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PM मोदी ने इमरान खान के सामने पाकिस्तान को सभ्य शब्दों में खरी-खोटी सुनाई

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किरगिस्तान की राजधानी बिश्केक पहुंचे हुए हैं. वो वहां शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइज़ेशन (SCO) सम्मेलन 2019 में हिस्सा लेने पहुंचे हैं. इससे पहले 30 मई को अपने शपथग्रहण समारोह के लिए भी नरेंद्र मोदी ने किरगिस्तान के राष्ट्रपति को न्योता था. SCO में हिस्सा लेने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान भी पहुंचे हुए हैं. ये पहला मौका है जब इमरान खान और नरेंद्र मोदी, दोनों एक मंच पर साथ थे. हालांकि मोदी की अलग से चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग, रूस के राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन और अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ़ गनी से मुलाकात हुई. मगर भारत ने साफ किया है कि इमरान खान के साथ नरेंद्र मोदी की अलग से कोई मीटिंग नहीं होने जा रही. पुलवामा हमले के बाद से भारत पाकिस्तान के साथ बेहद सख़्ती दिखा रहा है.

PM मोदी ने पाकिस्तान को सुनाया, बिना उसका नाम लिए
बिश्केक सम्मेलन में बोलते हुए मोदी ने बिना पाकिस्तान का नाम लिए आतंकवाद और राज्य-प्रायोजित आतंकवाद का मुद्दा उठाया. उन्होंने कहा कि जो भी देश आतंकवाद को मदद देते हैं, उसे प्रायोजित करते हैं और उनकी फंडिंग करते हैं, उनसे सवाल किया जाना चाहिए. PM मोदी ने शायद सीधे से पाकिस्तान का नाम इसलिए नहीं लिया, क्योंकि इससे उनकी बात भी पहुंच गई और इससे सम्मेलन में कोई विवाद की स्थिति भी पैदा नहीं हुई.

ये है किरगिस्तान का मानचित्र. उत्तर की तरफ गोल घेरे में है देश की राजधानी बिसकेक (फोटो: गूगल मैप्स)
ये है किरगिस्तान का मानचित्र. उत्तर की तरफ गोल घेरे में है देश की राजधानी बिश्केक (फोटो: गूगल मैप्स)

क्या है शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन?
15 जून, 2001 को चीन के शंघाई में इस संगठन के बनने का ऐलान किया गया. उस समय इसके सदस्य थे चीन, किरगिस्तान, कज़ाकस्तान, रूस, ताजिकिस्तान और उजबेकिस्तान. शुरुआत में बस ये छह थे SCO के परमानेंट सदस्य. 2017 में भारत और पाकिस्तान भी इसमें शामिल हो गए. फिलहाल यही आठ देश SCO के स्थायी सदस्य हैं.

शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन (SCO) में कुल आठ स्थायी सदस्य हैं. इनमें सबसे लेट एंट्री हुई भारत-पाकिस्तान की. ये मैप SCO की वेबसाइट से लिया है.
शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन (SCO) में कुल आठ स्थायी सदस्य हैं. इनमें सबसे लेट एंट्री हुई भारत-पाकिस्तान की. ये मैप SCO की वेबसाइट से लिया है.

इन मेंबर देशों की लोकेशन क्या है?
सदस्य देशों की भौगोलिक स्थिति के कारण SCO को यूरेशियाई देशों का संगठन कहा जाता है. यूरेशिया मतलब यूरोप प्लस एशिया. रूस एशिया और यूरोप, दोनों का हिस्सा है. किरगिस्तान, कज़ाकस्तान, ताजिकिस्तान और उजबेकिस्तान ये पांचों सेंट्रल एशिया के मुल्क हैं. चीन पूर्वी एशिया में आता है. भारत और पाकिस्तान, दोनों दक्षिण एशिया में आते हैं.

