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बागी लोगों के भगवान तो शिव ही हैं: अमीश त्रिपाठी

भारत में मिथकीय फिक्शन राजनीतिक तौर पर एक विस्फोटक सब्जेक्ट हो सकता था, लेकिन अमीश त्रिपाठी ने बिना किसी विवाद के ‘शिव’ को एक फिक्शन का किरदार बनाकर तीन उपन्यास लिख डाले. दावा है कि इस ‘शिव ट्रिलजी’ की करीब 25 लाख कॉपी बिकीं, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है.

अमीश त्रिपाठी से कुलदीप सरदार की 4 जुलाई,2015 को दिल्ली के ताज होटल में लंबी बातचीत हुई थी. इस वक्त उनके मित्र नंदलाल शर्मा भी उनके साथ थे. इस बातचीत के कुछ हिस्से आज हम आपको उनके जन्मदिन पर पढ़वा रहे हैं.


उनके दादा बनारस में पंडित थे. संस्कृत के प्रकांड विद्वान. घर में भी धार्मिक माहौल था, लेकिन IIM से ग्रेजुएट उस नौजवान का ईश्वर से भरोसा टूट गया. वह घर से दूर बैंकर होकर अच्छा पैसा कमाने लगा. लेकिन, चूंकि पढ़ने का शौक और जाने-अनजाने मिली धार्मिक संस्कारों की विरासत साथ थी, तो वो लिखने लगा. शिव की कहानी अपने तरीके से लिखनी शुरू की और फिर लिखते-लिखते चमत्कारिक तरीके से वो आस्तिक हो गया. पहली किताब छपकर आई तो सुपर-डुपर हिट हुई. फिर शिव की कहानी पर दो और किताबें आईं, जो भारत में सबसे तेजी से बिकने वाली बुक सीरीज बनी.

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अमीश धार्मिक कहानियों की फिक्शनल तरीके से व्याख्या करते हैं, जो भारत में राजनीतिक तौर पर एक विस्फोटक सब्जेक्ट हो सकता है. इसके बावजूद वह विवादों से दूर बने रहने का भरोसा जताते हैं. खुद को राम-भक्त स्वीकारने में वो हिचकते नहीं, पर इसके राजनीतिक पक्ष पर भी खुलकर सामने नहीं आते. बावजूद इसके किताब के हर पहलू पर अपनी प्रकट विनम्रता के साथ बात करने को तैयार दिखते हैं, असहमति का सम्मान करते हैं और जिंदगी में ‘बैलेंस’ बनाने के हिमायती हैं.

पेश है अमीश से हुई बातचीत के अंश:

आप शिव ट्रिलजी के बाद राम की कहानी लिखने वाले हैं, जो भारत में राजनीति और धार्मिक लिहाज से एक संवेदनशील विषय है? फिर भी इस विषय को चुना?
मैं दिल से लिखता हूं. ज्यादातर कंट्रोवर्सी खड़ी की जाती हैं. लेखक खुद करते हैं, ताकि पब्लिसिटी मिल जाए और किताब निकल जाए. राम जी की कहानी और प्रेरणा सदियों से चली आ रही है. जिस पॉलिटिक्स की आप बात कर रहे हैं वो तो कुछ साल से ही है. राम तो हमारे जेहन और आत्मा में मिले हुए हैं. उनकी कहानी से सीखने को बहुत मिलता है. तो मैं कंट्रोवर्सी करता नहीं हूं, तो होती नहीं है.

आपकी व्याख्या तुलसी या वाल्मीकि रामायण से अलग होगी, जिस पर किसी को ऐतराज हो तो विवाद होगा ही. इसमें आपके चाहने या न चाहने से क्या होता है. जैसे राम की मुंहबोली बहन रोशनी का गैंगरेप वाला सीन जो दिल्ली गैंगरेप से इंस्पायर्ड लगता है. कोई उसे कहानी की तरह लेगा, पर किसी के धार्मिक प्रतीकों को चोट भी लग सकती है.
ये इस फिलॉसफी पर डिस्कशन करने के लिए लिखा गया है कि अहम क्या है. न्याय या कानून. आप जानते हैं कि जो हुआ, वो अपराध था और उसे एक नाबालिग ने अंजाम दिया था. मेरी किताब में जो कांड है, वो दिल्ली से ज्यादा नहीं, बल्कि अमेरिका के एक मामले का उदाहरण लेकर लिखा है. मैं चाहता हूं कि नाबालिग के अपराधों पर चर्चा होनी चाहिए. यह पश्चिमी देशों में भी बहुत है. 90 के दशक में वहां बड़ी समस्या हो गया था.

