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'चिट्टियां कलाइयां' गाने से लड़कियों को नफरत करनी चाहिए!

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गलत फिल्म ‘रॉय’ का यह गाना सही है यार. बालकों को खासतौर पर पसंद आया. मुझे भी धुन अच्छी लगी. सुर भी. कुछ टुकड़े अटक गए. इतने कि ‘मैं तुम हम’ जैसे मोमेंट्स की जीभ बिराती क्यूटत्व का जतन करती एक स्वयंक्लिक फोटो फेसबुक पर शेयर की, तो कैप्शन में यही लिखा. रिकवेस्टां पाइयां वे. फिर इस गाने को लूप में डालकर खूब सुना. सुना तो अखरने लगा. घामड़ गाना है. निहायत ही पोंगापंथी. स्त्रीविरोधी. अब इसे खब्त कह सकते हैं. पर है तो है. आइए देखें जरा.

नायिका पेशे से ब्रिटेन की एक फिल्म डायरेक्टर है. शूट करने के लिए मलेशिया आई है. फिलहाल एक कैफे में बैठी है. यानी आज की नारी है. आर्थिक रूप से स्वावलंबी. चूंकि मैंने फिल्म देखी है, इसलिए यह भी बता देता हूं कि नायिका स्वाभिमानी भी है. मगर फिर उसे इश्क सा कुछ हो जाता है. और तब उसके भीतर का सारा ओज अभिसार के फेर में बह जाता है.

लड़की का इसरार क्या है. हे पिया, मेरे लिए गोल्डन झुमके ले आओ. उन्हें मैं चूमकर कान में पहन लूं. हे पिया, मुझे शॉपिंग करवाओ. प्यार मुहब्बत वाली फिल्म दिखाओ. और ये सब तुम क्यों करो. क्योंकि जी मेरी कलाइयां गोरी हैं.

गोरी भी नहीं. और आगे बढ़कर अगली लाइन में कलाइयों के व्हाइट होने की दुहाई दी जाती है. और फिर किलर गिराया जाता है. तेरे हिस्से आइयां वे. हमें लगता है कि हॉट पैंट्स पहनी हुई नायिका हर मायने में एक सशक्त महिला होगी. लेकिन यह भ्रम बुरी तरह टूटता है जब वह कहती है, ‘रिक्वेस्टां पाइयां वे.’ शॉपिंग कराने के लिए वह पुरुष पर आश्रित है और इसके लिए बाकायदा दरख्वास्त मोड में है.स्त्री की पुरुष पर निर्भरता का यह उत्तर-आधुनिक रूप ही तो है.

अर्थात हे पुरुष. ये संपूर्ण चराचर जिसकी कामना करता है. वह तेरे प्रारब्ध का हिस्सा है. पर उसके लिए तुझे नायिका को खरीदारी करवानी होगी. नायक भी रैप करते हुए अपने कोमल उदगार उगल ही देता है. वह अपनी कुंठा कामना को यूं प्रकट करता है. व्हाइट कलाइयां ड्राइव्स मी क्रेजी. और फिर कुछ कुछ लंतरानी. नायिका अब और भी हुलस जाती है. उसे सिर्फ शॉपिंग और फिल्म की ही तमन्ना नहीं है. अब उसे गुलाबी चुन्नी भी चाहिए. और कलरफुल चूड़ी भी.

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क्यों चाहिए. उसकी मर्जी. व्यक्तिगत तौर पर मुझे लड़कियों को सिर्फ गुलाबी रंग से बांधने से ऐतराज है. हो सकता है कि गुलाबी रंगत के कुछ ऐतिहासिक कारण रहे हों. मगर उनकी पड़ताल तो अब होती नहीं. ये मान लिया जाता है बाई डिफॉल्ट कि लड़की है तो उसे पिंक ही पसंद आएगा. या कहें कि करवाया जाएगा. कभी किसी बच्चे के लिए फ्रॉक खरीदने जाइए. मुंह से निकला नहीं कि लड़की है और सेल्समैन मार पिंक पिंक आपको पका देगा.

पर ठीक है, यहां नायिका की मर्जी है. कि उसे गुलाबी चुन्नी दिलवाई जाए. मुझे रंग पर नहीं मांगने पर आपत्ति है. नायिका पढ़े. नौकरी करे. अपने पैसे से जमकर शॉपिंग करे. गाए. मैंने गुलाबी चुन्नी ले ली. कलरफुल चूड़ी ले ली. खूब सारी शॉपिंग कर ली. और फिर कहे. ए लड़के. मेरे साथ फिल्म देखने चलेगा क्या. मतलब दो ढाई दशक में हम इतना तो आगे आ ही गए हैं न सोच, समझ और जमीनी मामले में. भरपूर मेहनत के साथ.

अब नया जमाना है. नायिका क्यों चूड़ी के लिए नायक से इसरार करे. ज्यादातर नायक एसी कमरों में कंप्यूटर के सामने गुलामी करते हैं. फिर ब्रेक के दौरान बर्गर खाकर बस एक मिनट के लिए बाहर निकलते हैं.

