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भारत में ये मुसलमान मूर्ति बनाकर एक देवी की पूजा करते हैं

इस्लाम पूरी दुनिया में माना जाने वाला धर्म है. अरब से चलकर ये जहां-जहां पहुंचा, वहां की कुछ न कुछ स्थानीय परंपराएं इसमें आ मिलीं. इसलिए पूरी दुनिया में इस्लाम के कई रंग मिलते हैं. तुर्की के मुसलमान भारत के मुसलमानों से अलग हैं, और उनसे अलग इंडोनेशिया के मुसलमान हैं. लेकिन एक बात पर पूरी दुनिया के मुसलमान एक हैं – अल्लाह के सिवा कोई दूसरा ईश्वर नहीं. ‘ला इलाहा इल्लल्लाह.’ न ईश्वर न उनके आखरी पैगंबर मुहम्मद साहब की कोई तस्वीर या मूर्ति बनाई जा सकती है. इस्लाम में मूर्ति पूजा की सख्त मनाही है. और इस बात को लेकर मुसलमान बड़े भावुक हैं. फ्रांस के शार्ली हेब्दो और डेनमार्क के जेलैंड्स पोस्टेन में मोहम्मद साहब पर बने कार्टूनों के खिलाफ दुनिया भर में प्रतिक्रिया हुई थी.

लेकिन इसी दुनिया में ऐसे मुसलमान भी हैं जो एक देवी को मानते हैं, बाकायदा मूर्ति बनाकर पूजा करते हैं. यहां बात किसी दूसरे धर्म की देवी की नहीं हो रही जिसे मुसलमान भी पूजते हों. हम एक विशुद्ध मुस्लिम देवी की बात कर रहे हैं – उनका नाम है बॉनबीबी.  

सुंदरबन
सुंदरबन

भारत और बांग्लादेश में बंटा सुंदरबन – गंगा के डेल्टा पर फैला दुनिया का सबसे बड़ा मैनग्रोव जंगल. ‘अठारो भाटिर देश’ – वो जगह जहां 18 बार ज्वार आता है, ज़मीन और समंदर की आंख-मिचौली चलती है. लेकिन इस जंगल की असली पहचान है सुंदरबन के आदमखोर बाघ. चिड़ियाघर में बाघ को कंकड़ मारने वाले लोग यहां पसरे बाघों के खौफ को ऐसे समझें कि यहां जंगल के किनारे ही ‘बाघेर विधवा ग्राम’ है – बाघों के हाथों मारे गए लोगों की विधवाओं का एक पूरा गांव. जब लोग शहद लाने या मछली पकड़ने जंगल जाते हैं, तो एक मुखौटा सर के पीछे पहनते हैं, कि बाघ पीछे से घात लगाकर आ जाए तो उसे लगे कि उसे देखा जा रहा है. लेकिन इस मुखौटे से ज़्यादा भरोसा उन्हें होता है बॉनबीबी पर. कोई भी बॉनबीबी के मंदिर में सिर झुकाए बिना जंगल में कदम नहीं रखता.

बाघ के हमले में बाल-बाल बचा शख्स. (फोटोःरॉयटर्स)
बाघ के हमले में जो बाल-बाल बच जाते हैं, उसका श्रेय बॉनबीबी को देते हैं. (फोटोःरॉयटर्स)

सुंदरबन की रानी – बॉनबीबी

‘बॉन’ का मतलब जंगल होता है. तो बॉनबीबी जंगल की देवी हैं, और पूरे सुंदरबन में बॉनबीबी की पूजा होती है. भारत के और देवी-देवताओं की तरह ही बॉनबीबी का इतिहास भी तर्क से ज़्यादा किस्से-कहानियों से भरा है. पत्रकार सबा नक़वी अपनी किताब ‘इन गुड फेथ’ में बॉन बीबी का ज़िक्र करती हैं. उनके मुताबिक भारत की तरफ के सुंदरबन के लोगों में एक किस्सा प्रचलित है कि दक्षिण रे (कुछ जगह दोखिन रॉय नाम भी आता है) नाम के बाघों के देवता और बॉनबीबी में जंगल को लेकर लड़ाई हुई थी. दक्षिण रे बाघों के हक के लिए लड़े और बॉनबीबी इंसानों के हक के लिए. लेकिन कोई नहीं जीता और गाज़ी मियां के कहने पर लड़ाई बराबरी में छूटी, इस बात पर कि जंगल को इंसानों-बाघों में बराबर बांटा जाएगा. वहां के लोग इस किस्से को लेकर एक लोक नृत्य भी करते हैं.