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हमने तय किया है कि कोई 18 साल से कम उम्र का अपराधी है तो उसे ज्यादा सजा नहीं दी जाएगी. अमेरिका में ये तय किया गया है कि संगीन जुर्म में 10 साल की उम्र से ज्यादा के बच्चों को भी सजा दी जाएगी. इस पर चर्चा तो होनी चाहिए हमारे देश में. मैं वही पूछने की कोशिश कर रहा हूं. मैं सही और गलत की बात नहीं कर रहा हूं, पर चाहता हूं कि देश इस बारे में सोचे. मेरी किताब में आप पाएंगे कि राम कानून के पक्ष में हैं और भरत न्याय के पक्ष में. बाकी कहानी तो आप किताब में पढ़ेंगे ही.

आपकी व्याख्या वाल्मीकि, कम्ब या तुलसी की व्याख्या से कैसे अलग है?
रामायण की बहुत व्याख्याएं हैं. ज्यादातर उत्तर भारतीयों से पूछेंगे तो वे तुलसी रामायण को ही रामायण समझते हैं. उनसे पूछिए कि क्या लक्ष्मण रेखा का कोई वर्णन है रामायण में? वे कहेंगे- हां, लेकिन वाल्मीकि रामायण में कोई जिक्र नहीं है इसका. मैं बस एक उदाहरण दे रहा हूं. ऐसे बहुत हैं. अगर आप पूछें कि राम जी ने कभी रावण की प्रशंसा की थी क्या? लोग कहेंगे नहीं. लेकिन कम्ब रामायण में बहुत मशहूर सीन है, जिसमें राम और रावण ने एक-दूसरे की प्रशंसा की, फिर दोनों में युद्ध हुआ. अगर आप पूछेंगे कि जो मुख्य रावण है, उसका वध किसने किया. ज्यादातर लोग कहेंगे श्रीराम, लेकिन हजार साल पुराने अद्भुत रामायण में सीता मां ने मां काली का रूप लेकर बड़े रावण का वध किया. अलग-अलग पहलू हैं राम जी के पास जाने के. एक वर्जन मेरा भी है.

नंदलाल: आज की पीढ़ी रामायण-रामचरितमानस से ज्यादा आपकी किताबें पढ़ रही है. क्या आपको लगता है कि 20-25 साल बाद आपकी की हुई व्याख्या ज्यादा प्रभावी होंगी?
अरे नहीं नहीं (हाथ जोड़ लेते हैं). मेरी किताबें इतनी अच्छी नहीं हैं. हमारी प्रथा इतनी सदियों से चली आ रही है. हजारों साल से चली आ रही है. सदियों रहा है दुश्मन दौरे-जहां हमारा, कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी. लेकिन ये हमारे देश की एक खासियत है कि हम अलग-अलग पहलू को मानने को तैयार रहते हैं. जैसे आप नॉर्थ इंडिया में किसी से पूछें कि कार्तिकेय और गणेश में कौन बड़े हैं. वे कहेंगे कार्तिकेय. लेकिन, दक्षिण भारत में गणेश बड़े हैं. नॉर्थ में कार्तिकेय जी को ब्रह्मचारी माना जाता है, जबकि साउथ की मान्यता है कि उनकी दो पत्नियां हैं. हम लोग नॉर्थ के रहने वाले हैं, लेकिन साउथ में कार्तिकेय जी के मंदिर में गए तो उनकी पत्नियों की भी पूजा की. तो ये हमारे भारत की खासियत है कि हम अलग-अलग सत्य को मानने को तैयार हैं.

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आप हमेशा ही लिबरल अप्रोच के लगते हैं. आपके पुराने इंटरव्यूज भी देखे हैं. आप शिकायत बिल्कुल भी नहीं करते.
पूरा इंडिया ही लिबरल अप्रोच का है. मैंने तो स्वामी विवेकानंद की ही बात दोहराई.

