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इसी लकीर पर से उस लाश को फाड़ा जाना था!

‘कफ़स’ में एक चरित्र है - अदीब. जब वह पैदा हुआ तब उसके शरीर में औरत और आदमी दोनों के जननांग थे. उसके पिता उसे लड़का बनाना चाहते थे. उसके कई-कई ऑपरेशन होते हैं. इस अंश में ‘बेदावा लावारिस लाश’ के ‘शव विच्छेदन’ के बहाने व्यवस्था की विद्रूपता का पोस्टमार्टम किया गया है.

अरुण देव
अरुण देव

16 फ़रवरी 1972, कुशीनगर उत्तर –प्रदेश में जन्मे अरुण देव जी का कविता संग्रह ‘क्या तो समय’ भारतीय ज्ञानपीठ से और ‘कोई तो जगह हो’ राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ था. उन्हें ‘राष्ट्र कवि मैथिली शरण गुप्त राष्ट्रीय सम्मान’ से सम्मानित किया जा चुका है. अरुण देव जी इंटरनेट पर एक साहित्यिक पत्रिका ‘समालोचन’ का संचालन करते हैं. यह पत्रिका साहित्य रसिकों को बीते समय के कनॉट प्लेस के कॉफ़ी हाउस सरीखा अड्डा देती है. अतीत में वो इस ख़ाकसार की कविताओं को भी ‘समालोचन’ में स्थान दे चुके हैं. उसी वर्चुअल कॉफ़ी हाउस से हम आपके लिए लेकर आए हैं तरुण भटनागर के आने वाले उपन्यास ‘कफ़स’ से एक अंश.

तरुण भटनागर
तरुण भटनागर

25 सितंबर 1968 को जन्मे तरुण भटनागर मध्यप्रदेश में राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं. साहित्य के अतिरिक्त उनकी संगीत एवं फिलोसोफी में भी रूचि है. अतीत में उनके ‘गुलमेहंदी की झाडियां’, ‘भूगोल के दरवाजे पर’, ‘जंगल में दर्पण’ नामक कहानी संग्रह और ‘लौटती नहीं जो हंसी नामक’ उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं.

आइये पढ़ते हैं कफ़स का एक अंश


दण्डकारण्य 

दूर जंगलों के एक अस्पताल की मर्चरी.

मर्चरी में घुसने से पहले डॉक्टर जे. जोसेफ ऊपर लिखे बोर्ड को देखते हैं. अंगरेजी में लिखा है- पोस्टमार्टम रुम, हिंदी में-शव विच्छेदन कक्ष.

कमरे में ठीक सामने टेबिल पर एक लाश पडी है. सफेद कपडों में लिपटी. डॉक्टर जोसेफ ने पहले प्लास्टिक के दस्ताने पहने फिर मुंह पर एक हरी पट्टी बांधी. डॉक्टर जोसेफ का पूरा चेहरा ढंका है. चेहरे पर सिर्फ दो आंखें दिखती हैं. ऐसे वक़्त में वे आंखों से ही बातें करते हैं. पोस्टमार्टम रुम वाला स्वीपर उनकी आंखों के इशारे को पढ़कर आगे का काम करता है.

उन्होंने अभी-अभी लाश के साथ आये कागजों को उलट पलटकर देखा है.
उम्र- लगभग अठाईस साल. मजहब – मुसलमान.
नाम – अब तक पता नहीं.

स्वीपर लाश को फाड़ने के लिए खंजरों की धार की पड़ताल कर रहा है. उसने सुबह ही औज़ार तैयार कर लिये थे. वह ख़ंजरों को तेज़ धार रखता है. कभी-कभी पुरानी लाशों में ख़ाल इस तरह मांस पर चिपक जाती है कि उसे मांस से अलग काटना मुश्किल हो जाता है. इसलिए ख़ंजरों की धार तेज रखना जरुरी है. कुछ लाशें इतनी नाज़ुक हो जाती हैं कि खंजर की तेज़ धार भी कुछ नहीं कर पाती. चलती धार पर ख़ाल, मांस, हड्डी सब कटता जाता है. वह हथौड़ी और छेनी को परख लेता है. ये खोपड़ी को खोलने के काम आती हैं. माथे के ठीक बीच हड्डी में एक जोड होता है, उस पर छेनी रख हथौड़ी मारने पर माथा खुलता जाता है. वह सूजे की नोक और धागे की मजबूती पर तसल्ली होने पर ही यकीन कर पाता है. अगर लाश ही साथ न दे तो दीगर बात है, वर्ना उसका सारा सामान चाक चैबंद रहता ही है.

