Submit your post

Follow Us

वो राष्ट्रपति, जिसकी नीतियों से ज्यादा उसकी लव स्टोरी पर बात हुई

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों भारत आ रहे हैं. कुछ लोग कहते हैं कि अमेरिका में ट्रंप के राष्ट्रपति बनने का इनको बड़ा फायदा हुआ. कि ट्रंप से डरे लोगों ने उन जैसी बात करने वाले इनके विरोधी उम्मीदवार को नहीं जिताया.

एक साल मेहनत करो और मुल्क का राष्ट्रपति बन जाओ. ये किसी सपने जैसा लगता है. लेकिन फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों के साथ ये हुआ. इतनी अच्छी शुरुआत हर किसी को नहीं मिलती. वो भी बस 39 साल की उम्र में. फ्रांस में राष्ट्रपति चुनाव हुए. दक्षिणपंथी मरीन ला पैन के जीतने की बड़ी संभावना थी. वैसे भी, दुनिया में दक्षिणपंथ लगातार उभार पर है. कई देशों की राजनीति में राइटिस्ट हावी हो रहे हैं. तो लग रहा था कि फ्रांस का नतीजा भी ऐसा ही होगा. मगर ऐसा नहीं हुआ. मैक्रों जीते, मरीन हारीं. फ्रांस के अलावा बस नीदरलैंड्स ही है, जहां हालिया चुनावों में राइट को शह नहीं मिल पाई. जैसे, उत्तर का उल्टा दक्षिण होता है. दाहिने का उल्टा बायां होता है. वैसे मैक्रों दक्षिणपंथ के अपोजिट, यानी वामपंथी नहीं हैं.

बहुत टॉप क्लास पियानो बजाते हैं
21 दिसंबर, 1977 को पैदा हुए. पिकार्डी शहर में. मां-पापा दोनों डॉक्टर. मैक्रों पियानो बहुत अच्छा बजाते हैं. फिलॉसफी में मास्टर्स की डिग्री है उनके पास. मैक्रों नैशनल स्कूल ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन से पढ़े हुए हैं. फ्रांस की सिविल सर्विस में जो टॉप के लोग होते हैं, उनमें से ज्यादातर इसी जगह से पढ़े होते हैं. इस संस्थान ने फ्रांस को तीन राष्ट्रपति दिए हैं. एक तो खुद मैक्रों हुए. दूसरे थे फ्रांस्वा ओलांद. तीसरे थे जैक चिराक.

इमैनुअल मैक्रों को अमेरिका में ट्रंप की मौजूदगी ने फायदा पहुंचाया. ट्रंप के आने के बाद उनके बयानों और उनकी नीतियों को देखकर फ्रांस का एक बड़ा धड़ा अपने देश में फार-राइट को सत्ता में नहीं देखना चाहता था.
इमैनुअल मैक्रों को अमेरिका में ट्रंप की मौजूदगी ने फायदा पहुंचाया. ट्रंप के आने के बाद उनके बयानों और उनकी नीतियों को देखकर फ्रांस का एक बड़ा धड़ा अपने देश में फार-राइट को सत्ता में नहीं देखना चाहता था.

दो आईफोन साथ रखते हैं
ग्रैजुएशन करने के बाद मैक्रों ने मिनिस्टरी ऑफ इकॉनमी में बतौर फाइनैंशल इंस्पेक्टर काम किया. फिर रॉथ्स्चाइल्ड ऐंड साइ बैंक में काम करने लगे. इन्वेस्टमेंट बैंकर के तौर पर. मैक्रों एक समय में सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े हुए थे. करीब तीन साल तक इसके सदस्य रहे थे. जब मैक्रों फ्रांस्वा ओलांद सरकार में पहले-पहल शामिल हुए, तो वो उनके निजी कर्मचारियों की हैसियत से काम कर रहे थे. बाद में उन्हें इकॉनमी, इंडस्ट्री ऐंड डिजिटल अफेयर्स का मंत्री बना दिया गया. उस समय फ्रांस के प्रधानमंत्री थे मैनुअल वाल्स. डिजिटल वाला प्रोफाइल बहुत ठीक था मैक्रों के लिए. अपने पास भी वो दो आईफोन रखते हैं. वॉट्सऐप खूब इस्तेमाल करते हैं. हाईटेक हैं.