क्या करता है ये संगठन?
राजनैतिक, आर्थिक और सैन्य. ये तीन क्षेत्र हैं, जहां SCO के सदस्य देश आपस में सहयोग करने का लक्ष्य रखते हैं. आपसी सहयोग बढ़ाने के जो मकसद तय किए हैं इस संगठन के, वो मोटा-मोटी इस तरह हैं-

– सदस्य देशों के बीच आपसी भरोसा मजबूत करना
– जो सदस्य पड़ोसी हैं, उनके बीच पड़ोसी भावना बढ़ाना
– राजनीति, व्यापार, अर्थव्यवस्था, रिसर्च, तकनीक और संस्कृति जैसे क्षेत्रों में असरदार सहयोग
– शिक्षा, ऊर्जा, परिवहन, पर्यटन, पर्यावरण से जुड़े मुद्दों में भी आपसी सहयोग बढ़ाना
– शांति, सुरक्षा और स्थिरता का माहौल बनाए रखने के लिए पारस्परिक हिस्सेदारी
– लोकतांत्रिक, निष्पक्ष और तर्कसंगत राजनैतिक और आर्थिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनाने की कोशिश

स्थायी सदस्यों के अलावा कौन है SCO के साथ?
चार ऑर्ब्जवर देश हैं शंघाई कोऑपरेशन कॉर्पोरेशन के. ये चारों हैं- अफगानिस्तान, ईरान, बेलारूस और मंगोलिया. ये भौगोलिक स्थिति में इसी इलाके का हिस्सा हैं. इसके सदस्य देशों के आसपास हैं और इस पूरे क्षेत्र की सुरक्षा और लिंकेज के हिसाब से अहमियत रखते हैं. इनके अलावा छह डायलॉग पार्टनर भी हैं SCO में- अज़रबाइजान, अरमेनिया, कंबोडिया, नेपाल, तुर्की और श्रीलंका.

नरेंद्र मोदी, कज़ाकस्तान के राष्ट्रपति कैसिम जोमा टोकाइव, चीन के राष्ट्रपकि शी चिनफिंग, किरगिस्तान के राष्ट्रपति सूरोनबे जिनबेकोव, रूस के प्रेज़िडेंट व्लादीमिर पुतिन, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान, ताजिकिस्तान के राष्ट्रपति इमोमली रहमान और उज़बेकिस्तान के राष्ट्रपति शेवकेथ मरज़ियोयेव (बाएं से दाहिने) SCO के बिसकेक सम्मेलन में साथ तस्वीर खिंचवाते हुए (फोटो: रॉयटर्स)
नरेंद्र मोदी, कज़ाकस्तान के राष्ट्रपति कैसिम जोमा टोकाइव, चीन के राष्ट्रपकि शी चिनफिंग, किरगिस्तान के राष्ट्रपति सूरोनबे जिनबेकोव, रूस के प्रेज़िडेंट व्लादीमिर पुतिन, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान, ताजिकिस्तान के राष्ट्रपति इमोमली रहमान और उज़बेकिस्तान के राष्ट्रपति शेवकेथ मरज़ियोयेव (बाएं से दाहिने) SCO के बिश्केक सम्मेलन में साथ तस्वीर खिंचवाते हुए (फोटो: रॉयटर्स)

SCO की अहमियत क्या है भारत के लिए?
चीन और पाकिस्तान के साथ भारत के संबंध अच्छे नहीं हैं. मगर इनके अलावा SCO के जो सदस्य हैं, उनके साथ भारत का लंबा साथ रहा है. सबसे ज्यादा रूस और मध्य एशियाई देश. मध्य एशिया के देशों के लिए भारत की अपनी एक नीति है- कनेक्ट सेंट्रल एशिया पॉलिसी. इस नीति का मकसद है मध्य एशिया के साथ अपने ऐतिहासिक और प्राचीन संबंधों में नई जान फूंकना. अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण सेंट्रल एशिया दुनिया के व्यापारिक रूट के लिए बेहद अहमियत रखता है. इसकी राह सस्ते और आसान तरीके से यूरोप के बाज़ारों तक पहुंचा जा सकता है. इसी कारण चीन की महत्वाकांक्षी ‘वन बेल्ट वन रोड’ योजना में बेहद अहम कड़ी है सेंट्रल एशिया.

