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अमित शाह ने हिंदी दिवस पर बयान तो दिया, लेकिन ये जरूरी बात भूल गए

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14 सितम्बर. भारत में इसे हिंदी दिवस के रूप में मनाते हैं. इसी मौके पर भाषण देते हुए अमित शाह ने हिंदी के महत्त्व पर बात की. उन्होंने ट्वीट किया,

‘भारत विभिन्न भाषाओं का देश है और हर भाषा का अपना महत्व है परन्तु पूरे देश की एक भाषा होना अत्यंत आवश्यक है जो विश्व में भारत की पहचान बने. आज देश को एकता की डोर में बांधने का काम अगर कोई एक भाषा कर सकती है तो वो सर्वाधिक बोले जाने वाली हिंदी भाषा ही है. (sic)’

इस बात पर गैर हिंदी भाषी क्षेत्रों से प्रतिक्रियाएं आईं.

 

केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने कहा कि अमित शाह ने जानबूझ कर ये मामला उठाया है. ताकि महत्वपूर्ण मुद्दों पर से जनता का ध्यान बंटाया जा सके. ये संघ परिवार की सोची समझी चाल है ताकि भाषा के नाम पर समाज में नई खाइयां खोदी जा सकें.

पुदुच्चेरी के मुख्यमंत्री वी नारायणस्वामी ने कहा कि लोगों पर हिंदी थोपने से भारत की सांस्कृतिक पहचान पर चोट पहुंचेगी.

एम के स्टालिन, जो द्रविड़ मुन्नेत्र कझगम (DMK) के लीडर हैं, उन्होंने भी अमित शाह के इस बयान पर कहा कि ये चौंकाने वाला है. इससे भारत की एकता पर असर पड़ेगा. DMK की तरफ से मैं (अमित शाह से) ये गुजारिश करूंगा कि वो अपने इस नज़रिए को वापस ले लें.

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने रविवार, 15 सितंबर, 2019 को कहा, ‘हमारे पास एक देश- एक टैक्स, एक देश एक चुनाव भले ही हो, लेकिन किसी भी हाल में एक देश – एक संस्कृति , एक देश – एक भाषा नहीं हो सकती.’

कमल हासन ने ट्विटर पर एक वीडियो पोस्ट किया. इसमें उन्होंने कहा कि पूरे देश में एक भाषा को थोपा नहीं जा सकता है, अगर ऐसा होता है तो इसपर बड़ा आंदोलन होगा.

वहीं किरन रिजिजू ने कांग्रेस पर निशाना साधा है. उन्होंने एक वीडियो ट्वीट किया है जिसमें पी चिदम्बरम हिंदी को प्रमोट करने की बात कहते दिखाई दे रहे हैं.

हिंदी को लेकर चल रही ये बहस नई नहीं है. भाषा और उससे जुड़ी पहचान को लेकर अलग-अलग समूहों ने समय-समय पर अपनी मांग सामने रखी है, और एक भाषा के थोपे जाने को लेकर विरोध भी किया है. भाषा के आधार पर राज्यों के विभाजन का तर्क भी इसमें शामिल है.

भाषा की बहस उतनी ही पुरानी है जितना पुराना आज़ाद भारत

 

1945-46 में कांग्रेस ने जो अपना चुनावी मैनिफेस्टो रखा था, उसमें भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की बात रखी गई थी. लेकिन आज़ादी के बाद JVP  कमिटी बनाई गई. इसमें जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल, और पट्टाभि सीतारमैया शामिल थे. इस कमिटी ने कहा कि ये नए राज्य बनाने का सही समय नहीं है. लोगों की भावना इस चीज़ को लेकर बहुत तेज और ज़ोरदार है. डेमोक्रेट्स के तौर पर हमें इससे मानना होगा. लेकिन भारत की भलाई के लिए इस मामले में कुछ बंदिशें लगाई जानी चाहिए.

जब भारत की राष्ट्रभाषा पर बहस शुरू हुई, तो संविधान सभा में दो फाड़ हो गए. एक प्रो-हिन्दी और दूसरा वो जो हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के खिलाफ था. इसके बाद अपनाया गया ‘मुंशी-अयंगर’ फ़ॉर्मूला. 1949 में इसी फ़ॉर्मूले ने भारत की राजभाषा नीति को उसका रूप दिया. ये कहा गया कि राष्ट्रभाषा कोई भी नहीं होगी. राजभाषा होगी. जिसमें हिंदी को एक स्थान दिया गया. और दूसरा स्थान अंग्रेजी को दिया गया, लेकिन सिर्फ 15 साल के लिए.