कहां है लिबरल? पीके के खिलाफ भी प्रदर्शन होते हैं?
‘पीके’ पर मैंने भी आर्टिकल लिखा था एक अखबार में. मुझे वो पिक्चर पसंद नहीं आई थी. उस आर्टिकल का पहला पैराग्राफ मैंने यही लिखा था कि फिल्म को प्रदर्शित किए जाने का पूरा हक है. उसी हक से मैंने अपनी बात लिखी. मुझे लगा कि फिल्म में मूर्तिपूजा का तिरस्कार किया जा रहा है, जबकि मुझे लगता है कि मूर्तिपूजा तो अच्छी चीज है और ये हमारी उदारता की निशानी है. अगर आप मूर्ति में भगवान देखते हैं, तो इसका ‘रूट’ यह है कि हर चीज में भगवान देखते हैं. इसका मतलब है कि आप हर चीज की इज्जत करने को तैयार हैं.

बैंकिंग और नास्तिकता से लेखन और आस्था की तरफ कैसे लौटे? ये बदलाव, ये ट्रांसफर्मेशन कैसे हुआ?
ये धीरे-धीरे हुआ. जैसे-जैसे मैं पहली किताब लिखता चला गया, मैं आस्था की तरफ वापस खिंचता चला गया. जब मैं बच्चा था तो आस्तिक ही था. परिवार का माहौल ही धार्मिक था. मेरे बाबा बनारस में पंडित थे, आपने सही कहा. मेरे मां-बाप बहुत धार्मिक थे. कुछ साल के लिए मैं नास्तिक बन गया था. मेरा मानना है कि अगर मेरे जैसा इंसान आस्था की तरफ आ सकता है तो कोई भी आ सकता है, क्योंकि मैं थोड़ा रेबेलियस (बागी) किस्म का आदमी हूं.

(अमीश के 6 साल के बेटे तैयार होकर वहां पहुंचते हैं. अपने बाल-सुलभ शेखी से अपने नए कुर्ते पायजामे का दर्शन कराते हुए. हम एक पल को रुक जाते हैं. अमीश कहते हैं- वाह जनाब बहुत अच्छे लग रहे हैं. फिर अमीश बात को आगे बढ़ाते हैं.)

…तो हम जैसे रेबेलियस लोगों के भगवान तो शिव ही हैं.

तो मैं ये मानकर चलूं कि आप जब लिखते हैं तो विवादास्पद चीजों के बारे में सोचते नहीं हैं, क्योंकि आपको लगता है कि कोई कंट्रोवर्सी होगी नहीं.
नहीं, मैं दिल से लिखता हूं. मेरा यही मानना है कि मन साफ होता है तो कंट्रोवर्सी नहीं होती, लेकिन दिल में खोट हो तो कंट्रोवर्सी निकल ही आती है. आप मीडिया से हैं, बुरा न मानें. आप जानते होंगे कि 99 फीसदी कंट्रोवर्सी लेखक खुद करते हैं. दुख की बात ये है कि किताब को इसका फायदा भी मिलता है, लेकिन मैं आस्तिक हूं. मैं जिस ईश्वर के बारे में लिखता हूं, उसे पूजता हूं. उसके साथ कंट्रोवर्सी करना मेरे दिल को गलत बात लगेगी.

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ये एक श्रद्धालु की तरफ से लिखी गई किताब है या एक किस्सागो की तरफ से या…?
(सवाल को बीच में काटते हुए) श्रद्धालु की तरफ से. मुझे अपने धर्म पर बहुत गर्व है. यह मैं बार-बार सीना ठोंककर बोलता हूं. मेरा मानना है कि हमारी प्राचीन सभ्यता में बहुत अच्छी बातें हैं, जिन्हें हम सीख सकते हैं. जैसे भगवद्गीता के 18वें अध्याय में कृष्ण जी ने कहा कि अगर भगवान भी कुछ बोलें, तब भी हमें अपना दिमाग इस्तेमाल करके अपने कर्म खुद करने चाहिए, क्योंकि कर्म का फल आपको ही मिलना है. आपको ही सोचना है कि आपका कर्म आपके स्वधर्म के अनुकूल है या नहीं. ये मेरे हिसाब से तो अच्छी बात है.