और क्या बड़ा खजाना है सेंट्रल एशिया के पास?
इस इलाके में हैं तेल और प्राकृतिक गैस के भंडार. खासतौर पर कज़ाकस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज़बेकिस्तान में. रूस, कज़ाकस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज़बेकिस्तान को मिला दें, तो दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस और तेल का भंडार बनता है. तुर्कमेनिस्तान के पास दुनिया का 5वां सबसे बड़ा और उज़बेकिस्तान के पास 8वां सबसे बड़ा गैस का भंडार है. कज़ाकस्तान और उज़बेकस्तान के पास यूरेनियम भी है.

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अगर इनके साथ भारत का करार हो, तो कम लागत में तेल और गैस की सप्लाई मिल सकती है हमें. जैसे पाइपलाइन बिछाकर रूस और चीन इनसे तेल और गैस खरीदते हैं. इनके अलावा पनबिजली और रिन्यूएबल एनर्जी (जैसे हवा से पैदा होने वाली बिजली) में भी काफी संपन्न है ये देश. दुनिया में प्राकृतिक गैस का सबसे बड़ा निर्यातक है रूस. अपनी लोकेशन की वजह से वो यूरोप के लिए एक बड़ा नैचुरल गैस सप्लायर भी है. इस सप्लाई का एक बड़ा हिस्सा सेंट्रल एशियाई देशों से आता है. सोवियत के टूटने के बाद अमेरिका और उसके यूरोपियन साथियों ने रूस को परे करके पाइपलाइन के रास्ते मध्य एशिया का प्राकृतिक गैस और तेल अपने यहां मंगवाने की सोची.  ये नई लड़ाई थी ताकतों के बीच. मिडिल-ईस्ट की अस्थिरता के बीच सेंट्रल एशिया के ऑइल और गैस फील्ड्स अच्छे विकल्प थे. मगर इसमें वेस्ट पिछड़ गया. रूस ने यहां खूब निवेश किया. अब चीन उसी राह और ज्यादा निवेश कर रहा है.

मध्य एशिया में कुल पांच देश आते हैं-
मध्य एशिया में कुल पांच देश आते हैं- कज़ाकस्तान, किरगिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज़बेकिस्तान. भारत की सीधी सीमा नहीं मिलती इससे. ये भारत की एक्सटेंडेड नेबरहुड का हिस्सा हैं (फोटो: गूगल मैप्स)

सेंट्रल एशिया से हमारे रिश्ते कैसे हैं?
अभी के सेंट्रल एशिया में पांच देश गिने जाते हैं- कज़ाकस्तान, किरगिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज़बेकिस्तान.
ये भारत के विस्तृत पड़ोस का हिस्सा हैं. इसके साथ हमारे पुराने रिश्ते हैं. कुषाण साम्राज्य, जिसके राजा कनिष्क के नाम पर अफगानिस्तान में अब भी एक होटल है और वहां से लोग कनिष्क को अपना पूर्वज मानते हैं, का राज भारत के अलावा मध्य एशिया में भी फैला था. इसी सेंट्रल एशिया के सिल्क रूट की राह कई यात्री भारत आए. न केवल व्यापार, बल्कि धर्म और संस्कृति में भी कनेक्शन का एक बड़ा पॉइंट था दोनों इलाकों के बीच. आज भी हिंदी फिल्में और इसके गाने सेंट्रल एशियाई मुल्कों में खूब पसंद किए जाते हैं.

