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नहीं रहा कांग्रेस का वो नेता, जिसने फैशन टीवी पर बैन लगाया था

वो साल 1967 था. पश्चिम बंगाल में अभी तक कांग्रेस ही सरकार बनाती आई थी, लेकिन अब यहां कम्युनिस्ट कार्यकर्ता पैर जमाने को छटपटा रहे थे. वो कांग्रेस को हर तरफ से नोच रहे थे और कांग्रेस भी हिंसक प्रतिवाद कर रही थी. इसका असर ये हुआ कि पश्चिम बंगाल की नालियां कम्युनिस्टों के झंडे की तरह लाल होने लगीं. एक नाली कलकत्ता के उपनगर बेलघरिया में भी थी, जो 22 साल के एक लड़के के खून से लाल हो रही थी. वो किसी रैली का दिन था, जहां से लौटते समय लेफ्ट काडर ने इस लड़के को ठोंक-पीटकर बराबर कर दिया था. न जाने कहां-कहां से खून निकल रहा था. बाईं बांह भी तोड़ दी गई थी, जो जुड़ने के बाद दाईं से कुछ इंच छोटी हो गई थी. ये लड़का था प्रियरंजन दासमुंशी, जो बाद में सूबे में कांग्रेस के सबसे बड़े नेता बने. 20 नवंबर को दासमुंशी का दिल्ली में देहांत हो गया. वो 8 साल से कोमा में थे. लोग उन्हें प्यार से ‘प्रिय दा’ बुलाते थे.


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पार्टी में कद बढ़ाने से लेकर विरोधियों को साधने तक, दासमुंशी में हर गुण था

दासमुंशी के बारे में बाकी बातों से पहले ये जान लीजिए कि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस का ढलान और दासमुंशी का चढ़ाव समानांतर ही चला. ये पढ़कर गुजरात में अहमद पटेल या यूपी में आरपीएन सिंह जैसी नज़ीर खोजने की कोशिश मत कीजिएगा. मिलेंगी नहीं. शुरुआत करेंगे किस्सों से और फिर दासमुंशी की कुछ बातें.

पहला किस्सा: दूसरे नेता के प्रचार में बिना बताए मीटिंग की, फिर टिकट भी दिलवाया

साल 1972. ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी का सदस्य और पश्चिम बंगाल यूथ कांग्रेस का अध्यक्ष बनने के बाद दासमुंशी इंदिरा की निगाह में आ चुके थे. सूबे में उस समय सिद्धार्थ शंकर रे सीएम थे. किसी से निर्देश मिले बिना दासमुंशी खुद ही सियालदह चले गए, जो उनके साथ नेता सोमेंद्रनाथ मिश्रा की विधानसभा थी. वहां उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ मीटिंग की और उन पर ये इंप्रेशन डाल दिया कि वो सोमेंद्र की तरफ से ही मीटिंग ले रहे हैं और सोमेंद्र को पार्टी से टिकट मिल चुका है. असलियत ये थी कि उस समय तक टिकट डिक्लेयर ही नहीं हुए थे.

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ये नए लड़कों को आगे बढ़ाने में यकीन रखते थे. इनके बनाए हुए नेता आज भी इनका अहसान मानते हैं

इस मीटिंग के बारे में सिद्धार्थ से लेकर सोमेंद्र तक, किसी को पता नहीं था. पर आखिरकार पार्टी को दबाव में सोमेंद्र को टिकट देना पड़ा. इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में सोमेंद्र कहते हैं, ‘हम 50 साल साथ में रहे. वो हमारी पीढ़ी के सबसे बड़े नेता थे. मैं ढेर सारी चीजों के लिए उनका ऋणी रहूंगा, जिनमें से एक ये है कि कैसे उन्होंने मुझे टिकट दिलाया था. मैं तो उस समय कलकत्ता यूनिवर्सिटी में था. वो युवा नेताओं को आगे बढ़ने में बहुत सपोर्ट करते थे.’ पश्चिम बंगाल के दूसरे कांग्रेसी नेताओं के बयान भी सोमेंद्र की बात की पुष्टि करते हैं. ये दासमुंशी का स्टाइल था. ग्रासरूट पर काम करने वाला स्टाइल.

