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यलगार परिषद की बैठक से लेकर कथित 'माओवादियों' की गिरफ्तारी की पूरी कहानी

28 अगस्त, 2018. सुबह से पूरे देश में छापे पड़ते हैं जिनमें कई लेखकों, पत्रकारों, वकीलों और कथित तौर पर माओवादी विचारधारा वाले लोगों की गिरफ्तारी होती है. और एक चिट्ठी का ज़िक्र आता है जिसमें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जान से मारने की साज़िश की बात है. वैसे, जैसे राजीव गांधी को मारा गया था.

अब ढेर सारा कंफ्यूज़न है. लगातार नई जानकारियां आ रही हैं. कोई ”अर्बन नक्सल” जैसे शब्द उछाल रहा है तो कोई कह रहा है ये सरकार के खिलाफ आवाज़ उठाने वालों को दबाने की कोशिश है. फिर राजनीति भी है. कांग्रेस नेता संजय निरुपम कुछ वक्त पहले कह चुके हैं कि ये बहाना है. मोदी की लोकप्रियता कम होती है और वो अपनी हत्या की खबर चला देते हैं.

और फिर है इतिहास. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई गई. ध्यान नहीं दिया गया, नतीजा, उनके ही बॉडीगार्ड्स ने उन्हें गोली मार दी. ठीक इसी तरह प्रधानमंत्री पद के दावेदार राजीव गांधी की जान को खतरा बताया गया, सुरक्षा में चूक हुई और लिट्टे के एक मानव बम ने उन्हें माला पनाकर मौत के घाट उतार दिया.

तो मामला सीरियस है. प्रधानमंत्री की जान को खतरा हो तो भी, सरकार के खिलाफ उठने वाली आवाज़ को दबाने की कोशिश हो तो भी और पीएम की लोकप्रियता बढ़ाने की कोशिश हो तो भी. हम अपने तईं कोशिश करेंगे कि पूरा मामला सिलसिलेवार ढंग से आपको समझाएं ताकि ये कंफ्यूज़न कुछ दूर हो.

भीमा कोरेगांव में अंग्रेज़ों और पेशवा की लड़ाई में मारे गए फौजियों की याद में बना स्मारक. यही सालाना जलसा होता है.
भीमा कोरेगांव में अंग्रेज़ों और पेशवा की लड़ाई में मारे गए फौजियों की याद में बना स्मारक. यही सालाना जलसा होता है.

भीमा-कोरेगांव की हिंसा और प्लानिंग का इल्ज़ाम

इस पूरे मामले की शुरूआत होती है 1 जनवरी, 2018 को भीमा कोरेगांव नाम के एक कस्बे में. पुणे के पास मौजूद इस जगह पर 1818 में अंग्रेज़ और पेशवा की फौज लड़ी थी. जीतने वाली अंग्रेज़ फौज में एक रेजिमेंट महार जाति के जवानों की थी. महार महाराष्ट्र का एक दलित समाज है. 1941 में अपने एक भाषण में अम्बेडकर ने भीमा-कोरेगांव का जिक्र करते हुए कहा कि इस जगह महारों ने पेशवा को हराया था. इस भाषण ने भीमा-कोरेगांव को दलित अस्मिता का केंद्र बना दिया.

इस साल माने 2018 में लड़ाई की 200 वीं सालगिरह थी, तो एक बड़ा जलसा हुआ भीमा कोरेगांव के स्मारक पर. इस जलसे के दौरान हिंसा हुई. इल्ज़ाम लगा महाराष्ट्र की अगड़ी जातियों के लोगों ने जलसे पर हमला किया. इसके बाद पुणे और आसपास के इलाकों में दलित गुटों के प्रदर्शन हुए जिस दौरान हिंसा हुई.

