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दर्जनों देशों ने रूस को अलग-थलग करना क्यों शुरू कर दिया है?

पूर्व रूसी जासूस सेरगी स्क्रीपल पर हुए नर्व एजेंट का मामला एक नए कोल्ड वॉर की स्क्रिप्ट जैसा लग रहा है. इसमें एक तरफ ब्रिटेन, अमेरिका और यूरोप हैं. दूसरी तरफ रूस अकेला.

मेरे पापा और पड़ोस के प्रफेसर साहब. दोनों की बिल्कुल नहीं बनती थी. ये तनातनी ठीक-ठीक कब शुरू हुई, पता नहीं. मगर जब से हमने देखा, उनको ऐसा ही देखा. प्रफेसर साहब के तीन कमरों की खिड़की हमारे कंपाउंड में खुलती थी. खिड़की का एक नियम होता है. आपने घर बनाते समय उधर की तरफ जमीन नहीं छोड़ी, तो आप खिड़की नहीं खोल सकते. इस हिसाब से उन तीनों कमरों की खिड़कियां हमारी जमीन में खुलती थीं. एक दिन पापा ने ट्रैक्टर भर ईंट मंगवाई. और अनारकली की तरह उन तीनों खिड़कियों को चुनवा दिया. मतलब, उनके सामने दीवार बनवा दी. ये सर्दियों के मौसम की बात है. प्रफेसर साहब ने बदला लेने के लिए छह महीने इंतजार किया. गर्मियां आईं. हमारे एक नीम और आम (आम्रपाली) के पेड़ की कुछ डालियां उनकी जमीन पर छितरी हुई थीं. नीम की डालियां तो प्रफेसर साहब ने छंटवा दीं. और आम तुड़वा लिए.

पूरा मुहल्ला जानता था. कि मेरे पापा और प्रफेसर साहब का ‘कोल्ड वॉर’ चल रहा है.

कोल्ड वॉर! उत्तर भारत के उस छोटे से शहर के उस पिद्दी से मुहल्ले के लोगों की डिक्शनरी में ये भारी-भरकम शब्द कहां से आया? क्या था ये कोल्ड वॉर, जो मिसाल की तरह इस्तेमाल हो रहा था?

पुतिन ये तो चाहते हैं कि अमेरिका और पश्चिमी देश उन्हें गंभीरता से लें. और उसके आस-पास के देशों में सेंधमारी की कोशिश न करें. ये ही वजह है कि पुतिन रूस की परमाणु हथियारों की ताकत के सहारे आक्रामकता दिखाते हैं. लेकिन कोल्ड वॉर जैसे हालात दोबारा पैदा हों, ऐसा वो खुद भी नहीं चाहेंगे.
पुतिन ये तो चाहते हैं कि अमेरिका और पश्चिमी देश उन्हें गंभीरता से लें. रूस को कमतर न समझें और उसके आस-पास के देशों में सेंधमारी की कोशिश न करें. ये ही वजह है कि पुतिन रूस की परमाणु हथियारों की ताकत के सहारे आक्रामकता दिखाते हैं. लेकिन कोल्ड वॉर जैसे हालात दोबारा पैदा हों, ऐसा वो खुद भी नहीं चाहेंगे. अमेरिका और ब्रिटेन भी समझते हैं कि कोल्ड वॉर जैसी स्थितियां उनके लिए भी मुश्किलें पैदा होंगी.

क्या था कोल्ड वॉर यानी शीत युद्ध?
हमारे उस छोटे से मुहल्ले से बहुत दूर की बात है. सात समंदर पार की बात. दुनिया के दो बड़े मुल्कों ने बरसों तक ऐसी जंग लड़ी जो जंग तो थी, लेकिन फिर भी जंग नहीं थी. एक तरफ था अमेरिका. दूसरी तरफ था सोवियत संघ. दोनों पक्ष लगातार गुंथे रहे. अकेले नहीं. बल्कि पाले बनाकर. इन्होंने दुनिया के अलग-अलग हिस्सों को अपनी जोर-आजमाइश का मैदान बनाया. दोनों झुंड में काम करते थे.