राष्ट्रपति बने, तो सबसे ज्यादा बातें इनकी लव स्टोरी पर हुईं
मैक्रों के राष्ट्रपति बनने के बाद उनकी लव स्टोरी पर खूब बातें हुईं. पता लगा कि 15 साल की उम्र में उन्हें खुद से 24 साल बड़ी ड्रामा टीचर ब्रिजिट से मुहब्बत हो गई. ब्रेजिट शादीशुदा थीं. उनके तीन बच्चे थे. मैक्रों के माता-पिता को जब ये बात पता चली, तो उन्होंने मैक्रों को वापस पैरिस भेज दिया. ताकि प्यार का बुखार उनके सिर से उतर जाए. लेकिन मैक्रों ने ब्रिजिट को प्यार करना नहीं छोड़ा. कहा कि शादी करेंगे, तो उनसे ही करेंगे. ब्रिजिट हिचक रही थीं. खुद से इतनी छोटी उम्र के लड़के के साथ शादी करने के लिए खुद को मना नहीं पा रही थीं. मगर मैक्रों लगातार उन्हें राजी करने की कोशिश करते रहे. और आखिरकार ब्रेजिट मान गईं. शादी के वक्त मैक्रों 30 साल के थे. ब्रेजिट 54 की थीं. ये शादी पूरे फ्रेंच इलेक्शन के दौरान उछलती रही. कुछ विरोधियों ने कहा कि मैक्रों असल में गे हैं. मगर इस बात को छुपाने के लिए उन्होंने ब्रेजिट से शादी की. और ये नाटक कर रहे हैं.

मैक्रों बस 15 बरस के थे, जब उन्हें ब्रेजिट से मुहब्बत हुई. ब्रेजिट उनसे 25 साल बड़ी हैं. मैक्रों के मां-पिता ने उनका ध्यान ब्रेजिट से हटाने की बहुत कोशिश की, लेकिन मैक्रों शादी करके ही माने.
मैक्रों बस 15 बरस के थे, जब उन्हें ब्रेजिट से मुहब्बत हुई. ब्रेजिट उनसे 25 साल बड़ी हैं. मैक्रों के मां-पिता ने उनका ध्यान ब्रेजिट से हटाने की बहुत कोशिश की, लेकिन मैक्रों शादी करके ही माने.

न दाहिने, न बायें… एकदम बीच में
राजनैतिक विचारधारा में एक होता है दक्षिणपंथ. एक होता है वामपंथ. फिर एक होता है सेंटर लेफ्ट. यानी, बीच में हैं लेकिन थोड़ा झुकाव लेफ्ट की तरफ है. एक होता है सेंटर राइट. यानी सेंट्रिस्ट हैं, लेकिन हल्का झुकाव राइट की ओर है. तो ये मैक्रों सेंट्रिस्ट हैं. मैक्रों का कहना है कि लेफ्ट और राइट, दोनों ही बेकार हैं. इनके पास आज की दुनिया को देने लायक कुछ नहीं रह गया है. ये दोनों ही चलन से बाहर हो गए हैं. ये मैक्रों का कहना है. वो रेडिकल सेंट्रिस्ट हैं. सेंट्रिस्ट यानी बीच में चलने वाला. न लेफ्ट, न राइट. एक किस्म का संतुलनवादी. उनके पास न तो सेंटर-लेफ्ट का सपोर्ट था, न ही सेंटर-राइट का. 1958 से लेकर अब तक फ्रांस की सत्ता में कमोबेश ये ही लोग रहे हैं.

