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फ्रांस क्यों मुसलमानों को पोर्क खिलाना चाहता है?

फ्रांस में इस्लाम के लिए नफरत लगातार बढ़ी है. ये वहां के सबसे बड़े राष्ट्रीय मुद्दों में से एक है.

मई 2017. फ्रांस में चुनाव हुए. मुकाबला दो ध्रुवों का था. एक ओर थे इमैनुअल मैक्रों. दूसरी तरफ मरीन ला पैन. पिछले कई दशकों से फ्रांस ने इतना करीबी मुकाबला नहीं देखा था. मरीन के जीतने की संभावनाएं ज्यादा थीं. लेकिन जीते मैक्रों. लोगों ने देखा कि जब दुनिया दक्षिणपंथ की ओर दौड़ रही है, तब फ्रांस ने दक्षिणपंथ को हरा दिया. मैक्रों क्या जीते, दक्षिणपंथ के कट्टरपन से झुंझलाए लोगों को उम्मीद नजर आने लगी. लगा, फ्रांस राह दिखाएगा. वैसे ही, जैसे कभी फ्रांस की क्रांति ने दुनिया को राह दिखाई थी.

बड़े मौके पर राष्ट्रपति बने मैक्रों
मैक्रों की टाइमिंग अच्छी थी. जिस वक्त वो राष्ट्रपति बने, वो उनके ‘वर्ल्ड लीडर’ बनने के लिए माकूल था. क्यों? क्योंकि अमेरिका में डॉनल्ड ट्रंप थे. ट्रंप के आने के बाद से अमेरिकी सुपिरियॉरिटी चारों खाने चित्त हो गई थी. क्या अमेरिका के अंदर और क्या बाहर, हर जगह ट्रंप का मजाक उड़ रहा था. बचा ब्रिटेन. तो वो ब्रेग्जिट में उलझा था. वैसे भी पिछले कुछ दशकों से ब्रिटेन की भूमिका एक किस्म के ‘अमेरिकी उपनिवेश’ की हो गई है. अमेरिका जो करता है, उसमें ब्रिटेन शामिल रहता है. इसके बाद था जर्मनी. न केवल जर्मनी बतौर देश, बल्कि उसकी मुखिया एंजेला मर्केल खुद भी वर्ल्ड लीडर बनने की सही दावेदार हैं. मगर, जर्मनी में भी चुनाव होने थे. और जर्मन चुनाव ने देश के अंदर बढ़ रहे दक्षिणपंथ को सामने लाकर रख दिया. इन सबके बीच फ्रांस था. और वहां मैक्रों आ गए थे. जाहिर है, स्थितियां बहुत मुफीद थीं उनके लिए. कॉम्पीटिशन कम था.

इमैनुअल मैक्रों के आलोचक कहते हैं कि वो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तो मुखर रहते हैं, लेकिन फ्रांस के भीतर के मुद्दों पर बोलने से कतराते हैं. विवादित मुद्दों को पकड़ने से हिचकते हैं.
इमैनुअल मैक्रों के आलोचक कहते हैं कि वो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तो मुखर रहते हैं, लेकिन फ्रांस के भीतर के मुद्दों पर बोलने से कतराते हैं. विवादित मुद्दों को पकड़ने से हिचकते हैं.

दुनियाभर की बातों पर खूब बोलते हैं मैक्रों
फिर मैक्रों हर जगह दिखने लगे. अंतरराष्ट्रीय मंचों पर. दुनिया को जिन चीजों से फर्क पड़ता था, उनके ऊपर बोलने लगे. जब ट्रंप ने पैरिस क्लाइमेट डील से निकलने की बात कही, तो मैक्रों ने उन्हें सुना दिया. फिर जब ट्रंप ने अमेरिकी दूतावास को तेल अवीव की जगह जेरुसलम ले जाने की बात कही, तब भी मैक्रों बोले. फिर नवंबर 2017 में लेबनन के प्रधानमंत्री साद हरीरी को सऊदी ने करीब-करीब बंधक बना लिया. इस बहाने ईरान और सऊदी की फिर ठन गई. दोनों के बीच तनाव एकदम थर्मामीटर पार चला गया. ऐसे में मैक्रों ने बीच-बचाव की कोशिश की. सऊदी के शहजादे मुहम्मद बिन सलमान से बात की. उन्हें मनाने की कोशिश की. कि साद हरीरी को जाने दें. उन्हें पैरिस भेज दें. ऐसा हुआ भी. हरीरी पैरिस आए. वहां से बेरुत गए. फिर दिसंबर 2017 में मैक्रों पहुंचे कतर. उसके साथ ट्रेड डील की. ये सब इसलिए कि कतर-सऊदी झगड़े में वो किसी एक टीम की साइड लेते नजर न आएं. लोग तो ये तक कहने लगे कि 39 साल का ये नया-नवेला नेता दुनिया के उदारवादी खेमे का अगुआ बन जाएगा. मगर ये सब फ्रांस के बाहर की बात है. फ्रांस के अंदर का हाल इससे अलग है.

