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वो 'अर्बन नक्सल' जिसके गुजर जाने पर नरेंद्र मोदी ने भी श्रद्धांजलि दी

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यह 1920 के आस-पास की बात है. 20 साल की कृष्णा बाई की जिंदगी झंझावातों से घिरी हुई थी. बचपन से डॉक्टर बनने के सपने देखने वाली कृष्णा बाई की घर वालों ने जबरदस्ती शादी करवा दी थी. मलेरिया और एनीमिया के चलते उनके पति ने दम तोड़ दिया और शादी के महज दो साल के भीतर कृष्णा विधवा हो गईं. उनके हाथ में एक लड़का था और उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि अब वो क्या करें.कृष्णा के ससुराल वालों ने कृष्णा से हाथ खींच लिया. पति के देहांत के बाद उनके ससुराल वाले उनसे महज एक बार मिलने आए थे वो भी शादी में मिले गहने वापिस लेने. कृष्णा के पास महज एक सोने का नैकलेस बचा था जिसे उनके पिता ने शादी के वक़्त दिया था. इस हार के जरिए जिंदगी काटना मुश्किल था. लिहाजा वो अपने पीहर लौट गईं. कृष्णा हमेशा से डॉक्टर बनना चाहती थी. अब उनकी यह इच्छा और ज्यादा मजबूत हो गई.

इस कठिन समय में कृष्णा को एक सहारा मिला. गांव से उनके देवर उनके पास मिलने आए. उन्होंने कृष्णा को बताया कि उनकी पहचान के एक डॉक्टर हैं जो कि बेलगाम में पोस्टेड हैं. कृष्णा को बेलगाम जाकर उनके अंडर नर्स की ट्रेनिंग कर लेनी चाहिए. कृष्णा ने कहा कि वो डॉक्टर बनना चाहती हैं. लेकिन उनके देवर ने उन्हें समझाया कि पहले जरुरी है कि उनके पास कोई रोजगार हो. आखिरकार कृष्णा बेलगाम चली गईं. जिस डॉक्टर के अंडर में उन्हें एक साल ट्रेनिंग लेनी थी उनका नाम था रघुनाथ कर्नाड. 22 साल की विधवा औरत के लिए नई जगह पर गुजारा करना आसान नहीं था. उन्होंने अपनी यह समस्या डॉक्टर कर्नाड के सामने रखी. डॉक्टर कर्नाड ने उनसे कहा कि वो चाहें तो उनके घर रह सकती हैं.

गिरीश कर्नाड की मां कृष्णा बाई. गिरीश पर अपनी मां का गहरा असर रहा. सारस्वत ब्राह्मण परिवार से आने वाली कृष्णा ने अपने दौर के समाजिक प्रतिबंधों को धता बताते हुए अपनी पसंद से दूसरी शादी कर ली थी.
गिरीश कर्नाड की मां कृष्णा बाई. गिरीश पर अपनी मां का गहरा असर रहा. सारस्वत ब्राह्मण परिवार से आने वाली कृष्णा ने अपने दौर के समाजिक प्रतिबंधों को धता बताते हुए अपनी पसंद से दूसरी शादी कर ली थी.

डॉक्टर कर्नाड की उम्र उस समय 35 साल थी. वो कृष्णा से 12 साल बड़े थे और शादीशुदा थे. उनकी बीवी लम्बे समय से बीमार चल रही थीं. इस बीच कृष्णा और डॉक्टर कर्नाड के बीच इश्क हो गया. यह 1930 के आसपास की बात है. कृष्णा बिना शादी के लगभग पांच साल डॉक्टर कर्नाड के घर रहीं. इस चीज ने उन्हें आसपास के इलाके में काफी बदनाम कर दिया. आखिरकार दोनों लोगों ने फैसला किया कि वो शादी कर लेंगे. कृष्णा ने डॉ. कर्नाड के सामने शर्त रखी कि वो शादी के बाद बेलगाम छोड़कर किसी दूसरी जगह पर बस जाएंगे ताकि उनके नाम के साथ चिपकी बदनामी से बचा जा सके. आखिरकार दोनों ने बॉम्बे जाकर शादी कर ली. इसके बाद डॉ. कर्नाड ने खुद का तबादला बगलकोट नाम के छोटे से कस्बे में करवा लिया.

