Submit your post

Follow Us

...मन को मैं तेरी नज्में नज़्में रिवाइज़ करा देता हूं

463
शेयर्स

Anurag-arya_130716-091129अनुराग आर्य पेशे से डॉक्टर हैं, पर उनके झोले में खूब सारी कहानियां होती हैं. स्किन स्पेशलिस्ट हैं, समाज की डेड स्किन भी कुरेदते रहते हैं. ब्लॉग पर ‘दिल की बात’ लिखते हैं बहुत पहले से. गुलज़ार पर जान छिड़कते हैं. उनके बर्थडे पर कुछ लिखा है. पढ़िए.

 

 

किसी सीले हुए मन को जब धूप लगानी होती है, मैं तेरी नज़्में रिवाइज़ करा देता हूं. नज्में ‘एजलेस’ होती हैं. बूढ़ी नहीं होतीं. उन पर उम्र नहीं चढ़ती. उनकी अपनी कैफियत होती है उनके ‘माने’ बदलते रहते हैं बस, साल दर साल!

यूं तो हर लिखने वाले के पास एक मुख्तलिफ अहसास है. मुख्तलिफ तस्सुवारात. पर सफ़ेद कुर्ते पजामे में सर पर पके-पके से बाल लिए एक ऐसा शख्स है जो कई सालों से हमारे वजूद का मुस्तकिल हिस्सा है. जाने कौन सा मिजाज़ पाया है उसने, के उसके तिलिस्मी यकीन पर यकीन करने का मन होता है.

jaipur-lit-fest-1_647_012516081201

कमबख्त बुरी बात भी इतने सलीके से कहता है के अच्छी लगने लगती है. दरअसल अट्ठारह-उन्नीस की उम्र में गुलज़ार कुछ-कुछ समझ आने लगे थे.

ज्यों ज्यों जिंदगी तजुर्बे फेंकती, रोशनी के छींटे यहां वहां पड़ते. कुछ मुगालते उतरते कुछ बने रहते. नज़्में अपना ज़ायक़ा बदलतीं. साल दर साल गुजरते ख़्वाब पिछली सीट पर धकेले जाते या मुल्तवी हो जाते. थके मांदे उनींदे जब उन्हीं जाने पहचाने कागजो से गुजरते तो वहां नए ‘माने’ होते. गुलज़ार को समझने के लिए उस फील से गुजरना, जिससे वे गुजरते हैं, शायद लाजिमी है. वे ग़ालिब से मुतासिर हैं. इसलिए मैं उन्हें ग़ालिब का एक्सटेंशन मानता हूं. मुश्किल ज़ुबान से बचते हुए वे कई बार रीच में आने के लिए अपने आप को आसान करते हैं. आसां होना बहुत मुश्किल काम है. वे आसान तर्जुमा हैं उर्दू का और ज़िन्दगी का. नज़्म वो होती है जो अपने वक़्त की टेरिटरी से बाहर चली जाती है.

बतौर गीतकार आप पर ये पाबंदी रहती है आसां जुबान पकड़ने की. आपका आस-पास आपकी ‘राइटिंग स्किल’ की डायरेक्शन तय करता है. उस दौर में जब लिखने वाले शहरयार, निदा फाजली, जां निसार अख्तर और शुरुआती दौर के जावेद अख्तर जैसे लोग हों. आप में एक तखलीकी हुनरमंदी आ जाती है. आपके विज़न गतिशील रहते हैं.

गुलज़ार की जो बात मुझे सबसे ज्यादा पसंद है वो ये है के वे जिंदगी से तल्ख़ नहीं होते. बिन मां के बच्चे की जिंदगी में कुछ तल्खियां आना ‘कंपल्सरी’ हैं. पर खुदा से उनकी नाराजगी बड़ी मासूमियत से बयान होती है. निजी जिंदगी में एक रिश्ते के न चलने पर भी वे उसे ‘अलग’ हो जाना कहते हैं. ये उनकी पर्सनैलिटी का एक बहुत मजबूत हिस्सा है.

उनकी रेंज अक्सर रिश्तों के दायरे से जब बाहर आती है तो बच्चों के लिए किताबें लिखने वाला ये शायर अफगान युद्ध में किसी दूसरे पायदान पर खड़ा मालूम पड़ता है. बारहा सोचता हूं कि कितने लोग ‘बीत जाने’ के बाद भी ‘बने’ रहते हैं, कागजों में. फिल्म रोल में. आवाज की शक्ल में. खेल के मैदानों में या दिलों में.
Gulzar-pti
शायद अपनी कैफियत की वजहों से. वे दिन को खींचते नहीं. अपनी उम्र के पाले में सालों को जमा नहीं करते. वे आहिस्ता-आहिस्ता अपने हिस्से से कुछ रोज इस सोसाइटी को देते हैं. मामूली-गैर मामूली सूरतों में, जो आने वाली नस्लों को बेहतर बनाने के मौजू देता है. जरिए अलग होते हैं पर नीयत एक ही होती है. इंसानी जिस्म की ‘इंनिंग्स’ एक बार ही मिलती है और वे अपनी ‘पारी’ मुकम्मल खेल जाते हैं.

