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नरेंद्र मोदी को लेफ्ट वालों के यहां गुलाब का एक फूल भिजवाना चाहिए, थैंक्यू के साथ

साल था 1970. एक नौजवान एडिनबरा  यूनिवर्सिटी से पॉलिटिकल साइंस में मास्टर्स करके भारत लौटा. नाम प्रकाश करात. वो एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी में वामपंथी छात्र आंदोलन में अपनी भागीदारी के चलते एक बार रेस्टिकेट हो चुका था. यहां आते ही उसने केरल के प्रसिद्ध वामपंथी नेता एके गोपालन का साथ पकड़ लिया. एके के कहने पर एक साल पहले खुली जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में पीएचडी करने के लिए दाखिला ले लिया. जेएनयू में उसने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की छात्र इकाई Students Federation Of India (SFI) की नींव रखी.

प्रकास करात और ईएमएस नंबूदरीपाद
प्रकाश करात और ईएमएस नंबूदरीपाद

1973 में प्रकाश करात जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष बने. 1974 में उन्हें SFI का ऑल इंडिया प्रेसिडेंट बना दिया गया. 1974 के साल में ही जेएनयू में एक और छात्र SFI का कारकून बना. नाम सीताराम येचुरी. आपातकाल के दौरान जेएनयू में SFI की कमान सीताराम के पास रही. 1977 में वो जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष बने. जेएनयू को वामपंथी राजनीति का गढ़ बनाने में इस दोनों नेताओं की अहम भूमिका रही. आज भी जेएनयू कैम्पस में वामपंथी छात्र संगठनों के कार्यकर्ताओं के बीच इस दोनों के कई सारे किस्से प्रचलित हैं.

जिस समय प्रकाश करात और सीताराम की जोड़ी जेएनयू की दीवारों पर लाल रंग पोत रही थी, ठीक उस समय सीपीएम का संस्थापक महासचिव इस्तीफ़ा दे रहा था. वामपंथी दलों में अध्यक्ष के बजाए महासचिव सबसे बड़ा सांगठनिक ओहदा होता है. साल था 1975. 1964 में सीपीएम की स्थापना के समय से पी. सुन्दरैया पार्टी के महासचिव थे. आपातकाल के दौरान सीपीएम में ये बहस जोरों पर थी कि आपातकाल के विरोध में क्या दक्षिणपंथी दलों (जैसे कि जनसंघ) के साथ साझा मोर्चा बनाना चाहिए. पी सुन्दरैया इसे पार्टी के लिए घातक बता रहे थे. पार्टी के दूसरे नेता इसके विरोध में थे. पार्टी की केन्द्रीय कार्यकरिणी की बैठक में सुन्दरैया के प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया गया और उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा.

आपातकाल के बाद इंदिरा के सामने उनकी भर्त्सना का प्रस्ताव पढ़ते हुए जेएनयू छात्रसंघ के तत्कालीन अध्यक्ष सीताराम येचुरी
आपातकाल के बाद इंदिरा के सामने उनकी भर्त्सना का प्रस्ताव पढ़ते हुए जेएनयू छात्रसंघ के तत्कालीन अध्यक्ष सीताराम येचुरी

42 साल बाद फिर से उसी किस्म की स्थितियां सीपीएम के सामने खड़ी हैं. इस बार बहस का मुद्दा ये है कि क्या सीपीएम को कांग्रेस के साथ गठबंधन करना चाहिए. इस मुद्दे पर पर एकराय कायम करने के लिए सीपीएम ने 20 जनवरी, 2018 के रोज अपनी केंद्रीय समिति की बैठक बुलवाई. इसमें बहस के दो मसौदे पेश किए गए. पहला मसौदा कांग्रेस के साथ गठबंधन के पक्ष में था. इसे पार्टी के महासचिव सीताराम येचुरी ने रखा था और दूसरा मसौदा गठबंधन के खिलाफ था, जिसे प्रकाश करात ने रखा था.

कांग्रेस के साथ या एकला चलो रे

2011 के बंगाल विधानसभा चुनाव में 37 साल लगातार सत्ता में रहने के बाद सीपीएम को बड़ी हार का सामना करना पड़ा. उस समय कांग्रेस ममता बनर्जी के खेमे में खड़ी थी. 2016 के विधानसभा चुनाव में सीपीएम अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रही थी. इस बार सीपीएम ने बंगाल में कांग्रेस के साथ गठबंधन करने का निर्णय लिया. सीपीएम किसी भी तरह से अपने को लड़ाई में बनाए रखना चाहती थी.

