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त्रिपुरा की सियासत की पूरी कहानी, जहां बीजेपी ने लेफ्ट को पटका है

BJP लेफ्ट के मजबूत गढ़ माने जाने वाले त्रिपुरा में जीत हासिल कर चुकी है. अपनी सादगी के लिए चर्चित 4 बार से मुख्यमंत्री रहे माणिक सरकार हार चुके हैं. ये तो हो गई एक लाइन की खबर, जिसे आपने हर जगह पढ़ लिया होगा. लेकिन जो नहीं जाना होगा, वो है त्रिपुरा की राजनीति की दिलचस्प कहानी. तो शुरू करते हैं…

देश जब आज़ाद हुआ, तो त्रिपुरा उसका हिस्सा नहीं था. एक वक्त था जब त्रिपुरा के इलाके पर 185 राजाओं का राज था – एक ही समय में. विश्व में ऐसा दूसरा उदाहरण शायद ही हो. लेकिन 1280 से राज्य के ज़्यादातर इलाके पर त्रिपुरी (बरोक) राजवंश का नियंत्रण रहा. इस वंश के महाराज बीर बिक्रम किशोर माणिक्य बहादुर देबबर्मा का नाम त्रिपुरा में आज भी बहुत अदब से लिए जाता है. इन्हीं की विधवा रानी कंचन प्रवा देवी ने 15 अक्टूबर, 1949 को भारत के साथ मर्जर एग्रीमेंट पर दस्तखत करके राज्य को भारत में मिलाया था.

त्रिपुरा के आखिरी राजा बीर बिक्रम सिंह. भाजपा इनकी विरासत के सहारे आदिवासियों को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है.
त्रिपुरा के आखिरी राजा बीर बिक्रम सिंह. भाजपा इनकी विरासत के सहारे आदिवासियों को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है.

1956 में त्रिपुरा को एक यूनियन टेरिटरी बनाया गया. तब विधानसभा नहीं थी. कुछ वक्त बाद वो भी आई और फिर आखिर 21 जनवरी, 1972 में त्रिपुरा एक पूर्ण राज्य बना – मय विधानसभा. कांग्रेस के सुखमय सेनगुप्ता त्रिपुरा राज्य के पहले सीएम थे. सुखमय की सरकार पूरे पांच साल चली. लेकिन इसके बाद इमरजेंसी के नतीजे में देश में कई राजनैतिक प्रयोग हुए और कांग्रेस से कई धड़े टूटे. तो त्रिपुरा में कांग्रेस से टूटकर बनी जगजीवन राम की कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी और फिर जनता पार्टी ने कुछ महीने सरकार चलाई. लेकिन ये सब नवंबर 1977 तक निपट गया था.

तब से लेकर 2018 तक के समय को नज़र डालें तो त्रिपुरा में हंसिया-हथौड़ा के निशान वाली CPM की सरकारे ही नज़र आती हैं. बस एक गैप पड़ा था – 1988 से 1993 के बीच (तब भी कांग्रेस ने बीच में सीएम बदल लिया था). इसलिए त्रिपुरा में आज लेफ्ट का इतना असर दिखता है. कभी-कभी कहा जाता है कि त्रिपुरा में भी पार्टी स्टेट चल रहा है, वैसे ही जैसे बंगाल में चला करता था. पार्टी स्टेट में सरकार चला रही पार्टी और सरकार (प्रशासनिक ढांचे) के बीच लकीर धुंधली हो जाती है.

त्रिपुरा पर लेफ्ट का रंग चढ़ा कैसे?

कम्युनिस्ट पार्टी आज़ादी से पहले से त्रिपुरा में काम कर रही थी. ज़्यादातर आदिवासी इलाकों में. पार्टी की जन शिख्खा (शिक्षा) समिति ने दूर-दराज़ के इलाकों में स्कूल खोले. पार्टी की गण मुक्ति परिषद राजशाही के खिलाफ थी, लेकिन उसका अंत तब हो गया जब त्रिपुरा का भारत में विलय हुआ. लेकिन त्रिपुरा को पूर्ण राज्य बनने में 23 साल लगे. इस दौरान लगातार पूर्ण राज्य और उसके साथ आने वाली सुविधाओं की मांग उठती रही. लेफ्ट के संगठन इन मांगों को उठाने में हमेशा से आगे रहे. 1952 में लेफ्ट संगठनों ने ऐलान किया कि वो गणतंत्र दिवस को ‘विरोध दिवस’ के रूप में मनाएंगे क्योंकि त्रिपुरा को असल आज़ादी तो मिली ही नहीं.

