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वो 7 सांसद, जो 2014 में चुनाव जीते, लेकिन कार्यकाल पूरा न कर सके

2019 वो साल जब मोदी सरकार के पांच साल पूरे हो जाएंगे. और फिर से लोकसभा चुनाव होंगे. लेकिन साल 2014 में चुनाव जीतकर संसद पहुंचे कुछ नेता अब हमारे बीच नहीं रहे. 16 सितंबर की रात को ही बीजेपी सांसद महंत चांदनाथ की मौत हो गई है. मौत ने उनकी कभी न खुलनी वाली नींद में सुला दिया. मौत एक सच है. रह जाते हैं तो सिर्फ इंसान के किस्से. और राजनीति में तो किस्से मरते भी नहीं, वो जिंदा रहते हैं. ये उन सांसदों की लिस्ट है, जो 2014 लोकसभा चुनाव जीतने के बाद अपने कार्यकाल के दौरान इस दुनिया से कूच कर गए.

1. महंत चांदनाथ : कैंसर की वजह से हुई मौत, 2014 में उनका वीडियो वायरल हुआ था

(मौत : 16 सितंबर 2017)

महंत चांदनाथ. राजस्थान के अलवर से बीजेपी सांसद थे. 61 साल के थे. दिल्ली के अपोलो हॉस्पिटल में उन्होंने आखिरी सांस ली. रोहतक में अस्थल बोहर मठ के महंत चांदनाथ कैंसर से पीड़ित थे. स्वास्थ्य ठीक न होने की वजह से महंत चांदनाथ ने बालकनाथ को 29 जुलाई 2017 को ही बाबा मस्तनाथ मठ का उत्तराधिकारी घोषित किया था. इस प्रोग्राम में यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ समेत बाबा रामदेव और अन्य कई राज्यों के महंत शामिल हुए थे.

महंत चांदनाथ पहली बार 2004 में राजस्थान की विधानसभा सीट से विधायक बने थे.
महंत चांदनाथ पहली बार 2004 में राजस्थान की बहरोड़ विधानसभा सीट से विधायक बने थे.

चांदनाथ 21 जून 1956 को दिल्ली के बेगमपुर में पैदा हुए. दिल्ली के हिन्दू कॉलेज से बीए ऑनर्स की पढाई पूरी करने के बाद डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की. महज़ 18 साल के थे, जब वो साधु बन गए थे. साल 2004 में पहली बार राजस्थान विधानसभा में एंट्री ली. बीजेपी के टिकट पर बहरोड़ से विधायकी का चुनाव जीते थे. 2014 में लोकसभा का चुनाव लड़ा. बीजेपी ने उन्हें राजस्थान की अलवर सीट से उमीदवार बनाया था. कांग्रेस के जितेंद्र सिंह को हराकर लोकसभा पहुंचे. चुनाव प्रचार के दौरान उनका एक वीडियो खूब वायरल हुआ था, जिसने उनकी मुश्किलें बढ़ा दी थीं.

हुआ ये था कि अलवर में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस थी. जिसमें महंत चांदनाथ और बाबा रामदेव मंच पर थे. इस दौरान चांदनाथ मंच पर लगे कैमरों को भूल गए और बाबा रामदेव से कहने लगे, ‘पैसे लाने में बहुत दिक्कत हो रही है, म्हारे पैसे भी पकड़े गए.’

2014 में चुनाव प्रचार के दौरान महंत चांदनाथ का बाबा रामदेव के साथ वीडियो वायरल हुआ था.
2014 में चुनाव प्रचार के दौरान महंत चांदनाथ का बाबा रामदेव के साथ वीडियो वायरल हुआ था.

ब्लैक मनी पर हल्ला बोलने वाले बाबा रामदेव महंत चांदनाथ की इस बात से सकपका कर रह गए. बाबा रामदेव को डर था कि कहीं यह बात कैमरे में कैद न हो जाए. रामदेव ने फुसफुसा कर मंच पर लगे कैमरों की तरफ महंत का ध्यान दिलाते हुए कहा, ‘मूर्ख हो क्या. जब माइक्रोफोन ऑन हो तब ऐसी बात नहीं करनी चाहिए.’