फ्रांस को ज्यादा खुश नहीं कर पाए हैं मैक्रों
इमैनुअल मैक्रों फ्रांस को ज्यादा खुश नहीं कर पाए हैं. फ्रांस में लोगों का कहना है कि बाहरी मुद्दों पर इतनी हिम्मत दिखाने वाले मैक्रों फ्रांस में बेहद डरपोक नजर आते हैं. सही जगह सही बात करने की हिम्मत नहीं दिखाते. खासकर इस्लाम से जुड़ी बहस पर. इस्लाम और फ्रांस का रिश्ता थोड़ा रिस्की है. पिछले कुछ वक्त से. जैसे पीठ और घमौरी का होता है, वैसे ही. दूसरा मुद्दा है राष्ट्रीय पहचान का. जिसको अंग्रेजी में नैशनल आइडेंटिटी बोलते हैं. ये दोनों मुद्दे भी बहुत जुड़े हुए हैं.

 

फ्रांस ने बुर्का बैन किया. फिर एक फरमान आया. कि स्कूली बच्चों को दिए जाने वाले खाने में जो पोर्क होता है, उससे मुसलमानों को छूट नहीं मिलेगी. उनको भी खाना होगा ये. बाद में ये मामला अदालत में गया. कोर्ट ने कहा कि स्कूलों को बिना पोर्क वाले खाने का विकल्प देना होगा.
फ्रांस ने बुर्का बैन किया. फिर एक फरमान आया. कि स्कूली बच्चों को दिए जाने वाले खाने में जो पोर्क होता है, उससे मुसलमानों को छूट नहीं मिलेगी. उनको भी खाना होगा ये. बाद में ये मामला अदालत में गया. कोर्ट ने कहा कि स्कूलों को बिना पोर्क वाले खाने का विकल्प देना होगा.

बुर्का बैन से समझिए, माजरा क्या है
नैशनल आइडेंटिटी को बुर्का बैन के नजरिये से समझिए. कि किसी फ्रेंच नागरिक के लिए बड़ी पहचान क्या है? उसका मजहब? या उसका मुल्क? यानी फ्रांस में रहना है, तो एक खास तरह से रहना होगा. अपने मजहबी नियमों-विश्वासों से ऊपर उठना होगा. इसी नैशनल आइडेंटिटी के लिए फ्रांस ने स्कूली बच्चों को दिए जाने वाले खाने में पोर्क रखवाया. फिर चाहे वो मुसलमान ही क्यों न हो. ये जानते हुए भी कि इस्लाम में पोर्क को हराम माना जाता है. फ्रांस का तर्क था कि नियम सबके लिए एक बराबर हों. हालांकि बाद में कोर्ट ने कहा कि स्कूलों को बिना पोर्क वाले खाने का विकल्प भी मुहैया कराना होगा. फ्रांस जो ऐसे नियम बना रहा है, उसके पीछे उसका तर्क है. उसका कहना है कि कोई इतना अलग न जीये कि सबसे अलग हो जाए. मतलब कि धर्म निजी चीज है. सार्वजनिक तौर पर हर किसी को सेक्युलर होना चाहिए. सेक्युलर दिखना चाहिए. मतलब आपका बुर्का या फिर आपके सिर पर रखा हिजाब आपको सेक्युलर नहीं रहना देता है! इस्लाम और नैशनल आइडेंटिटी दोनों ही चीजें फ्रांस में बड़ी बहस का मुद्दा हैं. और दोनों ही चीजों पर मैक्रों चुप्पी लगा जाते हैं.

फ्रांस में इस्लामोफोबिया बहुत बढ़ गया है
चुनाव के समय मरीन इस्लाम पर खूब बोलती थीं. शरणार्थियों पर बोलती थीं. फ्रांस में आकर बसने वाले ‘बाहरियों’ पर बोलती थीं. मरीन का कहना था कि इस्लाम फ्रांस के लिए खतरा है. कि इस्लाम फ्रांस को घुटनों पर ले आएगा. उसे असहाय करके छोड़ेगा. मरीन फ्रांस के अंदर शरणार्थियों को भी नहीं देखना चाहती थीं. मरीन भले हार गई हों, मगर उनके उठाए मुद्दों ने दम नहीं तोड़ा. फ्रांस में ये बहस चलती रही. आतंकवादी हमलों के बाद ये बहस लगातार उग्र होती गई.

