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देश के सबसे बेबस राष्ट्रपति का किस्सा

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ज्ञानी जैल सिंह. देश के सबसे बेबस राष्ट्रपति. जिनके कार्यकाल के दौरान सिखों के पवित्र स्थान स्वर्ण मंदिर में आर्मी का ऑपेरशन हुआ. और फिर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों का कत्ल ए आम. इतना ही नहीं ज्ञानी जैल सिंह पर देश की सत्तारूढ़ पार्टी कांग्रेस के एक सांसद ने संगीन इल्जाम भी लगाए. उनके घर को आतंकवादियों का अड्डा करार दिया. इंदिरा के बाद प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी से कटुता इस कदर बढ़ी कि महाभियोग की चर्चा भी होने लगी.

ये ज्ञानी जैल सिंह की कहानी है. देश के सातवें राष्ट्रपति. जो इस पद पर पहुंचने से पहले विधायक, मंत्री, सांसद, मुख्य मंत्री और केंद्रीय मंत्री भी रहे. ज्ञानी जैल सिंह की पैदाइश हुई 5 मई 1916 को. पंजाब के फरीदकोट जिले में. और निधन हुआ 25 दिसंबर 1994 को. चंडीगढ़ में.

उन्होंने धार्मिक ग्रंथों की पढ़ाई की. इसीलिए ज्ञानी की पदवी भी मिली. फिर कांग्रेस के अंग्रेज विरोधी आंदोलन में शरीक हो गए. फरीदकोट रियासत में कांग्रेस को स्थापित किया. नतीजतन जेल में डाल दिए गए. पांच बरस रहे. आजादी मिली तो रिहाई भी मिली. और उसके बाद कांग्रेस की सरकारों में मंत्री बने. नेहरू की नजर ए इनायत हुई तो आलाकमान से संपर्क भी स्थापित हो गया.

1956 में वाया राज्यसभा सांसद भी बने. सियासी कदमताल के दौरान जैल सिंह ने इंदिरा गांधी का पाला चुना. प्रताप सिंह कैरो की हत्या के बाद पंजाब कांग्रेस में हुई उठापटक के दौरान वह ईनाम से नवाजे गए. उन्हें 1972 में राज्य का मुख्यमंत्री चुना गया. इसके बाद वह इंदिरा कोटरी के और करीब आए. इंदिरा के बेटे संजय गांधी को पंजाब मसलों पर सलाह देने में अव्वल रहे.

ज्ञानी जैल सिंह ने कार्यकाल के शुरुआती दौर में कुछ धार्मिक टोन वाले कदम उठाए. एक हाईवे का नाम सिखों के दसवें गुरु गोविंद सिंह जी के नाम पर रखा. लंदन से सरदार ऊधम सिंह के अवशेष वापस लाए. एक कस्बे का नाम गुरु के पुत्र के नाम पर रखा. और ऐसा करने की उनके पास अपनी वजहें थीं.

दरअसल पंजाब में कांग्रेस को अकालियों से चुनौती मिल रही थी. अकाली पंथिक राजनीति कर रहे थे. धार्मिक प्रतीकों की बात. इस दौरान आनंदपुर साहिब प्रस्ताव भी पास किया गया. इसमें पंजाब को स्वायत्तता के नाम पर ऐसी राजनीतिक मांगें की गईं, जिन्हें मान लिया जाता तो देश में अलगाववाद और भड़कता. तमाम दूसरे राज्य भी दिल्ली को दरकिनार करने की राह पर चल पड़ते. खालिस्तान की मांग भी यहीं से परवान चढ़ी. और इसकी काट के लिए जैल सिंह की सलाह पर भिंडरावाले को आगे लाया गया.

जरनैल सिंह भिंडरावाले. पंजाब की दमदमी टकसाल का मुखिया. कट्टर विचारों से लबरेज धार्मिक नेता. जिसने धर्म में आई कुरीतियों के खिलाफ जेहाद छेड़ दी. उसका ये पवित्रतावादी रुख एक बड़े तबके को बहुत पसंद आया. उसकी तकरीरों में लाखों लोग पहुंचने लगे. धीमे धीमे वह एक कल्ट में तब्दील हो गया. और तगड़ी फॉलोइंग के साथ सत्ता और ताकत भी पहुंच में दिखाई देने लगी. जिस भिंडरावाले को कथित तौर पर जैल सिंह अपने राजनीतिक आका संजय गांधी से मिलवाने लाए थे, वही अब कांग्रेस को चुनौती देने लगा. इंदिरा गांधी की खुलेआम खिल्ली उड़ाने लगा. और पंजाब के गैरसिखों में आतंक फैलाने लगा. इस दौरान उस पर कई मुकदमे भी दर्ज हुए. मगर अब तक भिंडरावाले एक समानांतर सत्ता बन चुका था.