तभी तो ‘परिचय’ में जब उनका हीरो प्राण साहब से कहता है ‘कुछ नहीं सेकेंड ट्राई सुन रहा था’ या आनंद का आनंद जब ये कहता है ‘काश अपने रिश्तेदार भी हम दोस्तों की तरह चुन सकते.’ मुझे लगता है इसे लिखने वाला ऐसे तजुर्बे लिख रहा है, जो साझे के हैं। बतौर निर्देशक वो आपका एक्सटेंशन करते हैं। ‘इजाज़त’ में वो रिश्ते की कॉम्प्लेक्सिटी को इस तरह से स्क्रीन पर रखते हैं, वो किसी एक जानिब खड़े नजर नहीं आते. उनका कैमरा “न्यूट्रल” रहता है. उनकी फिल्मों में एक नमी रहती है, एक किस्म की वो ह्यूमन साइड जो ज्यादा तकरीर नहीं करती, एक बैलेन्स बनाए रखती है. तभी उनकी फिल्मों में सारे रिश्ते ‘वक़्त’ से लड़ते हैं.

उनके तमाम किरदार स्क्रीन पर अपना स्कैच नहीं खींचते. आपकी मेमोरी सेल में अपना स्पेस छोड़ जाते हैं. नानावटी घटना पर बनाई अपनी फिल्म ‘अचानक’ में भी किसी पॉइंट ऑफ़ व्यू को नहीं कहते, कहानी में से एक नई कहानी बुनते हैं. अच्छी कहानी को स्क्रीन पर एस्टेब्लिश करना उनकी खासियत है. आंधी में वे तब्दील हो गई चीज़ों को नई जगह रखते है. ‘खुशबू’ और ‘परिचय’ में वो एक नॉन एक्टर कहे जाने वाले अभिनेता से उसका सर्वश्रेठ बड़ी आसानी से निकलवा लेते हैं. मैं उन्हें एक जेनरेशन को उर्दू की खूबसूरत दुनिया से तआरुफ़ कराने वाला शख्स मानता हूं, एक दरवाजा.

gulzarstory_647_081815044325

बरसों पहले ‘किनारा’ का वो ऑफ बीट रोमांटिक सोंग ‘एक ही ख़्वाब कई बार देखा मैंने.. तूने साड़ी में चाभियां रख ली है घर की’. भूपेन्द्र बीच बीच में जिस तरह बोलते हैं, टिकू. हाय एक ‘नीट’ की ‘किक’ सी देती है. आर डी के जाने के बाद एक ‘वेक्यूम’ क्रिएट हुआ था. गुलज़ार के लहजे के मुतालिक. शुक्र है विशाल भारद्वाज ने उसे कहीं-कहीं ‘फिल’ किया है. लिखने वाले बहुत से लोग आपको मुतासिर करते हैं. मुझे भी किया है. कई किस्म के लोगों को पढ़ता-सुनता हूं, उर्दू-हिंदी-अंग्रेजी के. पर गुलज़ार से मेरी मोहब्बत कुछ ‘बायस’ है. जिंदगी को इतने कायदे से पकड़ता है ये शख्स, मसलन ‘बड़े तपाक से मिलते हैं मिलने वाले, मुझे हुई है तुझसे जो निस्बत उसी का सदका है वगरना… वगरना शहर में ग़ालिब की आबरू क्या है’.

शुक्रिया गुलज़ार, गुलज़ार बने रहने के लिए. जन्मदिन मुबारक गुलज़ार साहब.


ये भी पढ़ लीजिए:

‘जब मेरे सैनिक दोस्तों के चिथड़े उड़ रहे थे, तब भारत क्रिकेट के जश्न में था’

‘तलफ़्फ़ुज़ से ही पंजाबियों के वज़न बिगड़ जाते हैं’

इस कदर सुकूं जैसे सच नहीं हो सब: दीप्ति नवल की नज्में

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

गंदी बात

'इस्मत आपा वाला हफ्ता' शुरू हो गया, पहली कहानी पढ़िए लिहाफ

उस अंधेरे में बेगम जान का लिहाफ ऐसे हिलता था, जैसे उसमें हाथी बंद हो.

PubG वाले हैं क्या?

जबसे वीडियो गेम्स आए हैं, तबसे ही वे पॉपुलर कल्चर का हिस्सा रहे हैं. ये सोचते हुए डर लगता है कि जो पीढ़ी आज बड़ी हो रही है, उसके नास्टैल्जिया का हिस्सा पबजी होगा.