ये ताशकंद समझौते के समय की तस्वीर है. लाल बहादुर शास्त्री और अयूब खान, दोनों साथ खड़े हैं. इस तस्वीर के लिए जाने के कुछ ही घंटों बाद शास्त्री की मौत हो गई.
ये ताशकंद समझौते के समय की तस्वीर है. लाल बहादुर शास्त्री और अयूब खान, दोनों साथ खड़े हैं. इस तस्वीर के लिए जाने के कुछ ही घंटों बाद शास्त्री की मौत हो गई.

सोवियत के दौर में कैसा संबंध था इनसे?
कज़ाकस्तान, किरगिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज़बेकिस्तान. ये सब सोवियत का हिस्सा हुआ करते थे. सोवियत के साथ भारत के बेहद करीबी संबंध थे. तो उस दौर में, जब दुनिया के एक बड़े प्रभावी हिस्से ने सोवियत से दूरी बनाई हुई थी, उस दौर में भी मध्य एशिया के इन पांचों मुल्कों के साथ भारत के अच्छे ताल्लुकात थे. बल्कि 1965 में भारत-पाकिस्तान के बीच जंग में संघर्षविराम होने के बाद दोनों देश समझौते के लिए उज़बेकिस्तान की ही राजधानी ताशकंद में पहुंचे थे. भारत बेहद गिने-चुने देशों में था, जिसका ताशकंद में अपना एक दूतावास हुआ करता था.

सोवियत खत्म होने के बाद भारत की नीति बदल गई
सोवियत खत्म होने के बाद भारत और इन देशों में थोड़ी दूरी आ गई. सबसे बड़ी वजह तो ये रूस खुद खस्ताहाल था. दूसरा ये कि बाद के सालों में भारत और अमेरिका के बीच स्थितियां बेहतर होने लगी थीं. तो एक लंबे समय तक सेंट्रल एशिया भारत की वरीयता नहीं रहा. पिछले करीब एक दशक में सेंट्रल एशिया अपनी लोकेशन और संसाधनों की बदौलत बड़ा खिलाड़ी बन गया है. न केवल अपने व्यापारिक हितों के लिए, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती ताकत के तौर पर भी भारत को इस इलाके में प्रभाव बढ़ाने की ज़रूरत है. इसलिए भी चीन पहले ही भारत के समूचे पड़ोस में फैल चुका है. उसने मध्य एशियाई देशों में भी काफी निवेश किया है. इसीलिए बीते सालों में भारत लगातार इस इलाके में अपनी स्थितियां बेहतर करने में लगा है.

SCO से क्या फायदा हो सकता है भारत का?
सेंट्रल एशिया से भारत की सीमा नहीं लगती. न ही उन तक पहुंचने के लिए समंदर का सीधा कोई रास्ता है. हमारे लिए सेंट्रल एशिया तक पहुंचने की सबसे छोटा रास्ता पाकिस्तान और अफगानिस्तान से होकर जाता है. पाकिस्तान से हमारे रिश्ते ठीक नहीं हैं. दूसरा, अफगानिस्तान बेहद अस्थिर और असुरक्षित है. व्यापार और कारोबार के लिए बस लिंक और नेटवर्क नहीं चाहिए, सुरक्षा भी चाहिए. इसी की कमी के कारण TAPI (तुर्कमेनिस्तान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, इंडिया) जैसी अहम गैस पाइपलाइन योजना लटकी हुई है. 1,814 किलोमीटर लंबी ये पाइपलाइन तुर्कमेनिस्तान से शुरू होकर अफगानिस्तान और पाकिस्तान होते हुए भारत तक पहुंचेगी. चारों देशों ने 2010 में इसके समझौते पर दस्तखत किए. 2020 में इसके शुरू होने की बात थी, मगर ये कब हो पाएगा पता नहीं. चूंकि SCO में चीन और पाकिस्तान दोनों हैं, तो अगर सच में बातचीत से राह निकले तो भारत को बहुत फायदा हो सकता है.