बॉन बीबी की गथा का मंचन. (फोटोःविकिमीडिया कॉमन्स)
बॉन बीबी की गाथा का मंचन. (फोटोःफ्लिकर)

इस किस्से को थोड़े अंतर के साथ ऐसे भी सुनाया जाता है कि दक्षिण रे दरअसल एक ब्राह्मण संत थे. एक बार गुस्से में आकर तय कर लिया कि इंसानों का मांस खाएंगे. तो एक बाघ का रूप धर लिया. खुद को जंगल का मालिक घोषित कर दिया और ऐलान कर दिया कि इंसानों के साथ जंगल नहीं बांटा जाएगा. इंसानों को मुसीबत में देख अल्लाह ने एक अनाथ लड़की को दक्षिण रे का आतंक खत्म करने के लिए चुना. ये बॉनबीबी थीं. इसके बाद बॉनबीबी और उनका जुड़वा भाई शाह जोंगोल मदीना और फिर मक्का गए. दोनों वहां से कुछ पवित्र मिट्टी अपने साथ वापस सुंदरबन लाए. दक्षिण रे को अल्लाह के प्लान का पता चल गया और उन्होंने बॉनबीबी पर हमला कर दिया. लेकिन दक्षिण रे की मां नारायणी ने उन्हें ये कहकर टोका कि बॉनबीबी औरत हैं, उनसे औरत का लड़ना ही सही रहेगा. तो नारायणी लड़ाई में आईं. लेकिन हार होती देख उन्होंने बॉनबीबी को ‘साई’ मान लिया, और सुलह का रास्ता खुला. साई का मतलब दोस्त होता है. इसी तरह के कई और किस्से भी हैं.

बॉनबीबी पर 19वीं सदी में एक छोटी सी किताब लिखी गई थी. ‘बॉनबीबी जोहुरानामा’ नाम से. बंगाली में लिखी ये किताब बाएं से दाएं लिखी है, लेकिन अरबी की नकल करते हुए पीछे से आगे की ओर लिखी हुई है. अनुमान यही है कि किसी मुसलमान ने लिखी है. बॉनबीबी का आह्वान करते हुए इसी किताब को पढ़ा जाता है. इस्लाम इस इलाके में 16वीं सदी से है. जंगल में घुसते वक्त लोग ‘बाउली’ नाम के ओझा से मंत्र भी फुंकवाते हैं. मंत्र अरबी में होते हैं. मान्यता है कि बाउली के मंत्रों को ताकत बॉनबीबी से ही मिलती है.

सब शेयर करती हैंः भक्त भी, मंदिर भी

बॉनबीबी के मंदिर पूरे सुंदरबन में हैं. कह सकते हैं कि बॉनबीबी के मंदिर दो तरह के होते हैं. एक जो जंगल की हद पर होते हैं जहां लोग जंगल के अंदर जाने से पहले सिर नवाते हैं. ये मंदिर बहुत साधारण होते हैं. उनमें बॉनबीबी की एक मिट्टी की प्रतिमा बस होती है. गांवों में बने मंदिर इनकी तुलना में थोड़े भव्य होते हैं. यहां बॉनबीबी के साथ हिंदू देवी-देवता भी होते हैं. कुछ में बॉनबीबी दक्षिण रे के साथ विराजती हैं तो कुछ में उनका संहार करती मूर्ति होती है. कुछेक मंदिरों में बॉनबीबी बाघ (दक्षिण रे का प्रतीक ) के आलावा हिरण, मछली, मगरमच्छ या मुर्गी पर भी विराजती हैं. ध्यान देने वाली बात है कि बॉन बीबी और उनके साथ जुड़े प्रतीक, सभी लोगों के जंगल के साथ रहे गहरे नाते की ओर इशारा करते हैं.