राम किसी के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, पर किसी के लिए विवादित किरदार हैं. राम को विवादित किरदार मानने वालों की भी अपनी एक राजनीतिक लाइन है. उनका प्रचार ये होता है कि उन्होंने जो सीता की अग्निपरीक्षा ली, वो एक महिलाविरोधी कदम था. या शंबूक का ‘वध’ एक दलितविरोधी काम था? आपकी क्या राय है इस पर?
इन घटनाओं की व्याख्या मैं अपनी किताब में तो लिखूंगा, लेकिन अगर सीता मां के बारे में कहूं तो डेढ़ साल पहले मैंने इसी विषय पर एक आर्टिकल लिखा. उसमें मैंने लिखा था कि मैं श्रीराम की इज्जत क्यों करता हूं. मैंने लिखा था कि उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है. मर्यादा पुरुषोत्तम का मतलब क्या है, ‘कानून का आदर्श पालक’. श्रीराम की कहानी हमें ये सिखाती है कि भई एक मर्यादा पुरुषोत्तम की जिंदगी कैसी होती है.

आम तौर पर ऐसे लोग जिस समाज को लीड करते हैं, उस समाज का वे बहुत भला करते हैं, लेकिन उनके पारिवारिक जीवन में आमतौर पर कठिनाइयां होती हैं. मैंने कहा कि सिर्फ श्रीराम को नहीं, दूसरों को भी देखें, जो मर्यादा के मुताबिक चलते थे. गौतम बुद्ध को देख लीजिए. उनके फलसफे से कितनी शांति मिलती है. लेकिन उनके परिवार को देख लीजिए. उन्होंने अपने परिवार को त्याग दिया. जब वो वापस आए, उन्होंने राहुल को अपने बेटे के तौर पर स्वीकारने से साफ मना कर दिया.

महात्मा गांधी को देख लीजिए. उनके बेटों से उनके रिश्ते बहुत अच्छे नहीं थे. अगर समाज में कानून का राज होता है तो समाज के लिए अच्छा होता है. परिवार में कानून का नहीं, प्यार का राज होना चाहिए. राम को बुरे रूप में देखना एक पहलू है. दूसरा पहलू मैं अपनी किताब में लिखूंगा. राम की जिंदगी से ये सीखने को मिलता है कि जो मर्यादा पुरुषोत्तम होते हैं, उनकी जिंदगी कैसी होती है. हमारे देश में ऐसे भी लीडर हुए हैं, जिन्होंने अपने परिवार को कानून और देश से ज्यादा अहमियत दी. कह सकते हैं कि वे लीडर शायद लीडर अच्छे नहीं थे, लेकिन माता पिता अच्छे थे.

आपके पसंदीदा लीडर्स कौन से हैं?
(मुस्कुराते हुए कहते हैं) नहीं, मैं राजनीति पर टिप्पणी नहीं करता. माफ कीजिए. कंट्रोवर्सी से दूर रहने का यही तरीका है. (फिर एक ठहाका कमरे में गूंजता है..)

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जो अब नहीं हैं, उन्हीं के नाम ले लीजिए?
हमारे फाउंडिंग फादर्स में सब लीडर्स अच्छे थे. सरदार पटेल, महात्मा गांधी, नेहरू, डॉ. आंबेडकर, मौलाना आजाद, राजगोपालचारी, सुभाष चंद्र बोस, अरविंदो. हमारी किस्मत अच्छी थी.

नंदलाल: इन नेताओं की भी अलग-अलग वजह से आलोचना होती है.
राजनीतिक बात नहीं करूंगा. कोई भी लीडर इंसान है. खामियां-खूबियां सबमें होती हैं. देश का भला हुआ कि नहीं, बस वही देखना चाहिए.