यूरोप के कई देशों ने बुर्के पर प्रतिबंध लगाया. तर्क दिया गया कि ये सुरक्षा के लिहाज से लिया गया फैसला है. अगर ऐसा है, तो हिजाब पर पाबंदी क्यों? उससे तो बस सिर ढकता है. चेहरा तो खुला रहता है.
यूरोप के कई देशों ने बुर्के पर प्रतिबंध लगाया. तर्क दिया गया कि ये सुरक्षा के लिहाज से लिया गया फैसला है. अगर ऐसा है, तो हिजाब पर पाबंदी क्यों? उससे तो बस सिर ढकता है. चेहरा तो खुला रहता है.

तारिक रमदान स्कैंडल के बाद मामला और बड़ा हो गया
कुछ महीनों पहले फ्रांस में एक बड़ा विवाद हुआ. तारिक रमदान को लेकर. तारिक ऑक्सफर्ड में प्रफेसर हैं. वैसे स्विट्जरलैंड के रहने वाले हैं. इस्लामिक स्टडीज पढ़ाते हैं. मॉडर्न इस्लाम पर बहुत काम किया है उन्होंने. जानी-मानी शख्सियत हैं. मिस्र में मुस्लिम ब्रदरहुड आंदोलन शुरू लकरने वाले हसन अल-बना के नाती हैं. उनके पिता सैद रमदान खुद भी मुस्लिम ब्रदरहुड के नेता हैं. उन्हें मिस्र छोड़ना पड़ा था. हेंडा अयारी नाम की एक लेखिका ने उनके ऊपर बलात्कार का आरोप लगाया. फिर एक और महिला सामने आईं. उन्होंने भी तारिक पर रेप का इल्जाम लगाया. फ्रांस की पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. जल्द ही ये बहस इस्लाम की तरफ मुड़ गई. ऐसा इसलिए कि पिछले दो दशक से फ्रांस के अंदर तारिक काफी विवादित रहे हैं. उनके ऊपर फ्रांस के मुस्लिम युवाओं को ‘अति इस्लामिक’ बनाने का आरोप लगता रहा है. कि वो युवाओं को प्रभावित करते हैं. और तारिक के प्रभाव की वजह से ये युवा धर्मनिरपेक्षता, लिंग और सेक्शुऐलिटी जैसे अहम मुद्दों पर इस्लामिक नजरिये को ज्यादा तवज्जो देते हैं. फ्रांस के मूल्यों को नजरंदाज करते हैं.

फ्रांस के मुस्लिमों के बीच बहुत लोकप्रिय हैं तारिक
फ्रांस के मुस्लिम वर्ग में काफी लोकप्रिय हैं तारिक. मगर बाकी फ्रांस उनको कुछ खास पसंद नहीं करता. इसकी वजह भी है. इस्लाम का सबसे कट्टर पंथ है- सलफी. तारिक इसी से ताल्लुक रखते हैं. कहते हैं कि औरतों को तमीज के कपड़े पहनने चाहिए. तारिक के भाई हैं हनी रमदान. वो स्वीट्जरलैंड में रहते हैं. वो और आगे हैं. उनकी नजर में समलैंगिकता पाप है. और? ये भी कि 9/11 को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुआ हमला पश्चिमी देशों की साजिश थी. एक बार खुद तारिक ने एक टेलिविजन डिबेट में कहा था. कि वो ‘पराये मर्द के साथ रिश्ते बनाने वाली’ औरतों को पत्थर मार-मारकर जान से मारने की प्रथा पर बैन लगाने के खिलाफ हैं. ये चीज ताबूत में आखिरी कील थी. इसके बाद से ही फ्रांस के बुद्धिजीवी उन्हें अपने लिए खतरा मानने लगे. उन्होंने फ्रांस की नागरिकता के लिए अप्लाई किया था. मगर नाकाम रहे. जबकि उनकी पत्नी फ्रांस की नागरिक हैं.

जब मैक्रों चुनाव जीते, तो लोगों की दिलचस्पी उनकी निजी जिंदगी में ज्यादा थी. उनकी पत्नी के बारे में ज्यादा उत्सुकता थी लोगों के अंदर. कि मैक्रों और उनकी पत्नी में उम्र का इतना अंतर क्यों है? तकरीबन हर जगह ही मैक्रों की लव स्टोरी पर खबरें बनीं.
जब मैक्रों चुनाव जीते, तो लोगों की दिलचस्पी उनकी निजी जिंदगी में ज्यादा थी. उनकी पत्नी के बारे में ज्यादा उत्सुकता थी लोगों के अंदर. कि मैक्रों और उनकी पत्नी में उम्र का इतना अंतर क्यों है? तकरीबन हर जगह ही मैक्रों की लव स्टोरी पर खबरें बनीं.

