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कभी विधायकी भी न जीत पाने वाले रामनाथ कोविंद ने जीता राष्ट्रपति चुनाव

नरेंद्र मोदी और अमित शाह की अगुवाई वाली बीजेपी की बदलती प्राथमिकताओं और राजनीति का संकेत उनके राष्ट्रपति उम्मीदवार की घोषणा से मिल गया था. तमाम मीडिया रिपोर्ट्स और ढेर सारे नामों की अटकलों को धता बताते हुए बीजेपी ने पार्टी के वरिष्ठ दलित चेहरे रामनाथ कोविंद को NDA का प्रेसिडेंट कैंडिडेट घोषित किया था. अब कोविंद ये चुनाव जीतकर देश के 14वें राष्ट्रपति चुन लिए गए हैं.

वैसे कोविंद के नाम की घोषणा बीजेपी के अप्रत्याशित कदम के तौर पर देखी जा रही थी. वो यूपी के कोली समाज से ताल्लुक रखते हैं, जो अनुसूचित जाति में आता है. दो बार राज्यसभा सांसद रह चुके कोविंद बीजेपी के पुराने दलित चेहरे हैं. बिहार के राज्यपाल के तौर पर उनकी नियुक्ति को बीजेपी के जातिगत दांव के तौर पर डिकोड किया गया था.

रामनाथ के नाम की घोषणा इसलिए भी खास थी, क्योंकि इससे पहले बीजेपी ने राष्ट्रपति पद के लिए अपनी तरफ से कभी किसी दलित चेहरे को आगे नहीं किया.

आइए जानते हैं रामनाथ कोविंद के बारे में और:-

वकालत से शुरू हुआ करियर गवर्नर पद तक पहुंचा

1945 में कानपुर देहात के परौख गांव में जन्मे रामनाथ ने बी.कॉम के बाद LLB किया और फिर सुप्रीम कोर्ट के वकील के तौर पर अपना करियर शुरू किया. 1977 में इमर्जेंसी हटने के बाद जब चुनाव हुआ, तो जनता पार्टी ने कांग्रेस को गद्दी से हटा दिया. जनता पार्टी की तरफ से मोरार जी देसाई प्रधानमंत्री बने और कोविंद उनके निजी सचिव. यही वो वक्त था, जब कोविंद बीजेपी नेतृत्व के संपर्क में आए. अगले चुनाव में कांग्रेस और ताकत के साथ वापस आई और जनता पार्टी की सरकार चली गई, लेकिन कोविंद का रास्ता तय हो चुका था.

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लोकसभा चुनाव हारे, लेकिन बीजेपी में हमेशा कृपापात्र रहे कोविंद

1980 से 1993 तक कोविंद सुप्रीम कोर्ट के स्थायी वकील रहे, लेकिन उनकी लाइम-लाइट वाली राजनीति 1990 में शुरू हो गई थी. 1991 में पार्टी ने उन्हें घाटमपुर से लोकसभा का टिकट दिया, लेकिन कोविंद चुनाव हार गए. घाटमपुर रिजर्व सीट थी, जिस पर जनता दल के केशरी लाल 1,39,560 वोटों के साथ पहले नंबर पर रहे, जबकि रामनाथ कोविंद 95,913 वोटों के साथ दूसरे नंबर पर रहे. राम मंदिर की लहर के बावजूद कोविंद चुनाव नहीं जीत पाए. हालांकि, दलित समुदाय को साधे रखने के लिए पार्टी ने तीन साल बाद 1993 में उन्हें राज्यसभा भेज दिया.

1991 में बीजेपी राम मंदिर के माहौल में यूपी की सत्ता में आई थी. 1993 में बीजेपी ने फिर सबसे ज्यादा सीटें जीतीं, लेकिन यादव और दलित वोटबैंकों के ठेकेदार एसपी-बीएसपी ने मिलकर सरकार बना ली. हालांकि, 1996 में बीजेपी ने बीएसपी के साथ गठबंधन कर लिया था, जिसके बाद 1999 में कोविंद को दूसरी बार राज्यसभा भेजा गया.

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दलित होने का फायदा-नुकसान सब कोविंद को

90 के दशक में जब बीजेपी की छवि कट्टर सवर्णवादी पार्टी की मानी जाती थी, तब भी पार्टी दलितों के बीच जगह बनाने की कोशिश कर रही थी. इसका जो भी फायदा और नुकसान हुआ, वो सब कोविंद को मिला. 1998 से 2002 तक वो बीजेपी के एससी-एसटी मोर्चे के अध्यक्ष रहे. सुप्रीम कोर्ट का वकील होने की वजह से वो एक पढ़े-लिखे दलित होने के नाते बीजेपी की समावेशी राजनीति के खांचे में फिट होते रहे. 2012 में यूपी चुनाव के दौरान राजनाथ सिंह ने दलित इलाकों में मायावती के खिलाफ माहौल बनाने के लिए कोविंद से ही कैंपेनिंग कराई. कोविंद राजनाथ के करीबी भी माने जाते हैं.

केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह
केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह

हालांकि, कोविंद को जब-जब तवज्जो मिली, पार्टी का सवर्ण काडर हमेशा नाराज हुआ. कोविंद के बारे में पार्टी के सवर्ण नेताओं की धारणा ये थी कि प्रभावी बनने पर वह भी कल्याण सिंह की तरह बार-बार पार्टी छोड़ते रहेंगे. कोविंद के बारे में बैकफायर का डर बीजेपी को हमेशा रहा है, लेकिन अभी तक वो हमेशा पार्टी के साथ ही दिखे हैं. इनकी कमजोरी यही है कि इनके पास दूसरे समुदायों के नेताओं का सपोर्ट नहीं है.

विधायकी के चुनाव में तो तीसरे नंबर पर थे, आज प्रेसिडेंट

2006 में जब कोविंद का बतौर राज्यसभा सांसद दूसरा कार्यकाल भी खत्म हो गया, तो पार्टी ने उन्हें सक्रिय राजनीति में बनाए रखने के लिए 2007 में भोगनीपुर से विधानसभा चुनाव लड़ाया. इस चुनाव के समय कोविंद की उम्र 60 साल थी. उन्हें 26,549 वोट मिले थे, जबकि उनकी ही उम्र के 61 साल के रघुनाथ प्रसाद बीएसपी से लड़ रहे थे. 36,829 वोट हासिल करने वाले प्रसाद इस चुनाव में विजेता रहे. दूसरे नंबर पर सपा की अरुण कुमारी रहीं, जिन्हें 33,731 वोट मिले थे. बताते हैं कि उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव में उरई-जालौन से टिकट की गुजारिश की थी, लेकिन पार्टी ने उन्हें कैंडिडेट नहीं बनाया.

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बिहार के गवर्नर बने तो सवाल उठा, ‘कौन रामनाथ’

नवंबर 2014 में डीवाई पाटिल का कार्यकाल खत्म होने के बाद बिहार के नए गवर्नर की नियुक्ति में काफी वक्त लगा. इस बीच पश्चिम बंगाल के गवर्नर केशरीनाथ त्रिपाठी ने बिहार का प्रभार संभाला. आखिरकार 8 अगस्त, 2015 को जब कोविंद के नाम की घोषणा हुई, तो बिहार के नेताओं की तरफ से पहला रिएक्शन आया, ‘कौन रामनाथ?’ आरजेडी और जेडीयू छोड़िए, खुद बिहार बीजेपी के कई नेता कोविंद को नहीं जानते थे. इनकी नियुक्ति से नीतीश नाराज भी हुए थे, क्योंकि उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई थी. उन्हें मीडिया रिपोर्ट्स के जरिए कोविंद की नियुक्ति का पता चला. हालांकि, बाद में दोनों के बीच सब सामान्य होने की खबरें आईं.

एक कार्यक्रम में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और बिहार के सीएम नीतीश कुमार के साथ राम नाथ कोविंद
एक कार्यक्रम में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और बिहार के सीएम नीतीश कुमार के साथ राम नाथ कोविद

नेता हैं, तो गुरबत के किस्से भी खूब होंगे

बीजेपी से जुड़े सूत्र बताते हैं कि राज्यसभा सांसद बनने से पहले उन्होंने दिल्ली के कालीबाड़ी में लंबा समय बिताया. तब वो किराए के मकान में रहते थे और बहुत कम में गुजर-बसर करते थे. कोविंद ऐसे नेता माने जाते हैं, जो विवादों से यथासंभव दूर रहते हैं. शायद यही वजह रही कि पार्टी का राष्ट्रीय प्रवक्ता रहते हुए भी वो कभी टीवी पर नहीं आए.

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जब लालू के बड़े बेटे तेज प्रताप को मंच से टोका था

2016 में हुए हुए बिहार विधानसभा चुनाव में आरजेडी और जेडीयू के गठबंधन ने जीत दर्ज की थी. इसके बाद जब पटना के गांधी मैदान में शपथ-ग्रहण समारोह चल रहा था, तो लालू के बड़े बेटे तेज प्रताप तीसरे नंबर पर शपथ लेने पहुंचे. शपथ के दौरान उन्हें ‘अपेक्षित’ कहना था, लेकिन वो ‘उपेक्षित’ कह गए. इस पर रामनाथ ने उन्हें टोका और दोबारा शपथ दिलवाई. देखिए इसका वीडियो-


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