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बाबा नागार्जुन की अविनाश कथा, पार्ट-1

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बाबा नागार्जुन का आज जन्मदिन है. अब ये भी बताना पड़े कि बाबा हिन्दी और मैथिली के लेखक-कवि थे तो कोई बात हुई. हां इतना जान लो ऐसे तो बाबा का असली नाम वैद्यनाथ मिश्र था पर जब हिंदी में लिखते तो नागार्जुन और मैथिली में लिखते तो यात्री हो जाते थे. दरभंगा, बिहार में रहते थे.

अविनाश दास भी दरभंगा के ही हैं. पत्रकार, कवि, लेखक और अब फिल्ममेकर भी. कुल मिलाकर पढ़ने-पढ़ाने का चस्का है. बाबा के साथ अच्छा-खासा वक्त गुजारा है. अब उनके किस्से सुना रहे हैं. आज पहली किस्त में 6 किस्से हैं आपके लिए. पढ़ जाओ बिना नजर हटाए, फटाफट.


1 गुलमोहर और अमलतास यानी लाल-लाल, पीला-पीला

बाबा ने एक दिन कहा, चलो तुम्‍हारे घर चलते हैं. दोपहरी थी और गर्मी के दिन थे. मैं जाकर रिक्‍शा ले आया. हम पंडासराय (दरभंगा) से चले. रास्‍ते में कलेक्‍टेरिएट (कचहरी) की सड़क पड़ती थी, जिसके दोनों ओर हरे-भरे पेड़ों की कतार पीटी के अनुशासित विद्यार्थियों की तरह खड़ी नजर आती थी. लाल-पीली शृंखला में गुलमोहर और अमलतास की छाया धूप के गुस्‍से पर ठंडे पानी की तरह पड़ती थी. हमारा रिक्‍शा वहां से गुजरा, तो बाबा उछल पड़े. कहा, देखो देखो अमलतास. मैंने कहा, हां कई बार देखा है. फिर थोड़ी देर में बाबा उछले और कहा, देखो देखो गुलमोहर. मैंने फिर कहा, हां इसे भी कई बार देखा है - आगे इक्‍के दुक्‍के कुछ और नये पेड़ हैं. मेरी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि बाबा का पारा हाई हो गया. बोले, तुम परम मूर्ख हो. जिसे हम कई बार देखते हैं, वह हमेशा पुराना नहीं होता. आंखें अभ्‍यस्‍त होती हैं, आत्‍मा नहीं. चहको चहको, तभी तुम्‍हारे भीतर गुलमोहर और अमलतास का रंग उतरेगा. बाबा की फटकार सुन कर मेरे चेहरे का रंग उतर गया. रिक्‍शा आगे बढ़ा तो एक बार फिर गुलमोहर और अमलतास के फूल आंखों के सामने आये. मैंने बाबा को दिखाते हुए अपनी उंगलियों को उन पेड़ों की तरफ कर दिया. बाबा मुस्‍कराये, फिर अपने हाथ को नचाते हुए कहने लगे - लाल लाल, पीला पीला. मेरा मुंह भी तब तक खुल गया था और मैं भी कहने लगा - लाल लाल, पीला पीला. रिक्‍शा वाला हंसते हुए अपना रिक्‍शा हांक रहा था.

Baba Nagarjuna

2 बाबा को डुबा ही दीजिएगा क्‍या?

