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भगत सिंह खुद को क्या मानते थे, क्रांतिकारी या आतंकवादी?

पहले अजीब लगता था. फिर तकलीफ हुई. और अब गुस्सा आता है. सरदार वल्लभ भाई पटेल क्या थे. मैं कहूंगा, इस देश के सबसे शानदार नेताओं में से एक. पर कुछ लोग कहेंगे, कु्र्मियों के मसीहा. पटेल ने अपनी इस पहचान को लेकर कभी कुछ कहने की जरूरत नहीं समझी. क्योंकि जाति उनकी राजनीति में गैरजरूरी चीज थी.

और पीछे लौटें. ब्राह्मणों ने परशुराम पर कब्जा जमा लिया. उरई में सड़कों पर नारे लिखे देखे थे. ब्राह्मणों का बल, परशुराम दल. साथ में फरसा बना. फिर गणेश जी का बैनामा भी अपने खाते में कर लिया. बसपा को वोट देने के लिए जैसे बहाना खोज रहे हों. इसी तरह क्षत्रियों ने महाराणा प्रताप को चुना. आयोजन होते. जाति को लेकर गर्व का संचार किया जाता. और ये हाल सिर्फ पौराणिक या ऐतिहासिक किरदारों तक सीमित नहीं. सुना है कि कवि दिनकर और लेखक रेणु की भी जात के हिसाब से आयोजन होने लगे.

इसका एक उजला पहलू भी है. मसलन, मायावती के राज में पिछड़ों और दलितों के कई उपेक्षित नायकों को नए सिरे से मुख्यधारा में लाया गया. अवंतीबाई लोधी, ऊदा देवी पासवान,वीरांगना झलकारी बाई ऐसे ही कुछ नाम हैं.

पर असल सवाल नामों का नहीं, नीयत का है. मसलन, इन दिनों अंबेडकर और अब भगत सिंह पर कब्जे की लड़ाई चल रही है. भगत सिंह के शहीदी दिवस के दिन हमने उनका एक मशहूर पॉलिटिकल पैंफलेट लगाया. मैं नास्तिक क्यों हूं. लोगों ने उत्साह से पढ़ा. मगर आखिर में अविश्वास भी जता दिया. तमाम तार्किक बातों को किनारे कर बोले, भगत सिंह अंधविश्वासों और कुरीतियों की बुराई कर रहे थे धर्म की नहीं. या फिर एक कमेंट ये आया कि भगत सिंह नास्तिक होते हुए भी आस्तिक थे. अजब हड़बौंगपन है. भगत सिंह क्रांतिकारी थे. देशभक्त थे. सब युवाओं के आदर्श थे. अब उनके कहे को कैसे खारिज करें.

एक और पॉलिटिक्स चल रही है. भगत सिंह की टोपी को हटाकर पब्लिक को नए सिरे से टोपी पहनाई जा रही है. कोई उन्हें पीली पगड़ी पहना रहा है, कोई नीली. जबकि हमने तो बचपन में भगत सिंह की जो तस्वीर देखी थी उसमें वह हैट लगाए थे. जिस आदमी ने सिरे से धर्म को खारिज किया. उसे उत्पीड़न की जड़ बताया, उसके नाम के आगे सरदार को इस तरह से जोर लगाकर चस्पा किया जा रहा है, मानो वह एक कौम भर के ही हीरो रहे हों.

भगत सिंह हम सबके हैं. और अपने कामों की वजह से हैं. अपने विचारों की वजह से हैं. और उनके विचार एक नौजवान के खदबदाते विचार थे. उन पर खूब बात होनी चाहिए. मगर अंधश्रद्धा का ऐसा दौर न चलाया जाए कि वह भी महज एक मूर्ति बनकर रह जाएं.

और आखिर में हमारे हिस्से बस ये कहावतें बचें. कि भगत सिंह सबको अच्छे लगते हैं, मगर पड़ोसी के घर में. पड़ोसी तो पाक है. और हमें भगत सिंह से प्यार है. तो क्या हम भगत सिंह को पाकिस्तान को सौंपने को तैयार हैं.

ARVIND DAS
अरविंद दास

खैर. प्रो. बिपिन चंद्रा की किताब में भगत सिंह और उनके साथियों के लिए जो टर्म यूज हुआ है, उसे लेकर नए सिरे से पॉलिटिक्स हो रही है. किसी की देशभक्ति ज्यादा जागे तो याद रखे कि ये किताब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के दौरान भी यूं ही छप रही थी.

तो माजरा क्या है. इसे समझने समझाने के लिए हमने ‘दी लल्लनटॉप’ के स्तंभकार और मीडिया विश्लेषक अरविंद दास से दरख्वास्त की. और उन्होंने हमें ये लिख भेजा. अरविंद दास ने जेएनयू से पीएचडी की है और इन दिनों करण थापर के साथ जुड़े हुए हैं. नई पीढ़ी के विचारशील लोगों में से हैं और कला, संस्कृति, समाज को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणियां करते रहते हैं. आज आप उनके लिखे को पढ़ें और खूब गुनें.

