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'प्राइम टाइम न्यूज का हर घंटा कश्मीर को भारत से एक मील दूर कर देता है'

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Shah Faesal13IAS का एग्जाम टॉप करने वाला पहला कश्मीरी बंदा ख़फा है. स्टेट से ज्यादा मीडिया से. मीडिया में भी नेशनल TV चैनलों से. कश्मीर में बवाल के समय कुछ कुछ न्यूज चैनलों पर उन्हें मिलिटेंट बुरहान वानी से कंपेयर किया गया था. इसे रोल मॉडलों के टकराव की तरह पेश किया गया. कहा गया कि कश्मीरी नौजवान फैसल को आदर्श क्यों नहीं बनाते, वे बुरहान के पीछे क्यों भाग रहे हैं? इस बात से फैसल मीडिया पर बहुत बिगड़े. पहले इस बारे में फेसबुक पर लिखा. फिर नेशनल मीडिया के कश्मीर कवरेज पर एक लेख ही लिख दिया, जो मंगलवार को ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में ‘Between the studio and the street’ टाइटल से छपा है. हम इसका एक हिस्सा हिंदी में यहां दे रहे हैं.


13 जुलाई की दोपहर. मेरा साल भर का बच्चा सो नहीं पा रहा था. बाहर कर्फ्यू था और बगल वाली सड़क आजादी के मनहूस नारों और टियरगैस के धमाकों से गूंज रही थी. कंफ्लिक्ट जोन के बच्चे हिंसा से जल्दी परिचित हो जाते हैं. यहां मैं उसी पल का गवाह बना हुआ था.

मेरे बच्चे पर उसके खाली जेहन के बावजूद कश्मीरी होने का ठप्पा लग चुका है. ख़तने और मुसलमान बनने से पहले ही उसके दिमाग पर कश्मीर के इतिहास की छाप होगी. उसकी आत्मा पर इस्लाम से पहले कश्मीर ने दस्तक दी है.

तीन दशक पहले मेरी स्थिति भी यही थी, जब मैं अपने पिता के साथ था और हमारे घर के पिछवाड़े में मोर्टार शेल धमक रहे थे. लेकिन इस साल की 13 जुलाई कश्मीर के कल और आज के खूनी संगम की याद दिला रही थी. क्योंकि यह 85वां शहादत दिवस था. इस बार सड़कों पर दूसरी वजह से बवाल हो रहा था- 8 जुलाई को कोकरनाग में एक नौजवान मिलिटेंट कमांडर की मौत.

50 हजार सैलरी, 50 लाख का कर्जदार, मैं आदर्श कैसे?

इसी वक्त मुझे किसी ने बताया कि ज़ी न्यूज इस बवाल पर दो दिनों से मैराथन चर्चा करवा रहा है. चैनल पर मेरी तस्वीरें और वीडियोज भी रोल मॉडल के क्लैश के तौर पर दिखाई जा रही हैं. इसने मुझे बहुत बेचैन कर दिया. सिर्फ इस असंवेदनशीलता और सतहीपन ने नहीं, बल्कि इससे मेरी जिंदगी को पैदा हुए खतरे ने भी.

मैं हैरान था कि 50 हजार रुपये महीने की सैलरी और सिर पर 50 लाख के हाउसिंग लोन के साथ मैं सफल कश्मीरी नौजवानों का बेस्ट उदाहरण कैसे हूं.

और जब महानता का एकमात्र पैमाना जनाजे में उमड़ी भीड़ हो तो 50 हजार रुपयों के लिए कौन मरना चाहेगा और कौन चाहेगा कि उसके जनाजे में कोई न आए. मेरे डर सही साबित हुए. जल्दी ही किसी ने बताया कि हमारी कॉलोनी के बाहर भारी भीड़ है. ये भी़ड़ उस न्यूज एंकर की टिप्पणी से गुस्साई है, जिसने टीवी पर कहा था कि मरे हुए मिलिटेंट्स को भारतीय जमीन में दफनाने के बजाय कचरे में जला देना चाहिए.

यहां स्टूडियो और सड़क एक दूसरे से मुकाबला कर रहे हैं

अगले दिन मैं दफ्तर के लिए भेस बदलकर निकला. कुर्ता पायजामा और फार्मर्स कैप पहनकर. पुलिस नाकों के सामने एक चोर की तरह गुजरते हुए. ये जानते हुए कि गुस्साए नौजवानों ने मुझे पहचान लिया तो कश्मीरी बनाम भारतीय की बहस में गलत तरफ आ गिरने के लिए मैं मुश्किल में फंस सकता हूं. मेरी फेसबुक वॉल पर आई गालियों के पीछे भी यही भाव था.

पिछले कुछ सालों में, नेशनल मीडिया का एक हिस्सा अपनी बिजनेस स्ट्रैटजी के तहत कश्मीर में भारत के विचार को गलत तरीके से पेश कर रहा है. वह बाकी मुल्क में कश्मीर के बारे में झूठ भी फैला रहा है. यह 2008 में हुआ, 2010 में हुआ और 2014 में भी. इसलिए इस बहस के झुकाव और टाइमिंग में कुछ भी चौंकाने वाला नहीं है.

खबरी इमारतों का सबसे घटिया पहलू

कश्मीर पर लगभग सारे प्रोग्राम्स का मकसद लोगों को उकसाना लगता है. कवरेज बहुत सेलेक्टिव है जो प्रदेश सरकार के लिए समस्याओं को बढ़ा रही है. हालांकि प्रिंट मीडिया ने हमेशा बैलेंस बनाए रखा है.