लेकिन तब तक देर हो चुकी थी. बातचीत कैमरे में रिकॉर्ड हो गई. और बाद में वायरल भी हो गई. जब महंत चांदनाथ से इस बारे में सवाल हुए तो उन्होंने इसे कोरी कल्पना बताया. कहा कि दरअसल वो अपनी नहीं कांग्रेस प्रत्याशी की बात कर रहे थे.

फ़रवरी 2017 में हरियाणा की एक अदालत ने उन्हें लैंड फ्रॉड केस में दोषी ठहराया. उन्हें एक साल की जेल की सज़ा सुनाई गई थी. इसके बाद उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुए थे. विपक्ष ने उनकी बर्खास्तगी की मांग की थी.

2. गोपीनाथ मुंडे : मंत्री बनने के 9 दिन बाद कार एक्सीडेंट में हुई थी मौत

(मौत : 3 जून 2014)

26 मई 2014 को केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश में नई सरकार बनी. महाराष्ट्र के कद्दावर नेता गोपीनाथ मुंडे को ग्रामीण विकास मंत्री बनाया गया था. मंत्री बनने के ठीक नौवें दिन 3 जून 2014 को सुबह 7 बजकर 20 मिनट पर दिल्ली में सड़क हादसा हुआ. उनकी कार में एक दूसरी कार ने टक्कर मारी, जिसमें मुंडे की मौत हो गई.

गोपीनाथ मुंडे
गोपीनाथ मुंडे 40 साल से बीजेपी से जुड़े थे.

महाराष्ट्र की राजनीति में बीजेपी का आधार माने जाते थे गोपीनाथ मुंडे. वे 40 साल से भारतीय जनता पार्टी से जुड़े थे और 34 साल से चुनकर आ रहे थे. विडंबना ही कहेंगे कि मुंडे उसी प्रमोद महाजन परिवार से थे, जो ऐसे दुर्भाग्यपूर्ण हादसों का शिकार होता रहा है. भांजी पूनम महाजन के सांसद और खुद के केंद्रीय मंत्री बनने से महाजन परिवार में जो रौनक लौटी थी, वह इस हादसे से एक झटके में वापस लौट गई थी.

22 अप्रैल 2006 को प्रमोद महाजन की उन्हीं के छोटे भाई प्रवीण महाजन ने गोली मार दी थी. 3 मई को अस्पताल में उन्हें मृत घोषित कर दिया गया था. प्रमोद और मुंडे पुराने दोस्त थे, बाद में दोनों रिश्तेदार बन गए थे. गोपीनाथ की शादी 21 मई 1978 को भाजपा नेता प्रमोद महाजन की बहन प्रज्ञा महाजन से हुई थी.

मुंडे महाराष्ट्र राजनीति में लंबे समय से एक्टिव थे. जनसंघ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से उनका रिश्ता बहुत पुराना था. 34 साल पहले 1980 में ही वह पहली बार विधायक बन गए थे. 1980 से 1985 और 1990 से 2009 तक वह विधायक रहे. इसके बाद वह लोकसभा चले गए. 1992 से 1995 तक वह महाराष्ट्र विधानसभा में विपक्ष के नेता रहे. 1995 में जब बीजेपी-शिवसेना की सरकार आई तो मुंडे को उपमुख्यमंत्री बनाया गया.

2009 में वह बीड संसदीय सीट से सांसद चुने गए. साल 2014 में लोकसभा चुनाव में भी वह इसी सीट से जीते. मुंडे की छवि एक जमीनी नेता की थी. वह राजनीतिक विरोधियों से भी अच्छे संबंध रखने के लिए जाने जाते थे. महाराष्ट्र के पिछड़े वर्ग में उनका अच्छा जनाधार माना जाता था. मुंडे पिछड़े मराठवाड़ा क्षेत्र के एक गरीब परिवार से ताल्लुक रखते थे. उन्हें राजनीति में भाजपा के दिवंगत नेता वसंतराव भागवत लेकर आए थे, जिन्होंने प्रमोद महाजन सहित कई अन्य नेताओं को राजनीति में पारंगत बनाया.

पीएम मोदी के साथ गोपीनाथ मुंडे
मोदी सरकार में गोपीनाथ मुंडे को ग्रामीण विकास मंत्री बनाया गया था..