त्रिपुरा में लेफ्ट की रैलियों में बड़ी संख्या में लोग जुटते रहे हैं. हमेशा से. (फोटोःरॉयटर्स)
त्रिपुरा में लेफ्ट की रैलियों में बड़ी संख्या में लोग जुटते रहे हैं. हमेशा से. (फोटोःरॉयटर्स)

केंद्र की कांग्रेस सरकारों की लेफ्ट से खास बनती नहीं थी तो त्रिपुरा में भी लेफ्ट पर पुलिस की नज़र तिरछी ही रहती थी. हाल ये था कि सीपीआई के नेता दशरथ देब को पहली लोकसभा की कार्यवाही के लिए चोरी-छिपे दिल्ली जाना पड़ा, क्योंकि उनके खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट जारी था. दशरथ देब ने सदन में पहुंचकर सरेंडर किया और अपने लिए गिरफ्तारी से छूट मांगी.

ऐसे ही माहौल में नृपेन चक्रवर्ती जैसे नेता भी बंगाल से भागकर त्रिपुरा की पहाड़ियों में गए. यहां उन्होंने आदिवासियों के बीच संगठन का काम करना शुरू किया. त्रिपुरा में हर साल अनाज की भारी कमी हो जाती थी. तो कांग्रेस के खिलाफ जमकर प्रदर्शन होते थे. इनमें भी लेफ्ट बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेता था. लेफ्ट को ऑक्सीजन उन बंगालियों से मिलती थी, जो बंगाल और बांग्लादेश से आकर त्रिपुरा में बसते थे. चूंकि त्रिपुरा में बहुत बड़े पैमाने पर बंगाली आकर बसे, लेफ्ट के लिए ज़मीन तैयार होती गई. जब लेफ्ट का संगठन शहर से होता हुआ गांव और गांव से होता हुआ आदिवासी इलाकों तक पहुंचा उसने त्रिपुरा को लाल रंग में रंग दिया और तब से चुनाव महज़ एक औपचारिकता रहे. लेफ्ट (सीपीएम) 1978 से त्रिपुरा में जमा हुआ है, 1988-1993 के अपवाद को छोड़कर.

आदिवासी इलाकों में ‘पहचान’ की राजनीति

त्रिपुरा में सीपीएम के पहले सीएम नृपेन चक्रवर्ती. इन्होंने मुख्यमंत्री बनने से पहले आदिवासी इलाकों में संगठन के लिए बहुत काम किया था.
त्रिपुरा में सीपीएम के पहले सीएम नृपेन चक्रवर्ती. इन्होंने मुख्यमंत्री बनने से पहले आदिवासी इलाकों में संगठन के लिए बहुत काम किया था.

त्रिपुरा में भी पूर्वोत्तर के और राज्यों की तरह जातीय और क्षेत्रिय पहचान को लेकर लोग बहुत भावुक हैं. एक खास पहचान से इतर लोग ‘बाहरी’ माने जाते हैं. लेकिन त्रिपुरा में इतने लोग बाहर से आकर बसे कि वहां के मूल निवासी अल्पसंख्यक हो गए. इसलिए वहां के चुनावों में क्षेत्रिय पहचान इतना बड़ा मुद्दा नहीं बनती कि सरकारें बनें-गिरे. क्षेत्रिय पहचान का खेला एक दूसरे तरह के चुनाव में होता है.

त्रिपुरा के आदिवासी इलाकों में प्रशासन की काफी ज़िम्मेदारियां द त्रिपुरा ट्राइबल एरियाज़ ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल (TTAADC) के पास होती हैं. ऐसा इसलिए किया गया ताकि आदिवासियों की संस्कृति और परंपराएं बाहरी हस्तक्षेप से बची रहें.

राज्य के 68% इलाके पर नियंत्रण रखने वाला काउंसिल अगरतला से 23 किलोमीटर दूर खुमुलवंग से काम करता है और इसके 30 सदस्यों के लिए चुनाव होते हैं. काउंसिल के इलाके में ही राज्य के 80 फीसदी आदिवासी रहते हैं. इस बार का चुनाव भाजपा ने इन इलाकों में पैठ बनाने के लिए इंडीजीनियस पीपल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (IPFT) के साथ मिलकर लड़ा है. ये कुछ-कुछ जम्मू कश्मीर में भाजपा-पीडीपी गठबंधन जैसा ही है. पीडीपी एक समय उग्रवादियों के लिए सॉफ्ट कॉर्नर रखने वाली पार्टी मानी जाती थी. IPFT के संबंध भी एक समय अलगाववादी संगठन नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (NLFT)से थे. NLFT त्रिपुरा को देश से अलग करना चाहती थी. लेकिन IPFT का ज़ोर TTAADC के इलाके में ‘टिप्परलैंड’ नाम से एक अलग राज्य बनाने पर है. TTAADC के इलाके में रहने वाले आदिवासी इस मांग में अपनी खोई पहचान ढूंढते हैं और यहीं मामला दिलचस्प हो जाता है.

