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योगी पर राय बनाने से पहले वैध और अवैध बूचड़खानों का फर्क समझ लो

योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद उत्तर प्रदेश में अवैध बूचड़खाने बंद करवाए जा रहे हैं. इस फैसले को ज़्यादातर लोग अपनी-अपनी विचारधारा और राजनीतिक समझ के हिसाब से देख रहे हैं. इसी कारण से वैध-अवैध बूचड़खानों के बारे में कई भ्रम भी बने हुए हैं. हमारे देश में खाने का मुद्दा धर्म, सियासत, इतिहास और भूगोल जैसे सामाजिक विज्ञान के हर मुद्दे से जुड़ा हुआ है. इसलिए खासतौर पर मांसाहार और मीट उद्योग से जुड़े सरकारी नियमों में भी कई सारे पेंच हैं. हम आपको बूचड़खाने और मीट के पूरे व्यापार से जुड़े नियम, तमाम पक्ष और व्यवहारिक बातें बता दे रहे हैं. अगली बार जब आप किसी से इस पर बहस करें तो आपके पास ज़्यादा स्पष्ट तसवीर हो.

शाकाहारियों का देश नहीं है भारत

केंद्र सरकार के रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया के 2014 के सर्वे के हिसाब से भारत में 71 प्रतिशत आबादी मांसाहारियों की है. 2004 में ये प्रतिशत 75 था. मगर इनमें से ज़्यादातर लोग रोज नॉनवेज नहीं खाते हैं. इसका सीधा असर मीट व्यापार की छुट्टियों पर दिखता है. कई छोटे नॉनवेज होटल मंगलवार को बंद रहते हैं. नवरात्र और सावन जैसे मौकों पर भी इस उद्योग में छुट्टियां रहती हैं.

अलग-अलग राज्यों में हैं अलग नियम

मांस बेचने और जानवरों को काटने के नियम राज्यों में अलग-अलग हैं. “भंडार के परिरक्षण, संरक्षण और सुधार तथा जानवरों को होने वाली बीमारियों की रोकथाम, पशुधन प्रशिक्षण और व्यवहार” संविधान की सातवीं अनुसूची में प्रवेश (एंट्री) संख्या 15 है.

इसका मतलब यह हुआ कि राज्य विधानसभाओं को पशु वध रोकने और उनके संरक्षण के लिए कानून बनाने का विशेष अधिकार हैं. कुछ राज्य पशु वध की इजाजत देते हैं और कुछ नहीं. जहां पशु वध की इजाजत है उन राज्यों में कहीं-कहीं “वध के लिए उपयुक्त” प्रमाणपत्र की आवश्यकता होती है और यह काटे जाने वाले जानवर की उम्र, जेंडर और उसकी कीमत पर निर्भर हो सकता है.

मगर केंद्र सरकार के खाद्य सुरक्षा एवं मानक (लाइसेंस एवं पंजीकरण) विनियम 2011 आने के बाद देश में कहीं भी पशु वध स्लॉटर हाउस में ही संभव है.

उत्तर प्रदेश में नियम और उनका धार्मिक ऐंगल

उत्तर प्रदेश में जानवर काटने के लिए लाइसेंस की ज़रूरत पड़ती है. केंद्र और राज्य सरकार के कई नियमों न सिर्फ साफ-सफाई की शर्तें हैं बल्कि धार्मिक भावनाओं के हिसाब से भी शर्ते हैं.

# बूचड़खाना उस जगह को माना जाएगा जहां प्रतिदिन 10 से ज़्यादा जानवरों काटे जाते हों.

# बड़े (भैंस), छोटे (बकरे) और पोर्क (सुअर) के बूचड़ खाने अलग होते हैं.  

# ऐसी जगह में पानी, बिजली या प्रकाश की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए.

# पानी के लिए एक भिश्ती और एक सफाई कर्मचारी होना चाहिए.

# खून और बाकी गंदगी नलियो मे न बहे किसी सोख्ते में दबाई जाए. 

# दुकान पर लगे बोर्ड से साफ होना चाहिये दुकान हिंदू या मुस्लिम विक्रेता की है. अगर आम ज़ुबान में कहें तो, ग्राहक को पता चले कि मीट हलाल का है या झटके का.

