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उस इंसान की कहानी, जिसके आगे मोदी हाथ जोड़ के नमन करते हैं

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भारतीय जनता पार्टी एक इंसान के नाम पर सजदा करती है. आपके दिमाग में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम आएगा, पर वो इंसान पीएम नरेंद्र मोदी नहीं हैं. बल्कि वो खुद उस इंसान के नाम पर झुक जाते हैं.

वो नाम है दीनदयाल उपाध्याय का. भाजपा तो 1980 में अस्तित्व में आई. इससे पहले इस पार्टी का नाम जनसंघ हुआ करता था. पंडित दीनदयाल उपाध्याय 1953 से 1968 तक जनसंघ के नेता हुआ करते थे.

श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कहा था: ‘अगर मेरे पास दो दीनदयाल होते तो मैं भारत का चेहरा बदल देता.’

हिंदू विचारधारा की इस पार्टी में दीनदयाल उपाध्याय का नाम सिर्फ इसलिए नहीं है कि वो शुरुआत से थे, बल्कि इसलिए है क्योंकि उन्होंने एक फिलॉसफी दी, जिसकी दुहाई आज भी भाजपा के नेता देते हैं. अक्सर भाजपा पर आरोप लगता है कि इनके पास विचारधारा जैसी कोई चीज नहीं है. कोई इतना बड़ा विचारक नहीं हुआ है, जो बाकी विचारों को काट सके. ऐसे में ये पार्टी दीनदयाल उपाध्याय की बातों का ही आसरा खोजती है.

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गोलवलकर, दीनदयाल उपाध्याय और वाजपेयी

पर क्या थी उनकी बात, जिसे भाजपा आज भी दुहराती है?

दीनदयाल उपाध्याय की थ्योरी: एकात्म मानववाद

दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद के मुताबिक किसी व्यक्ति के लक्ष्य उसके समाज के लक्ष्यों के पूरक हैं. क्योंकि एक आत्मा पूरी इंसानियत को एक करती है. तो एक आदर्श इंसान को खुद से और खुद के परिवार से बाहर सोचना चाहिए और पूरी इंसानियत के भले के बारे में सोचना चाहिए. पर ये सिर्फ सामाजिक थ्योरी नहीं थी. दीनदयाल के मुताबिक ये पश्चिमी सभ्यता के कम्युनिज्म, कैपिटलिज्म और व्यक्तिगतवाद से अलग हिंदुस्तान के लिए थ्योरी थी. हालांकि इकॉनमी के बारे में दीनदयाल का मानना था कि छोटी यूनिट होनी चाहिए इंडस्ट्री की, जिससे प्रोडक्शन ज्यादा हो. नेहरू के प्लानिंग कमीशन के वो सख्त खिलाफ थे. नरेंद्र मोदी ने पीएम बनने के बाद बड़ी तत्परता से इसको खत्म किया.

1965 में जनसंघ ने एकात्म मानववाद को अपना ऑफिशियल सिद्धांत बना लिया. यही भाजपा का भी ऑफिशियल सिद्धांत है. इसके मुताबिक कम्युनिज्म और कैपिटलिज्म से अलग भारत को एक अपना इकॉनमिक मॉडल बनाना चाहिए, जिसमें इंसान को केंद्र में रखा जा सके. पर इस थ्योरी ने पश्चिमी साइंस को पूरी तरह से स्वीकार किया था, भले उनकी इकॉनमिक थ्योरी को ना किया हो.

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एम. एस. गोलवलकर

पर इसमें सबसे रोचक चीज ये है कि दीनदयाल उपाध्याय की बातों में हिंदू राष्ट्रवाद नहीं है. वो भारत की सामाजिक और आर्थिक समस्याओं से परिचित थे, पर ये उनके लिए धर्म की सेटिंग में था, हिंदुत्व की सेटिंग में नहीं था. वो धर्म की बात करते हैं, गोलवलकर की तरह हिंदू कॉन्शसनेस की बात नहीं करते. उपाध्याय का धर्म हिंदू धर्म नहीं है. वो इसको आम तौर पर प्रचलित धर्म और रिवाज की तरह नहीं मानते. इनके धर्म को अगर फिलॉसफी की तरह देखा जाए, तो शायद उनकी बात ज्यादा समझ आएगी. उनकी फिलॉसफी के मुताबिक हमें अपने कल्चर से ही अपनी समस्याओं का हल खोजना होगा. यही बातें पीएम नरेंद्र मोदी भी दुहराते हैं.

कैसे दीनदयाल उपाध्याय की ये हैसियत बनी?

25 सितंबर, 1916 को मथुरा के नगला चंद्रभान में पैदा हुए थे दीनदयाल. इनके पिताजी ज्योतिषी थे. पर बहुत जल्दी ही उनकी मौत हो गई थी. मां की भी मौत तब हो गई, जब दीनदयाल की उम्र 8 साल थी. तो दीनदयाल का पालन-पोषण ननिहाल में हुआ. पढ़ाई करने वो सीकर पहुंच गए और इतने मेधावी थे कि सीकर के महाराजा कल्याण सिंह ने उनको स्कॉलरशिप दे दी. बाद में उन्होंने पिलानी से पढ़ाई की. उस समय साइंस का वो बढ़िया कॉलेज हुआ करता था.