दासमुंशी के देहांत के बाद उनकी पत्नी दीपा के साथ राहुल और सोनिया गांधी
दासमुंशी के देहांत के बाद उनकी पत्नी दीपा के साथ राहुल और सोनिया गांधी

दूसरा किस्सा: इंदिरा को नाराज़ किया, लेकिन राजीव-सोनिया आखिर तक नहीं भूले

दासमुंशी ने 1962 में कांग्रेस जॉइन की थी. काम ऐसा किया कि 1971 में 26 साल की उम्र में ही संसद पहुंच गए. पार्टी को हमेशा ऊपर रखा, लेकिन जब इमरजेंसी लगी, तो इंदिरा से नाराज़ हो गए. संजय गांधी ब्रांड वाली पॉलिटिक्स से नफरत थी इन्हें. विरोध में पार्टी छोड़ दी. बोल दिया कि अगर कांग्रेस में लौटे, तो अपने कुत्ते का नाम प्रियरंजन दासमुंशी रख लेना. लेकिन वो वापस आए. इंदिरा या संजय का नहीं, बल्कि राजीव गांधी का हाथ पकड़कर. दासमुंशी की कीमत सबको पता थी. नतीजा ये निकला कि 1985 में राजीव गांधी ने इन्हें पश्चिम बंगाल में वाणिज्य का राज्यमंत्री बनाया.

इंदिरा गांधी इन्हें आखिर तक माफ नहीं कर पाई थीं
इंदिरा गांधी इन्हें आखिर तक माफ नहीं कर पाई थीं

1999 में जब सोनिया सर्वेसर्वा थीं, तो इन्हें संसद में पार्टी का चीफ व्हिप बनाया गया. 2004 में कांग्रेस केंद्र की सत्ता में वापस आई, तो दासमुंशी को दो पोर्टफोलियो मिले- सूचना-प्रसारण मंत्री और संसदीय कार्यमंत्री. केंद्रीय मंत्री रहते हुए इन्होंने कई विवादास्पद फैसले लिए, लेकिन पार्टी की तरफ से सब माफ था. सोनिया ने दासमुंशी का वो साइलेंट सपोर्ट हमेशा याद रखा, जो राजीव के जाने के बाद उनके लिए बेहद ज़रूरी थी. आखिर पश्चिम बंगाल में दासमुंशी और प्रणब मुखर्जी, दो ही तो खेवनहार थे.

प्रियरंजन की पत्नी दीपा और बेटे प्रियदीप के साथ सोनिया गांधी
प्रियरंजन की पत्नी दीपा और बेटे प्रियदीप के साथ सोनिया गांधी

तीसरा किस्सा: मोदी सरकार बनी, लेकिन दासमुंशी के इलाज का पैसा रोका नहीं गया

अब जबकि दासमुंशी का निधन हो गया है, तो सोनिया गांधी से नरेंद्र मोदी, मनमोहन सिंह और राज्यवर्धन राठौड़ तक, हर पार्टी के नेता श्रद्धांजलि दे रहे हैं. लेकिन ये महज़ रवायत के लिए नहीं हो रहा है. अक्टूबर 2008 में स्ट्रोक पड़ने और पैरालाइज्ड होने के बाद दासमुंशी कोमा में चले गए थे. केंद्रीय मंत्री थे, इसलिए इलाज सरकारी पैसे से हो रहा था. 2014 में जब सत्ता बदली और मोदी सरकार बनी, तो सबको लगा कि अब सरकार इनका इलाज नहीं कराएगी. लेकिन तभी खेलमंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ का बयान आया,

‘सरकार का ऐसा कोई इरादा नहीं है. दासमुंशी का इलाज सरकारी पैसे से जारी रहेगा. उन्होंने समाज के लिए काफी काम किया है और अब समाज की बारी है कि वो उनके लिए कुछ करे.’