-सौरभ द्विवेदी


आतंकवाद संपूर्ण क्रांति नहीं है और क्रांति आंतकवाद के बिना पूर्ण नहीं होती: भगत सिंह (बम का दर्शन, 1930)

वर्ष 2001-02 में हम भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी), दिल्ली में पत्रकारिता का प्रशिक्षण ले रहे थे. यह दौर हमारे लिए खबरों के लिहाज से काफ़ी महत्वपूर्ण था. अमेरिका में हुए 9/11, भारतीय संसद पर हमला और गोधरा-गुजरात दंगों की घटनाएं हमारे शिक्षण-प्रशिक्षण के लिए चुनौती लेकर आई थीं. उसी दौर में ‘इस्लामिक आतंकवाद’ जैसे शब्द भारतीय मीडिया में प्रचलन में आए थे. ज़ाहिर है, हम इसका विरोध कर रहे थे. पर सत्ता और मीडिया की भाषा में ज्यादा फर्क नहीं होता. ऐसे में यह पद आतंकवाद का पर्यायवाची बनकर चलन में बना रहा.

इसी दौरान, 9/11 के बाद स्टूडेंटस इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) को एनडीए की सरकार ने बैन कर दिया था. मेरे एक सहपाठी मित्र शहबाज अहमद सिमी से जुड़े थे. वह रातों-रात ग़ायब हो गए. हमें फिर उनकी ख़बर नहीं लगी. यह कहानी फिर कभी. अभी हम बात भगत सिंह और ‘क्रांतिकारी आतंकवाद’ की कर रहे हैं.

लंबे समय तक नक्सलबाड़ी आंदोलन से जुड़े रहे जेएनयू के प्रो. वीर भारत तलवार ने 80 के दशक में हंस पत्रिका में एक लेख लिखा था—क्रांतिकारी आतंकवाद की आख़िरी कड़ी. यह लेख शहीद भगत सिंह के इर्द-गिर्द था. बजरिए प्रो बिपिन चंद्र ‘क्रांतिकारी आतंकवाद’ पद उस दौर में अकादमिक बहस के दायरे में था.

प्रो. तलवार का कहना है कि भगत सिंह मानसिक रूप से भले ही आतंकवाद से मुक्त हो गए थे, पर वह व्यावहारिक रूप से मुक्त नहीं हुए थे. उनके संघर्ष की पद्धति क्रांतिकारी आंतकवाद से प्रेरित थी. अपने अंतिम दिनों में भगत सिंह मार्क्स-लेनिन की विचारधारा की ओर मुड़ गए थे. पर वह किसी किसान-मजदूर या जन-आंदोलन से जुड़े हुए नहीं थे.

ब्रिटिश हूकमतों के लिए आजादी के ये क्रांतिकारी सेनानी ‘आतंकवादी’ थे. हालांकि उस वक्त स्वाधीनता आंदोलन से जुड़े क्रांतिकारी गर्व से इस अवधारणा को अपनाए हुए थे. खुद प्रो चंद्र ने अपनी पुस्तक India’s Struggle for Independence में स्वाधीनता आंदोलन के क्रांतिकारियों के लिए ‘Revolutionary Terrorist (क्रांतिकारी आतंकवादी)’ शब्द का इस्तेमाल कोई ख़राब या गलत अर्थ में नहीं किया था.

1920 के दशक में क्रांतिकारी सचींद्र नाथ सान्याल की किताब ‘बंदी जीवन’ क्रांतिकारियों के लिए एक ‘मूल टेक्स्ट बुक’ की तरह थी. उस दौर की पत्रिकाओं में ‘भारतीय आतंकवाद का इतिहास’ जैसे इश्तेहार भी खूब दिखाई देते हैं. चर्चित इतिहासकार डीयू के प्रो. सुमित सरकार ने भी अपनी किताब ‘आधुनिक भारत (1885-1947)’ में लिखा है: 1922 के पश्चात कांग्रेसी नेतृत्व के प्रति मोहभंग की जो मन:स्थिति बनी, उसके परिणामस्वरूप बंगाल, संयुक्त प्रांत और पंजाब में शिक्षित युवक पुन: क्रांतिकारी आतंकवादी तरीकों की ओर आकृष्ट होने लगे.” इसकी अंतिम परिणति युवा भगत सिंह के नेतृत्व में 1928 में ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी’ की स्थापना में हुई.