करीब साढ़े चार दशकों तक चली ये लड़ाई
झुंड, माने अपनी-अपनी टीम. टीम तय हुई विचारधारा से. अमेरिका माने पूंजीवादी सिस्टम. सोवियत माने कम्यूनिस्ट. दोनों विचारधाराएं एक-दूसरे की धुर विरोधी. ये देशों की लड़ाई थी. और ये विचारधाराओं की भी लड़ाई थी. इसी को कोल्ड वॉर कहते हैं. दोनों पक्षों में कभी आमने-सामने की जंग नहीं हुई. क्योंकि दोनों के पास परमाणु हथियार थे. लड़ाई होती, तो इनका इस्तेमाल होता. इस्तेमाल होता, तो दोनों खत्म होते. ये दुनिया की सबसे लंबी लड़ाई थी. 1945 से 1989 तक चली.

सोवियत संघ के लीडर मिखाइल गोर्बाचेव के साथ ब्रिटेन की प्रधानमंत्री मार्गेट थैचर. ये 1984 की तस्वीर है, जब गोर्बाचेव ब्रिटेन के दौरे पर गए थे.
सोवियत संघ के लीडर मिखाइल गोर्बाचेव के साथ ब्रिटेन की प्रधानमंत्री मार्गेट थैचर. ये 1984 की तस्वीर है, जब गोर्बाचेव ब्रिटेन के दौरे पर गए थे.

कोल्ड वॉर 2.0 की स्क्रिप्टिंग
उस दौर में अमेरिका और रूस, दोनों ने खूब खतरनाक हथियार बनाए. एक से एक खतरनाक न्यूक्लियर हथियार. बलिस्टिक मिसाइल्स. यहां तक कि उनकी ये लड़ाई अंतरिक्ष में भी जा पहुंची. दोनों के बीच स्पेस वॉर छिड़ा. धरती पर ही नहीं, दोनों अंतरिक्ष में भी एक-दूसरे से आगे निकलना चाहते थे. कंबोडिया, कॉन्गो, कोरिया, इथोपिया, सोमालिया, अफगानिस्तान जैसे देश इन दोनों के बीच का अखाड़ा बन गए. फिर जब सोवियत का विघटन हुआ, तो दुनिया ने राहत की सांस ली. लगा, अब शीत युद्ध खत्म हुआ. लेकिन दुनिया गलत थी. कोल्ड वॉर फिर शुरू हो गया है. इस बार ये ब्रिटेन और रूस के बीच शुरू हुआ. अब इसमें अमेरिका सहित ब्रिटेन की टीम के सारे खिलाड़ी कूद गए हैं. सब कुछ वैसे ही हो रहा है, जैसा कोल्ड वॉर के जमाने में होता था. और ये सब शुरू हुआ एक जासूस पर हुए हमले से.

यूक्रेन ने भी ब्रिटेन के साथ सॉलिडेरिटी दिखाते हुए 13 रूसी राजनयिकों को निकाल दिया. ये यूक्रेन स्थित रूसी दूतावास की इमारत है. यूक्रेन वैसे भी प्रो-वेस्ट और प्रो-नाटो है.
यूक्रेन ने भी ब्रिटेन के साथ सॉलिडेरिटी दिखाते हुए 13 रूसी राजनयिकों को निकाल दिया. ये यूक्रेन स्थित रूसी दूतावास की इमारत है.

वो ही सॉलिडैरिटी, वो ही झुंडबाजी
सेरगी स्क्रीपल और यूलिया. इन पर हमला एक तरह से कोल्ड वॉर 2.0 की स्क्रिप्ट है. ब्रिटेन के दोस्तों ने रूस पर कार्रवाई की है. अपने-अपने यहां के रूसी दूतावास में पोस्टेड कई सारे राजनयिकों (डिप्लोमैट्स) को अपने यहां से निकाल दिया है. अमेरिका और ब्रिटेन पक्के दोस्त हैं. सो अमेरिका ने 60 रूसी डिप्लोमैट्स को निकाला. बस अमेरिका ने नहीं, कुल 21 देशों ने ऐसा ही किया. सॉलिडेरिटी के नाम पर. ‘हमारी एकता जिंदाबाद’ टाइप. ये वैसी ही झुंडबाजी है, जो कोल्ड वॉर के दौर में हुआ करती थी.