चौथे बच्चे की जरूरत नहीं

कृष्णा की जिंदगी बड़ी मुश्किल से पटरी पर लौटी थी. शादी के बाद उन्होंने दो बच्चों को जन्म दिया. पहली शादी से उन्हें एक बेटा था. इस तरह कर्नाड दंपती के पास तीन बच्चों की जिम्मेदारी थी. इस बीच कृष्णा एक और बार गर्भवती हो गईं. उन्होंने अपने पति को समझाया कि उन्हें एक और बच्चे की जरूरत नहीं है. कर्नाड दंपती ने तय किया कि वो लोग डॉक्टर के पास जाएंगे और अबॉर्शन करवा लेंगे.

पहले तय कार्यक्रम के अनुसार दोनों डॉक्टर मधुमालती गुणे के क्लीनिक पर पहुंचे. लेकिन डॉ. गुणे कहीं बाहर गई हुई थीं. दोनों ने काफी देर उनका इंतजार किया लेकिन वो आई नहीं. आखिरकार कृष्णा बाई परेशान हो कर घर चली आईं. जिस बच्चे को वो पेट में ही खत्म करवा देना चाह रही थीं उसने आखिरकार जन्म लिया. तारीख थी 13 मई 1939. कर्नाड दंपती ने इस बच्चे का नाम रखा, ‘गिरीश’.

सिरसी का किस्सागो

1945 में दूसरा विश्व युद्ध खत्म हुआ और इसी साल डॉ. कर्नाड की सरकारी सेवाओं की मियाद थी. 1945 के साल में ही उन्हें रिटायर होना था लेकिन वो एक्सटेंशन चाह रहे थे. ऐसे में उन्हें उत्तर कन्नड़ा के सिरसी में भेज दिया गया. यह जगह घने जंगल से घिरी हुई थी और यहां उस दौर में मलेरिया का प्रकोप भी बहुत हुआ करता था. उस समय सिरसी में नियुक्ति को ‘पनिशमेंट पोस्टिंग’ कहा जाता था. यह पिछड़ा हुआ इलाका था जहां बिजली तक नहीं थी.

डॉ. कर्नाड अपने परिवार को लेकर यहां आ गए. गिरीश उस समय महज 6 साल के थे. उनकी शुरूआती पढ़ाई सिरसी में ही शुरू हुई. यह सिरसी का असर था कि गिरीश आगे जाकर कहानियां और नाटक गढ़ पाए. दूरदर्शन को दिए एक इंटरव्यू में वो कहते हैं-

“क्योंकि सिरसी में बिजली नहीं थी तो वहां दिन जल्दी ढल जाता था. शाम को नीम अंधेरे में बच्चे बैठकी लगाते थे और अपने साथ हुई घटनाएं बताते थे. घर पर वक़्त बिताने के लिए दादी मां की कहानियां ही आपका एक मात्र सहारा थीं. हर आदमी के पास कहने के लिए किस्से होते थे. हम ऐसे माहौल में पले-बढ़े जहां हवाओं में कहानियां तैरा करती थीं और इसने मेरे भीतर गहरी पैठ जमा ली.”

गिरीश कर्नाड के माता-पिता मराठी मूल के थे और उनकी मराठी रंगमंच में गहरी दिलचस्पी थी. डॉ. कर्नाड नाटक देखने का कोई भी मौक़ा अपने हाथ से निकलने नहीं देते थे. सिरसी एक छोटा सा कस्बा था. जब कोई नाटक कंपनी वहां आती तो शहर के गणमान्य लोगों को मुफ्त में नाटक देखने का पास दिया जाता. डॉ. कर्नाड को अपनी पैठ का फायदा मिलता और हर नाटक का फ्री पास उनके पास आ जाता. गिरीश का बचपन नाटक देखते हुए बीता था. इसके अलावा कन्नड़ रंगमंच की एक और विधा का गिरीश पर गहरा असर था. यह विधा थी यक्षगान की. यक्षगान क्लासिकल संस्कृत नाटकों का कन्नड़ संस्करण था. इसमें कहानी गाकर सुनाई जाती. यह कन्नड़ संगीत और कुचीपुड़ी नाच का अद्भुत संगम होता है. सिरसी ने गिरीश के अंदर किस्सों के बीज बोए.

17 साल की उम्र में गिरीश कर्नाड को स्कैच बनाने का चस्का था.
17 साल की उम्र में गिरीश कर्नाड को स्कैच बनाने का चस्का था.

