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क्या सनी लियोनी के एड देखने से बच्चे बिगड़ते हैं?

देश के सूचना-प्रसारण मंत्रालय ने सभी टीवी चैनलों को सुबह 6 बजे से रात 10 बजे के बीच कॉन्डम के विज्ञापन दिखाने से मना कर दिया है. मंत्रालय ने ये फैसला बच्चों को ‘बुरे असर और गंदी आदतों’ से बचाने के लिए लिया है. एडवरटाइज़िंग स्टैंडर्ड्स काउंसिल ऑफ इंडिया (ASCI) ने मंत्रालय से कॉन्डम के विज्ञापनों पर संज्ञान लेने के लिए कहा था, जिसके बाद मंत्रालय ने केबल टीवी नेटवर्क नियम 1994 के तहत ये फैसला लिया. इसका उल्लंघन करने पर एक्शन लिया जाएगा.

शुरुआती दिनों में कॉन्डम

कॉन्डम प्रेग्नेंसी रोकने वाला एक प्रॉडक्ट है, जो सेक्स से फैलने वाले इन्फेक्शन से भी बचाता है. रबर का पहला कॉन्डम 1855 में बना था. तब से अब तक इसमें काफी डिवेलपमेंट हो चुके हैं. पहले ये सिर्फ पुरुषों से लिए आता था, लेकिन अब महिलाओं के इस्तेमाल वाले कॉन्डम भी ईजाद कर लिए गए हैं. हालांकि, मोटे तौर पर लोगों में अब भी कॉन्डम की यही छवि है कि ये प्रेग्नेंसी रोकने का टूल है, जो उनके प्लेज़र में खलल डालता है.

कॉन्डम के विज्ञापन: कहां से कहां तक

कॉन्डम के विज्ञापनों पर सरकार की चिंता जायज़ है. भारत में कॉन्डम के विज्ञापन जब तक सरकार-प्रायोजित रहे, तब तक वो बेहद अप्रत्यक्ष होते थे. शर्म से भरे हुए. कॉन्डम के बारे में इतनी सांकेतिक तरह से बात होती थी कि कम पढ़ा-लिखा इंसान शायद अंदाज़ा भी न लगा पाए कि क्या बेचा जा रहा है. हालांकि, बाद में ‘मुकद्दर का सिकंदर’ और ‘कॉन्डम बोल’ जैसे रोचक कैंपेन भी आए. लेकिन 90 के दशक के बाद से जब कॉन्डम को सेक्स के आनंद से जोड़ा जाने लगा, तो परिवार नियोजन जैसे बड़े मकसद पीछे छूट गए. चरमराते बिस्तर और सुघड़ शरीरों में सेक्स को आतुर मॉडल वाले विज्ञापनों की भरमार हो गई.

भारत में ‘कामसूत्र’ के विज्ञापन से शुरू हुए इस सिलसिले को मैनफोर्स और ड्यूरेक्स जैसी मल्टी-नेशनल कंपनियों ने आगे बढ़ाया. धीरे-धीरे इन्होंने कॉन्डम मार्केट पर एकाधिकार जमा लिया और कॉन्डम को सेक्स का आनंद बढ़ाने वाले प्रॉडक्ट के तौर पर बेचना शुरू किया. इस तरह फैमिली प्लानिंग नेपथ्य में चली गई और सेक्स प्लेज़र प्राथमिकता में आ गया. ड्यूरेक्स का ये विज्ञापन उदाहरण है कि कैसे बिना अश्लील हुए कॉन्डम बेचा जा सकता है, लेकिन इस विज्ञापन के केंद्र में सेक्स है, प्रेग्नेंसी और यौन संक्रमण रोकना नहीं.