सेरगी एक जमाने में रूस के जासूस थे. लेकिन रूस की नाक के नीचे वो ब्रिटेन की खुफिया एजेंसी को रूस से जुड़े सीक्रेट्स पास किया करते थे.
सेरगी एक जमाने में रूस के जासूस थे. लेकिन रूस की नाक के नीचे वो ब्रिटेन की खुफिया एजेंसी को रूस से जुड़े सीक्रेट्स पास किया करते थे. ऐसा नहीं कि रूस के ऊपर विदेशों में रह रहे अपने पूर्व जासूसों पर हमला करने के आरोप पहले नहीं लगे. ऐसी हत्याओं का अपना एक लंबा इतिहास है. स्तालिन के जमाने से ही रूस इस लीक पर चलता आ रहा है. कि ‘गद्दार’ को कभी माफ नहीं करना चाहिए.

यूरोपियन यूनियन में फूट
यूरोपियन यूनियन (EU) में कुल 28 देश हैं. यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, जर्मनी, ऑस्ट्रिया, बेल्जियम, बुल्गारिया, क्रोएशिया, साइप्रस, चेक रिपब्लिक, डेनमार्क, इस्टोनिया, फिनलैंड, ग्रीस, हंगरी, आयरलैंड, इटली, लातविया, लिथुआनिया, लक्जमबर्ग, माल्टा, नीदरलैंड्स, पोलैंड, पुर्तगाल, रोमानिया, स्लोवाकिया, स्लोवेनिया, स्पेन और स्वीडन. 26 मार्च, 2018 को इनमें से 16 देशों ने रूस के खिलाफ डिप्लोमैटिक एक्शन लेने का ऐलान किया. बाकी आठ EU सदस्यों (पुर्तगाल, ऑस्ट्रिया, बुल्गारिया, साइप्रस, माल्टा, स्लोवाकिया, स्लोवेनिया और लक्जमबर्ग) ने रूस के खिलाफ ये कार्रवाई करने से इनकार कर दिया. बेल्जियम और आयरलैंड क्या करेंगे, अभी पता नहीं. अमेरिका की गिनती करवा ही चुके हैं. बाकी कनाडा, यूक्रेन, नॉर्वे, ऑस्ट्रेलिया और अल्बानिया ने भी रूसी डिप्लोमैट्स को निकाला है. न्यूजीलैंड ने कहा कि वो भी साथ है. लेकिन उसके यहां रूसी जासूस हैं ही नहीं, जो उनको निकाला जाए. बाकी निंदा उसने भी की है.

ब्रिटेन में रूस के राजदूत एलेक्जेंडर याकोवेनको. पीछे जो विमान दिख रहा है, उसी रूस ने ब्रिटेन भेजा. इसी में बैठकर रूसी दूतावास के निलंबित राजनयिकों को लंदन से वापस बुलाया गया.
ब्रिटेन में रूस के राजदूत एलेक्जेंडर याकोवेनको. पीछे जो विमान दिख रहा है, उसे रूस ने ब्रिटेन भेजा. इसी में बैठकर रूसी दूतावास के निलंबित राजनयिकों को लंदन से वापस बुलाया गया.