नंदलाल: आपने लिखने के लिए माइथॉलजी को ही क्यों चुना?
कुलदीप: इसी में ये बात जोड़ दूं कि आप चेतन भगत जैसा फिक्शन लिखकर आसानी से सफल हो सकते थे, क्योंकि वो उसी तरह के लेखन का दौर था, लेकिन माइथॉलजी का यूथ से कनेक्ट नहीं था अब तक. आपने मुश्किल रास्ता चुना.
मैं कभी लेखक बनना ही नहीं चाहता था. मैंने रास्ता नहीं चुना, रास्ते ने मुझे चुन लिया. ‘हंबल’ परिवार से हूं. बाप-दादा का आशीर्वाद है, जायदाद वगैरह नहीं है. नौकरी अच्छी थी मेरी. नौकरी से खुश भी था. लेकिन इस किताब का जब आइडिया मुझे लगा, 11-12 साल पहले तो अपने लिए ही लिख रहा था. तब मैंने ये भी नहीं सोचा था कि किताब छपकर आएगी. अपने और परिवार के लिए लिख रहा था बस. शायद बिना सोचे-समझे मैं वही कर रहा था, जो हमारे कृष्ण भगवान कहते हैं कि कमर्ण्ये वाधिकारस्ते माफलेषु कदाचन्. ‘सायन ऑफ इक्ष्वाकु’ भी मैंने इसी सोच से लिखी है. हो सकता है मेरी अगली किताब न चले. तो कोई नहीं, मैं वापस बैंकिंग में चला जाऊंगा. लेकिन वही करूंगा, जो मेरे दिल को सही लगेगा. अगर सिर्फ पैसा कमाना है तो बैंकिंग भी कोई बुरा जरिया नहीं है.

मैंने सुना है कि आपके पास 20 साल का प्लान तैयार पड़ा है. राम के बाद क्या लिख रहे हैं.
हां राम जी की 5 किताबें आएंगी तो चार-पांच साल इसी में निकल जाएंगे. फिर और भी कई कहानियां हैं, मनु के ऊपर, ब्रह्मा जी, परशुराम जी और श्री रुद्र और मोहिनी पर है. एक महाभारत पर है और ये सब कहानियां एक-दूसरे से जुड़ी हैं. रामचंद्र सीरीज के बाद आप शिव ट्रिलजी दोबारा पढ़ें, तो मैंने उसमें कुछ सुराग छोड़े हैं रामचंद्र सीरीज के. महाभारत, परशुराम और सबकी कहानी के क्लू मैंने शिव ट्रिलजी में छोड़े हैं. मेरी कहानियां मेरे दिमाग में 9 हजार साल के बीच फैली हुई हैं. 12 हजार साल पहले से लेकर 9 हजार साल पहले तक. ये वैदिक लोगों की कहानी है, मनु के साथ संस्कृति के जन्म और 3500 साल पहले संस्कृति के खात्मे तक. और हम उनके ‘अयोग्य वंशज’ हैं.

हां तो लिखता तो मैं रहूंगा अगले 20-25 साल तक, कोई पढ़े या न पढ़े. किताबें नहीं चलीं तो बैंकिंग में चला जाऊंगा, पर लिखता रहूंगा.

आपका राइटिंग पैटर्न जानना चाहता हूं. लिखते हैं तो म्यूजिक चलाकर लिखते हैं, सुबह लिखते हैं या शाम को लिखते हैं, छुट्टी लेकर लिखते हैं?
नहीं मैं सुबह ही लिखता हूं. जल्दी उठ जाता हूं. 5:30-6 बजे तक. पूजा करता हूं, एक्सरसाइज करता हूं. चार अखबार पढ़ता हूं. फिर 9-9:30 बजे लिखना शुरू करता हूं. लेकिन, लिखते समय मैं पूरे मन से जाता हूं. कुछ दिन ऐसे होते हैं जब लिखते हुए शब्द नहीं आते. तब लैपटॉप बंद कर देता हूं. पर लिखते समय मुझे म्यूजिक की जरूरत पड़ती है, तो गाना हरदम ऑन रहता है. और लिखते समय मैं क्रीम बिस्किट्स बहुत खाता हूं.

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नंदलाल: आप योग करते हैं?
हां योग करता हूं. एक्सरसाइज भी करता हूं. ट्रेनर घर आता है. वेट ट्रेनिंग वगैरह भी. किक बॉक्सिंग भी.

नंदलाल: नई पीढ़ी शिव को बहुत पसंद करती है. उनके टैटू बनाती है. शिव में ऐसा क्या है आपकी राय में? उन्हें डिफाइन कैसे करेंगे?
उन्हें डिफाइन करना बहुत मुश्किल है. शिवजी का मुख्य आकर्षण ये है कि बहुत सारे विरोधाभास हैं. उन्हें माना जाता है कि वो समाज के बाहर रहते हैं, लेकिन समाज का सबसे ऊंचा स्तर, कला, नृत्य और संगीत के भगवान भी वही हैं. वे भस्म अपने बदन पर लगाते हैं, बाल ऐसे ही छोड़ देते हैं, लेकिन उन्हें सौंदर्येश्वर भी कहा जाता है. कहा जाता है कि वो वैरागी हैं, माया से दूर रहते हैं, लेकिन ये भी कहा जाता है कि बहुत अच्छे पति और पिता हैं.

