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रेखा के बारे में पूछने पर अमिताभ 'हूं' करके रुक जाते थे

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अमिताभ की फिल्म में एक डायलॉग था. ‘मर्द को दर्द नहीं होता.’ लिखने वाले की कलाकारी और वक्त के हिसाब से ठीक रहा होगा. लेकिन भाईसाब ये झूठ है. मर्द को दर्द होता है. मुझे भी हुआ. अमिताभ बच्चन के हर फैन को हुआ होगा. जब पनामा पेपर्स लीक हुए और पहले ही दिन उनका नाम आ गया. जिसे देखते, सुनते, कॉपी करते एक जमाना गुजरा हो. उसके बारे में ऐसी कोई भी खबर एक बार दिमाग खनका देती है. यकीन नहीं होता भाई. लेकिन दिमाग खुराफाती होता है. वो नई नई चीजें जोड़ता घटाता है. उसी तरह जब इस केस में वो बोले कि उनका नाम किसी ने इस्तेमाल किया होगा. तो मन ऐसे मानने को तैयार हो गया जैसे यही सुनने को बैठा था.

ये पहली बार नहीं है जब वो विवादों में आए हों. इसके पहले जब वो सांसद थे. और बोफोर्स घोटाले की आंच में तप रहे थे. फिल्मी करियर एकदम ढलान पर था. उस वक्त 1995 में सौम्य बंद्योपाध्याय ने उनकी जीवनी लिखी थी. कहते हैं ये अमिताभ के बारे में बताती एकमात्र ऑथेंटिक बायोग्राफी है. क्योंकि अमिताभ ने खुद इसके लिए वक्त दिया और अपने करीबियों से बात करने का रास्ता निकाला. वाणी प्रकाशन ने इसे छापा है. उसका ये हिस्सा पढ़ लो. फिर पूरी किताब पढ़ने का मन कहेगा.

amitabh bio

अमिताभ के जीवन में जया भादुड़ी ही पहली औरत थीं, यह बात सोचने का कोई कारण नहीं है. दिल्ली के कॉलेज से प्रारंभ करके कलकत्ता के नौकरी जीवन में अमिताभ के साथ कई स्त्रियों का घनिष्ठ सम्पर्क रहा है. इनमें से किसी के साथ सिर्फ दोस्ती थी, किसी के साथ इससे भी गहरा सम्पर्क था. मगर अपनी स्त्री मित्रों या अपने प्रेम के बारे में अमिताभ बच्चन ने कभी खुलकर बात करना पसंद नहीं किया.

कई बार ऐसा भी हुआ है कि मैंने किसी की चर्चा करते हुए कहा है कि फलाँ लड़की से तो कभी आपकी बेहद घनिष्ठता रही है. यह सुनकर अमिताभ बच्चन कुछ देर चुप रहकर कहते, ‘हाँ, वह मेरी दोस्त थी.’ ‘मैं पूछता, दोस्त या उससे कुछ ज्यादा ? अमिताभ कहते, ‘रहने दीजिए इन बातों को.

‘मैंने एक दिन जबरदस्ती की. साफ-साफ जानना चाहा कि जया जी के अलावा भी उनका कभी किसी से प्रेम संबंध रहा है ? पता नहीं क्या हुआ, ईश्वर ही जानते हैं, अमिताभ बच्चन काफी देर तक चुप बैठे रहे. फिर कहा, ‘हाँ था, लेकिन इससे ज्यादा मैं कुछ नहीं बताऊँगा. ’क्यों ? कोई खास कारण है?’ मैंने जानना चाहा था.

अमिताभ बच्चन काफी देर तक मेरी ओर देखते रहे फिर बोले, ‘यह सब बातें रहने दें. अब वह शादीशुदा है. अपने पति और बच्चों के साथ सुख से रह रही है. मैं भी शादीशुदा व्यक्ति हूँ. हम दोनों का ही परिवार ईश्वर की कृपा से सुख और शान्ति से है. मेरे कुछ कहने से, मेरी किसी भी बात से किसी का नुकसान हो, मैं नहीं चाहता. उसका नाम जानकर आपको या दुनिया के किसी व्यक्ति को कोई लाभ नहीं होगा. मगर एक-दूसरे का नुकसान जरूर हो सकता है.’