सूचना-प्रसारण मंत्रालय ने अपनी जायज़ चिंता का एक फालतू उपाय खोजा है. कॉन्डम के विज्ञापन बंद कर देना हल नहीं है. अगर हमारी प्राथमिकता बच्चों को बचाना है, तो सरकार का ज़ोर विज्ञापनों की गुणवत्ता सुधारने पर होना चाहिए, न कि उन्हें बंद करने पर. और इससे भी पहले सरकार को देखना चाहिए कि परिवार नियोजन और एड्स जैसी बीमारियों को लेकर इसके अभियान कहां तक पहुंचे हैं.

भारत में कॉन्डम की बिक्री 1930 में ब्रिटिश हुकूमत ने शुरू की थी. इन्हें ‘बर्थ प्रोटेक्टर’ नाम से बेचा जाता था, जो आठ रुपए में एक दर्जन मिलते थे. तब ये कीमत ज्यादा थी, इसलिए भारतीयों ने इसे गैर-ज़रूरी समझा. सरकार को इसकी कीमत 1968 में समझ आई और तब जापान, कोरिया और अमेरिका से 40 करोड़ कॉन्डम (प्रति व्यक्ति एक कॉन्डम) मंगाए गए. इसे ‘निरोध’ नाम दिया गया, जिसकी कीमत पांच पैसे थी. कॉन्डम और फैमिली प्लानिंग पर ध्यान न देने का असर ये हुआ कि 1947 में आजादी के वक्त भारत की आबादी 33 करोड़ थी, जो महज़ 70 सालों में 133 करोड़ के करीब पहुंच गई है. हर साल एक करोड़ से भी ज्यादा.

इन हालात में सरकार को बच्चों को कॉन्डम के ऐड देखने से रोकने के बजाय बुनियादी काम करने चाहिए. सबसे पहले तो लोगों को फैमिली प्लानिंग के बारे में शिक्षित किया जाना चाहिए. उन्हें पता होना चाहिए कि अगर वो ज्यादा बच्चे पैदा करेंगे, तो उनकी आर्थिक स्थिति कमज़ोर होती चली जाएगी. ज्यादा बच्चे होंगे, तो न तो उनकी पढ़ाई ढंग से हो पाएगी और न पोषण. और ये समझने के लिए उनके मन में कहीं गहरे बस चुका लड़के-लड़की का भेद खत्म करना होगा.

सरकार को ध्यान रखना होगा कि उसकी कवायग यहीं तक महदूद न रह जाए
सरकार को ध्यान रखना होगा कि उसकी कवायग यहीं तक महदूद न रह जाए

साथ ही, सरकार को ध्यान रखना होगा कि फैमिली प्लानिंग का उसका तरीका 1977 में संजय गांधी के तरीके जैसा न हो. उस समय सरकार ने सनक में लोगों को पकड़-पकड़कर उनकी नसबंदी करवा दी थी. नसबंदी, इसकी ज़रूरत और फायदों के बारे में पर्याप्त जानकारी न होने की वजह से ये लोगों के लिए शर्म का कारण बन गया था और कांग्रेस का इसका राजनीतिक खामियाजा भी भुगतना पड़ा था.

1976 में दिल्ली के एक हॉस्पिटल में नसबंदी. ये आज भी हमारे यहां उपाय से ज्यादा मज़ाक उड़ाए जाने की चीज़ है
1976 में दिल्ली के एक हॉस्पिटल में नसबंदी. ये आज भी हमारे यहां उपाय से ज्यादा मज़ाक उड़ाए जाने की चीज़ है

कॉन्डम खरीदने में झिझक भी एक समस्या है. इसके लिए सरकार ने कॉन्डम ATM आजमाए, लेकिन सुविधाओं के प्रति भारतीयों के विध्वंसक रवैये ने इस प्रयोग को भी फेल कर दिया. कॉन्डम के प्रति हमारा माइंडसेट इंटरनेट पर उजागर होता है. यूट्यूब पर कॉन्डम के अधिकतर विज्ञापनों को ‘बैन हो चुके विज्ञापन’ कहकर बेचा जाता है. लाखों लोग इन्हें सिर्फ उत्कंठा में देखते हैं कि आखिर ऐसा क्या दिखा दिया गया, जो ये बैन हो गए. वो अलग बात है कि इनमें से अधिकतर विज्ञापन बैन नहीं होते हैं. वो सेक्स के प्रति आपके अति-उत्साही रवैये का फायदा उठाते हैं.