कई लोग मैक्रों को मौकापरस्त भी कहते हैं. इन लोगों का कहना है कि लोकप्रियता कम होते देखकर मैक्रों सरकार से निकल गए और अपनी अलग पार्टी बना ली.
कई लोग मैक्रों को मौकापरस्त भी कहते हैं. इन लोगों का कहना है कि ओलांद सरकार की लोकप्रियता कम होते देखकर मैक्रों सरकार से निकल गए और अपनी अलग पार्टी बना ली.

एक साल की मेहनत में राष्ट्रपति बन गए
6 अप्रैल, 2016 को मैक्रों ने अपनी पार्टी एन मार्शे लॉन्च की थी. एक छोटे से कमरे से. लोगों ने कहा था कि सब हवा-हवाई है. साल भर बाद मैक्रों राष्ट्रपति बन गए. ये किसी परी कथा जैसा है. एक साल की मेहनत ने इतने बड़े मुकाम पर पहुंचा दिया. हालांकि इसमें बहुत बड़ा हाथ फ्रांस के राजनैतिक माहौल का भी रहा. लोग मौजूदा चीजों से नाराज थे. उन्हें लगा कि उन्होंने सबको मौका देकर देख लिया. चूंकि मैक्रों नई तरह की बातें कर रहे थे, तो लोगों को उनमें उम्मीद दिखी. मैक्रों का नया होना और राजनैतिक बैकग्राउंड से होना उनके पक्ष में गया. अमेरिका में ट्रंप के होने से भी थोड़ा फायदा मिला मैक्रों को. फ्रांस के लोग ट्रंप को ज्यादा पसंद नहीं करते. उन्हें लगा कि अगर मरीन जीतीं, तो वो भी ट्रंप की तरह बर्ताव करेंगी.

लेफ्ट और राइट, दोनों की खिचड़ी
मैक्रों को एक और चीज का फायदा मिला. फ्रांस के राष्ट्रपति चुनाव में सबसे मजबूत प्रत्याशी मरीन ही थीं. तो बाकी सारी पार्टियां उन्हें हराने में लगी थीं. मैक्रों लगातार अलग बातें कर रहे थे. किसी किस्म की अतिरेकता से बच रहे थे. उनका बैलेंस लोगों को आकर्षित कर रहा था. मैक्रों की राजनीति असल में चरम सेंट्रिस्ट है. एक इतिहासकार हुए. पियरे सर्ना. उन्होंने दुनिया को एक शब्द दिया था- एक्स्ट्रीम सेंटर. तो मैक्रों की पॉलिटिक्स ऐसी ही है. मसलन- मैक्रों पब्लिक सेक्टर का खर्च कम करने की बात करते हैं. पांच साल के अंदर 120,000 नौकरियां खत्म करने की बात करते हैं. ये राइटिस्ट नीतियां हैं. दूसरी तरफ वो पर्यावरण, स्वास्थ्य और कृषि क्षेत्रों में बड़े स्तर पर निवेश का भी वादा करते हैं. वो खुद को फ्रांस की क्रांति के मूल्यों का रक्षक भी बताते हैं. तो कुल मिलाकर वो जैसा कहते हैं- नो लेफ्ट, नो राइट- वैसी ही उनकी नीतियां भी हैं. मिली-जुली. खिचड़ीनुमा.

फ्रांस में एक किस्म के इस्लामोफोबिया की स्थिति है. आतंकवादी घटनाओं के बाद इसमें इजाफा ही हुआ है. मैक्रों की एक बड़ी चुनौती इस नफरत को बढ़ने रोकना है. लेकिन उनके अंदर ऐसे संवेदनशील मामलों से बचकर निकलने की एक कातरता दिखती है.
फ्रांस में एक किस्म के इस्लामोफोबिया की स्थिति है. आतंकवादी घटनाओं के बाद इसमें इजाफा ही हुआ है. मैक्रों की एक बड़ी चुनौती इस नफरत को बढ़ने रोकना है. लेकिन उनके अंदर ऐसे संवेदनशील मामलों से बचकर निकलने की एक कातरता दिखती है.