गोपीनाथ मुंडे महाराष्ट्र में बीड जिले के नाथरा गांव में पैदा हुए. उनका जन्म वंजारी (जाति) के मध्यम वर्गीय किसान परिवार में हुआ था और उनके पिता पांडुरंग मुंडे और मां लिम्बाबाई मुंडे थीं. मुंडे के परिवार में पत्नी और तीन बेटियां पंकजा, प्रीतम और यशश्री हैं. पंकजा पलावे बीड जिले में परली विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व करती हैं. जो अभी महाराष्ट्र सरकार में महिला एवं बाल कल्याण मंत्री हैं.

गोपीनाथ मुंडे के मरने के बाद खाली हुई सीट पर उनकी दूसरी बेटी प्रीतम मुंडे ने उपचुनाव लड़ा और बीड लोकसभा सीट पर करीब सात लाख के रिकॉर्ड मतों से जीत हासिल की.

3. सांवर लाल जाट : अमित शाह की मीटिंग में दिल का दौरा पड़ा और गिर पड़े

(मौत : 9 अगस्त 2017 )

सांवरलाल जाट अजमेर से लोकसभा सांसद थे. 62 साल की उम्र में 9 अगस्त 2017 को उनकी मौत हो गई. 1 जनवरी 1955 में राजस्थान के अजमेर जिले के गोपालपुरा गांव में पैदा हुए थे. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह 22 जुलाई 2017 को जयपुर में विधायकों और सांसदों की बैठक ले रहे थे. बैठक में सांवर लाल बोलने के लिए खड़े हुए और तभी बेहोश होकर गिर गए थे. हॉस्पिटल में एडमिट कराया गया. एम्स के डॉक्टरों के मुताबिक उन्हें दिल का दौरा पड़ा था, जिसकी वजह से उनके दिमाग को नुकसान पहुंचा था.

सांवर लाल जाट
सांवर लाल जाट को बीजेपी ने 2014 के चुनाव में सचिन पायलट के मुकाबले पर उतारा था.

सांवर लाल जाट मोदी सरकार में जल संसाधन राज्य मंत्री बने थे. चुनाव जीतने के बाद ही उन्हें मंत्री पद मिला था. लेकिन बाद में मंत्रिमंडल में फेरबदल के दौरान उन्हें हटा दिया गया था. वो 9 नवंबर 2014 से 5 जुलाई 2016 तक मंत्री पद पर रहे.

सांवर लाल राजनीति में आने से पहले राजस्थान यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे.
सांवर लाल राजनीति में आने से पहले राजस्थान यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे.

राजनीति में आने से पहले वो राजस्थान यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे. राजस्थान के अजमेर जिले की भिनाई विधानसभा क्षेत्र से तीन बार विधायक चुने गए. 1993, 2003 और 2013 में वे राजस्थान सरकार में भी मंत्री रह चुके थे. साल 2014 के चुनाव में भाजपा ने उनको सचिन पायलट के मुकाबले पर उतारा था. जहां उन्होंने जीत दर्ज की थी. अब ये सीट खाली है.

4. ई. अहमद : राष्ट्रपति की स्पीच के दौरान लोकसभा में दिल का दौरा पड़ा

(मौत : 1 फ़रवरी 2017) 

साल 2014 में ई अहमद केरल के मल्लापुरम सीट से लोकसभा सदस्य चुने गए थे. 31 जनवरी को उस वक़्त के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की स्पीच के दौरान ई अहमद को दिल का दौरा पड़ा था. 78 साल की उम्र में एक फ़रवरी 2017 को उनकी मौत हो गई. उनकी मौत आम बजट पेश होने से पहले हुई. मोदी सरकार बजट पेश कर रही थी तो विपक्ष ने एक सांसद की मौत हो जाने की वजह से इसे टालने के लिए बोला था, क्योंकि उन्हें दिल का दौरा राष्ट्रपति की स्पीच के दौरान संसद में ही पड़ा था. लेकिन बीजेपी ने बजट उसी दिन पेश किया जिस दिन तय था. इसपर विपक्ष ने बयानबाज़ी भी की थी.

ई अहमद
ई अहमद सात बार सांसद भी चुने गए.