भीमा कोरेगांव स्मारक पर हुई हिंसा के बाद पूरे महाराष्ट्र में दलित गुटों के प्रदर्शन हुए थे. (फोटोःपीटीआई)
भीमा कोरेगांव स्मारक पर हुई हिंसा के बाद पूरे महाराष्ट्र में दलित गुटों के प्रदर्शन हुए थे. (फोटोःपीटीआई)

यलगार परिषद की बैठक – जहां से गिरफ्तारियों की शुरुआत हुई

तो पुलिस ने मामले की जांच शुरू की. पुलिस की थ्योरी थी कि 1 जनवरी, 2018 से शुरू हुई हिंसा पूरी प्लानिंग के साथ हुई थी. इसके तहत भीमा कोरेगांव में 31 दिसंबर, 2017 को यलगार परिषद की एक बैठक हुई. इसी बैठक में दिए भाषणों के चलते हिंसा हुई. परिषद से संबंध के आरोप में 6 जून, 2018 को पुणे से 6 लोगों की गिरफ्तारियां हुईं. इनके नाम थे रोना विल्सन, दलित कार्यकर्ता सुधीर ढवले, वकील सुरेंद्र गडलिंग, प्रोफेसर शोमा सेन और सामाजिक कार्यकर्ता महेश राउत.

लेकिन 8 जून को मामला कुछ और ही हो गया. देशभर की मीडिया में एक लेटर जारी हुआ जिसमें लिखा था,

”हम राजीव गांधी जैसी घटना के बारे में सोच रहे हैं. ये आत्महत्या जैसा सुनाई देता है. और बहुत संभावना है कि हम नाकाम रहें. लेकिन हमें लगता है कि पार्टी पोलित ब्यूरो सेंट्रल कमेटी को इस पर विचार करना चाहिए. उनका रोड शो टारगेट करना प्रभावी रणनीति हो सकता है. हम सोचते हैं कि पार्टी का बचा रहना किसी भी शहादत से बड़ा है.”

पुलिस के मुताबिक ये लेटर रोना विल्सन की गिरफ्तारी के दौरान मिला.
पुलिस के मुताबिक ये लेटर रोना विल्सन की गिरफ्तारी के दौरान मिला.

पूरे प्लान का बजट बताया गया 8 करोड़. इसके लिए अमरीकी राइफर एम 4 और 4 लाख राउंड कारतूस का इंतज़ाम होना था. 18 अप्रैल, 2017 की तारीख वाला ये लेटर किसी कॉमरेड प्रकाश को लिखा था. लिखने वाले की जगह सिर्फ एक अक्षर था – ‘R’. पुलिस के मुताबिक ये खत रोना विल्सन के दिल्ली वाले घर से बरामद हुआ था. पुलिस का कहना था कि रोना विल्सन समेत ये सारे लोग प्रतिबंधित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के सदस्य थे. लेकिन इनके साथी कार्यकर्ता और लेखक वरवर राव के मुताबिक ये लोग राजनीतिक कैदियों की रिहाई के लिए काम कर रहे थे. इसके बाद गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने प्रधानमंत्री के सुरक्षा इंतज़ाम की खुद समीक्षा की थी. इसके बाद कुछ दिन के लिए खामोशी छा गई.

28 अगस्त के छापों में क्या हुआ?

इस दिन पुणे पुलिस ने दिल्ली, हैदराबाद, रांची और गोआ में एक साथ कई जगह छापे मारे. इसमें पत्रकार गौतम नवलखा, पी वरवरा राव, वर्नन गोंज़ाल्वेस, अरुण फरेरा और मानवाधिकार कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज और फादर स्टैन स्वामी के नाम शामिल हैं. ये बड़े जाने पहचाने नाम हैं इसीलिए इनकी गिरफ्तारी पर बवाल मचा हुआ है. सबसे पहले आप ये जान लीजिए कि ये लोग हैं कौनः

सुधा भारद्वाज ने छत्तीसगढ़ में मानवाधिकार पर लंबे अरसे से काम किया है.
सुधा भारद्वाज ने छत्तीसगढ़ में मानवाधिकार पर लंबे अरसे से काम किया है.