प्रियरंजन के निधन पर प्रधानमंत्री मोदी का ट्वीट
प्रियरंजन के निधन पर प्रधानमंत्री मोदी का ट्वीट

बीबीसी के साथ एक इंटरव्यू में जब उनसे उनके सबसे अच्छे दोस्त के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि उनकी पत्नी दीपा दासमुंशी उनकी सबसे अच्छी दोस्त हैं, जिनके साथ उन्होंने लंबी दोस्ती के बाद शादी की थी. वो बोले, ‘दोस्त तो और भी बहुत हैं. दोस्ती के मामले में मैं पार्टी का विचार नहीं करता.’

चौथा किस्सा: दासमुंशी कोमा में थे, लेकिन कांग्रेस ने स्टार कैंपेनर बना दिया

दासमुंशी का ये किस्सा लोगों के बीच उनका कद बताता है. 2016 की बात है. पश्चिम बंगाल में चुनाव होने जा रहे थे और दासमुंशी सात साल से कोमा में थे. चुनाव से पहले कांग्रेस ने 90 लोगों की कैंपेन कमेटी बनाई. इस लिस्ट में दासमुंशी का भी नाम था. उनकी पत्नी और राज्यसभा सांसद दीपा दासमुंशी ने लिस्ट देखी, तो उन्हें लगा कि प्रियरंजन का नाम गलती से लिस्ट में डाल दिया गया है. वो पश्चिम बंगाल प्रभारी सीपी के पास पहुंचीं. जोशी ने जवाब दिया,

‘प्रियरंजन दासमुंशी का नाम गलती से नहीं गया है. वो पश्चिम बंगाल के नेता हैं. उनकी अपनी पहचान है और कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के बीच वो बहुत लोकप्रिय हैं. यही कारण है कि उनका नाम कमेटी में 19वें नंबर पर रखा गया.’

प्रियरंजन को श्रद्धांजलि देते पूर्व पीएम मनमोहन सिंह
प्रियरंजन को श्रद्धांजलि देते पूर्व पीएम मनमोहन सिंह

पांचवां किस्सा: खुद कोमा में थे, पत्नी चुनाव जीत गईं

पश्चिम बंगाल में प्रियरंजन के जोर का एक और उदाहरण. 2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान प्रियरंजन कोमा में थे. ऐसे में पार्टी ने उनकी लोकसभा सीट रायगंज से उनकी पत्नी दीपा दासमुंशी को उतार दिया. जीत निश्चित थी, क्योंकि 1998 का चुनाव हारने के बाद यहां संगठन खड़ा करने का काम प्रियरंजन ने ही किया था. दीपा चुनाव जीत गईं. 2014 के लोकसभा चुनाव में भी दीपा की जीत निश्चित थी, लेकिन परिवार की आपसी खींचतान ने सब माठा कर दिया. प्रियरंजन के भाई सत्यरंजन दासमुंशी तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर लड़ गए.

ऐसे में जीत न तो दीपा को मिली और न सत्यरंजन को. बाजी मार गए सीपीएम के मोहम्मद सलीम. फिर भी, आलम ये था कि सलीम को 3,17,515 वोट मिले, दीपा को 3,15,881 वोट मिले और सत्यरंजन को 1,92,698. प्रियरंजन के निधन पर सलीम कहते हैं, ‘दासमुंशी को लोगों से, यहां तक कि विरोधियों से भी निजी रिश्ता कायम करने में महारत थी. उनके देहांत ने डेटा-बेस्ड और तर्क आधारित बहसों पर विराम लगा दिया है.’

अपनी एक रैली में दीपा दासमुंशी
अपनी एक रैली में दीपा दासमुंशी

छठा और आखिरी किस्सा: जब फैशन टीवी और AXN पर बैन लगा दिया

सूचना-प्रसारण मंत्री रहते हुए दासमुंशी ने मार्च 2007 में सोनी नेटवर्क के चैनल AXN पर बैन लगा दिया था. दासमुंशी के मुताबिक ये चैनल अश्लील चीजें दिखाता था. हालांकि, माफी मांगने के बाद AXN से बैन हट गया था. इसके बाद फैशन टीवी पर बैन लगा दिया गया, जिसके ‘Midnight Hot’ जैसे प्रोग्राम सरकार को गवारा नहीं थे. सरकार ने कहा था कि इन प्रोग्राम्स का टेस्ट अच्छा नहीं है, ये महिलाओं को बदनाम करते हैं और पब्लिक मोरलिटी को प्रभावित करते हैं. दासमुंशी के इस फैसला का काफी विरोध भी हुआ था. इसके बाद वो कोई ऐसा प्रस्ताव लाने जा रहे थे, जिससे मीडिया पर सरकार का नियंत्रण बढ़ जाता, लेकिन इसके आने से पहले ही प्रियरंजन कोमा में चले गए.