वकालत के रूप में अपना करियर शुरू करने वाले ई अहमद का जन्म केरल के कन्नूर जिले में हुआ था. तारीख थी 29 अप्रैल 1938. केरल विधानसभा से राजनीति की शुरुआत करने वाले अहमद लगातार पांच बार विधायक रह चुके थे. 1967, 1977, 1980, 1982 और 1987 में विधायक चुने गए. इसके अलावा वो सात बार सांसद भी चुने गए. वह 1982 से 1987 तक केरल सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रहे.

2004 में सांसद बने तो उन्हें मनमोहन सिंह की सरकार में विदेश राज्यमंत्री बनाया गया था.
2004 में सांसद बने तो उन्हें मनमोहन सिंह की सरकार में विदेश राज्यमंत्री बनाया गया था.

साल 1991 में पहली बार वे लोकसभा सांसद चुने गए. और फिर वो हर लोकसभा चुनाव में अपनी जीत का परचम लहराते रहे. यानी साल 1996, 1998, 1999, 2004, 2009 और फिर 2014. जब वो 2004 में सांसद बने तो उन्हें मनमोहन सिंह की सरकार में विदेश राज्यमंत्री बनाया गया. इस मंत्री पद पर वो 2004 से 2009 तक रहे. ई अहमद इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के अध्यक्ष थे.

उपचुनाव होने पर इस सीट पर इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के पीके कुन्हलकुट्टी ने जीत दर्ज की.

5. दलपत सिंह परस्ते : संघ के एक प्रोग्राम में ब्रेन हेमरेज हुआ

(मौत : 1 जून 2016) 

मध्यप्रदेश की शहडोल लोकसभा सीट से भाजपा सांसद थे दलपत सिंह परस्ते. 66 साल की उम्र में 1 जून 2016 को उनकी मौत हो गई. 27 मई को संघ के एक प्रोग्राम में परस्ते की तबीयत बिगड़ गई थी. उसी रात शहडोल के एक प्राइवेट हॉस्पिटल में परस्ते का ऑपरेशन किया गया था. उसके बाद उन्हें एयर एम्बुलेंस से मेदांता हॉस्पिटल गुड़गांव ले जाया गया. परस्ते को ब्रेन हेमरेज हुआ था. 30 मई 1950 को उनका जन्म हुआ था, और उन्होंने आखिरी सांस 1 जून 2016 यानी अपने जन्मदिन के दो दिन बाद ली. पिछले साल अगस्त में भी सांसद परस्ते अपने घर में उस समय चोटिल हो गए थे, जब उनका बाथरूम में पैर फिसल गया था. फिसलकर गिरने से उनका एक होंठ कट गया, जिससे उसमें कुछ टांके भी लगे थे.

दलपत सिंह परस्ते
दलपत सिंह परस्ते मध्यप्रदेश की शहडोल सीट से सांसद थे.

दलपत सिंह परस्ते 2014 में लोकसभा चुनाव जीतकर पांचवी बार सांसद बने थे. दलपत सिंह आदिवासी नेता थे. परस्ते ने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत जनता पार्टी से की थी. वे पार्टी की प्रदेश इकाई के संयुक्त सचिव रहे. इसके बाद वे लोकदल की राष्ट्रीय कार्यकारणी के सदस्य और प्रदेश सचिव रहे.

सबसे पहले 1977 में भारतीय लोकदल के टिकट पर शहडोल सीट से लोकसभा चुनाव जीते थे. दूसरी बार 1989 में जनता दल के टिकट पर चुनाव लड़कर संसद पहुंचे थे. इसके बाद चुनाव हारे तो हारते गए. फिर वो भाजपा में शामिल हो गए. 1999 में भाजपा के टिकट से एक बार फिर वो सांसद बन गए. इसके बाद दलपत सिंह 2004 और 2014 में लोकसभा चुनाव जीते.

दलपत सिंह के मरने के बाद 19 नवंबर को शहडोल लोकसभा सीट पर उप चुनाव हुआ. शिवराज कैबिनेट में मंत्री और दो बार सांसद रह चुके ज्ञानसिंह ने जीत दर्ज की और कांग्रेस के हिमाद्री सिंह को हरा दिया.