सीपीएम के पाले से पहले मुख्यमंत्री नृपेन चक्रवर्ती ने आदिवासी इलाकों में काफी काम किया था. इसलिए आदिवासी बहुल 20 आरक्षित सीटों पर CPM हमेशा मज़बूत रही है. यहां तक कहां जाता है कि त्रिपुरा में कांग्रेस की गिनती 21 से शुरू होती है. क्योंकि 20 आदिवासी सीटें तो उसे मिलेंगी ही. TTAADC के चुनावों में भी बीते 15 सालों से गण मुक्ति परिषद (GMP) का कब्ज़ा है. GMP, CPM का आदिवासी विंग है. हाल में काउंसिल में इसके 24 बैठते हैं. काउंसिल में नेशनल सोशलिस्ट पार्टी ऑफ त्रिपुरा (NSPT) के भी 4 सदस्य हैं. GMP और NSPT ने चुनाव साथ मिलकर लड़ा था.

लेकिन CPM अलग टिप्परलैंड की मांग के खिलाफ है. इसलिए वो अलग राज्य की मांग पर यहां-वहां देखने लगती है. लेकिन भाजपा वैचारिक तौर पर छोटे राज्यों के पक्ष में ही रही है. यही भाजपा-IPFT दोस्ती की सबसे बड़ी वजह है. आदिवासी इलाकों में उम्दा प्रदर्शन के बावजूद CPM ने अपने नारे में ‘शांति’, ‘सौहार्द’ और ‘विकास’ के साथ ‘त्रिपुरा की अखंडता’ जोड़ लिया है. अखंडता वाली बात IPFT पर चोट करती है और इसी बहाने भाजपा पर भी.

आईपीएफटी काडर अलग टिप्परलैंड की मांग के लिए जुलाई 2017 में प्रदर्शन करते हुए. (फोटोःपीटीआई)
आईपीएफटी काडर अलग टिप्परलैंड की मांग के लिए जुलाई 2017 में प्रदर्शन करते हुए. (फोटोःपीटीआई)

गांव-शहर की राजनीति

त्रिपुरा में लेफ्ट को ऑक्सीजन आदिवासी इलाकों के बाद ग्रामीण इलाकों से मिलती है. 2013 के चुनावों में वाम मोर्चा सिर्फ एक ग्रामीण सीट हारा था. कांग्रेस जो 10 सीटें जीती थीं, उसमें से 9 शहरी इलाकों की थीं और एक ग्रामीण. इन शहरी सीटों पर ही भाजपा के समर्थन में कुछ माहौल भी बना है. लेकिन शहरी इलाकों में भाजपा अगर कांग्रेस को पिछली बार मिले सभी वोट बटोर ले (जैसे उसने कांग्रेस के 10 में से 8 विधायक बटोरे हैं) तब भी उसकी राह आसान नहीं होगी. ऐसा इसलिए कि त्रिपुरा का ज़्यादातर इलाका कस्बाई या ग्रामीण है.

‘नाथ’ का आशीर्वाद भी ज़रूरी है यहां

त्रिपुरा की करीब 35 लाख की आबादी का लगभग एक तिहाई (यानी 12 से 13 लाख लोग) नाथ संप्रदाय को मानने वाला है. नाथ संप्रदाय यानी वो संप्रदाय जिसके मुखिया इस वक्त यूपी के सीएम गोरखनाथ मठ के महंत योगी आदित्यनाथ हैं. इस बार से पहले इस पहचान को चुनावों में भुनाया नहीं गया. लेकिन भाजपा ने जिस तरह प्रचार किया, उससे नाथ वाले गणित में उसकी रुचि साफ दिखती है. नाथ वोट बटोरने के लिए भाजपा ने राज्य में योगी आदित्यनाथ से भी सभाएं कराई हैं.

योगी आदित्यनाथ त्रिपुरा में एक रैली को संबोधित करते हुए. (फोटोःयोगी आदित्यनाथ के ट्विटर अकाउंट से)
योगी आदित्यनाथ त्रिपुरा में एक रैली को संबोधित करते हुए. (फोटोःयोगी आदित्यनाथ के ट्विटर अकाउंट से)

वोट शेयर की आंकड़ेबाज़ी

त्रिपुरा में जब से माणिक सरकार हैं, तब से वाम मोर्चा किसी भी चुनाव में (विधानसभा, लोकसभा, पंचायत या द त्रिपुरा ट्राइबल एरियाज़ ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल (TTAADC)के चुनाव) में 50% से कम वोट नहीं लाया. दूसरे नंबर पर हमेशा कांग्रेस रही है. 2013 के चुनाव में वाम मोर्चा 52.33 % वोट लाया था. कांग्रेस को 45.75% वोट मिले थे और भाजपा अटक गई थी 1.89 % पर.

