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उन एक लाख हिंदू शरणार्थियों की दास्तान, जिन्हें अमित शाह CAB के जरिए नागरिकता नहीं देना चाहते

जगह- श्रीलंका
साल- 1983

जुलाई का महीना. 23 और 24 की दरमियानी रात. श्रीलंका के जाफना में 13 सैनिक मार डाले गए. हत्या की थी तमिल चरमपंथियों ने. इसकी प्रतिक्रिया में नरसंहार हुआ. निशाने पर थे श्रीलंका के तमिल. सब कुछ इतना भयानक था कि नाज़ी जर्मनी में हुए हॉलोकास्ट को याद किया जाने लगा. इस एक हफ़्ते के भीतर तकरीबन 4,000 तमिल मार डाले गए. श्रीलंका के तमिल इस महीने को ‘ब्लैक जुलाई’ कहते हैं. ये एक 26 साल लंबे गृह युद्ध की शुरुआत थी. इसके एक सिरे पर थी ये 13 मौतें. आख़िरी सिरे पर लिट्टे (LTTE) का ख़ात्मा. और इन दोनों सिरों के बीच थीं हज़ारों-हज़ार निर्दोषों की हत्या. लाखों बेघर-बेवतन लोग.

टेंशन का बैकग्राउंड
श्रीलंका में बहुसंख्यक वर्ग है सिंहली बौद्ध. देश के अल्पसंख्यक समुदायों में एक हैं तमिल. ज़्यादातर हिंदू. दोनों के बीच लंबे समय से तनाव था. साल 1956 में आया सिंहल ओनली ऐक्ट. इसके तहत सिंहली को श्रीलंका की एकमात्र आधिकारिक भाषा बना दिया गया. ये बहुसंख्यक बौद्धों को फेवर करने का औज़ार था. भाषा का खेल बस इतना नहीं होता कि एक भाषा को ऑफिशल का दर्ज़ा मिल गया. इसकी वजह से बाकी भाषा वर्ग के लोग कई मौके खो बैठते हैं. एक समुदाय को अनफेयर प्रिविलेज मिल जाता है. इस प्रावधान से तमिल समुदाय सरकारी नौकरियों, संस्थानों में मौके हासिल करने से पीछे हो गया. तमिलों ने विरोध किया. दोनों समुदायों के बीच टेंशन के मौके बढ़ते गए. सरकार की तरफ से भी तमिलों को राहत नहीं थी. ऐसे में हथियारों और चरमपंथ की भी एंट्री हुई. मई 1976 में लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल इलम (LTTE) बना. इनकी मांग थी तमिलों के लिए अलग आज़ाद देश बनाना. इस मांग का आधार लंबे समय से हो रहे तमिलों के दमन, उनके साथ होने वाला पक्षपात था.

…और फिर आया ब्लैक जुलाई
13 सैनिकों की हत्या की प्रतिक्रिया के तौर पर तमिलों के विरुद्ध राजधानी कोलंबो से हिंसा शुरू हुई. सिंहली समुदाय की भीड़ हर तरफ तमिलों को खोज-खोजकर निशाना बना रही थी. उनके पास मतदाता लिस्ट की कॉपीज़ थी. तमिलों के नाम, घर का पता, सब था उनके पास. उनके घरों, दुकानों पर हमले हुए. सोचिए, जेल में भी हिंसा हुई. वहां बंद सिंहली कैदियों ने तमिल कैदियों को टारगेट किया. जेलों के अंदर करीब 53 तमिल कैदी मार डाले गए. ख़बरों के मुताबिक, जेल के गार्ड्स सिंहली कैदियों की मदद कर रहे थे. वैसे ही, जैसे बाहर सिक्यॉरिटी फोर्सेज़ भीड़ को सपोर्ट कर रहे थे. सरकार भी इस भावना के साथ थी. वो तमिल माइनॉरिटी के साथ हो रही हिंसा में बहुसंख्यकों की भरपूर मदद कर रही थी. बाद के सालों में कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने सत्ताधारी ‘यूनाइटेड नैशनल पार्टी’ (UNP) पर आरोप लगाया. कि तमिलों के विरुद्ध हुए इस संगठित नरसंहार की प्लानिंग और प्लॉटिंग के पीछे उसी का हाथ था. 13 सैनिकों की हत्या ने बस सिंहलियों को मुफ़ीद मौका दे दिया.