13 जून को SCO के मंच के अलावा पुतिन और मोदी की मीटिंग हुई. ये उसी बैठक की तस्वीर है (फोटो: रॉयटर्स)
13 जून को SCO के मंच के अलावा पुतिन और मोदी की मीटिंग हुई. ये उसी बैठक की तस्वीर है (फोटो: रॉयटर्स)

बिश्केक में पुतिन-मोदी मीटिंग के मायने?
प्रेज़िडेंट पुतिन ने सितंबर में व्लादीवोस्तोक के अंदर होने वाली इस्टर्न इकॉनमिक फोरम (EEC) में बतौर मुख्य अतिथि आने का निमंत्रण दिया है मोदी को. 4 से 6 सितंबर को होना है ये प्रोग्राम. PM मोदी ने न्योता भी मंजूर कर लिया है. यहां दोनों देशों के बीच रूस के सुदूर पूर्व इलाके में सहयोग बढ़ाने पर बातचीत होने की संभावना है. ये इलाका भारतीय हितों के हिसाब से बहुत अहमियत रखता है. ये इलाका मंगोलिया और जापान से लगता है. मंगोलिया से सटा है चीन. इसके अलावा रूस के पश्चिमी इलाके में सहयोग बढ़ाने पर भी बात होने की उम्मीद है. ये हिस्सा आर्किटन ओसन से लगता है. ये इलाके संसाधनों के लिहाज से काफी संपन्न हैं. इसके अलावा पुतिन ने भारतीय रेलवे को आधुनिक बनाने में भी हिस्सेदारी करने की इच्छा जताई है. इसके अलावा ऊर्जा, रक्षा और व्यापार जैसे मामलों में भी दोनों देशों के बीच बात हुई.

पाकिस्तान का एयरस्पेस इस्तेमाल न करके PM मोदी के बिसकेक पहुंचने के लिए ओमान होते हुए किरगिस्तान जाने का रूट लिया गया. ये गूगल मैप्स पर हमने ये वैकल्पिक रास्ता जोड़कर समझाने के मकसद से यहां दिखाया है.
पाकिस्तान का एयरस्पेस इस्तेमाल न करके PM मोदी के बिश्केक पहुंचने के लिए ओमान के रास्ते ईरान, तुर्कमेनिस्तान, उज़बेकिस्तान होते हुए फिर किरगिस्तान का रूट लिया गया. ये रास्ता आपको समझाने के लिए हमने गूगल मैप्स पर ये रूट जोड़ा है

एयरस्पेस का क्या मसल हुआ भारत-पाकिस्तान में?
26 फरवरी को इंडियन एयरफोर्स ने बालाकोट में जो हवाई हमला किया, उसके बाद पाकिस्तान ने अपना एयरस्पेस बंद कर दिया भारत के लिए. जैसे अपनी ज़मीन पर मालिकाना हक़ होता है देश का, वैसे ही सिर के ऊपर की हवाई जगह पर भी होता है. उसका इस्तेमाल आप दूसरे देश को करने देंगे या नहीं, ये आप तय करते हैं. बाद के दिनों में पाकिस्तान ने कर्मशल एयरलाइन्स के लिए दो रास्ते खोले थे अपने. फिर मई में जब SCO के विदेश मंत्रियों की मीटिंग में हिस्सा लेने सुषमा स्वराज बिश्केक जा रही थीं, तब पाकिस्तान ने उन्हें अपना एयरस्पेस इस्तेमाल करने की इजाजत दी थी. अभी जब मोदी को बिश्केक जाना था, तब भी भारत ने पाकिस्तान से उसका एयरस्पेस इस्तेमाल करने की परमिशन मांगी. PTI के मुताबिक, 11 जून को पाकिस्तान ने परमिशन दे दी. मगर फिर मोदी उस रास्ते गए ही नहीं. वो ओमान, ईरान और फिर मध्य एशिया के रास्ते किरगिस्तान पहुंचे.


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