17 साल का स्केच आर्टिस्ट

17 साल की उम्र में गिरीश कर्नाड की दिलचस्पी स्कैच बनाने की हो गई. वो अपने उस दौर के बड़े-बड़े कलाकारों के स्कैच बनाते थे. इन स्कैच को वो उन कलाकारों के पास भेजते और इन पर उनका ऑटोग्राफ मांगा करते. कई कलाकार और सेलेब्रिटी उन्हें ऑटोग्राफ करके भेज भी देते. गिरीश की नाटकों में शुरुआत से ही दिलचस्पी थी. लिहाजा उन्होंने ऐसा ही एक स्कैच अपने पसंदीदा आयरिश नाटककार शॉन ओ’केसी को भेजा. गिरीश के स्कैच के जवाब में शॉन ओ’केसी ने उन्हें लिखकर भेजा कि लोगों का ऑटोग्राफ लेने के चक्कर में अपना वक्त जाया मत करो. खुद कुछ ऐसा करो कि लोग तुम्हारा ऑटोग्राफ लें. कैसी के इस खत के बाद गिरीश ने यह काम बंद कर दिया.

धारवाड़ का नाटककार

गिरीश अपने दौर के हर युवा की तरह पढ़ाई के लिए बाहर जाना चाह रहे थे. लेकिन उनके पिता की आर्थिक स्थिति ऐसी थी नहीं कि वो उन्हें विदेश भेज सकें. ऐसे में विदेश जाने का एक ही जरिया था. बाहर पढ़ाई के लिए कोई वजीफा मिल सके. गिरीश का मन कन्नड़ और इतिहास पढने का था. लेकिन वजीफे के लिए पहले दर्जे से ग्रेजुएशन पास करना जरुरी था. गणित ऐसा विषय था जिसमें अच्छे नंबर मिलते थे. इसी उधेड़बुन में गिरीश धारवाड़ के कर्नाटक कॉलेज गए और मैथ्स (ऑनर्स) में दाखिला ले लिया.

गिरीश कॉलेज में गणित पढ़ रहे थे लेकिन दिमाग से साहित्य का भूत उतरा नहीं था. कॉलेज के कॉरिडोर में घुमाते हुए वो सोचा करते कि किसी दिन वो शेक्सपीयर और टीएस ईलियट के दर्जे के कवि बनेंगे. लेकिन कविता उनसे बन नहीं रही थी. वो घंटों शब्दों के नट कसते लेकिन कुछ भी हासिल नहीं होता. उनके पिता चाहते कि गिरीश यह सब कला-वला का चक्कर छोड़कर आईएस की तैयारी करें. पिता की नजर में गिरीश की सोहबत खराब हो गई थी. वो कवि, नाटक लिखने वाले लोगों के साथ उठने-बैठने लगे थे.

दत्तात्रेय बेंद्रे के साथ गिरीश कर्नाड.
दत्तात्रेय बेंद्रे के साथ गिरीश कर्नाड.

इस बीच धारवाड़ में गिरीश को अपने ही जैसा एक और आदमी मिल गया. नाम था कीर्तिनाथ कुर्तकोटे. कीर्ति और गिरीश की उम्र में 12 साल का अंतर था. कीर्ति ने उनसे 10 साल पहले ग्रेजुएशन की थी. आगे की पढ़ाई के लिए पैसा नहीं था तो पैसे जुटाने के लिए खुद पढ़ाने लगे. कुछ पैसा जुटाकर वो फिर से धारवाड़ लौटे. आगे की पढ़ाई करने के लिए. उन्हीं के जरिए गिरीश धारवाड़ में दो लोगों से मिले. पहले आदमी थे दत्तात्रेय बेंद्रे. बेंद्रे कन्नड़ भाषा के जाने-माने कवि थे. दोनों लोग अक्सर उनसे मिलने जाया करते. करीब घंटे भर साथ बैठने के बाद बेंद्रे अपने बेटे को मराठी में चीनी लाने के लिए कहते. इसका मतलब होता कि अब विदा लेने का समय आ गया है. गिरीश बेंद्रे के घर से चीनी चबाते हुए अपने दूसरे अड्डे पर पहुंचते. धारवाड़ के सुभाष रोड पर बनी एक दुकान, ‘मनोहर ग्रंथमाला’.

जीबी जोशी उस समय मनोहर ग्रंथमाला के मालिक हुआ करते थे. सुभाष रोड उस समय धारवाड़ की मॉल रोड हुआ करती थी. शाम के वक्त यहां पर कॉलेज के लड़के-लड़कियां घूमने आया करते थे. गिरीश अक्सर शाम के वक्त टहलते हुए मनोहर ग्रंथमाला पहुंच जाते. जीबी जोशी से उनकी ठीक पटरी खाने लगी.