1983-87: शरणार्थियों की पहली खेप
हज़ारों तमिलों के नरसंहार के अलावा बड़ी संख्या में तमिल बेघर हो गए. उनके घर, उनकी दुकानें जला दी गई थीं. उन्हें रिफ़्यूजी कैंप्स में रहना पड़ रहा था. वो शिविर भी सुरक्षित नहीं थे. बल्कि वहां रहने वाले ज़्यादा जोख़िम में थे. वजह ये कि एक जगह जमा इतने सारे तमिल अल्पसंख्यकों को आसानी से निशाना बनाया जा सकता था. तो इस बैकड्रॉप में जुलाई 1983 से दिसंबर 1987 के बीच श्रीलंका से तमिल शरणार्थियों के भारत पहुंचने का पहला राउंड शुरू हुआ. नावों के रास्ते किसी तरह जान बचाकर लोग भागने लगे. ज़्यादातर ने मन्नार द्वीप से रामेश्वरम के बीच का 29 किलोमीटर लंबा समंदर का रास्ता चुना भारत पहुंचने के लिए.

भारत-श्रीलंका अकॉर्ड
तमिलों का कत्लेआम भारत में मुद्दा बना. खासतौर पर दक्षिण में. तो श्रीलंका की तमिल समस्या में भारत ने भूमिका ढूंढी. भारत ने लड़ाई शांत कराने के लिए शांति सेना भेजी. इसके बाद 1987 में दोनों देशों के बीच एक समझौता भी साइन हुआ – ‘भारत-श्रीलंका शांति समझौता’. लगा चीजें अब बेहतर होंगी. अकॉर्ड के बाद दोनों देशों के बीच जहाज चलने लगे. उन शरणार्थियों के लिए, जो भारत से लौटकर श्रीलंका जाना चाहें. हज़ारों शरणार्थी भरोसा करके वापस गए भी. आधिकारिक संख्या बताती है कि 1987 से 1989 के बीच ही लगभग 25 हज़ार रिफ़्यूजी श्रीलंका लौटे. मगर 1990 में युद्ध फिर भड़क उठा. स्थितियां फिर बेहद हिंसक हो गईं.

फिर कई चरणों में शरणार्थी आए
इसके साथ ही शरणार्थियों के आने का राउंड भी फिर शुरू हो गया. 1991 में लिट्टे को लगा कि राजीव गांधी अगर चुनाव जीतकर प्रधानमंत्री बने, तो भारत फिर शांति सेना भेज देगा जो लिट्टे और श्रीलंका की फौज के बीच में खड़ी होगी. तो लिट्टे ने राजीव गांधी की हत्या करा दी. मास माइग्रेशन चालू रहा. 1992 से 1995. 1996 से 2002. 2009 में सिविल वॉर ख़त्म हो गया. मगर इसके बाद भी शरणार्थियों का आना नहीं रुका. 2012-13 तक तमिल रिफ़्यूजी आते रहे. हालांकि राजीव गांधी की हत्या के बाद इन शरणार्थियों के लिए भारत में चीजें मुश्किल हुईं. लिट्टे के साथ कनेक्शन के आरोपों और शुबहे ने काफी परेशानियां पैदा की उनके लिए.