1937 में जब दीनदयाल सनातन धर्म कॉलेज कानपुर में पढ़ रहे थे, तब वो RSS के संपर्क में आए. उससे पहले वो प्रोविंशियल सर्विसेज के लिए चुन लिए गए थे, पर उन्होंने जॉइन नहीं किया. और फिर उनकी मुलाकात आरएसएस के फाउंडर के बी हेडगेवार से हुई. 1942 में वो आरएसएस के लिए फुल टाइम काम करने लगे. नागपुर में संघ का द्वितीय वर्ष पूरा करने के बाद वो प्रचारक बन गए. पहले उन्होंने लखीमपुर जिले के लिए प्रचारक का काम किया. फिर यूपी के प्रांत प्रचारक बन गए.

उस वक्त उनको आरएसएस का आदर्श स्वयंसेवक माना जाता था. आज भी माना जाता है.

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दीनदयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेयी बाकी लोगों के साथ

दीनदयाल ने लखनऊ से राष्ट्रधर्म के नाम से मासिक पत्रिका शुरू की थी. उन्होंने बाद में पांचजन्य और स्वदेश भी निकालना शुरू किया. पर वो किसी में अपना नाम एडिटर के तौर पर नहीं देते थे.

1951 में जब श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ की स्थापना की, तो दीनदयाल को आरएसएस ने इसमें प्रमोट किया. वो आरएसएस का राजनीतिक चेहरा बनकर आए. पहले वो उत्तर प्रदेश जनसंघ के जनरल सेक्रेटरी बने, बाद में ऑल इंडिया जनरल सेक्रेटरी बन गए. पर 1953 में मुखर्जी की मौत हो गई. इसके बाद जनसंघ की पूरी जिम्मेदारी दीनदयाल उपाध्याय के कंधों पर आ गई. 1953 से 1967 तक वो जनसंघ के सर्वेसर्वा रहे. उन्होंने लोकसभा का चुनाव भी लड़ा, पर जीत नहीं मिली थी.

उनकी मौत को कई लोग आज भी रहस्यमयी मानते हैं
11 फरवरी 1968 को यूपी के मुगलसराय के पास ट्रेन यात्रा के दौरान उनकी संदेहास्पद मौत हो गई. वो सियालदह-पठानकोट एक्सप्रेस से लखनऊ से पटना के लिए निकले थे. उनकी लाश रेलवे ट्रैक के पास मिली थी. इसको ले के कई कॉन्सपिरेसी थ्योरीज हैं. कई लोग उनकी मौत को मर्डर ही मानते हैं. उसी साल रॉबर्ट कैनेडी और मार्टिन लूथर किंग जूनियर की भी हत्या हुई थी.

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दीनदयाल उपाध्याय की डेड बॉडी

शुरुआत में सीबीआई ने इस मामले की जांच की और कहा कि ट्रेन में चोरी के दौरान इनकी मौत हो गई है. दो लोगों को गिरफ्तार भी किया गया, जिन्होंने कहा कि हमने ट्रेन से दीनदयाल को धक्का दे दिया था. पर बाद में दोनों छूट गए.

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डेड बॉडी के साथ जनसंघ के नेता

जनसंघ के एक फाउंडिंग मेंबर बलराज मधोक ने कई बार कहा है कि ये मर्डर ही था. 1973 में मधोक ने जनसंघ छोड़ दिया था क्योंकि वाजपेयी ग्रुप के साथ उनकी बनी नहीं थी. मधोक ने ‘जिंदगी का सफर’ नाम से आत्मकथा लिखी. इसका तीसरा वॉल्यूम 2002 में आया. इसकी शुरुआत दीनदयाल की मौत से होती है. इसमें उन्होंने लिखा है कि इस हत्या में जनसंघ के नेताओं का ही हाथ होने की संभावना थी. वो आरएसएस के अंदर ताकत की आजमाइश को भी इसका जिम्मेदार मानते थे. उन्होंने वाजपेयी और नानाजी देशमुख पर भी आरोप लगाया कि एक हत्या को ट्रेन एक्सिडेंट बनने पर कुछ खास नहीं कहा इन लोगों ने. पर मधोक की बातों में कोई प्रूफ नहीं मिला है.

मोदी हर वक्त दीनदयाल उपाध्याय का नाम लेते हैं. जब इन्होंने योजनाएं चलाईं, तो सबसे पहले दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर ही चलाईं. 2007 के गुजरात विधानसभा चुनाव में मोदी ने कहा था: जब पंडित दीनदयाल उपाध्याय जिंदा थे, तब हम लोग चुनाव में जमानत जब्त हो जाने पर भी सेलिब्रेट करते थे. 2016 में कहा कि दीनदयाल उपाध्याय की जन्मशताब्दी पर भाजपा देश के कई राज्यों में जीतेगी. मेक इन इंडिया के लॉन्च पर कहा कि मैं ये प्रोग्राम उनके चरणों में रखता हूं.


ये स्टोरी ‘दी लल्लनटॉप’ के लिए ऋषभ ने की थी.


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