बायां हाथ 'उल्टा' ही क्यों हैं, 'सीधा' क्यों नहीं?

मां-बाप और टीचर बच्चों को पीट-पीट दाहिने हाथ से काम लेने के लिए मजबूर करते हैं. क्यों?

फेसबुक पर हनीमून की तस्वीरें लगाने वाली लड़की और घर के नाम से पुकारने वाली आंटियां

और बिना बैकग्राउंड देखे सेल्फी खींचकर लगाने वाली अन्य औरतें.

'अगर लड़की शराब पी सकती है, तो किसी भी लड़के के साथ सो सकती है'

पढ़िए फिल्म 'पिंक' से दर्जन भर धांसू डायलॉग.

मुनासिर ने प्रीति को छह बार चाकू भोंककर क्यों मारा?

ऐसा क्या हुआ, कि सरे राह दौड़ा-दौड़ाकर उसकी हत्या की?

हिमा दास, आदि

खचाखच भरे स्टेडियम में भागने वाली लड़कियां जो जीवित हैं और जो मर गईं.

अलग हाव-भाव के चलते हिजड़ा कहते थे लोग, समलैंगिक लड़के ने फेसबुक पोस्ट लिखकर सुसाइड कर लिया

'मैं लड़का हूं. सब जानते हैं ये. बस मेरा चलना और सोचना, भावनाएं, मेरा बोलना, सब लड़कियों जैसा है.'

ब्लॉग: शराब पीकर 'टाइट' लड़कियां

यानी आउट ऑफ़ कंट्रोल, यौन शोषण के लिए आमंत्रित करते शरीर.

औरतों को बिना इजाज़त नग्न करती टेक्नोलॉजी

महिला पत्रकारों से मशहूर एक्ट्रेसेज तक, कोई इससे नहीं बचा.

सौरभ से सवाल

दिव्या भारती की मौत कैसे हुई?

खिड़की पर बैठी दिव्या ने लिविंग रूम की तरफ मुड़कर देखा. और अपना एक हाथ खिड़की की चौखट को मजबूती से पकड़ने के लिए बढ़ाया.

कहां है 'सिर्फ तुम' की हीरोइन प्रिया गिल, जिसने स्वेटर पर दीपक बनाकर संजय कपूर को भेजा था?

'सिर्फ तुम' के बाद क्या-क्या किया उन्होंने?

बॉलीवुड में सबसे बड़ा खान कौन है?

सबसे बड़े खान का नाम सुनकर आपका फिल्मी ज्ञान जमीन पर लोटने लगेगा. और जो झटका लगेगा तो हमेशा के लिए बुद्धि खुल जाएगी आपकी.

'कसौटी ज़िंदगी की' वाली प्रेरणा, जो अनुराग और मिस्टर बजाज से बार-बार शादी करती रही

कहां है टेलीविज़न का वो आइकॉनिक किरदार निभाने वाली ऐक्ट्रेस श्वेता तिवारी?

एक्ट्रेस मंदाकिनी आज की डेट में कहां हैं?

मंदाकिनी जिन्हें 99 फीसदी भारतीय सिर्फ दो वजहों से याद करते हैं

सर, मेरा सवाल है कि एक्ट्रेस मीनाक्षी शेषाद्री आजकल कहां हैं. काफी सालों से उनका कोई पता नहीं.

‘दामिनी’ के जरिए नई ऊंचाई तक पहुंचा मीनाक्षी का करियर . फिर घातक के बाद 1996 में उन्होंने मुंबई फिल्म इंडस्ट्री को बाय बोल दिया.

ये KRK कौन है. हमेशा सुर्खियों में क्यों रहता है?

केआरके इंटरनेट एज का ऐसा प्रॉडक्ट हैं, जो हर दिन कुछ ऐसा नया गंधाता करना रचना चाहता है.

एक्ट्रेस किमी काटकर अब कहां हैं?

एडवेंचर ऑफ टॉर्जन की हिरोइन किमी काटकर अब ऑस्ट्रेलिया में हैं. सीधी सादी लाइफ बिना किसी एडवेंचर के

चाय बनाने को 'जैसे पापात्माओं को नर्क में उबाला जा रहा हो' कौन सी कहानी में कहा है?

बहुत समय पहले से बहुत समय बाद की बात है. इलाहाबाद में थे. जेब में थे रुपये 20. खरीदी हंस...

सर आजकल मुझे अजीब सा फील होता है क्या करूं?

खुड्डी पर बैठा था. ऊपर से हेलिकॉप्टर निकला. मुझे लगा. बाबा ने बांस गहरे बोए होते तो ऊंचे उगते.