स्वाधीनता आंदोलन के उस दौर में भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, सूर्य सेन आदि क्रांतिकारियों के लिए प्रयुक्त पद ‘आतंकवाद’ और आज उत्तर औपनिवेशिक राज्य-सत्ता, मीडिया जिसे ‘आतंकवाद’ के रूप में परिभाषित करती हैं, उसमें काफ़ी फर्क है. ठीक उसी तरह, साम्राज्यवाद के दौर में पनपी और उत्तर-औपनिवेशिक दौर में विकसित हुई भारतीय राजनीति और मीडिया में भी फर्क है.

इन्हीं सबको ध्यान में रख कर खुद प्रो. चंद्र ने 2006 में नेशनल बुक ट्रस्ट (एनबीटी) के लिए जब ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ की भूमिका लिखी, तो क्रांतिकारी आतंकवादी जैसे विशेषणों से परहेज किया था. उन्होंने अपनी भूमिका के शुरुआत में ही लिखा है, ‘भगत सिंह न सिर्फ भारत के महान स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारी समाजवादियों में से एक थे, बल्कि वह एक आरंभिक मार्क्सवादी विचारक और आइडियोलॉग भी थे.” टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक भगत सिंह की जन्मशती के अवसर पर (2007) एक समारोह में खुद प्रो चंद्र ने कहा था, “इस पद का प्रयोग भगत सिंह को आजादी के संघर्ष की अन्य धाराओं से अलगाने के लिए और प्रशंसा के तौर पर तब किया जाता था. लेकिन आतंकवाद शब्द अब एक अलग अर्थ लिए हुए है. मैं इस पद का इस्तेमाल करना अब पसंद नहीं करुंगा.”

करीब दस साल बाद अचानक संसद से सड़क तक भगत सिंह के प्रति उमड़े इस प्रेम और ‘आंतकवाद’ को लेकर इस बहस के पीछे राज क्या है? कहीं पंजाब में होने वाले चुनाव और भाजपा के भगत सिंह की छवि के प्रति उभरा नव-प्रेम तो नहीं?

हाल के वर्षों में पॉपुलर मीडिया में भगत सिंह के स्वाभिमानी सिर पर रहने वाली जानी-पहचानी तिरछी टोपी के बदले नीली-पीली पगड़ी नज़र आने लगी है. क्या आने वाले समय में भगत सिंह एक परिवार, एक पार्टी, एक समुदाय के नेता बन कर रह जाएंगे? भगत सिंह के परिवार वालों ने शिक्षामंत्री को चिट्ठी लिखकर और एबीवीपी के कार्यकर्ताओं के साथ दिल्ली विश्वविद्यालय के वीसी से मिलकर जिस तरह अपनी नाराजगी जताई उससे तो ऐसा ही लगता है. संसद ने भी निर्णय लेने में कोई देर नहीं की और फ़रमान जारी कर दिया कि क्रांतिकारी आतंकवाद पद को किताब से हटा दिया जाए!

राजनीतिक दलों में गांधी-पटेल-आंबेडकर-भगत सिंह के विचारों को अपनाने से ज्यादा उनकी मूर्तियों पर माला पहनाने की होड़ मची है. आने वाले दिनों में भारत में राजनीतिक लड़ाई, जाति-अस्मिता के साथ-साथ इतिहास के किरदारों और उनके बुतों के बूते लड़ी जाएगी.

बकौल अमित शाह, प्रधानमंत्री मोदी ओबीसी हैं. बकौल मायावती जेएनयू के मार्क्सवादी छात्र नेता कन्हैया कुमार ‘भूमिहार’. बिहार के राष्ट्रवादी कुशवाहा परिषद के मुताबिक सम्राट अशोक ‘कुशवाहा’ थे. बिहार सरकार ने करीब 2300 वर्षों के बाद सम्राट अशोक की जन्मतिथि 14 अप्रैल ढूंढ़ निकाली और उस दिन सरकारी छुट्टी घोषित कर दी है. इतिहासकारों का कहना है कि ये सारी राजनीतिक कवायद अनैतिहासिक है, अनर्गल है. विवेक सम्मत नहीं है.

अकादमिक लेखन और शोध की दुनिया में अंतिम सत्य कुछ नहीं होता. नए तथ्य, विश्लेषण के परिप्रेक्ष्य में पहले की स्थापनाओं पर पुनर्विचार किया जाता रहा है. भाषा सामाजिक-सांस्कृतिक निर्मिति है. समय के साथ उसे बरतने-व्यवहार करने में बदलाव आता है. निस्संदेह भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी, देशभक्त शहीदों के लिए ‘क्रांतिकारी आतंकवाद’ पद का इस्तेमाल बंद होना चाहिए. पर क्या इन्हें ’’इस्लामिक आतंकवाद’ ‘हिंदू आतंकवाद’ जैसे पदों में भी कोई दिक्कत नज़र आती है? और सवाल ये भी है कि अकादमिक निर्णय क्या राजनीतिक गलियारों में लिए जाएंगे?


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