इस अनुरोध के बाद आग्रह करना बेकार था. उचित भी नहीं था. इसके अलावा मैं एक और बात सोच रहा था. दूसरों के साथ अपनी तुलना कर रहा था. जो सवाल मैं पूछ रहा था वह एकदम व्यक्तिगत था. पहले तो यही प्रश्न आता है कि ऐसे सवाल पूछे जाने चाहिए या नहीं. दूसरे, मेरे इस व्यक्तिगत सवाल को सुनते ही अमिताभ मुझे चुप करा सकते थे. जिस तरह उन्होंने कई बार कई लोगों से कहा है, ठीक उसी तरह अपनी मेघ-मंद्र आवाज में मगर बड़े विनय से अनाधिकार चर्चा की बात याद कराते हुए कह सकते थे, ‘नो पर्सनल क्वेश्चन प्लीज.’ लेकिन अमिताभ ने ऐसा नहीं किया. मेरा आग्रह अन्य पत्रकारों से अलग था, यह महज जानने की इच्छा थी, अमिताभ ने इसे स्वीकार लिया था. अत्यधिक भद्र होने के कारण ही उन्होंने रूखी बातें करके मेरा दिल नहीं दुखाया. चाहते तो वह ऐसा कर सकते थे.

उस दृष्टि से मैं सौभाग्यशाली था. अमिताभ को बंबई के काफी लोग ‘दी मोस्ट डिफिकल्ट पर्सन टू नो’ कहते हैं. यहाँ तक कि इतने दिनों की विवाहिता जया भी कहती हैं, ‘उन्हें पहचानना इतना आसान नहीं है.’ अमिताभ के मूड, उनकी पसंदगी-नापसंदगी, उनकी अनुभूति आदि के ढेरों किस्से काफी लोगों ने कई बार सुनाए हैं. मैंने सभी को उनसे एक सम्मानजनक दूरी बनाकर मिलते, बातें करते हुए देखा है.

बच्चे से लेकर बूढ़े तक किसी को भी उनके सामने पूरी तरह से खुलकर बात करते हुए नहीं देखा. यही अमिताभ की पर्सनैलिटी है. वह हमेशा दूसरो के ऊपर रहते हैं. हर समय अमिताभ की इच्छा ही सर्वप्रमुख होती है, दूसरों को उसे स्वीकारना ही पड़ता है. लेकिन जाने क्यों वह मुझे हमेशा ही बेहद सहज लगे हैं. पहले दिन से मुझे लगता रहा कि उन जैसे सीधे-सादे सहज व्यक्ति को लोगों ने अनावश्यक ही जटिल बना रखा है. हर व्यक्ति के दो पक्ष होते हैं. एक उसकी अपनी निजी दुनिया होती है, जहाँ पर अनाधिकार प्रवेश करने की गुंजाइश नहीं होती, दूसरी दुनिया सर्वसाधारण के लिए होती है. जो जैसा चाहे समझ ले.

समझने का यह मौका अमिताभ ने बीच-बीच में उन्हीं को दिया है, जिन्होंने इसके बारे में आग्रह जताया है. जिसने भी अपने आचरण और व्यक्तित्व से अमिताभ को प्रभावित किया, अमिताभ ने उसे मौका दिया. इसके अलावा मौका देते समय वह एक और बात का ध्यान रखते हैं – उसका उद्देश्य या लक्ष्य क्या है? खुद को उन्मुक्त करने के पहले या किसी विषय पर अपनी राय जाहिर करने से पहले अमिताभ हमेशा उस व्यक्ति के उद्देश्य के बारे में जानना चाहते हैं.