1. सुधा भारद्वाज

आईआईटी कानपुर से गणित की पढ़ाई करने वाली सुधा कॉलेज से निकलीं, तो मोटी आमदनी वाली नौकरी कर सकती थीं. लेकिन वो बनीं मानवाधिकार कार्यकर्ता. पेशे से वकील और नैशनल लॉ यूनिवर्सिटी में विजिटिंग प्रफेसर सुधा पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज की राष्ट्रीय सचिव हैं. बीते कई सालों से छत्तीसगढ़ उनके काम का बेस रहा है. 1982 में जब ट्रेड यूनियन लीडर शंकर गुहा नियोगी को नैशनल सिक्यॉरिटी ऐक्ट में गिरफ्तार किया गया, तब उन्हें छुड़ाने के अभियान चलाने वालों में सुधा भी शामिल थीं. बाद में वो नियोगी के संगठन ‘छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा’ (CMM) से भी जुड़ गईं. सुधा ने अपने बचाव में कहा है कि मैं कहीं से लेकर कहीं तक भीमा कोरेगांव वाले मामले में शामिल नहीं हूं. ये सरकार बदले की नीयत से कार्रवाई कर रही है

वरनन गोंज़ाल्विस ने जेल में रहने के दौरान जेलबर्ड जब्बार नाम की कहानी लिखी थी जो खूब चर्चित हुई.
वरनन गोंज़ाल्विस ने जेल में रहने के दौरान जेलबर्ड जब्बार नाम की कहानी लिखी थी जो खूब चर्चित हुई.

2. वरनन गोंजाल्विस

वरनन का प्रफेशनल करियर बहुत चमकदार रहा है. एमकॉम में गोल्ड मेडलिस्ट हैं. मुंबई के एक कॉलेज में प्रफेसर रह चुके हैं. ट्रेड यूनियन नेता भी रहे हैं. 2007 महाराष्ट्र ATS ने उन्हें गिरफ्तार किया इल्जाम थे नक्सलियों से सहानुभूति रखना, भारत के खिलाफ छापामार युद्ध और ऐसे ही तमाम इल्जाम. जेल में बंद रहते हुए उन्होंने एक कहानी लिखी- जेलबर्ड जब्बार. जेल में बंद वरनन की कानूनी लड़ाई संभाली उनकी बीवी सुजैन अब्राहम ने. कोर्ट से उन्हें आर्म्स एक्ट और दूसरी धाराओं में सज़ा हुई लेकिन चूंकि वरनन पहले ही काफी वक्त जेल में गुजार चुके थे, सो उन्हें रिहाई मिल गई.

वरवर राव. ये नक्सल आंदोलन के प्रति सहानुभूति रखने वाले विचारक माने जाते हैं. इनकी खूब सारी किताबें भी प्रकाशित हुई हैं.
वरवर राव. ये नक्सल आंदोलन के प्रति सहानुभूति रखने वाले विचारक माने जाते हैं. इनकी खूब सारी किताबें भी प्रकाशित हुई हैं.

3. वरवर राव

मार्क्सवादी आलोचक पी वरवरा राव पिछले करीब चार दशक से आंध्र प्रदेश के नक्सल आंदोलन से जुड़े हुए हैं. नक्सल क्रांति के गीत लिखते हैं, जिनकी दस वॉल्यूम छप चुकी है. साल 2000 में जब आंध्र प्रदेश सरकार ने पहली बार माओवादियों के साथ बातचीत शुरू की, तब इसमें वरवरा राव भी शामिल थे. ये बातचीत फेल रही थी. जब माओवादी नेता किशन जी मारा गया, तब वरवरा राव ने कहा था कि पश्चिम बंगाल पुलिस ने कस्टडी में रखकर पहले किशनजी को टॉर्चर किया और फिर फर्जी एनकाउंटर में हत्या कर दी.

गौतम नवलखा पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं. छत्तीसगढ़ और जम्मू और कश्मीर में इनका फील्डवर्क रहा है.
गौतम नवलखा पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं. छत्तीसगढ़ और जम्मू और कश्मीर में इनका फील्डवर्क रहा है.

4. गौतम नवलखा
पत्रकार गौतम नवलखा मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं. कश्मीर और छत्तीसगढ़ में इन्होंने बहुत काम किया है. कश्मीर में जनमत संग्रह के पक्षधर हैं. इकॉनमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली के एडिटोरियल कंसल्टेंट रह चुके हैं.

