाबाद की सांस्कृतिक राजधानी कहा जाता था. आजादी की लड़ाई के दौरान भी ये जगह हमेशा आगे-आगे रही. अहमदाबाद पारंपरिक तौर पर बड़ा शर्मीला शहर रहा है. एक वक्त था कि औरतें घरों से बाहर दिखती भी नहीं थीं. पर्दे में रहती थीं. इस मामले में भी खादिया अलग था. आजादी की लड़ाई के दौरान यहां की औरतें ही थीं, जो शाम ढलने के बाद घरों से बाहर आकर आजादी के गाने गातीं. भजन सुनातीं. शायद यही आदत थी कि आगे चलकर जब आंदोलन वगैरह की स्थिति बनती तो यहां की औरतें पुलिस से भिड़ने में भी पीछे नहीं रहा करती थीं.

इन चुनावों में बीजेपी हिंदू वोटों के अलावा किस तबके को रिझाने में कामयाब होगी, इस बात से नतीजे तय होंगे.
इन चुनावों में बीजेपी हिंदू वोटों के अलावा किस तबके को रिझाने में कामयाब होगी, इस बात से नतीजे तय होंगे.

गुजरात में कोई भी दंगा-बवाल खादिया में ही पैदा होता है!

मगर फिर परिवर्तन आया. खादिया में भी हुआ बदलाव. अच्छी आदतों की जगह बुरी आदतों ने ले ली. जैसे-जैसे समय बीतता गया, संयुक्त परिवार टूटते गए. जगह कम पड़ने लगी तो लोग बाहर के इलाकों में जाने लगे. छोटी-संकरी गलियों की जगह इधर-उधर बड़ी इमारतें नजर आने लगीं. जैसे-जैसे पुराने लोग खादिया से बाहर जाने लगे, वैसे-वैसे यहां का माहौल भी बदलने लगा. लगा जैसे पुराने लोग अच्छी आदतें साथ लेते गए हैं. बुरे से बुरे सांप्रदायिक दंगे यहां आकर और बुरे हो जाने लगे. ये जगह ऐसी थी कि तनाव को सूंघकर अपना बना लेती थी. 80 के दौर में गुजरात ने जो आरक्षण-विरोधी हिंसा देखी, जो दंगे देखे, उनके कुछ सबसे डरावने पन्ने इसी खादिया में लिखे गए. फिर गुजरात में वो कहावत भी कही जाने लगी कि कोई भी दंगा या तनाव इसी खादिया में पैदा होता है. खादिया के बारे में पढ़-सुनकर ताज्जुब होता है. क्या कोई जगह इतनी भी बदल सकती है?


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