LTTE और श्रीलंकाई सेना के बीच 1983 से 2009 तक गृह युद्ध चला. इन सालों में और इसके बाद भी लाखों तमिलों को श्रीलंका छोड़ना पड़ा. शरणार्थियों की कई खेपें आईं भारत. और भी कई देशों में गए तमिल रिफ़्यूजी. ये मास एक्सोडस था. 1989 के बाद आने वाले शरणार्थी भारत के अलावा और भी देशों में गए. तमिल शरणार्थियों के आने के मामले में भारत पहले नंबर पर था. दूसरे नंबर पर कनाडा. कई लोगों ने मज़बूरी में भागते इन लोगों से पैसा भी कमाया. लोगों ने गहने बेचकर, घर गिरवी रखकर पैसे जुटाए. उनसे पैसे लेकर बिना वीज़ा-कागज़ात उन्हें समंदर के रास्ते स्मगल किया जाता. देश छोड़कर भागने की ये यात्रा कितनी जोख़िम भरी, कितनी मुश्किल और ख़तरनाक होती, इसपर कई रिपोर्ट्स हुई हैं. कई लोगों की जान गई इस तरह. कई लोग आज तक लापता हैं. कई समंदर में डूब गए. कई अवैध तरीके से किसी देश की सीमा में घुसने की कोशिश करते हुए अरेस्ट हुए और सालों जेल में सड़े. कइयों के परिवार अब भी उनका रास्ता देख रहे हैं. यूनाइटेड नेशन्स के पास ऐसी कई अपीलें जमा हैं.

कितने तमिल शरणार्थी भारत पहुंचे?
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई 1983 से अगस्त 2012 के बीच तकरीबन 3,042,69 लाख तमिल शरणार्थी भारत आए. भारत में इन शरणार्थियों के लिए राहत शिविर बनाए गए. भारत में घुसने वाले शरणार्थियों का रजिस्ट्रेशन किया जाता था. इसके लिए पहले उन्हें ट्रांजिट कैंप में रखा जाता था. फिर रिफ़्यूजी कैंप में ट्रांसफर कर दिया जाता था. कई शरणार्थी ऐसे भी हैं, जिनके लिए चीजें इतनी भी आसान नहीं रहीं. उन्हें डिटेंशन में रखा गया. ख़ैर. 2015 में तमिलनाडु सरकार ने PMO को बताया था कि राज्य में कुल 1,02,055 तमिल शरणार्थी हैं. इनमें से 64,924 रिफ़्यूजी तमिलनाडु के अलग-अलग हिस्सों में बने 107 शरणार्थी शिविरों में रहते हैं. मदद के नाम पर तमिलनाडु सरकार इन शिविरों में रहने वाले शरणार्थियों को ये मदद देती है-

1. परिवार के मुखिया को हज़ार रुपया महीना
2. हर वयस्क को 750 रुपया
3. हर बच्चे को 400 रुपया
4. हर रिफ़्यूजी परिवार को महीने का 20 किलो चावल
5. जनवितरण योजना से चीजें लेने के लिए राशन कार्ड
6. बच्चों के लिए 12वीं तक की पढ़ाई मुफ़्त. मुफ़्त किताबें, स्कूल की पोशाक, मिड-डे मील.

मगर इन राहत शिविरों में जीवन कैसा है?
‘इंडियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नवंबर 2014 में त्रिची में रह रहे 20 तमिल शरणार्थियों ने आत्महत्या की कोशिश की. उनका कहना था कि वो श्रीलंका के जिन हालातों से भागकर आए थे, उससे ज़्यादा ख़राब हालत है कैंप्स की. बाहर आने-जाने का समय सीमित है. इस वजह से नौकरी में दिक्कत आती है. वैसे भी उन्हें आधिकारिक तौर पर भारत में काम करने की इजाज़त नहीं. ऐसे में ज़्यादातर शरणार्थी अनस्किल्ड लेबर के तौर पर ही काम कर पाते हैं. उनके लिए मौके कम हो जाते हैं. बताया जाता है कि उनके रहने की स्थितियां भी बेहद ख़राब हैं. शौचालय, पीने का पानी, खाना, रहना, सारी व्यवस्था दयनीय है. कई शरणार्थी इस कैंप से बाहर रहते हैं. ऐसे शरणार्थियों को अपने नज़दीकी थाने में पंजीकरण करवाना पड़ता है. बिना रजिस्ट्रेशन के अगर वो पकड़े गए, तो जेल भेज दिए जाएंगे. उनके ऊपर ‘फॉरेनर्स ऐक्ट, 1946’ के तहत मामला दर्ज़ होगा. ये शरणार्थी कई सालों से अपने लिए भारतीय नागरिकता मांग रहे हैं. मगर ये भी नहीं हुआ. कई शरणार्थी भारतीय अदालतों में भी नागरिकता दिए जाने की अपील लेकर पहुंचे. मगर उनकी अपीलें अब तक बेनतीजा रही हैं.