इस बीच गिरीश अपनी पहली योजना में कामयाब हो गए. उन्होंने अपनी ग्रेजुएशन फर्स्ट क्लास पास की थी. 1902 में एक अंग्रेज व्यापारी जॉन रोड ने अपने नाम से एक वजीफा शुरू किया था. इस वजीफे का मकसद था ब्रिटिश कॉमनवेल्थ के देशों के अच्छे छात्रों को ऑक्सफ़ोर्ड में पढने का मौक़ा देना. गिरीश को यह वजीफा 1960 में मिल गया. अब उनके ऑक्सफ़ोर्ड जाने का रास्ता खुल चुका था. इस बीच एक दिन उन्होंने कागज पर कुछ लिखना शुरू किया. बाद के इंटरव्यू में गिरीश याद करते हैं-

“मैं कविता लिखने की कोशिश करता लेकिन वो मुझसे हो नहीं पा रहा था. एक रोज़ मुझे नाटक लिखने की सूझी. मैंने नाटक लिखना शुरू किया. यह अचानक से मेरे भीतर से बह निकला था. मुझे ऐसा लग रहा था कि रंगमंच मेरे सामने खुला हुआ है और हर किरदार अपने आप बोल रहा है. मैं एक स्टेनोग्राफर की तरह उस किरदार के डायलॉग लिखता जा रहा था. मैंने इंग्लैंड जाने से पहले इस नाटक की पाण्डुलिपि जीबी जोशी को दी. जोशी दो दिन बाद मुझे मिले और कहा कि इस नाटक में जो तुमने दासी का मोनोलॉग लिखा है वो अच्छा है. बात यहीं खत्म हो गई.

ऑक्सफ़ोर्ड में पढ़ाई के एक साल बाद मेरे पास कीर्तिनाथ का खत आया कि तुमने जो नाटक भेजा था उसकी स्क्रिप्ट फिर से भेजो. मैंने नए सिरे से स्क्रिप्ट लिखी और उन्हें भेज दी. इस तरह से मेरा पहला नाटक ‘यायाति’ छपा. उस समय मेरी उम्र महज 22 साल थी. पूरी जिंदगी मैंने इतने नाटक लिखे लेकिन ययाति की तरह कोई नाटक खुले रंगमंच की तरह मेरे सामने नहीं आया. ययाति मेरे भीतर से निकला था. “

सनकी बादशाह की गवाही

साल 1962. गिरीश ऑक्सफ़ोर्ड में अपने MA की पढ़ाई कर रहे थे. इस दौरान उन्होंने बहुत सारी वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में भाग लिया. ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी की डिबेटिंग सोसाइटी को ऑक्सफ़ोर्ड यूनियन के नाम से जाना जाता है. ऑक्सफ़ोर्ड की छात्र यूनियन से इसका कोई लेना-देना नहीं है. 1823 में बनी ये यूनियन, बहस के इतर अक्सर दुनिया के नाम-गिरामी लोगों को अपने यहां लेक्चर के लिए आमंत्रित करती है. 1962 में गिरीश ऑक्सफ़ोर्ड यूनियन के अध्यक्ष बनाए गए. इस दौर में उन्होंने विंस्टन चर्चिल को ऑक्सफ़ोर्ड में बोलने के लिए आमंत्रित किया था.

यूनिवर्सिटी में रहने के दौरान गिरीश अपने करीबी दोस्त और कन्नड़ साहित्य के आलोचक कीर्तिनाथ कुर्तकोटे की एक किताब पढ़ रहे थे. कुर्तकोटे ने कन्नड़ रंगमंच की आलोचना करते हुए लिखा था कि कन्नड़ रंग मंच में अंग्रेजी थियेटर की तरह इतिहास पर आधारित एक भी नाटक नहीं है. कर्नाड ने इसे चुनौती की तरह लिया. वो कहते हैं-

“कुर्तकोटे की आलोचना पढने के बाद मैंने भारत के इतिहास की किताबें उठा लीं और मोहनजोदड़ो से भारत का इतिहास पढ़ना शुरू किया. पढ़ते-पढ़ते मैं मोहम्मद तुगलक तक पहुंचा. उसी समय मुझे लगा कि यह बहुत दिलचस्प किरदार है. मुझे इस पर नाटक लिखना चाहिए. इसके बाद मैंने मोहम्मद तुगलक पर हर किताब पढ़ी. मैंने बरनी को पढ़ा, इब्ने बतूता को पढ़ा. ढेर सारे तथ्य जुटाए और उसके बाद यह नाटक लिखा. जब मैं ऑक्सफ़ोर्ड से भारत लौट रहा था, उस समय मेरे हाथ में मेरे नाटक ‘तुगलक’ का पहला ड्राफ्ट तैयार था.”