बिजनेस के वहशीपन के मारे कुछ न्यूज चैनल लगातार झूठ फैला रहे हैं, लोगों को बांट रहे हैं, नफरत बो रहे हैं, डेमोक्रेसी और सेक्युलरिज्म के मूल्यों का अपमान कर रहे हैं. वो भी तब, जब लोग मर रहे हैं और सरकार लोगों के गुस्से को शांत करने की पूरी कोशिश कर रही है.

टीआरपी को नेशनल इंटरेस्ट बताने की बाजारू बेशर्मी और नौजवानों की लाशों पर धंधा, शोर मचाने वाले उन खबरी इमारतों का सबसे घटिया पहलू है. कश्मीर या कश्मीर के बाहर, भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती इस समय यही है कि ‘नेशनल इंटरेस्ट’ को नेशनल मीडिया के कब्जे से कैसे रिहा कराया जाए और पड़ोसियों और लोगों से बातचीत बहाल की जाए.

मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं कि ज़ी न्यूज, टाइम्स नाऊ, न्यूज एक्स और आज तक उस कैंपेन के सेनापति हैं जो भारत को उसकी संवाद-सभ्यता से एक मूर्ख और अतार्किक सभ्यता की तरफ ले जाएगा.

… तो गुस्सा भारत के खिलाफ ही जाएगा

भारतीय परंपरा में राज्य को लोगों से संवाद करना चाहिए. भाषणों से नहीं, अनुकूल माहौल देकर. हिंसा से नहीं, खुशहाली से. सम्राट अशोक ने खंभों का नेटवर्क बनाकर अपने लोगों से संवाद किया. मुगलकाल में दीवान-ए-आम से डायरेक्ट कम्युनिकेशन होता था, राज्य और उसके अधीनों के बीच. कोई भी ऐरा-गैरा फरमान नहीं सुना सकता था. इसकी इजाजत सिर्फ संप्रभु राज्य को थी. इस्लामी सभ्यता में भी सच, धैर्य और तप संवाद के केंद्र में थे. भारत और इस्लाम के संगम प्रदेश के नाते, कश्मीर को ईमानदारी, सच और सफाई चाहिए. बांटने वाले संवाद से भारत का ही केस कमजोर होगा.

कश्मीर में अकसर लोग नेशनल मीडिया की उग्र एडिटोरियल पॉलिसी को दमनकारी स्टेट पॉलिसी से कंफ्यूज कर जाते हैं. जब टीवी बहसों में कश्मीरी प्रतिनिधियों की खिंचाई की जाती है तो उनके अरमानों का मखौल उड़ता है, उनके दुख अनसुने रह जाते हैं, कश्मीरी क्षेत्रीयता के प्रतीकों का अपमान होता है, या बेकसूरों की मौत से ज्यादा नॉन-ईशूज को अहमियत दी जाती है, जब लोगों के संताप से ज्यादा सेना की बहादुरी को बढ़ावा दिया जाता है, जब प्रदेश सरकार की सकारात्मक पहलों की अनदेखी होती है, और सबसे बड़ी बात, सच नहीं दिखाया जाता, जब गाय कश्मीरी लोगों से ज्यादा महत्वपूर्ण बतलाई जाती हैं, खीझ और गुस्सा जाहिर तौर पर भारत के खिलाफ ही जाएगा.

प्राइम टाइम टीवी न्यूज का हर एग्रेसिव घंटा कश्मीर को भारत से एक मील दूर कर देता है.

नफरत फैलाने वाले इन शीशमहलों पर नकेल कसना आसान नहीं होगा. क्योंकि वे बोलने के अधिकार के संवैधानिक पहरेदार हैं. लेकिन देश की एकता-अखंडता इससे बड़ी जरूरत है. हमें दिल्ली और श्रीनगर के बीच संवाद के असल, पारंपरिक और अतिरिक्त चैनल बहाल करने ही होंगे. जो शोर और कोप को कम कर दें और न्यूजरूम के राष्ट्रवाद को अप्रासंगिक कर दें.

श्रीनगर के किशोरों से पूछिए. वे आपको बताएंगे कि इतनें सालों तक भारत ने कश्मीर से किस जुबान में बात की है. चुनावी धांधलियों के जरिये, चुनी हुई सरकारों को बर्खास्त करके, एनकाउंटर्स और करप्शन के जरिए. वे आपको बताएंगे कि कैसे भारत एक मिलिट्री बंकर, पुलिसिया वाहन या किसी उग्र टीवी पैनलिस्ट का पर्याय बन गया है.

क्या ये वो ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ है जो कश्मीरियों का दिल जीत सकता है? एक कश्मीरी की नजरों में भारत के मायने और प्रतीक क्या हैं, उन्हें स्वीकार करके ही इस गझिन गांठ को खोलने की शुरुआत होगी.

कश्मीरी बहुत सेंसिटिव लोग हैं. लेकिन स्वभाव से वे शक्की भी हैं. उनके साथ संवाद बराबर की शर्तों पर किया जाना चाहिए, एहसान के तौर पर नहीं. रिश्तों में गर्मी होगी, तभी फल लगेगा. प्रधानमंत्री जिन्होंने अपने दम पर भारत की ग्लोबल छवि को बदला है, उन्हें कश्मीर में भारत की छवि बदलने का काम अपने कंधे पर लेना चाहिए.


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