मैक्रों का जिनसे सीधा मुकाबला था, वो बहुत कट्टर हैं
पिछले कुछ समय से फ्रांस लगातार आतंकवाद से जूझ रहा है. एक ओर आतंकवादी हमले. दूसरी तरफ उसके कई नागरिक सीरिया और इराक में जाकर इस्लामिक स्टेट से मिल गए. उसकी तरफ से लड़े. ये फ्रांस में कट्टरपंथ के बढ़ते असर का संकेत था. शरणार्थी संकट के कारण चुनौतियां और बढ़ीं. ऊपर से इस्लाम के साथ फ्रांस का पसीना-घमौरी जैसा रिश्ता. ये चीजें फ्रांस में बड़ी बहस का मुद्दा बन गईं. पिछले कुछ समय से फ्रांस ने मुस्लिमों के लिए कई ऐसी नीतियां बनाई हैं, जिन्हें पक्षपाती कहा जा सकता है. फ्रांस में एक बड़ा धड़ा चाहता है कि मुस्लिम सार्वजनिक तौर पर कम मुसलमान नजर आएं. कहने को इसका मतलब ये बताया जाता है कि लोग सेक्युलर रहें. सेक्युलर दिखें.

मरीन की कट्टरता का फायदा मिला मैक्रों को
रिफ्यूजियों पर ला पैन ने बेहद कड़ी बातें बोली थीं. वो सारे शरणार्थियों को फ्रांस से निकालने के पक्ष में थी. उनके मुताबिक, फ्रांस में बाहरियों के लिए कोई जगह नहीं है. फ्रांस फ्रेंच क्रांति की जमीन है. फ्रेंच क्रांति इस दुनिया की सबसे महान क्रांतियों में से एक है. बल्कि कई लोग इसे सबसे महान क्रांति मानते हैं. इस क्रांति के आदर्श, इसके मूल्य बहुत ऊंचे थे. बहुत महान. आजादी, बराबरी, भाईचारा. तो फ्रांस का एक बहुत बड़ा धड़ा अब भी वैसे ही मूल्यों पर यकीन करता है. लिबरल है. फ्रांस के इस लिबरल समाज ने मरीन ला पैन को स्वीकार नहीं किया. मरीन लोकप्रिय तो थीं. लेकिन इतनी लोकप्रिय नहीं हो पाईं कि चुनाव जीत लें.

मरीन के बेहद कट्टरपंथी विचारों का फायदा मैक्रों को मिला. हालांकि चुनाव नतीजे आने से पहले ये लग नहीं रहा था. मरीन ज्यादा मजबूत नजर आ रही थीं. नीदरलैंड्स के बाद फ्रांस में ही दक्षिणपंथी धड़े की साफ-साफ हार नजर आई.
ट्रंप को लेकर यूरोप में बहुत अच्छी राय नहीं है. उनके आने के बाद से लोग फार-राइट को लेकर सजग हुए हैं. उन्हें उदाहरण के लिए ट्रंप मिल गए हैं. शायद इसीलिए मरीन के बेहद कट्टरपंथी विचारों का फायदा मैक्रों को मिला. नीदरलैंड्स के बाद फ्रांस में ही दक्षिणपंथी धड़े की साफ-साफ हार नजर आई.