वह इतना परफेक्ट है कि डॉक्टर के कहने पर विसरे के लिए लाश की आंत, पेट, गले की नली, एक तरफ का पूरा फेफड़ा या कोई और भी अंग काटकर बाटल में कैमिकल में डालकर सुरक्षित रख देता है. उसने सुबह ही इस लाश पर निशानात बना दिये थे. गर्दन के नीचे से छाती के नीचे तक और माथे पर एक लकीर खींच दी थी. इसी लकीर पर से उस लाश को फाड़ा जाना था. डॉक्टर जोसेफ रोज पोस्टमार्टम करते हैं. कहीं कोई नई बात नहीं है.

स्वीपर लाश के ऊपर बने निशानों पर धारदार खंजर रखता जा रहा है.

डॉक्टर के आने से पहले ही स्वीपर ने लाश का सफेद कपड़ा काटकर अलग कर दिया था. ज़िस्म को फाड़ने से पहले डॉक्टर जोसेफ ने उसका मुआयना किया. वे पल भर को ठिठके. लाश पर सरकती उनकी आंखें पल भर को आहिस्ता हुईं और लाश के एक हिस्से को देखतीं थिर सी हो गईं. माथे पर पसीने की कुछ बूंदें उभर आईं. उनके ज़ेहन से अंधेरों में जज़्ब एक दुनिया के अक्स गुजरते गये. काले पर्दों के पीछे की एक ख़ामोश दुनिया.

याद आया जैसे गुजिश्ता दिनों में कहीं उन्होंने ऑपरेशन के कई दिनों के बाद बड़ी हिम्मत के साथ मरीज से आंख मिलाई हो. जब वे मरीज से पूछते हैं- कैसे हो तुम- तो उनके भीतर कुछ दरकता है, कुछ चटक कर बिगड़ता है. वे दुनिया के उन सबसे कमतर शल्य चिकित्सकों में से एक हैं जो उस काली दुनिया को देखकर आया है. कहते हैं यूरोप और दक्षिण अफ्रीका में आज भी कई डॉक्टर भिड़े हैं उसी काली दुनिया में…. हिंदोस्तान में ऐसे डॉक्टर गिनती के ही हैं. डॉक्टर जोसेफ उनमें से एक थे.

पर एक दिन…….

एक दिन उन्होंने उस बड़े अस्पताल के सुपरिटेंडेंट के सामने अपना स्तीफा रखते हुए कहा था कि अब वे इस तरह का ऑपरेशन न करेंगे. सुपरिटेंडेंट उन्हें मनमाफ़िक तनख़्वाह देने को तैयार था. पर वे राजी न हुए. इस तरह वे उस काम को छोड़कर सरकारी महकमे में नौकरी पर आ गये.

दण्डकारण्य के इन जंगलों में हाल छह महीने पहले ही उनका तबादला हुआ है. सरकारी महकमें में दण्डकारण्य में तबादले को सजा के तौर पर देखा जाता है. दण्डकारण्य में तबादला याने सजा. लाल-धूसर मिट्टी पर पसरे सागौन और साल के जंगलों को देखते हुए उनके दिमाग में यही लफ़्ज सरकता है – सजा…..सजा – और वे मुस्कुराते हैं. अक्सर कालिख़ में लिपटी काली-सलेटी रात की ख़ामोशी जब पेड़ों के साथ गुर्राती है, तब यह लफ़्ज उनको देख मुस्कुराता है – सजा…सजा….सजा – वे मुंह फेर लेते हैं.

मरे हुए ज़िस्म को पल भर देखने के बाद उन्हें लगा कि वे यहां से कहीं चले जायें. काला अतीत उनकी आत्मा की सीढियों पर चढ रहा है, धमकता हुआ. उनके पास उससे छुटकारे का कोई उपाय ही न हो जैसे.