पटना के अशोक राजपथ में राजकमल प्रकाशन की एक दुकान है. साइंस कॉलेज के सामने. तब सत्‍येंद्र सिन्‍हा वहां के सर्वेसर्वा हुआ करते थे. चौरानबे में जब बाबा के साथ मैं पटना गया, तो एक दिन वे मुझे वहां ले गये. बाबा ने कुछ किताबें वहां से ली और पैसे नहीं दिये. लौटते हुए मैंने पूछ लिया कि बाबा आप पैसे देना भूल गये. बाबा ने कहा कि वे मेरी रॉयल्‍टी से काट लेंगे. इस उत्तर से मेरे चेहरे पर उभरा अफसोस बाबा ने पढ़ लिया. उस रात हम बाबा के साथ हरिनारायण सिंह जी के घर रुके थे. दूसरे दिन सुबह बाबा ने एक कागज पर सत्‍येंद्र जी को पत्र लिखा कि ये लड़का, जिसका नाम अविनाश है, उसे जो किताबें चाहिए, दे दीजिएगा. मैं पत्र लेकर पहुंचा और सत्‍येंद्र जी से मिला. उन्‍होंने कहा कि ठीक है, आप किताबें चुन लीजिए. मैंने ताबड़तोड़ साठ-सत्तर किताबें शेल्‍फ से निकाल कर फर्श पर बिछा दी. सत्‍येंद्र जी से कहा कि ये सब चाहिए. उन्‍होंने मेरी ओर देख कर गंभीरता से कहा कि बाबा को डुबा ही दीजिएगा क्‍या? उन्‍होंने आप पर भरोसा किया है और आप एकदम से डकैती पर उतर आये हैं… इनमें से पांच किताबें चुनिए. मुझे खुद पर बड़ी शर्म आई और उनसे आंख चुराते हुए मैंने पांच किताबें लाकर उनकी ओर बढ़ाया. उनमें से दो किताबों के नाम अब भी याद हैं. इस अकालबेला में (राजकमल चौधरी), पटकथा का वह अंक जिसमें सत्‍यजीत रे की पटकथा पाथेर पांचाली थी. और शायद संसद से सड़क तक (धूमिल) भी. सत्‍येंद्र जी ने बाबा के नाम से बिल फाड़ कर मुझे पांचों किताबें पकड़ायी और किताब हाथ में आते ही मैं वहां से सरपट भागा. फिर कई बार आमने सामने पड़ने पर सत्‍येंद्र जी से मुंह चुराने की कोशिश करता रहा और तभी उनके सामने खुल कर आया जब तक मुझे यकीन नहीं हो गया कि वे मेरा चेहरा भूल चुके हैं. बाबा से भी मैंने कभी इस घटना का जिक्र नहीं किया.


3 बाबा बमक गये, इशारा किया- जमीन पे बैठो

वह समय ऐसा था, जब साहित्‍य अकादमी में मैथिली के मठाधीशों को हटाने के लिए “एक धक्‍का और दो” के अंदाज में कुछ प्रगतिकामी युवा सक्रिय थे. क्षेत्रीय भाषा की इस हलचल को तब राजेंद्र यादव की ‘हंस’ पत्रिका ने छापा भी था. देवशंकर नवीन की टिप्‍पणी और मेरी प्रतिक्रिया छपी थी. मैंने शीर्ष लेखक सुरेंद्र झा सुमन पर निशाना साधा था, जो मि‍थिला क्षेत्र में जनसंघ के संस्‍थापक थे और चुनाव भी लड़ चुके थे. उन दिनों बाबा के यहां सुबह-सबेरे का आना-जाना था. कभी कभी दोपहर में भी. तो एक बार जब वियोगी भाईजी आये, मैं उन्‍हें लेकर भरी दोपहरी में बाबा के यहां पहुंचा. बाबा बिस्‍तर से पांव लटकाये बैठे थे. बिस्‍तर पर एक किनारे किताबों की छोटी सी गट्ठर रखी थी. वियोगी भाईजी बाबा के बगल में बैठ गये… और मैं जैसे ही किताबों की गट्ठर के पास बैठने-बैठने को हुआ, बाबा बमक गये. इशारा किया कि जमीन पर बैठो. सघन मायूसी के साथ मैं नीचे धम्‍म से बैठ गया. बाबा ने वियोगी भाईजी से कहा, “आप जानते हैं तारा बाबू… ये लड़का चोट्टा है. सुमन जी के खिलाफ अनाप-शनाप लिखता है. हम शर्तिया कह रहे हैं कि इसने सुमन जी को सी अक्षर नहीं पढ़ा है. खाली किताब सूंघ लेता है.” वियोगी भाईजी मेरे आत्‍मविश्‍वास को पिघलते हुए देख कर पसीजे और बाबा से कहा कि अभी बालपन है. पर बाबा परम गुस्‍से में थे और उस दिन उन्‍होंने मुझसे एक बार भी बात नहीं की. बस, जब हम जाने लगे, तो ठुड्डी पकड़ कर हिला दिया. उस दिन तक मैंने मैथिली के पांच और लेखकों पर लिखने की तैयारी कर ली थी, पर बाबा के यहां से लौटने के बाद तय किया कि नहीं, पहले उन लेखकों को आद्योपांत पढूंगा. हालांकि आज तक मैंने न उन लेखकों को पढ़ा, न उन पर लिखा.