इसके बाद आया स्टेट रीऑर्गेनाइजेशन कमीशन (SRC). 1953 में कमीशन बना, जिसमें फज़ल अली, एचएन कुंजरू और केएम पणिक्कर शामिल थे. इस कमीशन द्वारा दी गई सलाहों में से कुछ का पालन 1956 के स्टेट रीऑर्गेनाइजेशन ऐक्ट में किया गया. इसमें भी कुछ बातों का विरोध रहा. जैसे विदर्भ का महाराष्ट्र में ही बने रहना, जबकि उसे अलग राज्य बनाने की मांग चल रही थी. आंध्र प्रदेश और तेलंगाना को एक ही राज्य बनाए रखने पर काफी विवाद हुआ था.

2008 में एक दूसरे स्टेट रीऑर्गेनाइजेशन कमीशन की बात उठनी शुरू हुई. उस समय UPA सत्ता में थी. आंध्र प्रदेश के कांग्रेस इंचार्ज वीरप्पा मोइली  के स्टेट लीडर्स से बात करने की खबरें सामने आईं. इस सेकंड SRC में तीन मांगों की प्रमुखता थी. आंध्र प्रदेश से तेलंगाना का अलग होना, विदर्भ का महाराष्ट्र से अलग होना, और उत्तर प्रदेश को तीन हिस्सों में बांटा जाना. लेकिन सिर्फ इसकी खबरें सामने आईं, कोई कदम उठाया नहीं गया उस वक़्त. भाषा और पहचान के आधार पर अलग राज्यों की जो मांग उठ रही थी, उसमें शामिल थे- मिथिलांचल (बिहार), बोडोलैंड (असम), गोरखालैंड( वेस्ट बंगाल), कोडागू (कर्नाटक), गोंडवाना (छत्तीसगढ़), लद्दाख (जम्मू-कश्मीर), और गारोलैंड (मेघालय).

‘हिंदी- भारत की बिंदी’ का तर्क, और दक्षिण भारतीय राज्यों का विरोध

 

1937 में मद्रास प्रेसिडेंसी में सी राजगोपालाचारी ने हिंदी सीखना अनिवार्य कर दिया था. पेरियार और अन्नादुरै, दोनों ने इसका विरोध किया. इसका हिस्सा एम करुणानिधि भी बने, जिनको DMK चीफ अन्नादुरै ने चांदी की तलवार और ढाल दी. हिंदी के थोपे जाने के खिलाफ चल रही लड़ाई में अपना ‘जनरल’ बनाया.

1959 में जब इस बात पर बहस चल रही थी, तब जवाहरलाल नेहरू ने कहा था,

मैं दो चीज़ों में यकीन रखता हूं. जैसा मैंने अभी कहा, कोई भी भाषा थोपी नहीं जाएगी. दूसरा, चाहे कितनी भी समय के लिए, मुझे नहीं पता वो समय कितना लंबा होगा, लेकिन मैं अंग्रेजी भाषा को सहयोगी भाषा के रूप में रखना चाहूंगा. इसलिए नहीं कि इसमें कोई सुविधा है, बल्कि इसलिये कि गैर हिंदी भाषी लोगों को ये न लगे कि विकास के कुछ दरवाज़े उनके लिए बंद हो गए हैं. क्यों? क्योंकि उन्हें सरकार से बातचीत के लिए भी हिंदी का इस्तेमाल करना पड़ रहा है. उनको ये ऑप्शन अंग्रेजी में भी होना चाहिए.

50 के दशक से ही DMK की राजनीति द्रविड़ पहचान और इससे जुड़े मुद्दों के आस-पास टिकी रही है. भाषा इसका अहम हिस्सा रही. द्रविड़ भाषाओं में तमिल, तेलुगु, मलयालम, और कन्नड़ आती हैं. द्रविड़ राष्ट्रवाद के जाने-माने नेता पेरियार वी रामस्वामी ने एक अलग द्रविड़ राज्य की मांग की थी. इसे बाकी के द्रविड़ राज्यों में उतना समर्थन नहीं मिला, लेकिन तमिलनाडु में इसे लेकर बहुत तगड़ी पॉलिटिक्स हुई. जब हिंदी के प्रचार प्रसार को लेकर गैर हिंदी भाषी दक्षिण भारतीय राज्यों में विरोध दर्ज हुआ, तो ऑफिशियल लैंग्वेजेज़ एक्ट ऑफ़ 1963 पास हुआ. इसमें अंग्रेजी को हिंदी के साथ राजभाषा माना गया. इसके इस्तेमाल को स्वीकृति दी गई. और तब से लेकर अब तक अंग्रेजी और हिंदी, दोनों ही भारत की राजभाषाएं हैं. अब दोबारा भाषा को लेकर दिए अमित शाह के बयान ने ‘बर्र के छत्ते’ को छेड़ दिया है.

