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जानते हो, अपने अंतिम दिन में क्या करने लगे थे बादशाह अकबर?

shazi zaman_1 - Copyशाजी जमां सेंट स्टीफेंस से पढ़े हैं. दूरदर्शन से करियर शुरू कर अभी पत्रकारिता में जाना-माना नाम हैं. जब ये चार-पांच साल के थे, मुहल्ले में हमउम्र बच्चों के साथ खेल रहे थे. एक बच्चे ने कहा- मुसलमान बुरे होते हैं. पर ये चौंकाने वाली बात नहीं थी. क्योंकि ऐसी बातें आम होती हैं. चौंकाने वाली बात इसके बाद हुई. एक दूसरे बच्चे ने कहा- नहीं, अकबर इनका भगवान था. तो अकबर के प्रति शाजी का इंटरेस्ट बचपन से ही बन गया था. बहुत मेहनत और रिसर्च से उन्होंने ‘अकबर’ किताब लिखी. जो राजकमल प्रकाशन से आई है. हम आपको इस किताब से कुछ किस्से पढ़वा रहे हैं-

 1. मौत के वक्त अकबर को याद आया ब्रज भाषा में कहा अपना दोहा


वो हिंदुस्तान के बादशाह अकबर की जिंदगी की आखिरी रात थी. कोई दवा काम नहीं आ रही थी. अकबर के पुराने वैद्य नारायण मिश्रा औऱ हकीम मर चुके थे. नये लोगों पर अकबर बिगड़ जा रहे थे. ईसाई पादरियों ने हुक्का भिजवाया कि पीने से राहत होगी. सब लोग तरह-तरह की बातें डिस्कस कर रहे थे. क्योंकि बहुत लोगों ने अकबर से कहा था कि वो हजार साल तक जियेंगे. पर जीवन के आखिरी वक्त में अकबर को यकीन हो गया था कि वो सारी बातें झूठी थीं. अकबर के यार-दोस्त तानसेन, बीरबल, टोडरमल काफी पहले मर चुके थे. अपने राग-रंग और हंसीबाजियों के लिये मशहूर अकबर की महफिलें कब की खत्म हो चुकी थीं.

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अकबर के दरबार की पेंटिंग

ऐसे में अकबर को अपना ही कहा एक दोहा याद आ रहा था. ब्रज भाषा में कहा गया था. हिंदुस्तान के बादशाह ने किसी भी सब्जेक्ट की तालीम नहीं हासिल की थी. पर आता सब था. दोहा यूं था-

पीथल सूं मजलिस गई तानसेन सूं राग.
हंसबो रमिबो बोलबो गयो बीरबर साथ.

पीथल पृथ्वी राज राठौर को कहा गया था. बीकानेर के योद्धा, कवि औऱ अकबर के दोस्त थे. तानसेन तो राजस्थान और रीवा से होते हुए अकबर के पास पहुंचे थे. कहते हैं कि तानसेन को जब राजा रामचंद्र ने अपने यहां से विदा किया अकबर के पास तो उनकी पालकी को खुद ही कंधा दिया था. कहा था कि बादशाह ने तो आपको हमारे लिए मार ही दिया. बीरबल अपनी जिद और जैन खां कोका के साथ रार के कारण लड़ाई के दौरान मारे गये थे. लाश तक नहीं मिली थी. कई बार अफवाहें उड़तीं कि बीरबल को फलानी जगह देखा गया है. अकबर पड़ताल करवाते पर झूठी बात निकलती. पर ऐसा कभी नहीं हुआ कि कुछ पता चला हो और अकबर ने पता करने के लिये किसी को ना भेजा हो.

2. अकबर की पैगंबरी को लेकर शायरों ने कसे फिकरे


जिस मुगल वंश को लेकर आज भी लोग कहते हैं कि वो आक्रांता थे, उसी वंश के बादशाह ने अपने राज में हर धर्म के लोगों से बात की थी. जिंदगी के मकसद के ऊपर. पंडों, मुल्लों और पादरियों की हर बात का जवाब बादशाह अपनी अक्ल से देता था. इससे सारे चिढ़ जाते थे. तो बादशाह हां, हूं कर फिर मना लेता था. अपना नया धर्म चला लिया बादशाह ने. दीन-ए-इलाही. बीरबल तुरंत इसके मुरीद हो गये. बाकी लोग बहुत घबराये. सबको लगा कि दुनिया के सबसे ताकतवर बादशाहों में से एक अकबर कहीं जबर्दस्ती सबको अपना धर्म ही ना मनवा दे.

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अकबर शिकार पर

हालांकि गांवों में अफवाह उड़ने लगी थी कि बादशाह पैगंबरी के रास्ते में है. चमत्कार करता है. अजमेर के पास खबर चली थी कि एक आदमी को जंगल में शेर ने घेर लिया. उस आदमी ने अपने चारों तरफ एक लकीर खींच ली और बादशाह सलामत का नाम लिया. सुनते ही शेर रुक गया.

इसी बात के मद्देनजर शायरों ने अपना कलाम पढ़ा. शायर तो शायर होते हैं. बादशाह के मुरीद शायर कासिमे काही ने लिखा-

शाहे दीन अकबर मोहम्मद का ऐसा रुतबा और रोब है,
अगर कुफ्र ना होता तो उन्हें दूसरा खुदा कहता.

शेख रहाई ने कहा-

अक्ल हैरान है कि आप कौन हैं?
फरिश्ता भी हैं, इंसान भी,
ना किसी खान में आप जैसा कीमती पत्थर,
ना आसमां में आप जैसा तारा.