उनके विरोधाभास बहुत आकर्षक होते हैं. उनके विरोधाभास आपको बैलेंस करते हैं. वैराग या जिम्मेदारी निभाने, दोनों में से किसी का भी अतिरेक ठीक नहीं है. इनके बीच का बैलेंस जरूरी है. हां, धन के पीछे नहीं भागना चाहिए वरना वो आपको पागल कर देगा. लेकिन जीवन-यापन के लिए थोड़ा धन कमाना भी जरूरी है, क्योंकि जिम्मेदारियां भी हैं. खुद पर अपनी सभ्यता-समाज पर गर्व होना चाहिए, लेकिन इतना भी नहीं कि आप दूसरों से घृणा करने लगें. शिव का मुख्य आकर्षण यही है. विरोधाभास जो आपको आकर्षित करते हैं और फिर आपको संतुलित कर देते हैं. मेरे हिसाब से दुनिया में सबसे अहम चीज है बैलेंस. बैलेंस करिए, बैलेंस करिए अपने आप को.

भारत में आपके फेवरेट लेखक कौन से हैं?
कुछ का नाम लेना मुश्किल है. महीने में मैं चार-पांच किताबें जरूर पढ़ता हूं. तो पिछले कुछ दिनों में जिनको पढ़ा, वो बताता हूं. डॉ. अंबेडकर की मैंने दो किताबें पढ़ीं- ‘पाकिस्तान ऑर द पार्टिशन ऑफ इंडिया’ और ‘हू आर द शूद्रास’. बहुत ही उम्दा किताबें हैं. हमारे फाउंडिंग फादर्स में सबसे बड़े बुद्धिजीवी वही थे. मलयाली लेखक एमटी वासुदेवन नायर की किताब पढ़ी- ‘भीमा’. मुझे अच्छी लगी.

उस तरह की किताबें पढ़ते हैं, जो नए लोग लिख रहे हैं, जिन्हें चिकलेट्स कह देते हैं लोग?
नहीं, मैं ज्यादातर नॉन फिक्शन पढ़ता हूं.

नंदलाल: और लिखते फिक्शन हैं!
हां लिखता फिक्शन हूं. विरोधाभास हो गया ना. (ठहाका)

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नंदलाल: आपने पेरियार की सच्ची रामायण पढ़ी है?
नहीं.

नंदलाल: जब आप मनु की कहानी लिखेंगे तो उसमें दलितों के विचार को शामिल करेंगे?
हां बिल्कुल. मैंने शिव ट्रिलजी में भी लिखा है. पुराने जमाने में इंसान का दर्जा उसके जन्म पर नहीं, कर्म पर होता था. सत्यकाम जावाली ऋषि माने गए हैं. वो पैदायशी ब्राह्मण नहीं थे, लेकिन उन्हें महाऋषि माना गया. राम जी उनसे मिलने गए, उनसे सीखा भी. रामायण लिखने वाले वाल्मीकि और महाभारत लिखने वाले कृष्ण द्वैपायन (वेदव्यास) भी पैदायशी ब्राह्मण नहीं थे. पुराने जमाने में आपके जन्म का फर्क नहीं पड़ता था. ये बात डॉ. अंबेडकर ने ‘शूद्र कौन थे’ में भी कही है. जो हुआ है पिछले 1500-2000 साल में हुआ है. पुराने जमाने में जेनेटिक अंतर्संपर्क (यौन संदर्भ में) बहुत होता था.

फैमिली कैसे रिएक्ट करती है इस पर? घर पर पौराणिक प्रसंग सुनाते हैं?
हां हां. हमारे परिवार में शुरू से ऐसा माहौल रहा है. ऐसी कहानियां सुनाने का माहौल रहा है. अभी तो 6 साल का बच्चा है तो वो कहानियों के तौर पर देखता है. हनुमान जी को हनुमान भैया कहता है. (ठहाका)


 

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