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चल रहा है भारतीय राजनीति का सबसे मजबूत स्त्रीकाल

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सावजराज सिंह
सावजराज सिंह

भारत का सुदूर पश्चिमी सिरा, लखपत. गुजरात के सबसे अंतिम सिरे पर बसे गांव से आते हैं सावजराज सिंह. उजले कच्छ के रण से आने वाले उजली आत्मा के इंसान. इंसानों को पढ़ते हैं. समय की कहानी सुनाते हैं. इमारतों पर लिखी इबारतों का दस्तावेजीकरण अपनी स्मृति की किताब में करते हैं. पांच भाषाएं जानते हैं, लेकिन चुप्पी की जुबां सबसे बेहतर पढ़ते हैं. उन्होंने ‘ज्ञान’ हासिल करने के लिए हम सबकी तरह स्कूल का रास्ता नहीं चुना, मैक्सिम गोर्की की तरह जिन्दगी की खुली किताब ही उनका विश्वविद्यालय है.

गुजरात दिल्ली के लिए हाशिया है, और कहते हैं ‘दिल्ली ऊंचा सुनती है’. लेकिन गुजरात से दिल्ली की ओर की गई यात्राएं इतिहास में की गई यात्राएं भी हैं, और भविष्य में की गई यात्राएं भी. ये लोग राजधानी को देखने के लिए एक भिन्न आइना साथ लाते हैं. ये आते हैं, और इतिहास की कहानी सुनाते हुए कई बार इतिहास बदल भी देते हैं. सावजराज हमारे साथ जुड़े विशेष लेखक हैं. हमने उन्हें दिल्ली में ‘दूसरे गुजराती’ का उपनाम दिया है.

यह अक्षरों से बनी एक नई मोतियों की लड़ की शुरुआत है. उनके लिखे को हम ‘दूसरा गुजराती’ शीर्षक से आपको पढ़वाते रहेंगे.

इस ‘दूसरे गुजराती’ की पिछली तीन पोस्ट में हम उनकी नज़रों से दिल्ली शहर, उनकी स्मृतियों में बसा शहर लखपत और ईमान मालेकी के चित्र देख चुके हैं.

दिल्लगी-ए-दिल्ली : यहां से शहर को देखो

लखपत के लोग उम्मीद भरी नज़रों से उत्तर दिशा की ओर देखते हैं, क्या सिन्धु नदी वापस आएगी?

दूसरा गुजराती : जब कभी इन चित्रों से गुजरता हूं, घंटों इस लड़की को ताकता रहता हूं.

आज सावाजराज ने 5 राज्यों में आए चुनाव परिणामों की समीक्षा की है. पत्रकार के नजरिए से नहीं, यायावर की तरह.


चुनाव नतीजों पर समीक्षा

चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के विधानसभा चुनावों के नतीजे सामने आ गए हैं. सभी राज्यों में कांग्रेस पार्टी को भारी पटखनी झेलनी पड़ी है. नरेंद्र मोदी का कांग्रेस मुक्त भारत का नारा लोकसभा चुनावों के बाद सतत हर राज्य में नतीजों के बाद तेज गति से चरितार्थ होता जा रहा है. आसाम और केरल जैसे दो महत्वपूर्ण राज्यों में से उनकी सत्ता छीन ली गई है. यह बहुत कठिन और निराशाजनक समय है कांग्रेस के लिए. अब निश्चित तौर पर कांग्रेस आलाकमान को गहन बदलाव और चिंतन की जरूरत है. कांग्रेस को समझ लेना चाहिए कि अब गांधी परिवार के सुकान (कप्तानी) में कांग्रेस की नैया बीच मझधार डूब ही गई है, अब कांग्रेस के लिए केंद्रगामी बल से मुक्त होकर नई कैडर खड़ा करना अति आवश्यक हो गया है.

इन नतीजों में केरल के रास्ते वामपंथ को कुछ बल जरुर मिला है. लेकिन वहीं पं. बंगाल में वामपंथ स्पष्ट तौर पर कंगाल हो गया है. उधर आसाम में बीजेपी ने सत्ता पर काबिज होते हुए उत्तर-पूर्व की राजनीति में अपनी दस्तक दे दी है. इन राज्यों में भाजपा की यह पहली बार पेशकदमी है. तमिलनाडु और पं. बंगाल में भारतीय राजनीति की दोनों गॉडेस ममता बनर्जी और जयललिता ने अपनी दहाड़ से दूसरे दलों को बुरी तरह दस्त-परस्त करते हुए सत्ता बरकरार रखी है. यह भारतीय राजनीति का इंदिरा गांधी के बाद सबसे मजबूत स्त्रीकाल चल रहा है.