कोई मसीहा टाइप नहीं हैं मैक्रों
अब आप पूछेंगे कि मैक्रों का स्टैंड क्या था? नहीं, मैक्रों शरणार्थियों के हिमायती नहीं थे. चुनाव के वक्त उन्होंने कहा था कि बॉर्डर की रक्षा के लिए 5,000 लोगों की एक फोर्स बनाएंगे. चुनाव में एक तरफ उन्होंने इमिग्रेशन सिस्टम को लचीला बनाने का वादा किया था. दूसरी तरफ ये कहा कि फ्रांस की नागरिकता लेने की अनिवार्य शर्त होगी कि आवेदक को धड़ाधड़ फ्रेंच बोलना आता हो. और ये भी कि वो सभी धर्मों से जुड़े लोगों से उम्मीद करेंगे कि वो अपने धर्म को मानने के साथ-साथ फ्रांस की धर्मनिरपेक्षता का भी सम्मान करें. यानी, फ्रांस में जो बहस चल रही है कि धार्मिक तौर-तरीकों से ज्यादा तवज्जो फ्रेंच वैल्यूज़ को मिलनी चाहिए, कुछ-कुछ वैसा ही. मैक्रों ने ये भी कहा था कि जिन शरणार्थियों की असालयम याचिका खारिज हो जाएगी, उन्हें तुरंत उनके देश वापस भेज दिया जाएगा. ऐसा नहीं कि वो मसीहा टाइप हों. या उदार हों.

शरणार्थी संकट पूरे यूरोप में एक बड़ा मुद्दा है. जर्मनी के चुनाव में ये एक बड़ा मसला था. फ्रांस में ये एक बड़ा मुद्दा है.
शरणार्थी संकट पूरे यूरोप में एक बड़ा मुद्दा है. जर्मनी के चुनाव में ये एक बड़ा मसला था. फ्रांस में ये एक बड़ा मुद्दा है.

अर्थव्यवस्था के लिए अभी तक कुछ खास नहीं कर पाए हैं
मैक्रों ने अर्थव्यवस्था में सुधार के खूब वादे किए थे. उन्होंने कहा था कि वो फ्रांस का आर्थिक घाटा कम करेंगे. इकॉनमी को दुरुस्त करेंगे. विकास दर तेज करेंगे. और बेरोजगारी घटाएंगे. अब तक इन सब मामलों में बहुत मामूली सुधार आया है. फ्रांस में विकास दर 1.8 फीसद है. बेरोजगारी भी कम नहीं हुई है. वैसे मैक्रों ने अपने आगे बहुत बड़ा लक्ष्य रखा हो- ऐसा भी नहीं. उन्होंने पांच साल में सात फीसद बेरोजगारी कम करने की बात की है. एक ओर उन्होंने बेरोजगारी घटाने की बात की. दूसरी तरफ वो 14,000 सिविल सेवा के अधिकारियों को निकालने की भी बातें करते हैं. लेबर रिफॉर्म्स के नाम पर उनकी सरकार कारखानों के मालिकों को ज्यादा ताकतवर बना रही है. ताकि किसी मजदूर को नौकरी से निकालना उनके लिए आसान हो जाए. कुल मिलाकर देखा जाए, तो उनकी कई बातें विरोधाभासी होती हैं.

EU के समर्थक
ऐसे समय में जबकि यूरोप के कई देशों में यूरोपियन यूनियन से अलग होने की सुगबुगाहट है, तो फ्रांस को मैक्रों मिले. जो एक यूरोप, संगठित यूरोप में भरोसा करते हैं. मैक्रों की एक बड़ी महत्वाकांक्षा यूरोपियन यूनियन में एका करना है. कि ब्रेग्जिट जैसी कोई और घटना न हो. जबकि उन्होंने खुद कहा था. कि अगर फ्रांस में लोगों को EU से निकलने या उसमें बने रहने पर वोट देने को कहा जाए, तो ज्यादातर नागरिक EU छोड़ने का समर्थन करेंगे. मैक्रों ने तो ये तक प्रस्ताव रखा था कि पूरे यूरोपियन यूनियन का एक ही बजट हो. एक ही वित्तमंत्री हो. मैक्रों चाहते हैं कि जर्मनी भी उनके इस प्रस्ताव पर सहमति दे. हालांकि मैक्रों की उस बात पर कि EU के पास अपनी एक सेना हो, जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल भी सहमति रखती है. दोनों को लगता है कि यूरोप की सुरक्षा के लिए ये बेहद जरूरी है. लेकिन बस जर्मनी के सहमत होने से तो ये हो नहीं जाएगा. और ऐसे समय में जब कि यूरोप के अंदर मिलकर रहने की इच्छा लगातार घटती जा रही है, ये एकमत बनना मुश्किल लगता है.