हिंदी क्यों नहीं?

 

हिंदी को भारत की इकलौती राष्ट्रभाषा न बनाए जाने के पीछे कई तर्क दिए जाते हैं. उनमें से कुछ तर्क ये हैं:

# हिंदी पूरे भारत में नहीं बोली जाती. इसे इकलौती राजभाषा बना दिया गया तो उन लोगों को नुकसान होगा जो ये भाषा नहीं जाते, उन्हें सीखनी पड़ेगी. जिनको पहले से आती है, वो किसी भी कम्पटीशन में आगे निकल जाएंगे.  देश की सत्ता जहां से कंट्रोल होती है, दिल्ली, वो हिंदीभाषी क्षेत्र है, और उसके आस-पास भी हिंदी भाषी राज्य हैं. ये गैर हिंदी भाषियों के विरुद्ध पक्षपात है.

# जो भी गैर-हिंदी भाषाएं हैं, उनका अपना काफी विस्तृत और समृद्ध साहित्य है. उन्हें इस बात से दिक्कत है कि किसी और भाषा के साहित्य को उनके अपने साहित्य के ऊपर रखा जाए.

# अंग्रेजी पूरी दुनिया में अपनाई जाती है. बोली जाती है. बिजनेस और साइंस की भाषा है. यही नहीं. दुनिया में इसे कई देश अपना रहे हैं. ग्लोबल भाषा से किसी को दिक्कत क्यों ही हो रही है? ये सवाल पूछते हुए लोग अक्सर चीन का उदाहरण देते हैं. जो अब अंग्रेजी भाषी देशों से खासतौर पर टीचर बुलाकर अपने स्कूलों में नौकरी दे रहा है.

# हिंदी- हिन्दू-हिन्दुस्तान वाले अप्रोच ने भी कई लोगों को इससे दूर किया है. साल 1800 में फोर्ट विलियम कॉलेज में इसकी शुरुआत हुई. जॉन बर्थोविक गिलक्रिस्ट वहां के डायरेक्टर थे. उनके निर्देश के अनुसार, ट्रेनियों के लिए रीडिंग मटीरियल दो भाषाओं में तैयार किया गया. हिन्दुओं के लिए देवनागरी लिपि  में लिखी हिंदी, और मुस्लिम छात्रों के लिए फ़ारसी लिपि में लिखी उर्दू. मुगल सल्तनत के बिखरने के समय ब्रिटिश लोगों ने हिंदी भाषा को प्रमोट किया, ताकि हिन्दी आधारित हिन्दू नेशनलिज्म (राष्ट्रवाद) को भड़काया जा सके. मुगलों के ख़िलाफ़. शुरुआत जो वहां से हुई, वो बाद में हिंदी के भीतर क्लिष्ट संस्कृतनिष्ठ शब्द घुसाते हुए उसकी तथाकथित ‘हिंदूकरण’ की तरफ बढ़ी. अभी भी कई लोगों के मन में ये छवि गहरे पैठी हुई है.

हिंदी क्यों?

 

हिंदी के समर्थन में तर्क देने वालों की भी कमी नहीं है. उनके हिसाब से एक देश एक भाषा वाले तर्क के पीछे कुछ महत्वपूर्ण वजहें हैं. जैसे:

# अंग्रेजी गुलामियत की याद दिलाती है. इसी भाषा का इस्तेमाल करने वालों ने हमारे देश को बंधक बनाकर रखा और मजबूरन गुलाम देशों को अपने आकाओं की भाषा सीखनी पड़ी. उसी का इस्तेमाल ये दिखाता है कि किस तरह बंधुआ मानसिकता से हम अभी भी पूरी तरह आज़ाद नहीं हो पाए हैं.

# अंग्रेजी में ऐसा कुछ ख़ास नहीं है जोकि भारत की पहचान से जुड़ा हो. दुनिया के कई देश अंग्रेजी बोलते हैं. उनसे हटकर भारत को एक राष्ट्रीय पहचान बनानी है तो हिंदी ही उसके लिए सबसे सही विकल्प है, ऐसा तर्क लोग देते हैं.