बंगाल चुनाव के दौरान की एक वॉल राइटिंग
बंगाल चुनाव के दौरान की एक वॉल राइटिंग (फोटो: scroll.in )

बंगाल के साथ-साथ केरल में विधानसभा चुनाव थे. बंगाल में कांग्रेस के साथ गठबंधन की वजह से केरल में सीपीएम असहज स्थिति में पड़ गई. केरल में सीपीएम और कांग्रेस आमने-सामने लड़ रहे थे. ऐसे में सीपीएम के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था कि जिस पार्टी के खिलाफ वो केरल में चुनाव लड़ रही है, उसी के साथ बंगाल में गठबंधन किए हुए है.

प्रकाश करात उस समय भी बंगाल में कांग्रेस के साथ गठबंधन के समर्थन में नहीं थे. बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे आए और वाम मोर्चा को इस गठबंधन के चलते 30 सीटों का नुकसान झेलना पड़ा. चुनाव से पहले उसकी हैसियत मुख्य विपक्षी दल की हुआ करती थी. 2016 के चुनाव के बाद वो तीसरे नंबर पर खिसक गई. इतनी शर्मनाक हार के बाद सीपीएम के भीतर यह बहस और तेज हो गई.

सीताराम येचुरी और प्रकाश करात
सीताराम येचुरी और प्रकाश करात

20 जनवरी के रोज कोलकाता में हुई बैठक इसी बहस को आखिरी अंजाम तक पहुंचाने के लिए हुई थी. इस मीटिंग में काफी बहस के बाद इस मामले पर वोटिंग हुई. फैसला हुआ कांग्रेस के साथ गठबंधन के विरोध में. सीताराम केसरी का प्रस्ताव 55 के मुकाबले 31 वोट से औंधे मुंह गिरा. पी. सुन्दरैया की तरह सीताराम ने भी महासचिव पद से अपना इस्तीफ़ा सौंपने की पेशकश की लेकिन उन्हें ऐसा करने से रोक दिया गया.

केंद्रीय समिति के इस फैसले के बाद सीताराम येचुरी ने प्रेस से मुखातिब होते हुए कहा-

“मैं यहां पार्टी के महासचिव की हैसियत से खड़ा हूं क्योंकि पार्टी की केंद्रीय समिति ने मुझसे ऐसा करने के लिए कहा है. पार्टी चाहती है कि मैं अपने पद पर बना रहूं. पार्टी कांग्रेस का निर्णय ही अंतिम निर्णय माना जाता है. हम इस प्रस्ताव को पार्टी कांग्रेस के पास लेकर जा रहे हैं. अब वही इसके ऊपर अपना निर्णय देगी.”

‘पार्टी कांग्रेस’ माने हर तीन साल में एक बार होने वाली सीपीएम की राष्ट्रीय बैठक. इस बैठक में हर राज्य से चुने हुए प्रतिनिधि आते हैं. इसके अलावा सीपीएम के अनुषांगिक संगठनों मसलन मजदूर और किसान यूनियन के प्रतिनिधि भी इस बैठक का हिस्सा बनते हैं. इस जलसे को सीपीएम में कांग्रेस कहा जाता है. इस साल अप्रैल में सीपीएम की कांग्रेस होने जा रही. सांगठनिक नियमों के मुताबिक पार्टी कांग्रेस में लिए गए निर्णय ही सीपीएम में अंतिम और सर्वमान्य होते हैं.

सीपीएम की केन्द्रीय समिति की मीटिंग के दौरान अपनी बात रखते हुए सीताराम येचुरी
सीपीएम की केंद्रीय समिति की मीटिंग के दौरान अपनी बात रखते हुए सीताराम येचुरी

येचुरी भले ही पोलित ब्यूरो और केंद्रीय समिति के सामने कांग्रेस के सामने गठबंधन का प्रस्ताव हार चुके हैं लेकिन वो हैदराबाद कांग्रेस से उम्मीद लगाकर बैठे हुए हैं. इसकी एक वजह यह भी है कि बंगाल में सीपीएम के नेता कांग्रेस के साथ गठबंधन करने के पक्ष में हैं. पार्टी कांग्रेस में प्रतिनिधियों का चयन सदस्यता के दम पर होता है. बंगाल में सीपीएम के सबसे ज्यादा सदस्य हैं. ऐसे में कांग्रेस में बंगाल से आने वाले प्रतिनिधियों की संख्या भी सर्वाधिक है. यह गणित ही येचुरी के भरोसे की वजह है. इसके अलावा त्रिपुरा, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और दिल्ली सहित कुल 10 राज्यों के प्रतिनिधियों ने भी 2019 में कांग्रेस के साथ गठबंधन का समर्थन किया है.