मैक्रों और उनकी पत्नी की उम्र में इतने बड़े फासले पर कुछ लोगों ने ये भी कहा कि मैक्रों गे हैं. इसे छुपाने के लिए उन्होंने ब्रेजिट से शादी करने का नाटक किया हुआ है. तस्वीर में ब्रेजिट सबसे बाईं ओर खड़ी हैं.
मैक्रों और उनकी पत्नी की उम्र में इतने बड़े फासले पर कुछ लोगों ने ये भी कहा कि मैक्रों गे हैं. इसे छुपाने के लिए उन्होंने ब्रेजिट से शादी करने का नाटक किया हुआ है. तस्वीर में ब्रेजिट सबसे बाईं ओर खड़ी हैं.

रूस को नापंसद करते हैं
मैक्रों रूस की विदेश नीति के आलोचक हैं. यूक्रेन में रूस की दखलंदाजी और क्रीमिया एपिसोड के बाद यूरोपियन यूनियन ने रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे. मैक्रों ने इन प्रतिबंधों को सपोर्ट किया. वो सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल-असद को नरसंहार का दोषी मानते हैं. उनके मुताबिक, असद को एक अंतरराष्ट्रीय ट्राइब्यूनल के सामने पेश किया जाना चाहिए. और उन्हें उनके किए की सजा मिलनी चाहिए.

जितनी बातें करते हैं, उतना काम दिखता नहीं है
चुनाव के समय मैक्रों के लिए जो उत्साह था, वो घटा है. लोग उन्हें विरोधाभासी कहने लगे हैं. कई मौकों पर वो बेहद चालाक लगते हैं. जैसे एक वाकया हुआ. उन्होंने एक बार फ्रांस के पत्रकारों से कहा कि वो उनकी सोच को समझने के काबिल नहीं. इसीलिए वो उनसे (पत्रकारों से) बात नहीं करेंगे. ये बहुत अड़ियल रवैया है. कुछ-कुछ ट्रंप जैसा. फिर एक और बात है. मैक्रों जब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आते हैं, तो बहुत उदार बातें करते हैं. लेकिन फ्रांस के आंतरिक मामलों में उनकी उदारता ज्यादा नजर नहीं आती. सत्ता में आने के करीब 9-10 महीने बाद उनको देखकर क्या लगता है? कि वो बातें तो बड़ी-बड़ी करते हैं. लेकिन उतना परफॉर्म नहीं कर पाते. मैक्रों की ज्यादातर चीजें ऐसी ही हैं. जिनका कामयाब होना बहुत मुश्किल लगता है. फिलहाल तो ये आशंका जताई जा रही है कि उनके पांच साल के कार्यकाल में जैसे-जैसे समय आगे बढ़ेगा, उनकी लोकप्रियता गिरती जाएगी. वैसे अभी उन्हें आए बहुत वक्त नहीं हुआ. नेताओं के पास कोई जादू की छड़ी नहीं होती. कि रातो-रात वादे पूरे कर दें. उन्हें वक्त दिया जाना चाहिए. जो कि उनके पास है. वो कितना बेहतर कर पाते हैं, ये तो आगे ही पता लग पाएगा.