4 जब बाबा का हॉर्निया का ऑपरेशन होना था

मेरी मां मेरे लिए बहुत चिंतित रहती थी. पिता की चिंता से वाकिफ नहीं था क्‍योंकि सीधे कभी वे मुझसे मुखातिब नहीं रहे. मेरे पर (पंख) पता नहीं कहां जाने के लिए फड़फड़ा रहे थे कि इंटर में विज्ञान लेने के बाद फिर कला में चला गया. डिग्री से लेकर हरकतों तक में विज्ञान को घुसने नहीं दिया. मेरा यह फैसला घर में सबकी इच्‍छाओं के विपरीत था। मेरे पास दरभंगा इप्‍टा, तर्जनी नाट्य संस्‍था और वीणापाणि क्‍लब (बंगाली टोला) में दुर्गापूजा में होने वाले बांग्ला नाटकों और साहित्यिक गोष्ठियों के अलावा बाबा की टेक थी. मां को मुझ पर भरोसा तो था, लेकिन उस भरोसे में कहीं कोई मुश्किल थी. मेरी दो मौसियां पंडासराय में रहती थीं. मां के साथ अक्‍सर मैं वहां जाता था, तो एक शाम जब हम वहां थे, तो मां ने कहा, बाबा से मिलेंगे. हम दोनों और मेरी बहन बाबा के यहां गये. शाम करीब आठ बजे की बात है. उन दिनों बाबा शाम के बाद किसी से मिलते नहीं थे. तबीयत बहुत खराब चल रही थी. हार्निया का ऑपरेशन होना था. पर मेरी मां से मिले. मां ने उनके सामने मेरे लिए अपनी शाश्‍वत चिंता रखी कि इसका कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि क्‍या करेगा. बाबा कम बोलते थे, लेकिन उन्‍होंने भी मां के सुर में सुर मिलाया, एकरा बुधि मे बियाधि छई… आ से तकरा लेल हम मोटगर डंडा रखने छी (इसकी बुद्धि में व्‍याधि है, पर हमने उसके लिए मोटा डंडा रखा हुआ है). मां ने याचना की, “एकरा अहां माथा हाथ द’ दियउ…” (इसके सर पर हाथ रख दीजिए…). बाबा ने जवाब दिया, “ई कने बेसी तेज अछि… आ तें एकरा कहियो दिक्‍कत नइं हेतय… समय पर कमाए लागत…” (ये कुछ ज्‍यादा ही होशियार है. सो इसको कभी दिक्‍कत नहीं होगी. समय पर कमाने लगेगा). मां इस बात से निश्चिंत होकर लौटी और फिर मुझे कभी नाटक-नौटंकी-कविता-कहानी के लिए नहीं रोका. मेरी घनघोर आवारागर्दी के दरम्‍यान बाबा भी बीच-बीच में ढाल की तरह मेरे घर आकर रहने लगे.


5 बांग्ला पत्रिका ‘देस’ और अंग्रेजी पत्रिका ‘फ्रंटलाइन’ जरूर पढ़ते थे

सबसे पहले रांची में कुमार बृजेंद्र (आकाशवाणी के मशहूर उदघोषक) ने बाबा की वह बांग्‍ला कविता सुनायी थी. आमि मिलिटारिर बूड़ो घोड़ा. मैं मिलिट्री का बूढ़ा घोड़ा. यह सब जानते हैं कि बाबा नागार्जुन बहुभाषा-विज्ञ थे. हिंदी, अंग्रेजी, मैथिली के अलावा पाली, प्राकृत, बांग्‍ला, उर्दू और संस्‍कृत को एक तरह से जानते थे. हम अपनी व्‍यवहार-भाषा के प्रति भी उतने आग्रही नहीं बचे. लिखने बोलने में त्रुटियों के प्रति बेलिहाज. बाबा मुझे हफ्ते में पचास रुपये देते थे और दूसरे दिन कुछ पत्रिकाएं लाने के लिए बोलते थे. उनमें बांग्‍ला पत्रिका ‘देस’ और अंग्रेजी की पत्रिका ‘फ्रंटलाइन’ जरूर होती थी. हिंदी और अंग्रेजी का कोई आर्टिकल पढ़ कर सुनाने के लिए कहते थे. अंग्रेजी लड़खड़ाती थी, तो दुरुस्‍त करते थे. बांग्‍ला सीखने को बोलते थे. मैंने कोशिश की, लेकिन आध-अधूरे में छूट गया सब. जीवन में कायदे की बहुत सारी चीजों की तरह. तो आज जिस सुबह का किस्‍सा सुनाना चाहता था, वह जाड़े की सुबह थी और मैं कुछ पत्र-पत्रिकाएं लेकर बाबा के घर पहुंचा था. उन दिनों उनके बड़े लड़के शोभाकांत जी (शोभा चचा) ने पंडासराय से घर बदल लिया था. राय साहब पोखर पर रहते थे. बाबा छत पर धूप सेंक रहे थे. सामने दरभंगा-लहेरियासराय की छोटी रेल लाइन दिखती थी. बाबा लेंस लेकर पत्रिकाओं के पन्‍ने पलटने लगे, तभी सामने से रेल गुजरी. बाबा उस तरफ देखने लगे और जब रेल गुजर गयी, तो मुझसे कहा - देखो अभी-अभी समय सामने से गुजर गया. मैंने पूछा, बाबा आप रेल को समय कहते हैं. बाबा बोले, “मूर्ख! जो जैसा होता है, वह कई तरह का होता है. रेल से मुझे पता चलता है कि समय क्‍या हुआ है. उसी तरह धूप होती है. छाया की लंबाई-चौड़ाई से समय का पता चलता है. उसी तरह विभिन्‍न भाषाओं में जो सूचनाएं हमें मिलती हैं, उससे देशकाल का पता चलता है.” बाबा रुक-रुक कर, सांस के साथ सहज हो-हो कर बोलते थे. मुझे तब शायद ही इसका एहसास हुआ हो कि बाबा विविध भौगोलिक भाषाओं के साथ प्रकृति की भाषा को जानने की जरूरत भी समझा रहे थे. बाद में जिंदगी की भाग-दौड़ और तरह-तरह के संघर्षों में बाबा की तमाम सीख धुंधली पड़ती चलती गई. अब उन स्‍मृतियों के टुकड़े जोड़ कर भी क्‍या होगा?