केरल और बंगाल सीपीएम के दो सबसे मजबूत गढ़ हैं. संगठन के भीतर दोनों राज्यों के नेता अपने-अपने धड़ों में बंटे हुए हैं. प्रकाश करात केरल से आते हैं और उन्हें केरल के धड़े का समर्थन हासिल है. करात पोलित ब्यूरो में जाने से पहले पार्टी की मजदूर इकाई CITU में सक्रिय रहे हैं. केंद्रीय समिति में CITU ने भी करात का समर्थन किया है. इसके अलावा आंध्र प्रदेश से आए प्रतिनिधियों ने भी करात के प्रस्ताव का समर्थन किया है.

क्या येचुरी हरकिशन सिंह सुरजीत का दूसरा संस्करण हैं?

अमृतसर में एक सभा के दौरान हरकिशन सिंह सुरजीत (फोटो: राजीव शर्मा)
अमृतसर में एक सभा के दौरान हरकिशन सिंह सुरजीत (फोटो: राजीव शर्मा)

हरकिशन सिंह सुरजीत की पैदाइश पंजाब की है. वो 1930 के दौर से 2008 में अपनी मौत तक वामपंथी राजनीति में सक्रिय रहे. हरकिशन सिंह सुरजीत की राष्ट्रीय स्तर पर पहचान एक बेहतरीन समझौताकार की थी. वो गठबंधन की राजनीति के चैम्पियन थे. एक से ज्यादा मौकों पर उन्होंने भानुमती के कुनबे को जोड़कर खड़ा किया है.

1996 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी 161 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी लेकिन उसके पास बहुमत नहीं था. उस समय सुरजीत ही थे जिन्होंने यूनाइटेड फ्रंट को अमलीजामा पहनाया. इस गठबंधन में नेशनल फ्रंट के 79, लेफ्ट फ्रंट के 52, तमिल मनिला कांग्रेस के 20, डीएमके के 17 और असम गण परिषद के 5 सांसद शामिल थे. कुल मिलाकर यह जोड़ 192 पर पहुंचा था और कांग्रेस का समर्थन लेकर देवगौड़ा प्रधानमंत्री बने थे. हालांकि यह सरकार पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई लेकिन इसने सुरजीत को कुशल समझौताकार के तौर पर स्थापित कर दिया.

हरकिशन सिंह सुरजीत और सीताराम येचुरी
हरकिशन सिंह सुरजीत और सीताराम येचुरी

2004 में अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री थे. 2003 में मध्य प्रदेश और राजस्थान में बीजेपी की सत्ता में वापसी हुई थी. वाजपेयी को भरोसा था कि वो ‘इंडिया शाइनिंग’ का नारा लगाते हुए फिर से सत्ता में आ जाएंगे. इधर सोनिया गांधी कांग्रेस को फिर से सत्ता में लाने के सपने देख रही थीं. उन्हें समझ में आ गया था कि कांग्रेस अकेले अपने दम पर कभी सत्ता में नहीं आ सकती. 2004 के लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने ‘सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ गठबंधन’ की बात कही.

सुरजीत ने 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व में साझा विपक्ष खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई. इस गठबंधन को नाम दिया गया ‘यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलायंस’. इस नाम में ‘प्रोग्रेसिव’ शब्द सुरजीत की भूमिका की गवाही के तौर पर जोड़ा गया था. उस समय उन्होंने ज्योति बासु सहित कई विपक्षी दलों को एक छाते के नीचे लाने का काम किया था. सीपीएम में कांग्रेस के साथ-साथ चलने की समझदारी को आज भी ‘सुरजीत लाइन’ के नाम से जाना जाता है. सीताराम भी इसी सुरजीत लाइन के सहारे सीपीएम के सिकुड़ते हुए जनाधार और अप्रासंगिक होती हुई राजनीतिक हैसियत को बचाने में लगे हुए हैं. राष्ट्रपति चुनाव के वक़्त विपक्ष के साझा उम्मीदवार के मसले पर कांग्रेस के अलावा दूसरी पार्टियों को साथ लाने में उन्होंने काफी मेहनत की थी.