ये भी पढ़ें:

फ्रांस में जो प्रेसिडेंट बने हैं, उनको वहां का अरविंद केजरीवाल कह सकते हैं

फ्रांस के नए प्रेसिडेंट, जिन्होंने 17 की उम्र में 42 साल की टीचर को प्रपोज किया था


अस्मां जहांगीर, जिसे पाकिस्तानी कहते थे- तुम भारत चली जाओ

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

गंदी बात

अपने गांव की बोली बोलने में शर्म क्यों आती है आपको?

अपने गांव की बोली बोलने में शर्म क्यों आती है आपको?

ये पोस्ट दूर-दराज गांव से आए स्टूडेंट्स जो डीयू या दूसरी यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे हैं, उनके लिए है.

बहू-ससुर, भाभी-देवर, पड़ोसन: सिंगल स्क्रीन से फोन की स्क्रीन तक कैसे पहुंचीं एडल्ट फ़िल्में

बहू-ससुर, भाभी-देवर, पड़ोसन: सिंगल स्क्रीन से फोन की स्क्रीन तक कैसे पहुंचीं एडल्ट फ़िल्में

जिन फिल्मों को परिवार के साथ नहीं देख सकते, वो हमारे बारे में क्या बताती हैं?

चरमसुख, चरमोत्कर्ष, ऑर्गैज़म: तेजस्वी सूर्या की बात पर हंगामा है क्यों बरपा?

चरमसुख, चरमोत्कर्ष, ऑर्गैज़म: तेजस्वी सूर्या की बात पर हंगामा है क्यों बरपा?

या इलाही ये माजरा क्या है?

राष्ट्रपति का चुनाव लड़ रहे शख्स से बच्चे ने पूछा- मैं सबको कैसे बताऊं कि मैं गे हूं?

राष्ट्रपति का चुनाव लड़ रहे शख्स से बच्चे ने पूछा- मैं सबको कैसे बताऊं कि मैं गे हूं?

जवाब दिल जीत लेगा.

'इस्मत आपा वाला हफ्ता' शुरू हो गया, पहली कहानी पढ़िए लिहाफ

'इस्मत आपा वाला हफ्ता' शुरू हो गया, पहली कहानी पढ़िए लिहाफ

उस अंधेरे में बेगम जान का लिहाफ ऐसे हिलता था, जैसे उसमें हाथी बंद हो.

PubG वाले हैं क्या?

PubG वाले हैं क्या?

जबसे वीडियो गेम्स आए हैं, तबसे ही वे पॉपुलर कल्चर का हिस्सा रहे हैं. ये सोचते हुए डर लगता है कि जो पीढ़ी आज बड़ी हो रही है, उसके नास्टैल्जिया का हिस्सा पबजी होगा.

Lefthanders Day: बायां हाथ 'उल्टा' ही क्यों हैं, 'सीधा' क्यों नहीं?

Lefthanders Day: बायां हाथ 'उल्टा' ही क्यों हैं, 'सीधा' क्यों नहीं?

मेरा बाएं-हत्था होना लोगों को चौंकाता है. और उनका सवाल मुझे चौंकाता है.

फेसबुक पर हनीमून की तस्वीरें लगाने वाली लड़की और घर के नाम से पुकारने वाली आंटियां

फेसबुक पर हनीमून की तस्वीरें लगाने वाली लड़की और घर के नाम से पुकारने वाली आंटियां

और बिना बैकग्राउंड देखे सेल्फी खींचकर लगाने वाली अन्य औरतें.

'अगर लड़की शराब पी सकती है, तो किसी भी लड़के के साथ सो सकती है'

'अगर लड़की शराब पी सकती है, तो किसी भी लड़के के साथ सो सकती है'

पढ़िए फिल्म 'पिंक' से दर्जन भर धांसू डायलॉग.

मुनासिर ने प्रीति को छह बार चाकू भोंककर क्यों मारा?

मुनासिर ने प्रीति को छह बार चाकू भोंककर क्यों मारा?

ऐसा क्या हुआ, कि सरे राह दौड़ा-दौड़ाकर उसकी हत्या की?

