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कोरोना सफ़र पार्ट 1 : घर लौटता मज़दूर लल्लनटॉप पर गुस्साकर बहुत बड़ी बात कह गया

16 मई. नोएडा और ग्रेटर नोएडा के बीच के शहरी बियाबान को चीरते हुए एक सड़क गुज़रती है. इस सड़क को एक्सप्रेस वे कहते हैं. मेरी एसी गाड़ी का पारा 38 पर जाकर टिक रहा है. मैं गाड़ी से उतरने के पहले एक मास्क पहनता हूं जो आज दिन भर के बाद फेंक दिया जाएगा. एक जोड़ी दस्ताने पहनता हूं. और अपनी झेंप को थोड़ा-सा थामकर सड़क के किनारे खड़े कुछ लोगों से मिलने, बात करने के लिए उतरता हूं. अमितेश साथ आते हैं. हमारे कंधों पर अभिजात्य का शर्म है. हम मज़दूरों से बात करने जा रहे हैं. 

घर लौट रहे मज़दूर इतने मज़दूर हैं कि सड़क पर दो घंटों से खड़े किसी गाड़ी के गुज़रने का इंतज़ार कर रहे हैं. उन्हें पुख़्ता पता नहीं, बस उन्हें किसी ने बताया है कि यहां से उन्हें अपने घर पहुंचने के लिए कुछ न कुछ तो मिल ही जाएगा. बिहार के सुपौल के रहने वाले मोहम्मद मोफ़िल खान को बहुत भरोसा है. ये भरोसा है कि जब पुलिस चौकी में फ़ोन करके, श्रमिक स्पेशल से जाने के लिए रजिस्ट्रेशन कराकर कुछ नहीं हासिल हुआ तो भी शहरों में सामान उतारकर लौट रहे ट्रक वाले कुछ दूर तक, सुपौल की दूरी कुछ कम करते हुए, छोड़ देंगे.

इस भरोसे पर ही सबकुछ टिका हुआ. देश में हुए लॉकडाउन में दो बड़ी चीज़ें एक साथ हुई. मज़दूर वर्ग का भरोसा उस पूरे तंत्र से थोड़ा खिसक गया, जो उनकी हिमायत करता था. उन्हें भरोसे में लेकर उनकी बात करता था. यदाकदा उनके पैर धोता था. लेकिन दूसरी बड़ी चीज़ ये कि मज़दूर का भरोसा इस देश की जनता पर थोड़ा पैबस्त हुआ. भरोसा ये कि कोई न कोई घर पहुंचा देगा. कोई न कोई खाने के लिए ज़रूर दे देगा. मोफ़िल खान अपने बैग में कुछ कपड़ों के अलावा एक जोड़ी जूते रखे हुए हैं. जूतों के नीचे एक पैकेट दाल का. सरसों के तेल की तीन बोतलें और हल्दी का एक पैकेट. कुछ काग़ज़. सुपौल पहुंच गए लोग बताते हैं कि पहुंच गए. ये बात थोड़ा भरोसा दिलाती है मुफ़ील और उनके साथ चल रहे लोगों को. 

सफ़र में मज़दूर अब धीरे-धीरे ग़ायब होने लगे हैं. सफ़र में ही एक इंफोग्राफ़िक से सामना होता है. लॉकडाउन की वजह से कुछ मज़दूर मारे गए. कुछ ट्रेन की पटरियों पर सो गए थे. ट्रेन उनके ऊपर से गुज़र गयी. कुछ को ट्रकों और तेज़ गाड़ियों ने सड़कों पर कुचल दिया. केंद्रीय गृह मंत्रालय ने आदेश जारी किया. कहा कि राज्य इस बात की तस्दीक़ करें कि कोई मज़दूर सड़क या रेल की पटरियों पर न चले. पत्रकार और कवि अरविंद चतुर्वेदी की कविता की एक पंक्ति कौंधती है,

“दिल्ली से फ़रमान हुज़ूरे आला लेकर आए हैं
सड़कों पर कैसे आ निकला कीचड़ में जो पांव सना”

मज़दूर ऐसे ही हैं. उनके क़दम जब पड़ निकले तो व्यवस्था अपने खांचे में बैठने लगी. ट्रेन का चक्का घूमा. बसें पकड़ी गयीं. कल तक लॉकडाउन के पालन के लिए फ़ायर बिग्रेड के नलके से मज़दूरों को सैनिटाइज़ कर रही पुलिस अब राज्यों के बॉर्डर पर ट्रक या बस रोककर पैदल जाते मज़दूरों को बिठा दे रही है. सहिष्णुता, संभवत: एक अध्याय है जो त्रासदी के शबाब पर चढ़ने के साथ ही आता है. 