डॉक्टर जोसेफ को गुजिश्ता दिनों के पोस्ट ऑपरेटिव वार्ड से आती कराहें और चीखें सुनाई देती हैं…. वे मरीज़ को ढांढस बंधाते हैं. मरीज़ चीखता रहता है.

हर ज़िस्म में कुछ बेहद नाज़ुक अंग होते हैं. मांस और तंत्रिकाओं से बने अंग. उन अंगों से लिपटी होती है उस ज़िस्म की सबसे अहम संवेदना. डॉक्टर जोसेफ को कई मर्तबा उन अंगों को काटकर उस ज़िस्म से अलग करना पडता था. वे जानते थे कि उस ज़िस्म से सिर्फ वह अंग ही कटकर अलग नहीं होता था, उसके साथ-साथ कटकर अलग होती थी कोई बहुत अपनी सी संवेदना, कोई आत्मिक सा जज़्बात…..कटकर अलग होता था कोई ख़्वाब, कोई अक्स जिसमें अपने रंग भरती रहती थी वह बहुत गोपन सी भावना……

डॉक्टर जोसेफ ने लाश के सिर पर, बालों पर, दस्ताने में लिपटे अपने हाथ को रखा. जैसे मां अपने बच्चे के सिर पर हाथ रखती है. स्वीपर ने पल भर को भौंचक नजरों से डॉक्टर जोसेफ को देखा. डॉक्टर जोसेफ सचमुच कहीं चले जाना चाहते हैं. पर इस तरह चले जाना आसान नहीं है. उन्हें अपना काम निबटाना है. जाने से पहले उन्हें कागजों पर दर्ज करनी है पोस्टमार्टम की रिपोर्ट.

लाश के साथ आई पुलिस की डायरी में सबसे ऊपर लिखा है – बेदावा लावारिस लाश…

डॉक्टर जोसेफ अपनी आंखें बंद कर लेते हैं. स्वीपर उन्हें घूरता रह जाता है.

डॉक्टर जोसेफ के ज़ेहन में ओल्ड टेस्टामेंट की कोई इबारत गूंजती है. बंद आंखों के अंधेरों में पुलिस की डायरी पर लाल स्याही से अंकित तीन शब्द गुजरते रहते हैं – बेदावा लावारिस लाश…. शल्य चिकित्सा की उस स्याह दुनिया से आती कराहें सुनाई देती रहती हैं, कोई एकाकी विलाप उनके ज़ेहन को काटता जाता है. आंखें बंद किए-किए दाहिने हाथ की उंगलियों से अपने माथे, गले, कंधे और छाती को छूते हुए वे क्रास का निशान बनाते हैं. ओल्ड टेस्टामेंट की प्रार्थना की अंतिम लाइनें बुदबुदाते हैं. अचानक आंखें खोल स्वीपर को आंखों से इशारा करते हैं, याने – लाश पर रखे खंजर हटा दो- स्वीपर उन्हें अचरज से देखता है.

डॉक्टर जोसेफ के मन में एक पाप आ गया है. अपने पेशे से दगा करने का पाप. एक ऐसा दगा जिसकी इंतिहा उनकी जिंदगी तबाह कर सकती है.

डॉक्टर जोसेफ ने फिर से लाश के साथ आये कागज पत्रों को पलटा. कागज के एक टुकड़े पर वे रुके. एक फटी हुई मार्कशीट. जिसका ऊपरी और निचला हिस्सा फाड़कर अलग किया जा चुका है. सिर्फ बीच का एक हिस्सा बचा है. जिसमें अल्हदा विषयों के नाम और उनके सामने उन विषयों में मिले नंबर लिखे हैं. उन्होंने विषयवार प्राप्त नंबरों पर सरसरी नजर दौड़ाई. गणित के नंबरों को उन्होंने गौर से देखा. चार सौ में से तीन सौ अंठांबे. उन्होंने फिर से गणित में प्राप्त नंबरों को पढा – चार सौ में से तीन सौ अंठांबे – उन्होंने तिबारा पढा – चार सौ में से तीन सौ अंठांबे – फिर कागज पत्रों को बंद कर दिया.