मैक्रों बोलते कहां हैं?
इसीलिए लोग चाह रहे थे कि मैक्रों कुछ बोलें. कि फ्रांस के लोगों को सार्वजनिक जीवन में कैसा होना चाहिए? किन मूल्यों पर यकीन करना चाहिए? मगर चुनाव जीतने के बाद से मैक्रों ऐसे मुद्दों पर बोलने से बचते आए हैं. उन्होंने इस तरह के सामाजिक मुद्दों से किनारा किया है. हालांकि वो अर्थव्यवस्था को बेहतर करने पर काम कर रहे हैं. मगर आलोचकों का कहना है कि एक जरूरी चीज करके दूसरे जरूरी मुद्दों को दरकिनार करना, आपको बेहतर नहीं बनाता. कि देश के नेता को सारे जरूरी सवालों का जवाब देना चाहिए. इस एक सवाल पर मैक्रों करीब-करीब फेल नजर आते हैं.

मैक्रों की चुप्पी दक्षिणपंथ को शह देगी
एक और नजरिया है इस मामले का. अगर फ्रांस में उठी ये बहस गलत है, तब भी तो मैक्रों का चुप रहना नहीं बनता. उन्हें सही और गलत तय करने की हिम्मत तो करनी ही होगी. क्योंकि फिलहाल वो फ्रांस के राष्ट्रपति हैं. ये उनकी जिम्मेदारी है. पिछले कुछ समय से फ्रांस के अंदर इस्लाम के प्रति नफरत की भावना मजबूत हुई है. ऐसे में मैक्रों की चुप्पी से फ्रांस में दक्षिणपंथियों के हावी होने का खतरा है. राष्ट्रीय पहचान के नाम पर नस्लीय भेदभाव करने वालों के ताकतवर होने का जोखिम है. और मैक्रों की चुप्पी इसलिए भी अखरती है कि वो बाहर बहुत मुखर रहते हैं. कहते हैं कि एक संगठित यूरोप ही कट्टर दक्षिणपंथ को हरा सकता है. उसके खिलाफ सबसे कारगर हथियार साबित हो सकता है.

मरीन भले ही चुनाव हार गई हों, मगर मैक्रों की जीत ने फ्रांस के अंदर मजबूत हो रहे दक्षिणपंथ को रोका नहीं. इस्लाम और राष्ट्रीय पहचान, ये दोनों चीजें फ्रांस के अंदर बड़ा सवाल हैं. और ये दोनों का ही लेना-देना मुसलमानों के साथ है.
मरीन भले ही चुनाव हार गई हों, मगर मैक्रों की जीत ने फ्रांस के अंदर मजबूत हो रहे दक्षिणपंथ को रोका नहीं. इस्लाम और राष्ट्रीय पहचान, ये दोनों चीजें फ्रांस के अंदर बड़ा सवाल हैं. और ये दोनों का ही लेना-देना मुसलमानों के साथ है.

कथनी और करनी में बहुत फर्क दिखता है
अक्टूबर 2017 में फ्रांस ने एक नए कानून को मंजूरी दी. इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर पुलिस और अन्य एजेंसियों को खास अधिकार दिए गए. नए कानून से फ्रांस में पुलिस की ताकत काफी बढ़ गई. उसे हक मिला कि वो चाहे, तो शक के आधार पर किसी के भी घर-दफ्तर की तलाशी ले सकती है. संदिग्धों को नजरबंद कर सकती है. पुलिस चाहे तो कभी भी, किसी को भी रोककर उसकी तलाशी ले सकती है. इस सबमें अदालत की दखलंदाजी बहुत सीमित होगी. लोगों का कहना है कि ये कानून असल में फ्रांस के अंदर मुस्लिमों के साथ पक्षपात को समर्थन देगा. नागरिक अधिकारों की वकालत करने वाले फ्रांस पर ये कानून जमता नहीं है. चूंकि ये सब मैक्रों की सरकार ने किया, तो ये बात ज्यादा चुभती है. कहां तो वो बाकी देशों को सहिष्णुता और मानवाधिकार का उपदेश देते हैं. और कहां अपने यहां ऐसे तानाशाही कानून को पास करवा रहे हैं.

शायद इन्हीं वजहों से मैक्रों प्लास्टिक से बने किसी फूल की तरह लगते हैं. जो दूर से देखने में अच्छा है. मगर पास जाओ, तो मालूम चल जाता है कि वो असली नहीं है. इमैनुअल मैक्रों के दो अवतार हैं. एक तो बाहर की दुनिया के लिए. दूसरा फ्रांस के लिए. दोनों में काफी अंतर है.


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