 

आसाम:

आसाम में बीजेपी को स्पष्ट रूप में बहुमत मिला है. यह भारतीय राजनीति की एक बड़ी राजनीतिक घटना हैं. नॉर्थ ईस्ट भारत में पहली बार किसी राज्य में बीजेपी की सरकार बनी है. यह नॉर्थ ईस्ट की राजकीय मानसिकता का बड़ा बदलाव है. यकीनी तौर पर बीजेपी ने वहां जो स्थानीय कैडर बना कर, स्थानीयता को महत्त्व देकर, चुनाव लड़ा जिसका फायदा हुआ. और यहां बीजेपी की सरकार बनी. अब बीजेपी शायद अगले सभी राज्यों में विधानसभा चुनाव मोदी के नाम पर नहीं पर स्थानीय कैडर के आधार पर लड़ेगी तो यह कोई अतिशयोक्ति भरा निर्णय नहीं होगा.

बीजेपी ने केन्द्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल को अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया था. सोनोवाल की साफ, युवा छवि और स्थानीय क्षेत्रों में मजबूत पकड़ तथा हेमंत बिश्व शर्मा के हिम्मत भरे साथ ने भाजपा को पहली बार यहां सत्ता का स्वाद चखाया है. कांग्रेसी मुख्यमंत्री तरुण गोगोई सरकार की असफलताएं इस कदर थीं कि आसाम की जनता तंग आ गई थी. सामाजिक, धार्मिक दंगों में गोगोई सरकार ने कुछ खास कार्रवाई नहीं की थी. आसाम की जनता नया विकल्प चाहती थी और जब भाजपा के रूप में एक नया विकल्प मिल रहा था तो जनता भाजपा की नाव में सवार हो गई. हालांकि एआईयूडीएफ (AIUDF) सरकार में किंग मेकर बनने का ख्वाब पाल रही थी पर भाजपा की आंधी में 13 सीटों तक ही सीमित रह गई.


 

केरल:

केरल में भी कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी है. 92 साल के बुड्ढे बब्बर शेर अच्युतानंद की बागडोर में वामपंथी दलों ने केरल के मैदान में बड़ी फतह हासिल की है. देश में जर्जर होते जा रहे वामपंथ के लिए यह एक राहत की सांस हैं. यहां पर बीजेपी खुद को तीसरे विकल्प के तौर पर प्रोजेक्ट कर रही थी. पर कुछ खास फायदा नहीं हुआ. भाजपा का वोट प्रतिशत कुछ बढ़ा जरूर है पर जिस तरह के दावे बीजेपी की ओर से किए जा रहे थे. वो पूर्ण रूप से विफल साबित हुए.

केरल में ओमान चांडी के नेतृत्व में यूडीएफ मोर्चा चुनाव लड़ रहा था. ओमान चांडी की सरकार भ्रष्‍टाचार के आरोपों से जूझ रही थी. और उसका ही खामियाजा उन्हें चुनाव में भुगतना पड़ा. चुनावों में यही भ्रष्टाचार का मुद्दा सबसे बड़ा मुद्दा भी रहा. केरल की जनता ने इसबार विश्वास दिखाया वामपंथ में. एलडीएफ का नेतृत्‍व वीएस अच्‍युतानंद कर रहे थे जो जनता से जमीनी स्तर पर जुडे हुए नेता हैं. समग्र चुनाव प्रचार के दौरान जनता की समस्याओं को लेकर जोर दे रहे थे और प्रजा ने उन्हें केरल की सत्ता सौंपी. भाजपा भी यहां तीसरे विकल्प के तौर पर प्रचार में लगा था पर प्रजा ने दगा दे दिया और सिर्फ अपना खाता खोलते हुए सिर्फ एक ही सीट से मन मनाना पड़ा. हालांकि की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यहां पांच सभाएं की थी. और एक विवादास्पद बयान में केरल की सोमालिया से समानता की थी पर फिर भी बीजेपी को ज्यादा हाथ कुछ न लगा.