पुलिस के सबसे ऊपर के कागज में सबसे नीचे लिखा है – मृत्यु का कारण.

डॉक्टर जोसेफ को इन कागज़ों में ‘मृत्यु का कारण’ अंकित करना है. मृत्यु के कारण के नीचे ब्रैकेट में लिखा है – पोस्टमार्टम करने वाले चिकित्सक का अभिमत, याने वे क्या मानते हैं कि मृत्यु का कारण क्या है ? क्या वज़ह थी कि यह शख़्स मारा गया? मौत की वज़ह? वाज़िब वज़ह?

उन्हें शल्य चिकित्सा के दौर के वे ज़िस्म फिर से याद आये.

एक अधेड़ उम्र का बाप और उसके पीछे चलती उसकी कम उम्र वाली घरवाली डॉक्टर जोसेफ को अक्सर याद आते. बाप अक्सर गुजारिश सी करता कि वे उसकी औलाद को लड़का बना दें. एक बार उनके सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया. उन्होंने उसे समझाया कि उनकी औलाद का ज़िस्म ऐसा है कि वह लड़की तो आसानी से बन सकता है पर लड़का नहीं. पर वे न माने. वे उसे समझाते रहे पर उस पर इसका कोई असर न होता. बाद में एक दूसरे डॉक्टर से पता चला कि वह अस्पताल को मुंह मागी रकम देने को तैयार है. अस्पताल के लागे भी रजामंद थे – जब बाप चाहता है तो हमें क्या – वही दूसरा डॉक्टर उन्हें समझाता है – वह काफी पैसे दे रहा है, अस्पताल का डीन भी ऐसा ही चाहता है, कोई ऊपर से फोन भी आया है, क्यों पचड़ा पालना, कर देते हैं ऑपरेशन. ऑपरेशन के बाद वह मरीज पोस्ट ऑपरेटिव वार्ड में सो रहा था.

पता नहीं वह क्या हो पाया है – डॉक्टर जोसेफ का मन ग्लानि से भर उठता – राम जाने वह क्या बन गया होगा, शायद थोडा लड़का, शायद थोडा लड़की – वे उसके सोते चेहरे को गौर से देखते हैं – जैसे कोई लड़की, जैसे कोई लड़का, जैसे इंसान की कोई औलाद, बस एक ही अंतर है कि उसे बार-बार अपने ज़िस्म पर चलवाने हैं चाकू, कटवाने हैं ज़िस्म के कुछ बेहद अंतरंग हिस्से – डॉक्टर जोसेफ सोचते हैं एक दिन वे यह काम बंद कर देंगे, एकदम बंद……

उन्होंने पल भर को लाश की ओर देखा और फिर खिड़की के बाहर देखने लगे.

मृत्यु का कारण…..

खिड़की के पार टीन की एक छत है. छत पर एक कौवा बैठा है. कौवे के मुंह में मांस का एक टुकड़ा है. एक दूसरा कौवा उससे उस टुकड़े को छीनने के लिए झपट रहा है.

मृत्यु का कारण…..

खिड़की के पार कचरे का ढेर है. ढेर में अस्पताल से फेंके गये कटे-फटे मानव अंग पड़े हैं, रक्त रंजित पट्टियों के टुकड़े, पुराने सड़े विसरे की बोतलें……ढेर में काले-लाल रक्त से सना एक प्लेसेन्टा पड़ा है जिसे एक कुत्ता अपने जबड़ों से खींच रहा है.

मृत्यु, मृत्यु….मृत्यु का कारण…..

सजा…दण्डकारण्य…..सजा….दण्डकारण्य…..

ऊपर गिद्धों का एक झुण्ड है. नीले आकाश में इत्मिनान से तैरता. कचरे के ढेर में पड़े इंसानी ज़िस्म के टुकडों पर ललचाते. इंसानी मांस के टुकडों पर झपटने को आतुर….

मृत्यु का कारण….

वे लाश का मजहब जानते हैं, पर वे लाश का नाम नहीं जानते…..

पढ़ाई के सबसे बेहतरीन नंबरों के आगे वे बड़े इत्मिनान से लिख देते हैं – बेदावा लावारिस लाश….