# भले ही हिंदी और द्रविड़ भाषाओं में उतनी समानता नहीं, लेकिन हिंदी सीखना उनके लिए आसान इसलिए होगा क्योंकि द्रविड़ भाषाओं और हिंदी में संस्कृत की वजह से एक कॉमन ग्राउंड मिल सकता है.

# हिंदी की स्वीकृति पर बुरा असर इसलिए पड़ा क्योंकि इसे प्रमोट करने वालों का तरीका ठीक नहीं था. अगर सभी को ये विकल्प दिया जाए कि वो अपनी मर्ज़ी से हिंदी सीखें, और उसका इस्तेमाल करने के लिए उन्हें बाध्य न किया जाए, तो उससे लोगों को दिक्कत शायद कम होगी.

त्रिभाषा फ़ॉर्मूला

 

अंग्रेजी और हिंदी के बीच की खींचतान में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब थ्री-लैंग्वेज फ़ॉर्मूला पर बात हुई. हालत कुछ ऐसी थी. जनवरी 1964 में DMK के एक सदस्य ने खुद को त्रिची में आग लगा ली, हिन्दी के विरोध में. लोगों को लग रहा था कि सरकारी नौकरियों, ब्यूरोक्रेसी इत्यादि में हिंदी बोलने वालों को फायदा होगा, उनकी भाषा का. छात्र भी सड़कों पर उतर आए, ऐसे में मद्रास स्टेट के मुख्यमंत्री एम भक्तवत्सलम ने त्रिभाषा फ़ॉर्मूला सामने रखा. यानी राज्य में हिंदी-अंग्रेजी और तमिल इस्तेमाल की जाएगी. उसे लेकर संशय व्यक्त किया गया. इस बात ने छात्रों के बीच हिंदी को लेकर चिंता और बढ़ा दी. इसी हाल में DMK ने 25 जनवरी को शोक दिवस मनाने की घोषणा कर दी. प्रदर्शन कर रहे छात्र और कांग्रेस के कार्यकर्ता भिड़ गए. पैरामिलिट्री फ़ोर्स बुलानी पड़ी. कुछ प्रदर्शन कर रहे छात्रों ने खुद को आग लगा ली, ज़हर खा लिया. इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल  बहादुर शास्त्री ने ऑल इंडिया रेडियो पर घोषणा करके कहा कि अंग्रेजी का इस्तेमाल किया जाता रहेगा.

1983 के सरकारिया कमीशन ने भी ये कहा कि त्रिभाषा फ़ॉर्मूला अपनाया जाना चाहिए. स्कूल के स्तर पर हिंदी, अंग्रेजी( या कोई भी यूरोपियन भाषा), और एक क्षेत्रीय (गैर हिंदी भारतीय) भाषा सिखाई जानी चाहिए बच्चों को. इस वक़्त राज्य अपनी आधिकारिक भाषाएं चुन सकते हैं. उनमें अपने आधिकारिक काम कर सकते हैं. जैसे कर्नाटक में सरकारी कामों के लिए कन्नड़ इस्तेमाल की जा सकती है. उसे वहां ऑफिशियल रिकग्निशन मिला हुआ है. इसी तरह दादरा और नगर हवेली में गुजराती को ये जगह मिली हुई है.

लेकिन भाषाओं के सीखने के नज़रिए से ये बात कही जाती रही है कि स्कूल में ही गैर हिन्दी भाषी बच्चों को हिंदी और हिंदी भाषी बच्चों को गैर हिंदी भाषाओं से परिचित कराना चाहिए. इस वक्त जवाहर नवोदय विद्यालय इस त्रिभाषा फ़ॉर्मूले को अपना चुके हैं. लेकिन कई सरकारी या प्राइवेट स्कूलों में ऐसा नहीं है. कई हिंदी भाषी क्षेत्र के स्कूलों में तीसरी भाषा संस्कृत, फ्रेंच, जर्मन इत्यादि पढ़ाई जाती है. इसमें गैर-हिंदी भारतीय भाषाएं शामिल नहीं हैं. अगर त्रिभाषा फ़ॉर्मूला अपनाकर भाषा को सीखने के नज़रिए से आगे बढ़ाया जाए, तो उसके स्वीकृति मिलने की संभावना भी ज्यादा होगी.


वीडियो: हिंदी दिवस पर दिए गए अमित शाह के बयान का विरोध तो हुआ ही, वो बाद में ट्रेंड भी करने लगा

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