जब मां के हाथ लगा प्रेमपत्र

आजादी के बाद तमाम भारतीय भाषाओं में नए सिरे से साहित्य लिखा जा रहा था. खास तौर पर थियेटर में नए प्रयोग हो रहे थे. इसके पहले जो नाटक भारतीय भाषाओं में हो रहे थे वो सदियों पहले लिखे गए थे. बंगाल में बादल सरकार, मराठी में विजय तेंदुलकर, हिंदी में मोहन राकेश रंगमंच पर नई कहानियां गढ़ रहे थे. इसे बाद में भारतीय रंगमंच का पुनर्जागरण काल कहा गया. गिरीश के एक नाटक ने उन्हें इस श्रेणी में ला खड़ा किया. गिरीश कर्नाड जब ब्रिटेन से भारत लौटे तब तक कन्नड़ साहित्य में उनकी काफी पहचान बन चुकी थी. ययाति बहुत जबरदस्त हिट था.

इस बीच गिरीश के जीवन में एक दिलचस्प घटना हुई. गिरीश के घर में खाना बनाने वाली एक लड़की ने गिरीश को एक प्रेम पत्र लिखा. गिरीश ने यह खत पढ़ा और अपनी दराज में रखकर कहीं शूट पर चले गए. जब वो घर लौटे तो वो खत उनकी दराज में नहीं था. वो परेशान हो गए. उन्होंने अपनी मां से जाकर पूछा कि क्या आपने मेरी दराज से कोई खत उठाया क्या? उनकी मां का जवाब था, “कहीं तुम उस लड़की के प्रेम पत्र के बारे में बात तो नहीं कर रहे? इस उम्र में लड़कियां किसी के भी इश्क में पड़ जाती हैं. इसमें कुछ भी अजीब नहीं है. तुमने वो खत अपने पास क्यों संभाल कर रखा? ताकि तुम उसे ब्लैकमेल कर सको? मैंने वो खत उसे लौटा दिया.”

मुझे पैसे कमाने हैं

1970 के साल में गिरीश नाटक से फिल्मों की तरफ बढे. 1970 में उन्होंने अपने जिंदगी की पहली फिल्म की. नाम था संसार. यह फिल्म कन्नड़ लेखक यू. आर. अनंतमूर्ति के उपन्यास पर आधारित थी. इस फिल्म का स्क्रीन प्ले भी कर्नाड ने ही लिखा था. पट्टाभि रामा रेड्डी ने इस फिल्म का निर्देशन किया था. इस फिल्म को कन्नड़ सिनेमा की श्रेणी में प्रेसिडेंट्स गोल्डन अवॉर्ड भी मिला था. 1971 के साल में कर्नाड निर्देशन के क्षेत्र में उतरे. उन्होंने कन्नड़ लेखक एस. एल. भैरप्पा के उपन्यास पर आधारित फिल्म ‘वंश वृक्ष’ का निर्देशन किया. इस फिल्म ने बेस्ट डायरेक्शन की श्रेणी में नेशनल फिल्म अवॉर्ड जीता.

अपनी पत्नी सरस्वती गोपीनाथ के साथ गिरीश कर्नाड.
अपनी पत्नी सरस्वती गोपीनाथ के साथ गिरीश कर्नाड.