स्वीपर हठात खड़ा है. उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं.

कौवों की कांव-कांव और गिद्धों की चांव-चांव से टूटती रहती है पोस्टमार्टम रुम की ख़ामोशी. पोस्टमार्टम रुम की ख़ामोशी एक तवायफ़ है. चुप्पियों के दलाल की तवायफ़. ख़ामोशी की बदचलनी पर बोलने का उसूल नहीं है. दुनियादारी के बीच उसकी हरमज़दगी का किस्सा कोई नहीं कहता. पैसों कि ख़ातिर जो सबकुछ बेचने को आतुर हो ऐसी बेग़ैरत ‘ख़ामोशी’ से लोग मुस्कुराकर बात करते हैं. ठीक वही ख़ामोशी…..वही असीम, अनंत और परम शांति….अनवरत, मुसलसल….क्या फ़र्क पडता है किसका ज़िस्म….क्या अंतर कि किस- किसकी लाश….शांति, शांति, शांति….क्या फ़र्क कि किसका पोस्टमार्टम, क्या मतलब कि कहां का, किसका और कौन सा जंगल…?

ख़ामोश, ख़ामोश… ऑर्डर- ऑर्डर. चुप बे,चुप…..

मृत्यु का कारण……

डॉक्टर जोसेफ लाल स्याही से पुलिस के कागज़ों में जल्दीबाजी में लिखते हैं – पीठ, छाती और चेहरे पर खरोंच के गहरे निशान (संभवतः पथरीली जमीन पर खसीटे जाने की वज़ह से), दाहिने चैस्ट की पांच पसलियां टूटी हुईं, पेट के दाहिने हिस्से में गहरा घाव (किसी धारदार हथियार से हमले की वज़ह से), गर्दन के पीछे सरवाइकल स्पाइन टूटी हुई (वही संभवतः पथरीली जमीन पर खसीटे जाने की वज़ह से), दाहिने टैम्पोरल में गहरा घाव खोपड़ी के भीतर तक (बंदूक की गोली लगने से), बाईं ह्यूमरस टूटी हुई……

मृत्यु का कारण……

लगातार हुआ रक्तस्राव और ब्रेन के अंदरुनी हिस्सों में गंभीर चोट……

कचरे के ढेर के पास कुत्ता भौंकता है. उसके रक्त रंजित दांत दिखते हैं. अधखाया प्लेसेण्टा उसके मुंह से लटका है.

डॉक्टर जोसेफ तत्काल मर्चरी के बाहर आ जाते हैं. हड़बड़ाए. और सीधे चलते चले जाते हैं. नाक की सीध में. लंबे डग भरते. बेचैन. कभी भी पलटकर न देखने.

मृत्यु का कारण….

खिड़की से सिर बाहर कर कातर आवाज़ में स्वीपर पुकारता है –
‘कहां चल दिये सर. एकदम अचानक.’

डॉक्टर जोसेफ पलटकर नहीं देखते. सीधे चले जाते हैं. सामने की ओर मुंह उठाये. खिड़की के बाहर झांकता स्वीपर चीखता है-

‘कोई काम याद आ गया क्या सर…..?’

फिर वह पुलिस के कागज़ों पर लाल स्याही से दर्ज़ डॉक्टर की रिपोर्ट देखता है. रिपोर्ट के नीचे डॉक्टर जोसेफ ने दस्तख़त नहीं किए हैं. वह फिर से खिड़की की ओर लपकता है. डॉक्टर जोसेफ उसे दूर-दूर तक कहीं नहीं दिखते.

कहानी का एक हिस्सा किसी को नहीं पता. किसी को भी नहीं.

कहते हैं वह दण्डकारण्य के घने जंगलों में वह एक नई-नई रात थी.

