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भूल जाओ गांजा-चरस, यहां लोग बिच्छू मारकर पीते हैं

ये वो नशा है जिसके बारे में दिल्ली, नोएडा और गुरुग्राम के लड़के बहुत कम जानते हैं. इसकी कर्मभूमि हिंदुस्तान और पाकिस्तान के गांवों में है.

नशाखोरी सेहत के लिए बुरी है. और इसमें भी सबसे बुरा है जहरीले जानवरों का नशा, जो चरस-गांजे और हेरोइन-पेरोइन से बहुत पावरफुल होता है.

इस वक्त पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में एक नया नशा महामारी की तरह फैला है. ये वो जगह है जहां दबाकर अफीम पैदा होता है. चरस का चरचराटा है. गांजे का प्रभुत्व है. लेकिन कुछ गांवों के लोग इन पुराने नशों से बोर होने लगे हैं. उन्हें और ज्यादा चाहिए. ज्यादा खतरनाक.

Photo: Reuters
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इसलिए वे अब बिच्छू मारकर पी रहे हैं. ये कोई नया नशा नहीं है. बेहद खतरनाक और पुरानी लत है. 1960 के दशक में ही खैबर-पख्तूनख्वा में किसी प्रयोगधर्मी ने ये बीच बो दिया. पर अब ये नशा बहुत तेजी से फैल रहा है. यहां की गलियों में आज कल बिच्छूमार घूम रहे हैं. मरा हुआ बिच्छू भी दो से तीन रुपये में बिक रहा है. ये नशा सबसे ज्यादा बिक रहा है पेशावर के मतानी इलाके में.

कैसे तैयार किया जाता है?

बिच्छू को पहले मारा जाता है, फिर कई दिन धूप में सुखाकर उसका पाउडर बनाते हैं. प्रोफेशनल लोगों से पूछो तो बताएंगे कि धूप में सूखते बिच्छू की रखवाली भी करनी पड़ती है, वरना चींटियां और कीड़े उसकी लाश का जहर सोख लेंगे.

अगर इमरजेंसी में नशा तैयार करना हो तो मरे हुए बिच्छू को कोयले की आग पर भूंज लेते हैं. फिर उसे एक खास तरह के चूल्हे पर रखकर तब तक फूंकते हैं, जब तक वह चुरमुरा पाउडर न बन जाए.

इस पाउडर को सिगरेट में या चिलम में गांजे के साथ रोल किया जाता है. फिर शोले के हवाले कर दिया जाता है और सुट्टे खींचे जाते हैं. मरा हुआ बिच्छू अविश्वसनीय नशा पैदा करता है, जो कई बार खतरनाक भी हो सकता है. जिन्होंने इसे ट्राई किया है, वो इसे सबसे बुरा नशा बताते हैं. इसका फितूर पालने वाले बिच्छू की लाश के चूरन के साथ खुद भी सुलगते रहते हैं.

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10 घंटे तक आदमी बावला हो जाता है

अच्छा कुछ अधीर लोगों ने बिच्छू पीने का नया तरीका ईजाद किया है. वह जब चूल्हे पर पक रहा होता है, ये लोग उसी में पाइप लगाकर धुआं भीतर लेने लगते हैं. इस पूरी कवायद में सबसे क़यामतख़ेज मानी जाती है बिच्छू की जहरीली पूंछ, जिसका नशा सबसे ज्यादा होता है.

मरे हुए बिच्छू का नशा कर लिया तो 10 घंटे तक आदमी बावला होकर पड़ा रहता है. डॉक्टर लोग मानते हैं कि ये नशा दिमाग के लिए खतरनाक होता है. बिच्छू पीने के 6 घंटे तक बहुत ज्यादा दर्द होता है. लेकिन बताते हैं कि उसके बाद नशेड़ी लोग इसकी खुमारी एंजॉय करने लगते हैं.

बिच्छू की आदत, बीमारी को दावत

इसकी लत से शॉर्ट टर्म मेमोरी लॉस हो सकता है. या पूरी तरह याददाश्त भी जा सकती है. पेट की सबसे खराब बीमारियां इससे हो सकती हैं, नींद उड़ सकती है और बुरे-बुरे सपने आ सकते हैं. सोते समय पैरालिसिस होने का खतरा भी बढ़ जाता है. नशे में हैलुसिनेशन भी हो सकते हैं, जिसे बहुत सारे बिच्छूनोश एंजॉय भी करते हैं.

‘दोबारा बिच्छू नहीं पिऊंगा’

पाकिस्तान के एक नशाई उस्ताद बताते हैं कि उन्होंने जब पहली बार बिच्छू को चरस के साथ पिया तो ऐसा लगा कि वो किसी और दुनिया में पहुंच गए हैं. वह समझ ही नहीं पाए कि उनके साथ क्या हुआ. वह बताते हैं, ‘मेरा शरीर और दिमाग बहुत अलग लेवल पर पहुंच गया था. दोस्तों ने बताया कि मैं एक घंटे तक चिल्लाता और रोता रहा. होश आया तो मैंने तय किया कि दोबारा बिच्छू नहीं पिऊंगा.’

Photo: Reuters
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इंडिया में छिपकली चलती है

खैबर-पख्तूनख्वा की चिलमों में गांजे के साथ बिच्छू भी है. ऐसा नहीं है कि यह सब पाकिस्तान में ही हो रहा है. भारत के गांवों में भी आपको इस तरह के लोग मिल जाएंगे. न मिलें तो उनके किस्से जरूर मिल जाएंगे. हालांकि भारत में बिच्छू से ज्यादा छिपकली पी जाती है. तरीका वही है. आग के हवाले कर के पाऊडर बना लिया और फिर गांजे में मिलाकर फूंक लिया. छिपकली का नशा गांजे के नशे को बढ़ा देता है.

नशा बिच्छू में होता तो नाचता बिच्छू

वैसे बिच्छू में वैसी नशे वाली कोई चीज नहीं होती, जैसी अफीम-गांचे-चरस में होती है. हालांकि बिच्छू के डंक में एक एसिडिक द्रव होता है. उसी की वजह से बिच्छू काटने पर जलन होती है. लेकिन अगर उसमें नशा होता तो बिच्छू के काटने के बाद सब टल्ली होकर क्यों नहीं घूमते?

डॉक्टरों का अंदाजा है कि बिच्छू के पांवों या पेट में कोई चीज हो सकती है जिसका सीडेटिव असर होता हो. लेकिन चूंकि इस पर ज्यादा रिसर्च नहीं की गई है, इसलिए डॉक्टर भी पूरी तरह श्योर नहीं हैं.

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