 

पं. बंगाल:

एग्जिट पोल के आंकडों की साख रखते हुए ममता बनर्जी ने दुबारा पं. बंगाल में अपनी सत्ता सुनिश्चित कर ली है. इस बार राज्य में और मुख्य दल वामपंथ और कांग्रेस साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे थे और अंततः दोनों ही सिर्फ हाथ मलते रह गए, पर हाथ में पात के सिवा कुछ न लगा! बीजेपी भी इस बार खुद को सत्ता की दौड़ में मजबूत दावेदार बता रही थी पर उसे कुछ प्रतिशत वोट के इजाफे और कुछेक सीटों से ही संतोष करना पड़ा.

चुनाव के दौरान ओवरब्रिज के टूटने को मुद्दा बनाकर विपक्षी दलों ने उस समय ममता पर निशान साधकर जोरदार हमला जरुर किया था. पर बंगाली प्रजा ने अपना विश्वास मजबूती से दीदी में बनाए रखा. वामपंथ पं. बंगाल में इस कदर कमजोर हो गया था कि इसबार कांग्रेस के साथ गठबंधन किया था पर पं. बंगाल की जनता को रिझा न सके. वामपंथ की विडंबना तो देखिए कि जिस कांग्रेस के साथ गठबंधन किया है उससे भी कम सीटें मिली हैं. एक तरह से पूरी तरह पं. बंगाल में वामपंथ धराशायी हो गया है. इन चुनावों में भाजपा ने चुनाव प्रचार में काफी दमखम दिखाया था. और सुभाष चंद्र बोस के पौत्र के साथ सेलिब्रेटी सितारों के जरिये सेंध लगाने की कोशिश जरूर की पर कुछ सीटों से ज्यादा जोर नहीं दिखा पाए. हालांकि वोट प्रतिशत और सीटों में जरुर इजाफा हुआ है जो भाजपा की व्यक्तिगत तौर पर औपचारिक जीत भी है.


 

तमिलनाडु:

तमिलनाडु में इसबार कुछ एग्जिट पोल ने जयललिता की रवानगी के संकेत दिए जरुर थे. पर अम्मा ने अपनी सत्ता का खंभा गाड़े रखा और एग्जिट पोल की स्थिति करुणामय बना कर दी. यह पहली बार हुआ कि अम्मा ने लगातार दूसरी सेंचुरी जड़ी है. हालांकि अगली बार से अन्नाद्रमुक की सीटें इस बार जरुर कम हुई हैं. और डीएमके+ की सीटों में बढ़ोतरी हुई हैं पर सत्ता की डोर जयललिता से नहीं हथिया सके. बीजेपी यहां पर अपनी हालत में कोई खास सुधार नहीं कर पाई. हमेशा की तरह नादुरुस्त तबियत के साथ उसी हालत में खटिया पर लेटी पड़ी हुई नज़र आ रही है.

यहां मुकाबला सीधे तौर एआईएडीएमके और डीएमके, कांग्रेस और भाकपा गठबंधन के बीच था. दोनों मुख्य प्रतिद्वंदी दलों ने अपने चुनाव प्रचार में जनता की प्राथमिक जरुरतों को पूरा करने के वादे किए थे. पर तामिलजनों ने करुणानिधि एंड फैमिली और साथी पक्षों की फिर से अवगणना की. अम्मा ने गरीब और मध्यम वर्ग के लिए जो कुछ योजनाएं बनाई थी, उसका साफ-साफ असर चुनाव नतीजों में दिख रहा है. तमिलनाडु की जनता ने जरुरी बहुमत के साथ अम्मा को अगले पांच साल के लिए स्टेट का सरदार बना दिया है.


 

पुडुचेरी:

30 विधानसभा सीटों वाले केन्द्रशासित प्रदेश पुडुचेरी में इसबार तीन बार के मुख्यमंत्री एन. रंगास्वामी के नेतृत्व वाले कांग्रेस-डीएमके गठबंधन को कड़ी टक्कर देते हुए कांग्रेस और एआईएडीएमके का प्रयास रंग लाया. कांग्रेस को 17 सीटें मिलीं. चौथी बार एन. रंगास्वामी पुडुचेरी की सत्ता पर काबिज़ नहीं हो सके. इस बार अनाद्रुमक की वजह से नतीजों में बदलाव आया. रंगास्वामी की AINRC 8 सीटों पर ही सिमट गई.

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