दासमुंशी के बारे में आप जितने भी नेताओं के बयान पढ़ेंगे, उनमें से जो चार मुख्य चीजें निकलकर आएंगी, वो हैं- Orator, Crisis Manager, Football Enthusiast, Genuine Anti-Left Leader.

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अब प्रियरंजन दासमुंशी के बारे में दो नंबर वाले सवाल टाइप्स कुछ बातें:

13 नवंबर 1945 को ब्रिटिश इंडिया की बंगाल प्रेसिडेंसी के चिर्रीबंदर में जन्म हुआ, जो अब बांग्लादेश में है.
1970 में AICC के सदस्य बने. फिर पश्चिम बंगाल यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष बने.
1971 में कलकत्ता साउथ सीट से सांसद बने. 1984 और 1996 में हावड़ा से सांसद बने. 1999 और 2004 में रायगंज से सांसद बने.
1985 में पश्चिम बंगाल के वाणिज्य राज्यमंत्री बने. मई 2004 से अक्टूबर 2008 तक सूचना-प्रसारण मंत्री और संसदीय कार्यमंत्री रहे.
करीब 20 साल तक ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन के अध्यक्ष रहे. इंडियन फुटबॉल को प्रफेशनल बनाया. 1996 में नेशनल फुटबॉल लीग का आना एक क्रांतिकारी कदम था, जो दासमुंशी की वजह से मुमकिन हुआ.

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फीफा वर्ल्ड कप गेम में मैच कमिश्नर का रोल निभाने वाले पहले भारतीय थे. 1999 के फीफा वुमन्स वर्ल्ड कप में मैच कमिश्नर बने. फिर 2006 में जर्मनी में हुए फीफा वर्ल्ड कप में स्पेन और ट्यूनीशिया के बीच ग्रुप स्टेज गेम में मैच कमिश्नर रहे. इसके बाद ऑस्ट्रेलिया और क्रोएशिया के ग्रुप स्टेज मैच में भी ये मैच कमिश्नर रहे. ये मैच इंग्लिश रेफरी ग्राहम पोल के निर्णयों के लिए मशहूर है, जिसमें पोल ने क्रोएशिया के खिलाड़ी जोसेप सिमुनिच को तीन येलो कार्ड दिखाए थे.
निंबस के दूरदर्शन के साथ मैच के ब्रॉडकास्टिंग राइट्स शेयर करने के पीछे भी दासमुंशी ही थे, जबकि निंबस चार साल से मैच टेलीकास्ट करने के लिए करोड़ों रुपए दे रहा था.
दासमुंशी बांग्लादेश बनने के सपोर्ट में थे. उनकी मौत पर बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने भी श्रद्धांजलि दी. बांग्लादेश की तरफ से दासमुंशी को ‘फ्रेंड ऑफ लिबरेशन वॉर’ का अवॉर्ड भी दिया गया था, जिसे उनके परिवार ने 2013 में स्वीकार किया था.

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दासमुंशी ने 1994 में सामाजिक कार्यकर्ता दीपा से शादी की थी. इनका एक बेटा है- प्रियदीप दासमुंशी. 12 अक्टूबर 2008 को इन्हें स्ट्रोक पड़ा और पैरालिसिस हो गया. फिर ये कोमा में चले गए. पहले एम्स, फिर अपोलो में इलाज चला. नवंबर 2009 में स्टेम सेल थेरेपी दी गई. अक्टूबर 2011 में अपोलो हॉस्पिटल ने इन्हें घर ले जाने के लिए कहा. 20 नवंबर 2017 को दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल में इनका देहांत हो गया. डॉक्टरों के मुताबिक आखिरी महीने में चेस्ट इन्फेक्शन बहुत बढ़ गया था, जिसकी वजह से इनका निधन हुआ.


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