ऐतिहासिक गलती

1996 में देवगौड़ा के प्रधानमंत्री बनने से पहले ज्योति बासु के सामने प्रधानमंत्री बनने का प्रस्ताव आया था. उस समय प्रकाश करात सीपीएम की पोलित ब्यूरो का हिस्सा हुआ करते थे. उन्होंने बड़े जोर-शोर से इसका विरोध किया था. करात का कहना था कि अगला जो भी प्रधानमंत्री होगा, वो कांग्रेस की दया का पात्र रहेगा. अगर ज्योति बासु प्रधानमंत्री बनते भी, तो वो कोई बड़े आर्थिक सुधार नहीं कर पाएंगे. ऐसी सरकार का प्रधानमंत्री बनने से बेहतर है, उसे बाहर से समर्थन देना. उस समय पोलित ब्यूरो का निर्णय प्रकाश करात के पक्ष में गया था और ज्योति बासु प्रधानमंत्री नहीं बन पाए थे. आज सीपीएम के दस्तावेजों में यह घटना ‘ऐतिहासिक भूल’ के तौर पर दर्ज है.

पिछले तीन दशक में जब भी इस देश में सत्ता के खिलाफ विपक्ष को एकजुट करने की बात आई है, वामपंथी दल उस गठबंधन को टिकाने के लिए गोंद का काम करते नजर आए हैं. चाहे वो आपातकाल के बाद का दौर हो या फिर वीपी सिंह का. सीपीएम सेकुलर पार्टियों को एक मंच पर लाने में कामयाब रही हैं. किसी दौर में हरकिशन सिंह सुरजीत के लालू यादव, मुलायम सिंह, करुणानिधि, नवीन पटनायक जैसे नेताओं के साथ अच्छे संबंध रहे हैं. आज सीताराम येचुरी के बारे में यही बात कही जा सकती है.

ज्योति बासु जो 1996 में प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गए
ज्योति बासु जो 1996 में प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गए

प्रकाश करात कांग्रेस का विरोध इस वजह से करते आए हैं क्योंकि आर्थिक मोर्चे पर बीजेपी और कांग्रेस में कोई ख़ास फर्क कर पाना मुश्किल है. सीपीएम पिछले 40 साल में दोनों तरह के प्रयोग करके देख चुकी है. वो कांग्रेस के साथ भी चल चुकी और कांग्रेस के विरोध में भी खड़ी हो चुकी है. दोनों ही प्रयोगों का वक़्त और अनुभव अलग-अलग हैं.

बीजेपी आजादी के बाद सबसे मजबूत स्थिति में है और कांग्रेस सबसे कमजोर. राजीव गांधी के बाद नरेंद्र मोदी वो नेता हैं जिनके पास पूर्ण बहुमत है. कांग्रेस को भारतीय राजनीति में मध्यमार्गी पार्टी के तौर पर जाना जाता है. इतिहास गवाह रहा है जब भी कांग्रेस संकट में घिरती है वो सेंटर से बाईं तरफ खिसक जाती है. 1967 के चुनाव में बुरे प्रदर्शन के बाद इंदिरा गांधी का रुझान तेजी से वामपंथी आर्थिक नीतियों की तरफ हो गया था. चाहे वो बैंको का राष्ट्रीयकरण हो या प्रिवी पर्स का खात्मा. उस दौर में मोरारजी देसाई यहां तक कहते थे कि अगर वो हट गए तो इंदिरा गांधी कम्युनिस्टों के हाथों देश को बेच देंगी.

राहुल गांधी और सोनिया गांधी
राहुल गांधी और सोनिया गांधी

पिछले साल भर में राहुल गांधी बड़े परिवर्तन के दौर से गुजरे हैं. जेएनयू में भारत विरोधी नारों का मुद्दा हो या रोहित वेमुला, ऊना कांड हो या फिर गुजरात चुनाव, राहुल गांधी खुद को नए सिरे से स्थापित करने में लगे हुए हैं. कांग्रेस इतिहास में सबसे कमजोर स्थिति में खड़ी है. बीजेपी के खिलाफ अकेले टिक पाना उसके बूते से बाहर की बात है. सीपीएम की केंद्रीय समिति का ताजा फैसला एक साझा विपक्ष की संभावना को धूमिल करने वाला है. इस पूरे घटनाक्रम पर प्रो. आनंद कुमार का बयान बहुत मानीखेज है-

“आज की परिस्थिति में बीजेपी का मुकाबला करने के लिए विपक्ष का एकजुट होना जरूरी है. सीपीएम के नेताओं को चाहिए कि वो आज के राजनीतिक हालात को राज्यों के चश्मे से देखना छोड़ें. बिखरे हुए विपक्ष के साथ बीजेपी का मुकाबला कर पाना बहुत मुश्किल है.”



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