आलम ये था कि 80 के शुरुआती दशक में हत्या के मामले में वांछित भिंडरावाले दिल्ली आया. समर्थकों के साथ खुली जीप में घूमा. और कानून को ठेंगा दिखा पंजाब लौट गया. मगर इंदिरा सरकार के तत्कालीन गृह मंत्री ज्ञानी जैल सिंह की समझाइश ये थी कि उसे गिरफ्तार न किया जाए. वर्ना हालात और भड़क जाएंगे.

पंजाब में हालात बेकाबू होते जा रहे थे. ऐसे में एक राजनीतिक संदेश देने के लिए इंदिरा गांधी ने 1982 में अपने कैबिनेट मंत्री ज्ञानी जैल सिंह को राष्ट्रपति पद के लिए कांग्रेस का उम्मीदवार बना दिया. और फिर कुछ ही दिनों में ज्ञानी जी निर्विरोध देश के राष्ट्रपति चुन लिए गए. उस दौरान ज्ञानी जैल सिंह ने इंदिरा गांधी के प्रति अपनी वफादारी जताते हुए बयान दिया. मैं अपनी नेता का हर आदेश मानता हूं. अगर इंदिरा जी कहेंगी कि मैं झाडू़ उठाकर सफाई करूं तो मैं जमादार भी बन जाऊंगा. उनके कहने पर ही मैं राष्ट्रपति बन रहा हूं.

मगर इसके बाद इंदिरा गांधी के पंजाब प्लान में उनके लिए जगह नहीं रह गई. आलम ये हुआ कि इंदिरा गांधी ने भिंडरावाले और उसके समर्थकों को स्वर्ण मंदिर से बाहर निकालने क के लिए प्रस्तावित सेना के ऑपरेशन ब्लू स्टार की राष्ट्रपति को भनक भी नहीं लगने दी. उन दिनों ये अफवाहें भी चलीं कि राष्ट्रपति का पंजाब के अलगाववादी तत्वों की तरफ नरम रुख है.

जून 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ. सेना स्वर्ण मंदिर में गई. भीतर आतंकवादियों ने फौजी ढंग की तैयारियां कर रखी थीं. ऐसे में भारी हथियारों और तोपों का इस्तेमाल करना पड़ा. भिंडरावाले और उसके कमांडर रिटायर्ड जनरल सहबेग सिंह समेत तमाम चरमपंथी मारे गए. मंदिर परिसर में फंसे कई श्रद्धालु भी चपेट में आए. सिखों के लिए पवित्र अकाल तख्त को भारी नुकसान पहुंचा. पूरे देश में आशंका, आक्रोश का माहौल बन गया.

ऐसे में देश के पहले सिख राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह पर दबाव बढ़ा. इस्तीफा देने का. ऐसी सरकार का विरोध करने का, जिसने उनकी कौम के सबसे पवित्र घर पर हमला किया. मगर ज्ञानी जैल सिंह को उनके समझदार समर्थकों ने समझाया. कि ऐसे वक्त में ये सियासी कदम उठाने से सिखों और गैरसिखों के बीच की फांक और गहरी हो जाएगी. दूरी इतनी बढ़ जाएगी कि पाटना मुश्किल होगा.

जैल सिंह इंदिरा सरकार से बेतरह नाराज थे. उन्होंने मांग रखी कि वाया दूरदर्शन वह देश के नाम संदेश दें. फिर वह जिद पर अड़े कि उन्हें स्वर्ण मंदिर हर हाल में जाना है. और वह गए भी. पुख्ता सुरक्षा व्यवस्था के बीच. तब तक मंदिर में सफाई का काम भी ढंग से शुरू नहीं हो पाया था. ये तो छोड़िए. सेना ने परिसर को पूरी तरह से सुरक्षित भी घोषित नहीं किया था. मगर प्रेजिडेंट के सामने किसी की एक न चली. उस दौरान एक अनहोनी भी होते होते रह गई. परिसर में गोली चली. जो राष्ट्रपति के नजदीक चल रहे सुरक्षा गार्ड को लगी.

जून में ये सब हुआ और चार महीने बाद 31 अक्टूबर 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई. उनके अपने ही सुरक्षा दस्ते के दो जवानों ने. जो धर्म से सिख थे. उस वक्त राष्ट्रपति ओमान के राजकीय दौरे पर थे. और इंदिरा के राजनीतिक वारिस राजीव गांधी पं. बंगाल के दौरे पर थे. उनके साथ थे इंदिरा के दो वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री गनी खान चौधरी और प्रणव मुखर्जी.