सौरभ से सवाल

दिव्या भारती की मौत कैसे हुई?

दिव्या भारती की मौत कैसे हुई?

खिड़की पर बैठी दिव्या ने लिविंग रूम की तरफ मुड़कर देखा. और अपना एक हाथ खिड़की की चौखट को मजबूती से पकड़ने के लिए बढ़ाया.

कहां है 'सिर्फ तुम' की हीरोइन प्रिया गिल, जिसने स्वेटर पर दीपक बनाकर संजय कपूर को भेजा था?

कहां है 'सिर्फ तुम' की हीरोइन प्रिया गिल, जिसने स्वेटर पर दीपक बनाकर संजय कपूर को भेजा था?

'सिर्फ तुम' के बाद क्या-क्या किया उन्होंने?

बॉलीवुड में सबसे बड़ा खान कौन है?

बॉलीवुड में सबसे बड़ा खान कौन है?

सबसे बड़े खान का नाम सुनकर आपका फिल्मी ज्ञान जमीन पर लोटने लगेगा. और जो झटका लगेगा तो हमेशा के लिए बुद्धि खुल जाएगी आपकी.

'कसौटी ज़िंदगी की' वाली प्रेरणा, जो अनुराग और मिस्टर बजाज से बार-बार शादी करती रही

'कसौटी ज़िंदगी की' वाली प्रेरणा, जो अनुराग और मिस्टर बजाज से बार-बार शादी करती रही

कहां है टेलीविज़न का वो आइकॉनिक किरदार निभाने वाली ऐक्ट्रेस श्वेता तिवारी?

एक्ट्रेस मंदाकिनी आज की डेट में कहां हैं?

एक्ट्रेस मंदाकिनी आज की डेट में कहां हैं?

मंदाकिनी जिन्हें 99 फीसदी भारतीय सिर्फ दो वजहों से याद करते हैं

सर, मेरा सवाल है कि एक्ट्रेस मीनाक्षी शेषाद्री आजकल कहां हैं. काफी सालों से उनका कोई पता नहीं.

सर, मेरा सवाल है कि एक्ट्रेस मीनाक्षी शेषाद्री आजकल कहां हैं. काफी सालों से उनका कोई पता नहीं.

‘दामिनी’ के जरिए नई ऊंचाई तक पहुंचा मीनाक्षी का करियर . फिर घातक के बाद 1996 में उन्होंने मुंबई फिल्म इंडस्ट्री को बाय बोल दिया.

ये KRK कौन है. हमेशा सुर्खियों में क्यों रहता है?

ये KRK कौन है. हमेशा सुर्खियों में क्यों रहता है?

केआरके इंटरनेट एज का ऐसा प्रॉडक्ट हैं, जो हर दिन कुछ ऐसा नया गंधाता करना रचना चाहता है.

एक्ट्रेस किमी काटकर अब कहां हैं?

एक्ट्रेस किमी काटकर अब कहां हैं?

एडवेंचर ऑफ टॉर्जन की हिरोइन किमी काटकर अब ऑस्ट्रेलिया में हैं. सीधी सादी लाइफ बिना किसी एडवेंचर के

चाय बनाने को 'जैसे पापात्माओं को नर्क में उबाला जा रहा हो' कौन सी कहानी में कहा है?

चाय बनाने को 'जैसे पापात्माओं को नर्क में उबाला जा रहा हो' कौन सी कहानी में कहा है?

बहुत समय पहले से बहुत समय बाद की बात है. इलाहाबाद में थे. जेब में थे रुपये 20. खरीदी हंस...

सर आजकल मुझे अजीब सा फील होता है क्या करूं?

सर आजकल मुझे अजीब सा फील होता है क्या करूं?

खुड्डी पर बैठा था. ऊपर से हेलिकॉप्टर निकला. मुझे लगा. बाबा ने बांस गहरे बोए होते तो ऊंचे उगते.