अरुण फेरेरा और उनकी किताब का कवर.
अरुण फेरेरा और उनकी किताब का कवर.

5. अरुण फेरेरा

वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता अरुण फरेरा ने मुंबई में झुग्गी-झोपड़ी वालों के लिए काम किया है. ग्रामीण महाराष्ट्र में रहने वाले आदिवासियों के बीच भी इनका काम रहा है. 2007 में अरुण फरेरा को माओवादी बताकर गिरफ्तार कर लिया गया. इल्जाम था कि वो नागपुर स्थित ‘दीक्षाभूमि कॉम्प्लैक्स’ को उड़ाने की साजिश रच रहे हैं. ये वही जगह है, जहां भीमराम आंबेडकर ने बौद्ध धर्म अपनाया था. सितंबर 2011 में कोर्ट ने उन्हें सारे इल्जामों से बरी कर दिया. फिर उनके ऊपर दो और इल्जाम लग गए. गैरकानूनी तरीके से हथियार रखने और पुलिस पर गोली चलाने का अतिरिक्त आरोप लगा दिया गया. वो जमानत पर रिहा कर दिए गए. जेल से बाहर आकर उन्होंने एक किताब लिखी- कलर्स ऑफ द केज़. गिरफ्तारी के बाद अरुण ने कहा कि जिस केस का मैं बचाव कर रहा था उसी केस के लिए मुझे पकड़ लिया गया. ये मानव अधिकारों का हनन है.

विवादित इशरत जहां एनकाउंटर. पुलिस का कहना है कि इशरत और उसके साथी मोदी को मारने की साज़िश कर रहे थे. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि इशरत और उसके साथी बेगुनाह थे और जानबूझकर मार दिए गए.
विवादित इशरत जहां एनकाउंटर. पुलिस का कहना है कि इशरत और उसके साथी मोदी को मारने की साज़िश कर रहे थे. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि इशरत और उसके साथी बेगुनाह थे और जानबूझकर मार दिए गए.

लोकप्रियता घटने पर मोदी की ‘हत्या का षडयंत्र’ सामने आ जाता है?

हम यहां उस थ्योरी पर भी बात करेंगे कि जब भी नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता घटती है तब उनके मर्डर की खबर चल जाती है. हमने पुराने अखबार खंगाले. हमने पाया कि कम से कम छह एनकाउंटर के मामले ऐसे रहे जब पुलिस ने कहा कि सीएम नरेंद्र मोदी और भाजपा नेता निशाने पर थे. इसमें सबसे चर्चित थे इशरत जहां और सोहराबुद्दीन केस. एनकाउंटर के इन मामलों पर फर्जी होने के आरोप लगे. कई मामले अब भी विचाराधीन हैं.

अरुणधति रॉय समेत कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इन गिरफ्तारियों पर सवाल उठाए हैं. सीपीआई(एम) ने कहा है कि लेफ्ट इंट्लेक्चुअल्स के घरों पर पड़ी रेड्स का विरोध करता है. लेकिन केंद्रीय गृह राज्यमंत्री ह हंसराज अहीर ने जवाब कहा है कि छापों पर सवाल नहीं उठने चाहिए.

गिरफ्तारियों पर प्रतिक्रिया देता ट्वीट.
गिरफ्तारियों पर प्रतिक्रिया देता CPM का ट्वीट.

फिलहाल पुलिस की ओर से यही कहा गया है कि ये गिरफ्तारियां भीमा कोरेगांव हिंसा और यलगार परिषद से जुड़े मामले में की गई हैं. पुलिस इन्हें पुणे लेजाकर पूछताछ करना चाहती है. इन लोगों के खिलाफ क्या सबूत मिले हैं, पुलिस ने ये फिलहाल नहीं बताया है. ये बात भी पूरी तरह से साफ नहीं है कि पीएम की हत्या की साज़िश वाले मामले में इनसे पूछताछ होगी या नहीं. तो बेहतर ये है कि कयासबाज़ी और लोगों पर लेबल लगाने से बचा जाए और इंतज़ार किया जाए ठोस जानकारी का जो आपको हम देते रहेंगे.


 

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