# जानवर दुकान पर काट कर नही बूचड़खाने से कटवा कर दुकान पर बिकना चाहिए.

# पहले से कटवाकर लाने का नियम मुर्गे पर लागू नहीं होता है. जबकि मछली में हलाल और झटका नहीं माना जाता है.

# कोई भी गर्भवती, दूध देने वाला या 3 महीने से कम उम्र का जानवर नहीं काटा जा सकता.

# कटनेवाले हर जानवर की एक वेटनरी डॉक्टर जांच करेगा और मुहर लगाकर सर्टिफिकेट देगा. इसके बाद ही जानवर को काटा जा सकता है.

कौन से नियम फॉलो होते हैं और कौन से नहीं

हमनें कुछ होटलवालों और कुछ मांस व्यापरियों से बात की और समझा कि इन नियमों में कितनों को सही में फॉलो किया जाता है.

उत्तर प्रदेश के एक मांस व्यापारी गुड्डू कुरैशी ने बताया “कोई भी कसाई गलती से भी गर्भवती या दूध देने वाला जानवर नहीं काटता है. दूध देने वाली भैंस का वजन 150 किलो के आस-पास और कीमत 50,000 से ऊपर होती है. वहीं दूध और बच्चे देना बंद कर चुकी भैंस का वजन 250 किलो के आस-पास और कीमत 10,000 से 20,000 की रेंज में होती है. ऐसे में ये सोचना भी मज़ाक है कि कोई कसाई इतना बड़ा नुकसान सहेगा.”

वहीं उत्तर प्रदेश के ही एक होटल मालिक से बात करने पर पता चला, एक बकरे में 6 से 10 किलो तक मीट निकलता है. एक किलो मीट में कुल 20 या 22 पीस या 5 प्लेट. मतलब एक बकरे में 30-40 प्लेट मीट मिलता है. इस अनुपात से देखें तो किसी 5 स्टार होटल में ही दिन के 100 से ज़्यादा बकरों की खपत एक आम बात है.

क्यों चल रहे हैं अवैध बूचड़खाने?

इसको समझने से पहले दो भ्रम दूर कर लीजिए.

Up slaughter house story 2


 

 हलाल मीट- जिसमें जानवर को काटने से पहले पूरा खून निकाल दिया जाता है.
हलाल मीट- जिसमें जानवर को काटने से पहले पूरा खून निकाल दिया जाता है.

वैध बूचड़खाने में साफ-सफाई की पूरी व्यवस्था होती है और एक डॉक्टर कटनेवाले जानवरों की जांच करता है. डॉक्टर एक घंटे में 12 और दिन में 96 से ज़्यादा जानवरों की जांच नहीं कर सकता. 2014 में कुल 63,000 रजिस्टर्ड वेटनरी डॉक्टर थे और तीस करोड़ गाय-भैंस (बाकी जानवर नहीं) ऐसे में डिमांड और सप्लाई का ये अंतर बहुत बड़ा है, कहा जा सकता है कि जिस अनुपात में मीट की खपत है उसको पूरा करने के लिए हर जानवर की जांच करना आज की तारीख में तो संभव नहीं है.

और क्या पहलू हैं इस फैसले के

अगर किसी प्रदेश की सरकार ये तय करती है कि जनता को साफ अच्छा मीट खाने के लिए मिले तो ये बहुत अच्छी बात है. मगर किसी भी फैसले को लागू करते समय व्यवहारिक दिक्कतों को भी देखा जाना चाहिए. उत्तर प्रदेश में एक बड़ा प्रतिशत ऐसे छोटे कसाइयों का हैं जो दिन में एक-दो बकरे, भैंस काटकर बेच लेते हैं. ठीक वैसे ही जैसे कुछ छोटे किसान फसल-सब्जियां मंडी में न बेचकर सड़क किनारे बेच लेते हैं. बूचड़खानों के लिए बने नियम इनपर किस तरह लागू होंगे, इसकी एक साफ गाइड लाइन होनी चाहिए. इसके साथ ही बकरीद पर और गोरखपुर के तर्कुला देवी जैसे धार्मिक मंदिरों में क्या स्थिति रहेगी साफ होना चाहिए. इसके अलावा इस फैसले के क्या फायदे और नुकसान हैं, आप इस स्टोरी में पढ़ सकते हैं.

बूचड़खाने बैन होंगे तो सबसे ज्यादा फायदा जनता को, खुश होंगे मीट व्यापारी


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