सेरगी स्क्रीपल: रूसी जासूस उर्फ डबल एजेंट
सेरगी स्क्रीपल की कहानी हम बता चुके हैं आपको. पूर्व रूसी जासूस. जिसने डबल एजेंट का काम किया. ब्रिटेन की खुफिया एजेंसी MI6 को रूस के सीक्रेट्स पास किया करता था. पकड़ा गया, तो सजा हुई. लेकिन अमेरिका और रूस ने मिलकर बड़ी चालाकी से उसको छुड़वा लिया. सेरगी आकर ब्रिटेन में बस गए. उनकी बेटी यूलिया रूस में ही रहती थी. मार्च 2018 में वो पापा से मिलने ब्रिटेन आई. 6 मार्च को दोनों एक पार्क में बेहोश मिले. पता चला कि उनके ऊपर खतरनाक नर्व एजेंट से हमला हुआ है. नर्व एजेंट केमिकल हथियार होता है. ब्रिटेन ने जांच की. कहा कि सेरगी और यूलिया पर नोविचोक कैटगरी के नर्व एजेंट से अटैक किया गया. नोविचोक का सोवियत संघ से बड़ा गहरा नाता है. 1970-80 के दशक में सोवियत अपने गुप्त कारखानों में ये खतरनाक केमिकल हथियार बनाता था. इसी वजह से ब्रिटेन ने सेरगी और यूलिया पर हुए हमले का आरोप रूस पर लगाया. इस हिसाब से देखो, तो रूस के पास मोटिव भी था. शुरुआती जांच के बाद 14 मार्च, 2018 को ब्रिटेन ने रूस के 23 राजनयिकों को देश निकाला दे दिया. उसका कहना था कि ये सारे नाम को ही डिप्लोमैट हैं. असल में जासूसी कर रहे हैं. रूस ने भी जवाब दिया. उसने भी ब्रिटेन के 23 राजनयिकों को निकाल दिया.

इससे पहले ऐसा होता था कि पहले अमेरिका कोई कदम उठाता था और फिर ब्रिटेन उसके पीछे-पीछे वो ही लाइन पकड़कर चलता था. ये पहली बार है कि ब्रिटेन ने फैसला लिया और अमेरिका उसे फॉलो कर रहा है.
इससे पहले ऐसा होता था कि पहले अमेरिका कोई कदम उठाता था और फिर ब्रिटेन उसके पीछे-पीछे वो ही लाइन पकड़कर चलता था. ये पहली बार है कि ब्रिटेन ने फैसला लिया और अमेरिका उसे फॉलो कर रहा है. तस्वीर में दिख रही हैं ब्रिटेन की प्रधानमंत्री टरीजा मे.

ट्रंप ने अपनी जान छुड़ाने को कार्रवाई की है?
इस डिप्लोमैटिक वॉर में कोल्ड वॉर की महक है. शीत युद्ध खत्म होने के बाद से ऐसा पहली बार हो रहा है. रूस ने ब्रिटेन से उस नर्व एजेंट का सैंपल मांगा था, जिससे सेरगी और यूलिया पर हमला हुआ. लेकिन ब्रिटेन ने सैंपल नहीं दिया. इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल अमेरिका पर है. कि उसने इतनी बड़ी संख्या में रूसी राजनयिकों को क्यों निलंबित किया? आमतौर पर ऐसा होता है कि पहला कदम अमेरिका चलता है. ब्रिटेन उसके पीछे-पीछे चलता है. फिर चाहे वो 2003 में इराक पर किया गया हमला हो या 2011 में लीबिया के अंदर से गद्दाफी को हटाना. इस बार अलग ये हुआ कि अमेरिका ब्रिटेन के पीछे-पीछे दिखा. क्या ये इसलिए है कि डॉनल्ड ट्रंप अपनी अंदरूनी परेशानियों से लोगों का ध्यान हटाना चाहते हैं? या फिर रूस के साथ सांठ-गांठ के आरोपों का जवाब देना चाहते हैं? फिलहाल तो ट्रंप चौतरफा परेशानियों में घिरे हैं. एक तरफ अमेरिकी चुनाव में रूस की दखलंदाजी का मुद्दा है. दूसरी तरफ गन कंट्रोल को लेकर शुरू हुआ आंदोलन है. और पॉर्न स्टार स्टॉर्मी डेनियल्स के लगाए आरोप हैं.