अपने एक दोस्त की समझाइश पर अदीब ने अपनी मार्कशीट के तीन टुकड़े किए. एक टुकड़ा जिसमें उसका नाम, उसकी वल्दियत, उसकी उम्र, उसका पता लिखा था, दूसरा टुकड़ा जिसमें उसके कालेज और विश्विविद्यालय का नाम लिखा था और जिसके नीचे विश्विविद्यालय के रजिस्ट्रार के दस्तख़त थे और तीसरा टुकड़ा जिसमें सब्जैक्ट-वार नंबर लिखे थे. दोस्त ने उससे कहा कि वह सिर्फ सब्जैक्टवार नंबर संभाल कर रख सकता है. दोस्त जाने के लिए उठा और उससे मुख़ातिब हुआ –

‘नंबर गणित की इजाद हैं. नंबरों की कोई जात नहीं. नंबरों का कोई मजहब नहीं. नंबर न आदमी होते हैं, न औरत. नंबरों का कोई मुल्क नहीं.’

अदीब उसे एकटक देखता रहा. सामने आग जल रही थी. आग की लपटें दोस्त की आंखों में दमकती थीं-

‘नंबर ख़ालिस गणित हैं. नंबर सिर्फ और सिर्फ उसी के होते हैं जिसके ये होते हैं. नंबरों पर किसी और का अख़्तियार नहीं होता. नंबर इंसाफ़ का दूसरा नाम हैं.’
वह जाने को मुडा. पर फिर उसकी ओर देखा-
‘हां….एक और बात.’
‘क्या…?’
‘नंबरों का कोई घर नहीं होता. उनका कोई पता ठिकाना नहीं होता. सारी दुनिया उनका घर है……तुम सिर्फ नंबरों को सहेज कर रख सकते हो.’

दूर कहीं सुधीर के पास अपर्णा बैठी थी. उसके हाथों में अदीब के स्टडी रुम से लाए कुछ कागज़ थे, जो वह वहां से उठा लाई थी. कागज़ों में वही सब था. इश्क के नंबरों की वही थ्योरम. उसने बड़ी मुश्किल से उस थ्योरम को समझ लिया था. वह सुधीर को वह थ्योरम बांच रही थी. उसे सफेद बोर्ड पर हाईलाइटर चलाती अदीब की उंगलियां दिखीं, थ्योरम और एनामेलीज़ का सही-सही जवाब निकाल लाने को आतुर बेचैन उसकी आंखें दिखीं. उसने सुधीर को चूम लिया –

‘गणित के नंबरों में से इश्क की ख़ुशबू आती है…..है न.’

‘गणित के नंबरों को देखो तो किसी सौदाई इश्कबाज़ की याद आती है….है न.’

जाने से पहले दोस्त ने अदीब के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा था.

अदीब ने सधे हाथों से मार्कशीट के दो टुकडों को आग में जला दिया. इस तरह धधकती आग में जल गया उसका नाम, उसकी वल्दियत, उसकी उम्र……रफ़्ता-रफ़्ता जला था उसके घर का पता….धू-धू कर जलता रहा था उसका कॉलेज, विश्वविद्यालय….लपटों में भस्म होते गये थे विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार के दस्तख़त…… दूर खड़ा दोस्त मुस्कुरा रहा था. उसने गौर से देखा था, कि इन टुकडों को जलाते समय अदीब के हाथ जरा भी नहीं झिझके.

उन तमाम राखों में जो इश्क के अनकहे अफ़साने होकर सबसे पहले चिता पर ख़ाक होते हैं. जो दफ्न होते हैं मिट्टी होने किसी अनाम कब्र में. उड़ते फिरते धूल और राख़ होकर. उन्हीं में शुमार थी वह राख़ भी जो कागज़ के उन टुकडों को जलाने से उठी थी, बिखरी थी दण्डकारण्य के उस बियाबान में.


गुजरात चुनाव-2017 की लल्लनटॉप कवरेजः

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चीतल डायरीज़ः ‘अमूल’ की कामयाबी के कसीदों में खेड़ा-आणंद इलाके की ये सच्चाई छुप जाती है
चीतल डायरीज़ः गुजरात का ये मुसलमान क्यों पिछले 15 साल से वोट नहीं डाल रहा है?
नरेंद्र मोदी 16 जनवरी 2012 की सुबह 11.35 पर किए वादे से मुकर गए
ग्राउंड रिपोर्ट अरावलीः जहां नरेंद्र मोदी लोगों को भावुक कर देते हैं लेकिन कांग्रेस जीत जाती है
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