राजीव आनन फानन में दिल्ली लौटे. सलाह ये हुई कि पहले उन्हें प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलवाई जाए और उसके बाद देश को बताया जाए. कि इंदिरा गांधी नहीं रहीं. ऐसे वक्त में गांधी परिवार के कुछ करीबियों मसलन अरुण नेहरू वगैरह ने एक पेच ला दिया. उन्हें ये अंदेशा था कि ज्ञानी जैल सिंह पलटी मार सकते हैं. बदला निकाल सकते हैं. परंपरा का हवाला देकर राजीव गांधी को शपथ दिलाने के बजाय प्रणव मुखर्जी जैसे किसी वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री के हाथ कमान सौंप सकते हैं सरकार की. और इससे बचने का एक फॉर्मूला बताया गया. कि राष्ट्रपति के ओमान से लौटने का इंतजार न किया जाए. उपराष्ट्रपति आर वेंकटरमण के हाथों शपथ दिला दी जाए.

प्रणव मुखर्जी और ओल्ड गार्ड के कई नेताओं ने इस सुझाव का विरोध किया. राजीव भी उनसे सहमत थे. ज्ञानी जैल सिंह लौटे और उन्होंने राष्ट्रपति भवन के अपने दफ्तर में ही राजीव गांधी को शपथ दिलवाई. मगर ये नए प्रधानमंत्री से उनका अगले कुछ रोज तक पहला और आखिरी मुखामुखम था. 31 अक्टूबर की दोपहर से ही दिल्ली और देश में सिख विरोधी दंगे भड़कने लगे. इस दौरान पुलिस प्रशासन ज्यादातर जगहों पर तमाशबीन बना रहा. गुस्साई भीड़ पूरी की पूरी कौम को संगठित ढंग से निशाना बनाने लगी.

ज्ञानी जैल सिंह तक भी इसकी खबर पहुंची. उन्होंने प्रधानमंत्री से लेकर गृह मंत्री और पुलिस प्रशासन तक पहुंचने की कई कोशिशें कीं. मगर नतीजा सिफर रहा. राष्ट्रपित को कई जगहों पर लोगों के बचाव के लिए अपने सुरक्षा गार्ड और गाड़ियां भेजनी पड़ीं.

इस वाकये के बाद जैल सिंह के भीतर खलिश भर गई. कांग्रेस और गांधी परिवार को लेकर. उनके और राजीव गांधी के बीच मनमुटाव बढ़ता ही गया. आलम ये हुआ कि एक दफा लोकसभा में राजीव के करीबी कांग्रेसी सांसद केके तिवारी ने राष्ट्रपति भवन को आतंकवादियों की शरणस्थली बता दिया. ज्ञानी जैल सिंह इस पर बिफर हो गए. उन्होंने राजीव गांधी पर दबाव डाला. और राजीव को न चाहते हुए भी तिवारी पर कार्रवाई करनी पड़ी.

राजीव और राष्ट्रपति के बीच राजनीतिक रस्साकशी और भी तगड़ी हो गई. एक संवैधानिक व्यवस्था के सहारे ज्ञानी जैल सिंह ने सरकार पर नकेल कसनी चाही. राजीव सरकार ने पोस्टल एमेंडमेंट बिल भेजा. ज्ञानी जैल सिंह पॉकेट वीटो का इस्तेमाल कर गए. इसके तहत राष्ट्रपति स्वीकृति के लिए आए किसी बिल को अनियमित काल तक अपने पास रोक सकते हैं.

राजीव गांधी इस हरकत से बेहद नाखुश हुए. उनकी किचन कैबिनेट के कई सदस्यों ने कहा. अब राष्ट्रपति पर महाभियोग चलाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा. वह देश की चुनी हुई सरकार के काम में अड़ंगा डाल रहे हैं. उधर कुछ सलाहकारों ने कहा. ऐसा करने से पंजाब की अलगाववादी समस्या और बढ़ जाएगी. राजीव गांधी उस वक्त अकाली दल मुखिया लोंगोवाल के साथ समझौते की तैयारी में थे. ऐसे में जैल सिंह के खिलाफ सरकार थमी रही.

कार्यकाल पूरा करने के बाद जैल सिंह राजनीतिक निर्वासन में चले गए. खबर में आए बरसों बाद. 29 नवंबर 1994 को. जब उनकी कार का पंजाब में रोपड़ के पास भयानक एक्सिडेंट हुआ. ज्ञानी जैल सिंह जख्मी हुए, पंजाब के पीजीआई में भर्ती हुए और यहीं 25 दिसंबर को उनका निधन हो गया. केंद्र में उस वक्त कांग्रेस की सरकार थी. मगर गांधी परिवार की रिट नहीं चलती थी. राज था पीवी नरसिम्हा राव का. उन्होंने ज्ञानी जैल सिंह का बापू के समाधिस्थल राजघाट पर अंतिम संस्कार करवाया. और इस तरह एक राजनीतिक शख्सियत की जिंदगी का अंत हुआ.

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