त्रिपुरा में भाजपा को कमज़ोर बताते हुए ये 1.89 % का आंकड़ा कई बार गिनाया जाता है. लेकिन ये आंकड़ा 2013 का है और 2014 में भारतीय राजनीति में ‘मोदी’ नाम की घटना हुई. 2014 के लोकसभा चुनाव में त्रिपुरा की दोनों सीटें सीपीएम को गईं और उसका वोट शेयर रहा 64.7%. लेकिन भाजपा का वोट शेयर लगभग तीन गुना बढ़कर 5.77 % पर पहुंच गया. ये आंकड़ा भी इतना छोटा है कि देखते ही खारिज कर दिया जाए. लेकिन जब हम चुनाव दर चुनाव नज़र डालते हैं तो हमें एक पैटर्न देखने को मिलता है. 2015 और 2016 में त्रिपुरा की चार विधानसभा सीटों पर चुनाव हुए. जीता यहां भी लेफ्ट लेकिन भाजपा तीन सीटों पर दूसरे नंबर पर रही. माने कांग्रेस जो ज़मीन खो रही थी, भाजपा उसपर अपने पैर जमा रही थी.

भाजपा ने त्रिपुरा में पैर जमाने के लिए अपने चोटी के प्रचारकों को लगाया है. (फोटोःपीटीआई)
भाजपा ने त्रिपुरा में पैर जमाने के लिए अपने चोटी के प्रचारकों को लगाया है. (फोटोःपीटीआई)

काडर में टूट-फूट

त्रिपुरा में पिछले दिनों सभी पार्टियों के काडर में काफी हेर-फेर देखने को मिला है. बंगाल में सीपीएम और कांग्रेस ने चुनाव साथ लड़ा तो त्रिपुरा में कांग्रेस के 6 विधायक पार्टी छोड़कर तृणमूल चले गए. इन विधायकों के साथ पार्टी कार्यकर्ता भी गए. लेकिन दिसंबर 2017 में 1000 पार्टी वर्कर तृणमूल छोड़कर वापस कांग्रेस में शामिल हुए. लेकिन सब वापस नहीं गए. कुछ भाजपा में चले गए. एक बार तो 400 पार्टी कार्यकर्ता एक ही दिन में तृणमूल छोड़कर भाजपा में शामिल हुए थे. ये सुनने थोड़ा अटपटा लग सकता है, लेकिन पूर्वोत्तर में ये आम है.

गढ़ जीतने के लिए क्या-क्या मुद्दे हैं भाजपा के पास?

त्रिपुरा में चार बार से सीपीएम की सरकार है. तो त्रिपुरा विधानसभा चुनाव का ज़िक्र आते ही तो पहला शब्द दिमाग में आता है ‘एंटी इन्कम्बेंसी’. लेकिन ये वो बात नहीं है जिसपर CPM की नींद हराम हो. असल परेशानी है सीपीएम और रोज़ वैली नाम की कंपनी के बीच नज़दीकी के इल्ज़ामों से. इस चिट फंड कंपनी ने लगभग 17,000 करोड़ का घोटाला किया है और इसका मालिक गौतम कुंडू जेल में है. सीबीआई इस घोटाले के संबंध में सीपीएम के नेताओं से पूछताछ कर चुकी है. कहा जा रहा है कि CPM में चिट फंड कंपनियों का फर्ज़ीवाड़ा रोकने के लिए कदम नहीं उठाए. ये इल्ज़ाम माणिक सरकार की ‘साफ’ छवि की एंटी थीसिस बनाता है.

तृणमूल भी त्रिपुरा में ज़ोर मारना चाहती है, लेकिन रोज़ वैली स्कैम में उसके नेताओं का भी नाम है. इसलिए वो ठीक से सरकार को घेर नहीं पा रही (पीटीआई फोटो)
तृणमूल भी त्रिपुरा में ज़ोर मारना चाहती है, लेकिन रोज़ वैली स्कैम में उसके नेताओं का भी नाम है. इसलिए वो ठीक से सरकार को घेर नहीं पा रही (पीटीआई फोटो)

इसके अलावा त्रिपुरा में बेरोज़गारी बड़ा मुद्दा है. इसलिए पिछले दिनों में शिक्षित युवा वर्ग लगातार CPM से दूर हुआ है. राज्य बिजली के मामले में आज सरप्लस है, बांग्लादेश को बेच भी रहा है, लेकिन उसकी सप्लाई निर्बाध नहीं है. खासकर दूर-दराज़ के इलाकों में.

त्रिपुरा में भाजपा की जीत महज एक राज्य में उसकी जीत नहीं है. ये भाजपा के कार्यकर्ताओं का मानसिक संबल बन सकता है. ये मध्य प्रदेश और राजस्थान उपचुनाव में भाजपा के हार की काट है.


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