कॉन्डम ATM: बड़ा बदलाव ला सकने वाली एक योजना, जो सरकार की कमज़ोर इच्छाशक्ति और लोगों की उद्दंडता की वजह से विफल हो गई
कॉन्डम ATM: बड़ा बदलाव ला सकने वाली एक योजना, जो सरकार की कमज़ोर इच्छाशक्ति और लोगों की उद्दंडता की वजह से विफल हो गई

एक और बड़ा उपाय ये कि बच्चों के लिए सेक्स एजुकेशन अनिवार्य की जानी चाहिए. भारत में सेक्स आज भी टैबू है. मिडिल या लोअर मिडिल क्लास का कोई बच्चा अपने घर में किसी से भी सेक्स पर बात नहीं कर सकता. हम सेक्स को संस्कारों से जोड़ते हैं. सेक्स करने से पहले और करने के बाद हमारे लिए इसका अस्तित्व ही खत्म हो जाता है. ‘अनुभवी’ लोगों के लिए ये मज़े की चीज़ है, लेकिन शारीरिक बदलावों से गुज़र रहे बच्चे को कहां पता होता है कि सेक्स क्या है. ऐसे में वो ज़रूरी और गैर-ज़रूरी, दोनों चीजें सीखते हैं.

भारत के तमाम स्कूलों में सेक्स एजुकेशन देना तो दूर, प्रजनन वाला हिस्सा भी बिना पढ़ाए छोड़ दिया जाता है
भारत के स्कूलों में सेक्स एजुकेशन देना तो दूर, प्रजनन (Reproduction) वाला हिस्सा भी ऐसे पढ़ाया जाता है कि कुछ समझ न आए.

हमारी सरकार सेक्स एजुकेशन का एक संतुलित ढांचा तैयार करने में नाकाम रही और निकट भविष्य में भी इसकी कोई संभावना नहीं दिखाई देती. इन उपायों में आप पाएंगे कि ज्यादातर लोगों की शिक्षा से जुड़े हुए हैं. वही शिक्षा, जिस पर सरकार ने इस साल कुल बजट का महज़ 3.71% खर्च किया. सरकार किसी की भी रही हो, शिक्षा-बजट के आंकड़े में ज्यादा बदलाव नहीं होता. 2013-14 में UPA ने शिक्षा पर कुल बजट का 4.57% खर्च किया, लेकिन 2016-17 में NDA सरकार में ये 3.65% पर आ गया. साक्षरता दर का आंकड़ा देना इसलिए बेइमानी होगा, क्योंकि देश के 65% बच्चों को दाखिला देने वाले सरकारी स्कूलों की हालत किसी से छिपी नहीं है.

2014 से 2016 के बीच शिक्षा पर खर्च घटाया गया. 2017 में इसमें 9.9% की मामूली बढ़त हुई, जिससे ये 79,685.95 करोड़ हो गया.
2014 से 2016 के बीच शिक्षा पर खर्च घटाया गया. 2017 में इसमें 9.9% की मामूली बढ़त हुई, जिससे ये 79,685.95 करोड़ हो गया.

हमें इस समस्या के मूल में जाना होगा. सरकार को कॉन्डम के विज्ञापन में लड़कियों का जो चित्रण अश्लील लग रहा है, वही लॉन्जरी के किसी विज्ञापन में नॉर्मल लगता है. सरकार को ये संस्कारों से जुड़ी समस्या लगती है, जबकि असल में ये काफी हद तक मनोवैज्ञानिक समस्या है, जिसका हम सही इलाज नहीं कर रहे हैं. हुज़ूर, देश की तरफ देखिए. हमें कॉन्डम के विज्ञापन बैन करने की नहीं, इन्हें हर 15 मिनट में एक बार दिखाने की ज़रूरत है.


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