चिट्टियां कलाइयां सुनते ही गोरी है कलाइयां याद आता है. फिल्म आज का अर्जुन का गाना. यहां भी नायिका गांव के सेटअप में नायक को लुभा रही है. कह रही है कि गोरी है कलाइयां, तू ला दे मुझे हरी हरी चूड़ियां. अपना बना लूं तुझे बालमा. आप कह सकते हैं कि नब्बे का मनमोहनी समां तब नहीं बंधा था. नायिका खेत में खाना ले जाती थी. घर संभालती थी. मगर फसल बेचने मरद ही जाता था. उसके हिस्से बच्चे, कपड़े लत्ते और जेवर आते थे. कैश नहीं. तो उसका कहना बनता था कि मुझे चूड़ियां ला दो. और तब हीरो के पास गिफ्ट के ऐसे विकल्प भी नहीं थे कि देख मैं तुझे कित्ता प्यार करता हूं. पूरे दो जीबी का नैटपैक डलवा दिया तेरे फोन में.

बात चूड़ी की नहीं है. यहां नायक कुछ ठोस बात करता है. सबसे पहले तो गोरेपन की महानता का निषेध करता हुआ कहता है कि गोरी हो कलाई. चाहे काली हो कलाई. जो भी चूड़ी पहनाए फंस जाए. मतलब नायक कुछ प्रगतिशील है. खलरिया के कलर पर नहीं अटकता. शायद तब तक गांव में फेयर एंड लवली को बाजार नजर नहीं आया था. या फिर थोक के भाव एमबीए पढ़कर निकले लौंडे कोलगेट और लाइफबॉय के बाजार में सेंध लगाने के लिए प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की फिसलपट्टी पर सवार हो इस नए अनदुहे स्वर्ग में नहीं उतरे थे.

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पर आगे नायक नालायक फंस जाए की बात क्यों करता है. उसका मतलब क्या है जी. कि आदमी औरत के हुस्न में फंस जाता है. जैसे न फंसे तो मंगल पर कमंडल लेकर चढ़ जाए एक सांस में. पर ठहरिए, विमर्श इसके बाद है. गाने में चूड़ी के बाद नायक अर्थ की यानी असल मुद्दे की बात करता है. वह कहता है कि हरी हरी चूड़ियों की देखे हरियाली, भीमा की न खेती सूख जाए. तो मतलब पहले खेत की, खरीद की चिंता. तब ये सब रायता फैलाया जाए.

अब नया जमाना है. नायिका क्यों चूड़ी के लिए नायक से इसरार करे. ज्यादातर नायक वैसे भी खेत छोड़ आए हैं. अब वे जेठ के महीने में गेंहू की कटाई की चिंता में पसीना नहीं बहाते. एसी कमरों में कंप्यूटर के सामने गुलामी करते हैं. फिर ब्रेक के दौरान उसी गेंहू के बने रिफाइन्ड अवतार से बने बर्गर खाकर बस एक मिनट के लिए बाहर निकलते हैं. उस ठंडे निर्वात से. और कहते हैं. इट्स सो हॉट. नायिका मर्दों की चेरी नहीं रह गई है. उसने घाघरा उतार हॉट पैंट चढ़ा लिए हैं. उसकी मर्जी. जो कपड़े पहने. मगर यूं नायक से चिज्जू मांगना अखर गया कसम से.

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ये लोफड़ाई और प्रलोभन वाला काम तो नब्बे का सलमान करता था. जब वह गाता था. चलती है क्या नौ से बारह. वह सज्जनता का स्वांग नहीं करता. साफ कर देता है कि शो रात का है, टिकटें दो हैं और चिपक कर बैठूंगा मैं.

इसे कविता को गद्य में बदलते देखते हैं हम फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर में. नायक डॉन बन गया है. मगर देखने में चिमरखी ही है. नायिका माधुरी का कस्बाई वर्जन है. भरो मांग मेरी भरो देखकर कसमसाती. नायक नब्बे फीसदी मर्दों की तरह गाइडेड हीट सेंसिंग मिसाइल सा बना हुआ है. क्लीवेज देखने को आतुर व्याकुल. और तब नायिका पूछती है किताब की दुकान के बार रोमांस करते हुए. करण अर्जुन देखने जाने से पहले. सटकर बैठोगे, गोद में पॉपकॉर्न ढूंढोंगे. नायक बेचारा हड़काई के डर से न न कहता है. और तब नायिका कहती है कि जब ये सब नहीं करना तो अपनी अम्मा के साथ ही देखो न जाकर.

खैर. नायिका बदल रही थी ये तो मुझ नायक को पता था. गानों ने भी देर सवेर इसकी साखी दे ही दी. याद करें. लक्ष्य फिल्म का वह सीन. नायक सीधे सीधे कह देता है कि हम साथ हैं और हमें साथ होना चाहिए. नायिका गुस्सा जाती है. अरे, ऐसे कैसे सीधे फच्च से मुंह पर दे मारा. अदा से कहो. और ये सुनते ही नायक चिबिल्ला मटकने फटकने लगता है. अगर मैं कहूं मुझे तुमसे मुहब्बत है. नायिका इस भोले भंडारी को समझाती है कि इस बात को और सजा के कहते, घुमा फिराके कहते तो अच्छा होता…

मगर दशक बीतते न बीतते नायिका को ये ढंग बोर करने लगता है. अब उसे सीधी बात वाला लड़का चाहिए. ये तू फूल मैं भंवरा टाइप रूपकों की दुकान का स्टॉल नहीं सजवाना उसे. तो नायक जब पिछले सबक के वशीभूत पुरखों को प्रणाम करते हुए घुमाकर इश्क का इजहार करता है तो नायिका डपट देती है. सीधे प्वाइंट पर आने का फरमान सुनाती है. कसम से, उस वक्त शमशेर बहादुर की कविता ‘टूटी हुई बिखरी हुई’ की वो लाइन याद आ जाती है. उसके इंजेक्शन की चिकोटियों में बड़ा प्रेम है.

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