गृह युद्ध ख़त्म होने के बाद क्या हुआ?
सिविल वॉर के बाद के सालों में इन तमिल शरणार्थियों के लिए दुनिया का रवैया बदला है. इनके प्रति सख़्ती बढ़ी है. मिसाल के तौर पर स्विट्ज़रलैंड. सिविल वॉर के सालों में कई तमिल शरणार्थी वहां भी गए. स्विट्ज़रलैंड ने करीब 3,674 तमिलों को शरणार्थी का दर्ज़ा दिया. मगर गृह युद्ध के बाद के सालों में स्विट्ज़रलैंड ने शरण देने के अपने रवैये में सख़्ती लाई. वजह ये बताई कि श्रीलंका में हालात सुधर गए हैं.  अब तमिलों को शरण मांगने की क्या ज़रूरत?

ऑस्ट्रेलिया में भी ऐसा ही हुआ. 2019 में श्रीलंका से ऑस्ट्रेलिया गए दो नाम काफी ख़बरों में रहे- प्रिया और नादेसालिंगम. नादेसालिंगम 2012 और प्रिया 2013 में ऑस्ट्रेलिया पहुंचे. शुरुआत में दोनों को डिटेंशन सेंटर में रखा गया. फिर वहां से रिहा करके उन्हें शॉर्ट टाइम वीज़ा दिया गया. 2014 में दोनों ने शादी कर ली. बच्चियां हुईं इनकी. दोनों ने रिफ़्यूज क्लेम किया. मगर प्रशासन इस बात पर राज़ी नहीं हुआ कि इन्हें सच में सुरक्षा और शरण की ज़रूरत है. प्रिया ने असाइलम मांगते हुए अपनी आपबीती ये सुनाई थी कि 2001 में उसके मंगेतर समेत कई लोगों को श्रीलंका में ज़िंदा जला दिया गया. इसके बाद वो भागकर भारत चली गईं. 2013 में भारत से ऑस्ट्रेलिया पहुंचीं.

प्रिया के मुताबिक, उनका पति नादेसालिंगम LTTE लीडरशिप का हिस्सा था. ऐसे में अगर वो वापस श्रीलंका लौटीं, तो उनके परिवार को नुकसान पहुंचाया जा सकता है. मगर ऑस्ट्रेलियाई प्रशासन उनके इस तर्क से सहमत नहीं था कि उन्हें सुरक्षा और शरण की ज़रूरत है. ऑस्ट्रेलिया ने बीते सालों में क्या किया कि तमिल शरणार्थियों में जिनके असाइलम आवेदन ख़ारिज होते, उन्हें वापस श्रीलंका को सौंप देता. 2014 की एक ख़बर दिखी. ये कि ऑस्ट्रेलिया ने अपने यहां रह रहे 200 तमिल शरणार्थी श्रीलंका को सौंपे. 2014 की ही एक और घटना है. सीमनपल्ली नाम का एक शख्स तमिलनाडु के एक रिफ़्यूजी कैंप से ऑस्ट्रेलिया गया. नाव पर बैठकर. वहां अथॉरिटीज़ ने उन्हें वापस श्रीलंका डिपोर्ट करने की चेतावनी दी. सीमनपिल्लई ने ख़ुद को आग लगा ली. ऑस्ट्रेलिया, न्यू ज़ीलैंड जैसे देशों में जाने की कोशिश करते हुए कई रिफ़्यूजी पकड़े गए. इंडोनेशिया, सऊदी अरब, ऑस्ट्रेलिया. इन देशों की जेलों में ऐसे कई रिफ़्यूजी सज़ा काट रहे हैं.