कई बार ऐसा भी हुआ है कि जान-बूझकर ही उन्होंने अपने को फँसा लिया है. ऐसा क्यों किया ! यह पूछने पर उनहोंने बताया कि कभी-कभी धोखा भी खा लेना चाहिए. मगर वह जिसको भी, कितना भी मौका क्यों न दें, उसे अपनी व्यक्तिगत बातें नहीं बताते. एक तयशुदा जगह तक आकर वह फिर बड़े आराम से अपने खोल में घोंघे की तरह दुबक जाते हैं.

एकदम प्रारम्भिक दिनों में उनकी आत्मकथा के बारे में चर्चा करते-करते एक दिन मैंने फिल्मिस्तान स्टूडियों में बैठकर कहा था, ‘मगर इसमें आपके व्यक्तिगत जीवन की बातें भी स्वाभाविक है, आएंगी. जैसा कि रेखाजी का प्रसंग.’ अमिताभ कुछ सोचते हुए ‘हूँ’ कहकर खामोश हो गये. बाद में मैंने देखा कि उनसे इस ‘हूँ’ के बाद काफी लोग उस विषय पर फिर बात ही नहीं करते थे.

क्योंकि वे जानते थे कि इस हुँकारी का मतलब है कि अब वह इस विषय पर कुछ कहना नहीं चाहते. लेकिन मैंने पहले दिन से ही कुछ ज्यादा आजादी ले ली थी. जैसे कि उस दिन ‘हूँ’ सुनने के बाद कहा था, ‘हूँ’ कहकर आप इसे टाल नहीं सकते. पाठक आपके जीवन के हर पक्ष को जानना चाहते हैं. मैं भी जानना चाहता हूँ कि मेरी पुस्तक में कोई चीज छूट न जाए.’

अमिताभ बच्चन ने इस पर कुछ न कहकर कुछ देर मेरी ओर देखकर कहा था, ‘ये सब विषय बहुत नाजुक हैं. खासकर हमारे देश में. एक बात हमेशा याद रखनी होगी कि आप जिसे लेकर लिख रहे हैं वह इसी देश का व्यक्ति है. भारतीय है. उसके आसपास जो लोग इकट्ठा हैं वे भी भारतीय हैं. हमारे देश की नैतिकता का मानदंड पश्चिम देशों की तुलना में भिन्न है.

पश्चिमी देशों में जो बातें बहुत आसानी से लिखी जाती हैं, हमारे देश में उतनी आसानी से नहीं लिखी जा सकतीं. इसे समाज नहीं स्वीकारता. इसके अलावा एक और बात है. मान लीजिए, आपने लिख दिया कि उस व्यक्ति के साथ उस महिला के संबंध थे. पाठक उस रिश्ते का तरह-तरह का अर्थ निकाल सकते हैं. ऐसी हालत में, अगर दूसरा व्यक्ति लेखक के खिलाफ मुकदमा कर दे तो? मानहानि का मुकदमा? तब आप क्या करेंगे? हमारे यहाँ किताबें ही कितनी बिकती हैं ? ऐसी सूरत में क्या आपके प्रकाशक आपका साथ देना पसंद करेंगे?’

उस दिन मेरे हाथ में किटी केली की लिखी फ्रैंक सिनेजा की जीवनी थी. अमिताभ बच्चन ने उस किताब की ओर इशारा करके कहा था, ‘यूरोप में ही किताबें इस तरह लिखी जा सकती हैं. भारत की बात होती तो बेचारी लेखिका का इतना रिसर्च बेकार ही जाता. आप हमेशा इस बात को याद रखिए कि यह भारत है. यहाँ पर किसी के बारे में किताब लिखने में सैकड़ों प्रकार की बाधाएँ हैं.’

निस्सन्देह अमिताभ की बातों ने मुझे भी उस वक्त सोचने पर मजबूर कर दिया था. अचानक ही मेरे मुँह से निकला, ‘इसीलिए हमारे देश में अच्छी जीवनियां नहीं प्रकाशित होतीं.’


वीडियो देखें: अमिताभ बच्चन की जगह राजीव गांधी को मिल रहा था फ़िल्मों में हीरो बनने का मौक़ा

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excerpts from the book amitabh bachchan by saumya bandyopadhyay

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