6. पीए संगमा : राष्ट्रपति का चुनाव लड़ चुके थे, दिल का दौरा जानलेवा साबित हुआ

(मौत : 4 मार्च 2016)

संगमा मेघालय के वेस्ट गारो हिल्स जिले की तुरा (अनुसूचित जनजाति) लोकसभा सीट से सांसद थे. पूर्व लोकसभा अध्यक्ष पीए संगमा की मौत 4 मार्च 2016 को हुई. 68 साल के थे. उनको दिल का दौरा पड़ा और राम मनोहर लोहिया अस्पताल में मौत हो गई. पुर्नो एगीटोक संगमा (पीए संगमा) का जन्म 1 सितंबर 1947 को मेघालय में पश्चिम गारो हिल्स के चपाथी गांव में हुआ था. पीए संगमा की बेटी अगाथा संगमा 15वीं लोकसभा में सबसे कम उम्र की कैबिनेट मंत्री बनीं. जब वो मंत्री बनीं उस वक़्त देश के पीएम मनमोहन सिंह थे.

पीए संगमा
पीए संगमा 8 बार सांसद रहे

पीएम संगमा 8 बार सांसद रहे थे. 1996-98 तक लोकसभा के स्पीकर रहने वाले संगमा आदिवासियों के हित की बात करते. साल 1988 से 1990 तक मेघालय के मुख्यमंत्री भी रहे. 1996 से 1998 के दौरान लोकसभा के अध्यक्ष रहे.

1996 से 1998 तक वह लोकसभा के स्पीकर रहे. अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद 11वीं लोकसभा में संख्या में कमी की वजह से भाजपा को कांग्रेस उम्मीदवार संगमा को लोकसभा अध्यक्ष के तौर पर स्वीकारना पड़ा था. तब वाजपेयी सरकार महज़ 13 दिन तक सत्ता में रही थी. 1999 में सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे के खिलाफ विद्रोह करने वाले नेताओं में संगमा भी शामिल थे. उन्होंने, शरद पवार और तारिक अनवर ने कांग्रेस छोड़कर नेशनल कांग्रेस पार्टी का गठन किया. बाद में शरद पवार की सोनिया गांधी से बढ़ती नजदीकियों के चलते, संगमा पश्चिम बंगाल की सीएम और टीएमसी की चीफ ममता बनर्जी के साथ हो गए. 10 अक्टूबर 2005 को टीएमसी से अलग हो गए और लोकसभा से इस्तीफा दे दिया. फरवरी 2006 में फिर से वो नेशनल कांग्रेस पार्टी के प्रतिनिधि के तौर पर संसद पहुंचे.

पीए संगमा जब 11 साल के थे, तब उनके पिता की मौत हो गई थी. परिवार की हालत खराब हो गई थी. संगमा को स्‍कूल छोड़ना पड़ा था. खाने के लाले थे. दूसरों के जानवर चरा कर खाने का इंतजाम किया करते थे. फिर एक पादरी की मेहरबानी से उन्होंने पढ़ाई शुरू की और जिंदगी नयी दिशा की तरफ चल पड़ी. पादरी को उस वक्त इस बात का इल्हाम भी नहीं होगा कि जिस बच्चे की वह मदद कर रहे हैं, एक दिन वह न सिर्फ मेघालय का सीएम बनेगा बल्कि भारत के राष्ट्रपति का चुनाव भी लड़ेगा.

2012 में प्रेसिडेंट चुनाव में पीए संगमा की सीधी टक्कर प्रणब मुखर्जी से थी.
2012 में प्रेसिडेंट चुनाव में पीए संगमा की सीधी टक्कर प्रणब मुखर्जी से थी. (Photo : PTI)

2012 में प्रेसिडेंट चुनाव में पीए संगमा की सीधी टक्कर प्रणब मुखर्जी से थी. उस चुनाव में प्रणब मुखर्जी को 7 लाख से ज्यादा वोट मिले थे. जबकि संगमा को 3 लाख 15 हजार वोट मिले. चुनाव में संगमा मुखर्जी से हार गए थे. और राष्ट्रपति बनने का सपना पूरा नहीं हो पाया. संगमा के राष्ट्रपति पद की दावेदारी का समर्थन एआईएडीएमके, बीजेडी और बाद में बीजेपी ने भी किया था.