अपनी हाजिरजवाबी के लिए मशहूर शायर मुल्ला शेरी ने कहा-

बादशाह इस साल पैगंबरी का दावा करेंगे,
गर खुदा ने चाहा तो अगले साल खुदा बन जाएंगे.

 3. बात करने के शौक से बड़ी रोचक चीजें निकल के आती थीं


पचास साल की हुकूमत में अकबर एक जंग नहीं हारा था. अकबर के दरबार की चकाचौंध देखकर विदेशों से आने वाले लोग हैरान रह जाते थे. तानसेन ने अकबर के बारे में कहा था-

कासी, कास्मीर, कामरू, करनाटक, बूंदी, बुंदेलखंड
मालवा, मुलतान, मेवाड़, खुरासान, बलख, बुखार, गोकुलमंड.
बीजापुर, बंग, बदखसान, रूम, स्याम भरत सम दंड
कहत ‘तानसेन’ सुनौ हुमायूं के नंदन जलालुद्दीन अकबर जाके डर डरात ब्रह्मंड.

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अकबर के दरबार की पेंटिंग

अकबर को बातें करने का बड़ा शौक था. एक बार मियां तानसेन ने दरबार में सूरदास का पद सुनाया-

जसुदा बार-बार यों भाखे,
है कौन ब्रज में हितू, हमारो चलत गुपाल हिं राखे.

अकबर ने इसका मतलब पूछा.

तो तानसेन ने कहा- जसुदा कहती है कि हमारे हित का ध्यान रखने वाला कौन है जो गोपाल को बार-बार मथुरा जाने से रोके. तो अकबर ने बाकी से भी पूछा.
शेख फैजी ने कहा- बार-बार का मायने रोने से है. मतलब जसुदा रो-रो के कह रही हैं.
राजा बीरबल ने कहा- बार-बार का मतलब दरवाजे-दरवाजे यानी जसुदा दरवाजे-दरवाजे जा के कह रही हैं.
एक ज्योतिषी ने कहा- बार का मतलब दिन है. जसुदा हर रोज कहती हैं.
रहीम ने कहा- बार-बार का मतलब है बाल-बाल. जसुदा का हर बाल कहता है.

बादशाह ने पूछा कि सारे लोग अलग-अलग क्यों बता रहे हैं? रहीम ने जवाब दिया कि हर कोई अपनी तरह के मायने ढूंढता है. तानसेन गवैय्या हैं. तो दरबार में बार-बार गाने की वजह से उनको यही लगा. फैजी शायर हैं. रोने-धोने के अलावा क्या जानते हैं. बीरबल ब्राह्मण हैं. दरवाजे-दरवाजे जाते हैं. तो ऐसा मायने बताया. ज्योतिषी को ग्रह-नक्षत्रों के अलावा क्या पता है.

 4. सलीम चिश्ती के नजदीक रहने के लिए फतेहपुर सीकरी बसा दिया, पर जब धर्म से मन उचटा तो आगरा बसा लिया


सलीम चिश्ती से अकबर को बहुत लगाव था. उनके नजदीक रहने के लिए ही फतेहपुर सीकरी का शहर बसाया था. उनके नाम पर बेटे का नाम सलीम रखा था. पर अदब में उसे सलीम कह के नहीं बुलाते थे. अकबर अपने बेटे को शेखू जी कहकर बुलाते थे. एक बार अकबर ने सलीम चिश्ती से पूछा था कि आप इस दुनिया से कब जायेंगे. तो सलीम चिश्ती ने जवाब दिया कि जब शहजादे को किसी उस्ताद से कुछ याद हो जाएगा और मुझे सुना देंगे तो वही मेरा अंत होगा. अकबर ने ताकीद कर दी कि सलीम को कुछ ना सिखाया जाये. पूरी निगरानी रहती थी. पर महल की एक बांदी ने सलीम को एक शेर याद करा दिया-
या खुदा उम्मीद की कली खिला दे,
हमेशा कायम रहने वाले बाग से एक फूल खिला दे.
ये शेर सलीम ने चिश्ती साहब को सुना दिया. कुछ दिन बाद उनकी मौत हो गई.

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दीवान-ए-खास (फतेहपुर सीकरी)

बाद में अकबर का हर धर्म से भरोसा बदलने लगा था. हर धर्म के लोगों से बात करने की वजह से बहुत कुछ पता चलने लगा कि क्यों कोई जबर्दस्ती करता है. अकबर पूछता कि जब ऊपरवाले को सब पता ही है तो फिर इतनी तकलीफ क्यों देता है. अजमेर जाना बंद कर दिया. फिर एक बार फतेहपुर सीकरी से निकला तो आगरा को अपनी राजधानी बना लिया.


अकबर की जिंदगी के बारे में ये किताब एक नया नजरिया देती है. एक बादशाह के जीवन की छोटी-छोटी चीजें बताई गई हैं इस किताब में. सच और फिक्शन दोनों को मिला के लिखा गया है. फिक्शन डालने की कोशिश रोचक बनाने के लिए की गई है. पर तथ्यों को सही रखने की पूरी कोशिश की गई है. हिंदी में इतिहास को पढ़ने के लिए ये नई तरह की कोशिश है. किताब पढ़ी जानी चाहिए. ये उत्साह लेखकों को इतिहास के अन्य पात्रों पर लिखने के लिए प्रेरित करेगा.


 

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राजकमल प्रकाशन

ये स्टोरी ‘दी लल्लनटॉप’ के लिए ऋषभ ने की थी.


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