मैं एक बीमारी के बारे में ज़्यादा सोच रहा हूं. मैं बीमार होने से नहीं डर रहा, लेकिन इस बात का डर ज़रूर है कि मैं या अमितेश या हमारे सारथी मुरारी जी किसी और को न इंफ़ेक्ट कर दें. लोग हमसे बोलते हैं कि हमें रेलवे स्टेशन तक ही छोड़ दीजिए. हमें अगले चौराहे तक छोड़ दीजिए. हमें अगले शहर तक ही छोड़ दीजिए. हम अपने डर को पोसते हैं. हम अपने पत्रकार होने को पोसते हैं. हम उनकी मदद करते हैं. इस मदद को या मदद करने को कहीं दर्ज नहीं करते हैं. हम माफ़ी मांगते हैं कि हम इतनी ही मदद कर सकते हैं. हम मदद करके गाड़ी में बैठते हैं. कुछ शर्म के साथ कहते हैं कि गाड़ी का एसी चलाइए. माइक-कैमरा-फ़ोन सैनिटाइज करते हैं. कुहनियों तक ख़ुद के हाथों को भी. मैं अपने फ़ोन पर नोट्स लेने लगता हूं. मुरारी पूछते हैं कि कहां चलें? मैं कहता हूं किधर भी चलिए? सब जगह मृत्यु है.


एक इंसान के तौर पर हम ज़्यादा बेशर्म हो सकते हैं, अमानवीय नहीं. जब आगरा में सड़क पर चलती एक लड़की कहती है कि महीने आया हुआ है. और कपड़ा पसीने से भीगा है या ख़ून से? इसका पता नहीं लेकिन इतना पता है कि दर्द बहुत है. साथ ही लड़की ये भी कहती है कि चलना रोक नहीं सकते. तो हम जानते हैं कि हम अमानवीय हो रहे हैं. ज़ाहिर है कि बीमारी से बचना है, ज़ाहिर ये भी है कि बीमारी से बचने का तरीक़ा बेहद चिंताजनक है. ये भेदभाव और छुआछूत को एक नया कलेवर देता है. उदाहरण चाहिए : नोएडा सेक्टर 15 के RWA के प्रेसिडेंट के उस अंकल से बात करनी चाहिए, जिनके whatsapp ग्रुप में सुबह तक देशभक्ति और कोरोना से लड़ाई के नए क़ानून बन रहे होंगे, और अब माइक पर वो अंकल कह रहे हैं कि सेक्टर 10 से राशन लेने आए ये ग़रीब कोरोना फैला देंगे. सरकार इन्हें इनकी झुग्गी तक क्यों नहीं सीमित रखती है. इस सवाल का जवाब किसके पास है?

***

दिन थोड़ा अलग तरीक़े से बीतता है. दो रातों से खाने में मैंने और अमितेश ने मूंगफली ही खाई है. रात ऐसी है तो दिन भी एक अदद चाय के जुगाड़ में रिस जाता है. आगरा होते हैं. आगरा से जूझते हैं. आगरा से राजस्थान की ओर सफ़र शुरू करते हैं. आगरा में आशा वर्कर मिलती हैं. गांव क़स्बों को लौटते मज़दूरों के लिए ये आशा दीदियां ही होती हैं. जिनके पास खुद को बचाने के लिए न पीपीई किट है और न ही हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन की दवाएं. आरोग्य सेतु चलाने के लिए जो मोबाइल चाहिए, वो तक नहीं हैं उनके पास.

फिर भी कोरोना के खिलाफ जंग में ये आशा दीदियां गांव-क़स्बों में पहली क़तार में हैं. संक्रमण का रिस्क उतना ही है, जितना कोविड का इलाज कर रहे शहरी डॉक्टरों को. लेकिन सुविधाओं से विपन्न. ये समय भी ऐसा नहीं कि ये आशा दीदियां अपने दो हज़ार रुपये के मानदेय को बढ़ाने के लिए कोई प्रोटेस्ट कर सकें, या एक फ़ेसबुक पोस्ट लिख सकें. दिन में मज़दूरों का सर्वे करती हैं. कॉल आती है तो वैसे ही महिलाओं को डिलीवरी के लिए लेकर चली जाती हैं. 

ऐसे में एक मज़दूर का बयान याद आता है. कैमरे पर बात करने से इनकार करते हुए उसने व्यवस्था पर एक बहुत बड़ा आरोप लगाया था. कहा था कि कोरोना से मरने से पहले भूख से मरेंगे. 

“कोरोना हो भी गया, तो दिल्ली का कौन-सा अस्पताल हमको भर्ती करेगा? एक अस्पताल भी भर्ती करेगा? हारकर ट्रेन और बस तो इसलिए चला रहे हैं लोग कि दिल्ली और बड़े शहर को हमको न भोगना पड़े. हमारे रोग को या हमारी बेरोजगारी को न भोगना पड़े.”