उपचुनाव में नेशनल पीपुल्स पार्टी के उम्मीदवार और पीए संगमा के बेटे कॉनरेड संगमा ने मेघालय के मुख्यमंत्री मुकुल संगमा की पत्नी डीडी शीरा को हराया.

7. दिलीप सिंह भूरिया : आदिवासी सीएम की मांग को लेकर सत्ता से टकरा गए थे, ब्रेन हेमरेज ने जान ले ली

(मौत : 24 जून 2015)

रतलाम-झाबुआ लोकसभा सीट से सांसद थे. दिलीप सिंह भूरिया को ब्रेन हेमरेज हुआ था. गुड़गांव के एक हॉस्पिटल में इलाज के दौरान 24 जून 2015 को मौत हो गई. 19 जून 1944 को मध्यप्रदेश के झाबुआ में पैदा हुए थे.

दिलीप सिंह सबसे पहले 1972 में कांग्रेस के टिकट पर पेटलावद सीट से विधायक चुने गए थे. लोकसभा में भी पहली बार वो कांग्रेस के टिकट पर ही पहुंचे थे. साल था 1980. सीट थी झाबुआ. जो अब रतलाम-झाबुआ सीट है. एक बार जीतने के बाद लगातार वो इस सीट पर पांच बार जीते. 1996 तक इस सीट पर उनका कब्ज़ा रहा.

दिलीप सिंह भूरिया
दिलीप सिंह भूरिया सबसे पहले 1972 में कांग्रेस के टिकट पर पेटलावद सीट से विधायक चुने गए थे.

इसी दौरान कांग्रेस महासचिव और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से आदिवासी मुख्यमंत्री के मुद्दे पर मतभेद होने की वजह से भूरिया ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था, जिसके बाद वो बीजेपी में शामिल हो गए थे. साल 1998 के चुनाव में बीजेपी ने भूरिया को झाबुआ सीट से टिकट दिया, लेकिन इस बार उनकी किस्मत ने साथ नहीं दिया और वह कांग्रेस के कांतिलाल भूरिया से चुनाव हार गए. कांतिलाल भूरिया 1998 में जीतने के बाद लगातार 2009 तक चार बार सांसद बने. और फिर 2014 में मोदी लहर चली. दिलीप सिंह भूरिया भी इस लहर में चुनाव जीतकर एक बार फिर संसद पहुंच गए.

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में उन्हें राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आयोग का अध्यक्ष बनाया गया था. आदिवासी सीएम बनाने को लेकर दिलीप सिंह भूरिया सत्ता से टकरा गए थे. हुआ ये था कि 1995 में त्रिवेणी के मानस भवन पर आदिवासी सीएम की मांग को लेकर 3 दिन का सम्मेलन चल रहा था. दिलीप सिंह भूरिया से तमाम मतभेद होने के बावजूद आदिवासियों में उनकी अच्छी पकड़ होने की वजह से उस वक़्त के सीएम दिग्विजय सिंह को इस सम्मेलन में आना पड़ा था.

सम्मेलन के अंतिम दिन दिग्विजय सिंह पहुंचे और जब उनके बोलने की बारी आई तो सबसे पहले शब्द थे,

‘भूरिया जी, आप सिर्फ आदिवासियों के नहीं पूरे प्रदेश के नेता हो.’

इसपर आदिवासियों ने काफी देर तक तालियां बजाईं थीं. इस सम्मेलन के 3 साल बाद लोकसभा चुनाव हुए और भूरिया को इस विरोध का खामियाज़ा भुगतना पड़ा. कांग्रेस ने उनकी जगह कांतिलाल भूरिया को टिकट थमा दिया था. वो बीजेपी में शामिल हो गए. चुनाव लड़े और हार गए. तब से अब 2014 में चुनाव जीते थे, लेकिन इस बार जिंदगी से हार गए.

रतलाम-झाबुआ लोकसभा सीट पर उप चुनाव हुए तो कांग्रेस प्रत्याशी कांतिलाल भूरिया ने बीजेपी की निर्मला भूरिया को हराकर जीत दर्ज की.


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