काफी शरणार्थी लौटकर श्रीलंका नहीं जाना चाहते
ऐसा सोचा गया था कि श्रीलंका में सिविल वॉर ख़त्म हो जाने के बाद, हालात ठीक हो जाने के बाद रिफ़्यूजी वापस लौट जाएंगे. मगर ऐसा नहीं हुआ. बहुत लंबा समय बीत गया था इन शरणार्थियों को श्रीलंका से आए. इतने लंबे समय बाद वापस उस पुरानी जगह पर लौटकर नए सिरे से जीवन शुरू करना कठिन तो है. वो भी तब, जब भागने का अतीत और परिस्थितियां इतनी भीषण हों. शरणार्थी परिवारों की नई पीढ़ी का बड़ा हिस्सा श्रीलंका नहीं लौटना चाहता. उनके लिए श्रीलंका अजनबी है. ऐसी जगह, जिसके बारे में ख़ौफनाक कहानियां सुनते हुए वो बड़े हुए हैं.

तस्वीर में हैं महिंदा राजपक्षे. श्री लंका के मौज़ूदा प्रधानमंत्री. राष्ट्रपति हैं उनके भाई गोटबाया राजपक्षे. महिंदा राजपक्षे तमिल शरणार्थियों को वापस लौटाए जाने के पैरोकार माने जाते हैं. माना जाता है कि उनके रहते शायद ये प्रक्रिया आसान हो(फोटो: PTI)
तस्वीर में हैं महिंदा राजपक्षे. श्री लंका के मौज़ूदा प्रधानमंत्री. राष्ट्रपति हैं उनके भाई गोटबाया राजपक्षे. महिंदा पूर्व राष्ट्रपति रहे हैं. उनके दौर में तमिलों को ख़ूब निशाना बनाया गया (फोटो: PTI)

अब श्रीलंका से मुस्लिमों को निशाना बनाने की ख़बरें आती हैं
श्रीलंका की सरकार ने कई बार इन शरणार्थियों को वतन लौट आने का प्रस्ताव दिया. 2015 में तब के राष्ट्रपति सिरिसेना ने तमिलों के लिए कई पॉजिटिव घोषणाएं की थीं. उनकी सरकार ने तमिल शरणार्थियों को लौटा लाने के लिए भारत के साथ बातचीत भी शुरू की. ताकि कोई आधिकारिक योजना तैयार की जा सके इस बारे में.

2019 में भी श्रीलंका की सरकार ने कहा कि वो चाहते हैं सारे तमिल शरणार्थी अपनी-अपनी मूल जगहों पर वापस लौट आएं. उन्हें सुरक्षा का आश्वासन भी दे रहा है श्रीलंका. सिर के ऊपर छत. बच्चों की पढ़ाई. रोज़गार. हालांकि श्रीलंका में नस्लीय और धार्मिक हिंसा का माहौल ख़त्म होता तो नहीं दिख रहा. तमिलों के बाद अभी वहां मुस्लिम हैं बौद्ध बहुसंख्यकों के निशाने पर. 2018 में मुस्लिम माइनॉरिटी के साथ हिंसा हुई. अभी कुछ दिनों पहले चुनाव के समय मुस्लिमों से भरी एक बस पर हमला हुआ था. जब एक अल्पसंख्यक समुदाय सुरक्षित नहीं है, तो इतना भयानक अतीत देखने वाले तमिलों को सुरक्षा की गारंटी कैसे देगी सरकार? अभी नवंबर में वहां सत्ता बदली है. गोटबाया राजपक्षे राष्ट्रपति और महिंदा राजपक्षे प्रधानमंत्री बने हैं. इनके ऊपर अतीत में तमिलों के साथ हुए अन्याय पर आंखें मूंदने और तमिलों को निशाना बनाने का आरोप लगता है. वो कितना भरोसा दे सकेंगे तमिल शरणार्थियों को, ये सोचने की बात है.