बॉन बीबी का मंदिर.
बॉन बीबी का मंदिर.

एक और खास बात है, बॉनबीबी के मंदिर में दरवाज़ा नहीं होता. दरवाज़ा हो, तो ध्यान रखा जाता है कि ताला न लगे. बॉनबीबी बाघ और इंसान के बीच आखरी दीवार हैं, उनकी ज़रूरत कभी भी, किसी को भी पड़ सकती है.

बॉनबीबी का मेला – हिंदू-मुसलमान दोनों आते हैं

जनवरी से फरवरी के बीच बॉनबीबी का मेला भी भरता है. इन मेलों में सबसे बड़ा मेला होता है बंगाल के 24 परगना में. यहां के रामरूद्रपुर में होने वाले मेले में आसपास के लगभग सभी लोग भाग लेते हैं. हिंदू और मुस्लिम, दोनों धर्म की महिलाएं इस दिन उपवास रखती हैं और सूरज ढलने पर ही कुछ खाती हैं. मेले में आकर लोग तरह तरह की मन्नतें मांगते हैं- बच्चे से लेकर अच्छी फसल तक. ये बात इस ओर इशारा करती है कि यहां के लोगों के लिए बॉनबीबी सिर्फ जंगल की देवी नहीं हैं. जिन इलाकों से सुंदरबन पीछे हट गए हैं, वहां भी बॉनबीबी को उतनी ही शिद्दत के साथ माना जाता है. इनके मेलों में हर साल पहले से ज़यादा लोग आते हैं.

बॉन बीबी और धर्म

बॉनबीबी का किस्सा कई तरह से खास है. सबसे अव्वल तो इस तरह कि वे एक मुस्लिम देवी हैं. सबा नक़वी अपनी किताब में साफ-साफ लिखती हैं कि बॉनबीबी के भक्त इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि बॉनबीबी कोई हिंदू शक्ति स्वरूप (जैसे दुर्गा या काली मां) नहीं है, वे एक मुस्लिम देवी हैं. इस्लाम में अल्लाह के सिवा किसी का भी पूजनीय होना अपने आप में चौंकाता है. लेकिन ध्यान देने वाली बात है कि यहां एक इस्लामिक देवी की कल्पना की गई है, न कि देवता की. किसी औरत को इतना खास ओहदा मिलना काफी कम देखने को मिलता है.

बॉन बीबी का पूरा किस्सा हमें जंगल और इंसान के गहरे नाते की याद भी दिलाता है. एक ऐसा रिश्ता जहां जंगल और उसके जीव एक संसाधन बस नहीं हैं. उनके और इंसानों के बीच एक जीवंत नाता है. यहां जंगल को लेकर वो आदर का भाव है, जो पूरे देश से ओझल होता जा रहा है.

लेकिन बॉन बीबी सबसे खास उस मायने में हैं कि वो धर्म को देखने के हमारे नज़रिए पर चोट करती है. धर्म ढेर सारी मान्यताओं को मिलाकर बनते हैं. और ये मान्यताएं वक्त और जगह के साथ बदलती रहती हैं. लेकिन हमारी सोच में ज़्यादातर धर्म कुछ ही मान्यताओं तक सिमट गए हैं. धर्म अलग-अलग खांचों में बांट दिए गए हैं. आप हिंदू हैं, तो आप फलां  चीज़ करेंगे, मुसलमान हैं तो फलां चीज़ करेंगे. किसी भी मिलीजुली प्रथा/मान्यता के लिए स्कोप खत्म कर दिया गया है.जबकी सच ये है कि कोई भी धर्म किसी एक्सक्लूज़िव स्पेस में नहीं माना जाता. बॉन बीबी इस बात का सबसे बढ़िया रिमाइंडर हैं.

बॉनबीबी पर और जानकारी के लिए ‘लैंड ऑफ एट्टीन टाइड्स एंड वन गॉडेस’ नाम की डॉक्यूमेंट्री देखी जा सकती है: 


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