ब्रिटेन ने रूस के 23 राजनयिकों को एक्सपेल किया था. रूस ने भी ठीक इतने ही ब्रिटिश राजनयिकों को बाहर का रास्ता दिखाया. अब बाकी देशों ने उसके खिलाफ कार्रवाई की है. रूस ने कहा है कि वो सबको बराबर जवाब देगा.
ब्रिटेन ने रूस के 23 राजनयिकों को एक्सपेल किया था. रूस ने भी ठीक इतने ही ब्रिटिश राजनयिकों को बाहर का रास्ता दिखाया. अब बाकी देशों ने उसके खिलाफ कार्रवाई की है. रूस ने कहा है कि वो सबको बराबर जवाब देगा.

1986 की अमेरिका-रूस डिप्लोमैटिक लड़ाई
ये 1986 की बात है. तब अमेरिका के राष्ट्रपति थे रोनाल्ड रीगन. और सोवियत के लीडर थे मिखाइल गोर्बाचोव. अमेरिका ने सोवियत के एक जासूस गेनाडी एफ ज़ाखरोव को अरेस्ट कर लिया. जब ये हुआ, तब अमेरिका के एक पत्रकार निकोलस एस डेनिलऑफ सोवियत में थे. निकोलस वहां रिपोर्टिंग करते थे. वो यू एस न्यूज ऐंड वर्ल्ड रिपोर्ट नाम की एक मैगजीन के मॉस्को कॉरस्पोंडेंट थे. ज़ाखरोव की गिरफ्तारी के जवाब में सोवियत ने निकोलस को अरेस्ट कर लिया. ताकि ज़ाखरोव को रिहा करवाने की डील की जा सके. सोवियत ने निकोलस की रिहाई के बदले ज़ाखरोव की रिहाई मांगी. रीगन इस सौदेबाजी से चिढ़ गए. अमेरिका की नीति थी. कि वो बंधकों की रिहाई को लेकर सौदेबाजी नहीं करता था. इसीलिए जब सोवियत ने डील की शर्त रखी, तो रीगन चिढ़ गए. रीगन ने सोवियत के 55 राजनयिकों को अमेरिका छोड़कर जाने का हुक्म दिया. संयुक्त राष्ट्र (UN) से भी 25 सोवियत डिप्लोमैट्स की छुट्टी कर दी. सोवियत ने अमेरिका के 10 राजनयिकों को निकाला.

किस ताकत के दम पर रूस को अकेला करके भी कॉन्फिडेंट हैं पुतिन?
कोल्ड वॉर के उस जमाने में दोनों देशों के बीच हुई ये सबसे बड़ी डिप्लोमैटिक लड़ाई थी. अब अमेरिका ने रूस के 60 राजनयिकों को निकाला है. ये कोल्ड वॉर की उस घटना से भी बड़ी संख्या है. तो क्या इसे ‘कोल्ड वॉर 2.0’ कहना गलत है? लगता तो नहीं. जहां तक रूस की बात है, तो उसको पुतिन का सहारा है. पुतिन के आक्रामक तौर-तरीकों ने न केवल उन्हें, बल्कि रूस को भी बहुत मजबूत बना दिया है. पुतिन अच्छी तरह जानते हैं कि रूस के पास पैसे नहीं हैं. लेकिन उसके पास एक चीज भरपूर है. वो है परमाणु हथियार. न्यूक्लियर पावर. इस ताकत के दम पर न केवल गेम में बरकरार रहा जा सकता है, बल्कि अपनी शर्तों पर चला भी जा सकता है. शायद इसीलिए रूस के अकेले पड़ने का जोखिम लेकर भी पुतिन डटे हुए हैं. वैसे जाते-जाते एक जिक्र कर देते हैं. इस नर्व एजेंट अटैक मामले में एक देश ने खुलकर रूस को सपोर्ट किया है. जानते हैं वो मुल्क कौन सा है? चीन :-) :-) :-)


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