हिंदी फिल्मों में कर्नाड के आने का किस्सा दिलचस्प है. कर्नाड इस दौर में अमेरिका में रहने वाली डॉ. सरस्वती गोपीनाथ के साथ इश्क में थे. उन्होंने सरस्वती को शादी के लिए प्रपोज किया. सरस्वती ने उनसे कहा कि अगर वो अमेरिका से भारत लौट आती हैं तो क्या कर्नाड के पास गृहस्थी चलाने के लिए पर्याप्त पैसा है? जवाब में गिरीश ने कहा कि उन्होंने सोचा था कि सरस्वती डॉक्टर हैं और उनके पास पैसा होगा. इस पर सरस्वती ने जवाब दिया कि उन्होंने सोचा था कि गिरीश इतने बड़े डॉक्टर हैं और उनके पास घर चलाने लायक पैसा तो होगा ही. कुल मिलाकर पैसा दोनों के पास नहीं था. ऐसे में कर्नाड ने तय किया कि वो बॉलीवुड में जाएंगे और पैसा कमाएंगे. उनकी श्याम बेनेगल के साथ अच्छी पटरी बैठती थी. श्याम बेनेगल के साथ उन्होंने कई फिल्मों में काम किया. 1975 में उनकी पहली हिंदी फिल्म निशांत आई. 1976 में उन्होंने श्याम बेनेगल के साथ गुजरात के दूध उत्पादन में आई क्रांति पर आधारित एक फिल्म मंथन की. इस फिल्म वो एक आदर्शवादी युवा डॉक्टर की भूमिका में थे.

बैंगलोर का अर्बन नक्सल

1998 में ज्ञानपीठ अवॉर्ड मिलने के बाद गिरीश कर्नाड ने दूरदर्शन को एक इंटरव्यू दिया था. इस दौरान जब उनसे उनके राजनीतिक रुझान के बारे सवाल किया गया था तो गिरीश कर्नाड ने जवाब में कहा था,

“मुझे जिस तरह का सम्मान, जिस तरह की पहचान इस देश ने दी, मुझे लगता है कि इस देश के प्रति मेरा भी उत्तरदायित्व है. मैं खास किस्म की राजनीति और खास किस्म के मुद्दों को लेकर बहुत सक्रिय हूं. खास तौर पर सांप्रदायिक राजनीति का मैंने भरसक विरोध किया. इसके चलते मेरे घर पर पत्थर फेंके गए. गुंडों ने मुझे धमकाने की कोशिश भी की. लेकिन मुझे महसूस होता है कि सेकुलरिज्म हमारी सबसे महान विरासत है और हमें इसके लिए लड़ना पड़ेगा. बदकिस्मती से पिछले 10-15 सालों में यह कमजोर हुआ है. देश में कुछ ताकतें हैं जो इसे खत्म करके इस देश को खतरनाक जगह में तब्दील करने में लगी हुई हैं.”

 

गिरीश कर्नाड के नाटकों और फिल्मों पर नेहरु के समाजवाद की झलक बहुत साफ थी. कर्नाड अपनी उम्र के आखिरी पड़ाव में भारत की सांस्कृतिक विविधता और संविधान के पक्ष में खड़े रहे. इस वजह से उन्होंने दक्षिणपंथी हिंदूवादी संगठनों को काफी असहज किया. पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या की जांच में SIT को आरोपियों के पास एक डायरी हाथ लगी. इसमें गिरीश कर्नाड का नाम उनकी हिट लिस्ट में पहले नंबर पर लिखा हुआ था जबकि गौरी का नाम दूसरे नंबर था. सितंबर 2018 में गिरीश, गौरी की पहली पुण्यतिथि पर हुए कार्यक्रम में बीमार होने के बावजूद शामिल होने आए. इस समय उन्होंने अपने गले में एक तख्ती टांग रखी थी. इस पर लिखा था, “Me Too Urban Naxal”.इससे कुछ दिन पहले ही सात सामाजिक कार्यकर्ताओं को महाराष्ट्र पुलिस ने अर्बन नक्सल होने के आरोप में गिरफ्तार किया था. इस मौके पर गिरीश ने कहा था-

“आज के दौर में जो नक्सली या आतंकवादी कर रहे हैं उससे ज्यादा डरावना है जो पुलिस कह रही है. तर्कवादियों के खिलाफ लगाए गए आरोप बेतुके हैं. यह तर्कसंगत बात नहीं है. यह डरावना है क्योंकि उन लोगों को लगता है कि जो वो करना चाहते हैं कर सकते हैं. अगर अपनी बात कहना नक्सल होना है तो मैं भी अर्बन नक्सल हूं. मुझे गर्व है कि मैं उनकी हिट लिस्ट में हूं.”

यही गिरीश कर्नाड थे. उम्र के आखिरी दौर में अपने मूल्यों के लिए लड़ता एक कलाकार.10 जून 2019 को गिरीश कर्नाड इस दुनिया से रुखसत हुए. उनका जाना भाषाओं में आजादी के बाद आए पुनर्जागरण के आखिरी दूत का जाना है.


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