 

दो रास्ते हैं- श्रीलंका भेज दें या हम अपना लें
आंकड़ों के मुताबिक, अभी तक तकरीबन 5,000 तमिल शरणार्थी श्रीलंका लौटे हैं. हालांकि लौटे हुए शरणार्थियों की संख्या को लेकर अलग-अलग संख्याएं भी मिलीं. मसलन, फरवरी 2019 में ‘कोलंबो पेज.कॉम’ पर छपी एक ख़बर में लिखा मिला कि साल 2009 से 2019 के बीच तमिलनाडु के शरणार्थी शिविरों में रह रहे तकरीबन 11 हज़ार तमिल श्रीलंका लौटे.

ऐसी भी ख़बरें आईं कि श्रीलंका लौटे कई तमिल वापस आ गए. उनमें से कइयों ने डरावनी दास्तान सुनाई. मसलन ये कि उनकी ग़ैर-मौजूदगी में उनके घरों, ज़मीनों और दुकानों पर कब्ज़ा कर लिया गया था. वो उन्हें लौटाया नहीं गया. उनके पास कामकाज और नौकरियों के मौके भी बहुत सीमित थे. तमिलनाडु की दोनों बड़ी पार्टियां- DMK और AIADMK ने कई बार इन शरणार्थियों को नागरिकता दिए जाने की मांग की. उन्हें स्थायी निवासी का दर्ज़ा दिए जाने की बात कही. मगर इनमें से कोई बात सच नहीं हो पाई.

इन शरणार्थियों के साथ दो ही व्यावहारिक चीजें हो सकती हैं. या तो इन्हें श्रीलंका भेज दिया जाए. इसके लिए नई दिल्ली और कोलंबो को मिलकर बहुत गंभीरता से काम करना होगा. वरना दूसरा रास्ता है कि उन्हें यहीं पर अपना लिया जाए. अपने में शामिल कर लिया जाए. क्योंकि रिफ़्यूजी कैंप में रहते हुए बहुत समय हो गया. वो विकल्प अब बंद हो जाना चाहिए. और जिस तरह और जिन हालातों में भारत ने रोहिंग्या शरणार्थियों को म्यांमार भेजा, वैसा अमानवीय रास्ता न अपनाया जाए तो चैन की बात होगी.

क्या CAB में इन तमिल शरणार्थियों को शामिल नहीं किया जा सकता था?
मोदी सरकार ‘नागरिकता संशोधन बिल, 2019’ (CAB) लाई है. बिल लोकसभा में पास हो चुका है. 11 दिसंबर को विपक्ष की कई आपत्तियों के बीच राज्यसभा में भी ये बिल पास हो गया. राष्ट्रपति की मुहर लगने के बाद ये क़ानून बन जाएगा. इसके बाद बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान के ग़ैर-मुस्लिम शरणार्थियों के लिए भारतीय नागरिकता हासिल करने की राह बन जाएगी. आधार होगा- रिलिजियस परसिक्यूशन. धार्मिक आधार पर की गई हिंसा और यातना. मगर श्रीलंका से आए ये तमिल शरणार्थी CAB का फ़ायदा पाने की पात्रता नहीं रखते. इसलिए नहीं कि वो भारत के पड़ोसी देश से नहीं हैं. न ही इसलिए कि ये धार्मिक और नस्लीय हिंसा का शिकार नहीं हुए. बल्कि इसलिए कि बिल बनाने वालों ने उन्हें बिल की ज़द में नहीं रखा. वो उन तीन देशों की लिस्ट में नहीं आते, जिन्हें इस बिल के लिए चुना गया है. जो तमिल रिफ़्यूजी भारत के अलावा किसी और देश में शरणार्थी हैं, उनके लिए कुछ कर पाना हमारे बस में नहीं. मगर जब CAB क़ानून बना ही, वो भी ख़ास धार्मिक हिंसा का शिकार हुए अल्पसंख्यक शरणार्थियों के लिए, तो इन तमिलों को भी अकॉमोडेट किया जा सकता था. जिस देश ने उन्हें तब ठौर दिया, उसके लिए क्या ये इतना मुश्किल था?


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