अमितेश का सवाल है. यही है व्यवस्था? मेरा भी सवाल है. यही है व्यवस्था का वर्गीकरण? मुरारी का सवाल है. आगे कहां जाना है?

***

ये वो बॉर्डर है, जहां कुछ दिनों पहले दो राज्यों की पुलिस की हाथापाई हो गयी थी. आगरा और भरतपुर का बॉर्डर. दिन में एक पोर्टेबल शौचालय के नीचे हेमंत टट्टी और पेशाब मिला हुआ पानी बोतल में भर रहे मिले थे. आगरा में. वही आगरा, जो अब तक यूनियन कैबिनेट की मीटिंग में इस वायरल बीमारी से लड़ने की मिसाल की तरह रखा जा रहा था. वही आगरा, जो अब कोरोना से बौरा गया है. हेमंत से मुलाक़ात का बहुत कुछ दबाए हुए हम आगे बढ़ रहे थे. भरतपुर के उस सीलन से भरे और तपते कमरे में पहुंचने के पहले इसी बॉर्डर पर कुछ लोग रुके-टिके दिखाई दिए. पीछे तंबू के नीचे बैठे हुए थे. पुलिस ने जितनी देर में रोककर पूछा तो पता चला कि वे लोग काग़ज़ के अभाव में रोके गए हैं. वे सवारी गाड़ी में भरकर कहीं की यात्रा कर रहे थे. पुलिस ने इन लोगों को उस मुस्तैदी से ज़ब्त किया था कि एक सवाल ज़रूर कौंधा. क्या पुलिस इतनी ही मुस्तैदी से रेत से भरे ट्रक या लकड़ी से लदे ट्रकों को रोककर ज़ब्ती की कार्रवाई करती होगी?


लोगों के चप्पल टूट गए हैं. सड़क पर कहीं बिखरे हुए. टूटते चप्पल लम्बी यात्राओं को रोक लेते हैं. कई सौ किलोमीटर की यात्राएं हों, तो और भी दिक्कत है. फ़रीदाबाद में हमने देखा था. जहां कुछ लोग खाना-पानी बांट रहे थे. कुछ लोग अपनी गाड़ियों में चप्पल भरकर आए थे. गाड़ियों में भरे चप्पल यात्रा पूरी करने के लिए ‘एक गहरी सांस’ की तरह थे. एक गहरी सांस कुछ और आगे तक जाने की हिम्मत देती है. 


लेकिन इस गहरी सांस का रात के अंधेरे में क्या होता है? जब शहर को एक लॉकडाउन धर लेता है तो ये गहरी सांस भरकर चलने वाले मजदूर कहां जाते हैं? इसका जवाब मुझे और अमितेश को मथुरा में मिला. हाइवे पर दिल्ली से मज़दूरों का रेला चला आ रहा था. मुझे हममें और इन मज़दूरों के बीच निर्लज्ज तरीक़े से कोई समानता निकालनी हो तो एक ही बात कह सकेंगे – हम दोनों के पास ही रात रुकने या सोने की कोई जगह नहीं थी. 

इन मज़दूरों ने हांफ़ते हुए कहा, ‘बात नहीं करेंगे. बस इतना बताइए, लखनऊ का बस कहां से मिलेगा?’

मेरे पास जवाब नहीं था. उनके पास जवाब था, ‘तो क्यों समय ख़राब कर रहे हैं हमारा? बहुत दूर जाना है हमको.’

लेकिन एक कम थके बंदे ने बताया. गहरी सांस रात के अंधेरे में भी चलती है. कुछ-कुछ देर का आराम करते हैं. अच्छा आराम भोर का कुछ देर का आराम होता है. जब पौ फट रही होती है, उस समय का आराम सबसे ज़्यादा सुकून देता है. कम थका बंदा चलते-चलते इतनी ही बात करके थक गया. 

मुक्तिबोध ने कहा था. शायद मेरी और व्यवस्था की लाचारी पर. शायद इस अजायबघर बन चुके लॉकडाउन पर. शायद लगातार दी जा रही आश्वस्ति की बेशर्मी पर,

“मर गया देश, अरे जीवित रह गए तुम!”


[कोरोना सफ़र के अगले हिस्से में हम कुछ और बातें करेंगे. कुछ मज़दूर. कुछ पुलिस. कुछ मदद. कुछ लॉकडाउन. कुछ बीमारी. तब तक के लिए नीचे देखिए लल्लनटॉप वीडियो]

कोरोना सफ़र: कोरोना वायरस से संक्रमित गर्भवती महिला को अस्पताल में सुविधा नहीं मिल रही?

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