6 बाबा ने मायावती पर कविता लिखी

मायावती पर पहली कविता शायद बाबा ने ही लिखी थी. कविता में महिमा भी थी और जिन शक्तियों के खिलाफ दलित उभार हुआ, उससे गंठजोड़ पर व्‍यंग्‍य भी था. तब मैं पटना में रहने लगा था और प्रभात खबर में काम करता था. दरभंगा आने पर एक शाम जब मैं पंडासराय के बगल में खाजासराय वाले उनके घर पहुंचा, बाबा ने बताया कि उन्‍होंने एक कविता लिखी है. तुम तो अब रहते नहीं, तो नवीन जी को डिक्‍टेशन दिया. नवीन जी (मूल नाम सुनील जी) शोभाकांत जी की बड़ी बेटी ऋचा के पति हैं. सज्‍जन व्‍यक्ति हैं. उन दिनों विकास कुमार झा के साथ माया पत्रिका (मित्र प्रकाशन) में काम करते थे. बाबा ने कहा कि तुम एक कागज पर उस कविता की कुछ पंक्तियां उतार लो और मुझसे हस्‍ताक्षर ले लो. मैंने पूरी कविता उतार ली, तो नवीन जी पर बाबा नाराज हो गये. उनसे कहा, “आब अहां लग की रहल?” [अब आपके पास क्‍या रहा?]… हाथ ऐसे चमकाया, जैसे कह रहे हों, “सुथनी”? सुथनी का मतलब इस जमाने में आप “बाबा जी का ठुल्‍लू” या “घंटा” से लगा सकते हैं. नवीन जी विदेह आदमी, उन्‍हें कविता या इस पूरी कथा से क्‍या लेना-देना! वे हंसने लगे, तो बाबा ने मेरे कागज पर हस्‍ताक्षर कर दिया और कहा कि ले जाओ. वह कविता बाबा के किसी संकलन में तो नहीं, पर रचनावली में संकलित है. यहां वह पूरी कविता साझा कर रहा हूं.

 मायावती मायावती

दलितेंद्र की छायावती छायावती

जय जय हे दलितेंद्र

प्रभु, आपकी चाल-ढाल से

दहशत में है केंद्र

जय जय हे दलितेंद्र

आपसे दहशत खाये केंद्र

अगल बगल हैं पंडित सुखराम

जिनके मुख में राम

सोने की ईंटों पर बैठे हैं

नरसिंह राव

राजा होंगे आगे चल कर

जिनके पुत्र प्रभाकर राव

मायावती मायावती

दलितेंद्र की शिष्‍या

छायावती छायावती

दलितेंद्र कांशीराम

भाषण देते धुरझाड़

सब रहते हैं दंग

बज रहे दलितों के मृदंग

जय जय हे दलितेंद्र

आपसे दहशत खाये केंद्र

मायावती आपकी शिष्‍या

करे चढ़ाई

बाबा विश्‍वनाथ पर

प्रभो, आपसे शंकित है केंद्र

जय जय हे दलितेंद्र

मायावती मायावती

गुरु गुन मायावती

मायावती मायावती

गुरु गुन मायावती

मायावती मायावती

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