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क्या हल्दी घाटी की लड़ाई हिन्दू और मुसलमानों के बीच जंग थी?

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पण लिखूं कियां जद देखै है आडावळ ऊंचो हियो लियां,
चितौड़ खड़्यो है मगरां में विकराळ भूत सी लियां छियां,

मैं झुकूं कियां? है आण मनैं कुळ रा केसरिया बानां री,
मैं बुझूं कियां हूं सेस लपट आजादी रै परवानां री,
पण फेर अमर री सुण बुसक्यां राणा रो हिवड़ो भर आयो,
मैं मानूं हूं दिल्ली तनैं, समराट् सनेशो कैवायो.

(मैं अकबर को ख़त कैसे लिखूं? अरावली अपना ऊंचा सीना लेकर सामने खड़ी. लुटे-पिटे चितौड़गढ़ किले की परछाई भूत बनकर सामने आ जाती है. मैं झुकूं कैसे? कुल के केसरिया बाने की मर्यादा मुझ पर टिकी है. मैं आजादी की आखिरी लौ हूं, मैं कैसे बुझ जाऊं. लेकिन फिर अमर सिंह को सिसकता देख राणा का दिल भर आया और उन्होंने दिल्ली को खत लिखकर अकबर की गुलामी स्वीकार कर ली.)

राजस्थानी भाषा के प्रसिद्द कवि कन्हैया लाल सेठिया ने एक लम्बी कविता लिखी ,’पाथळ अर पीथळ’. पाथळ मतलब महाराणा प्रताप और पीथळ माने बीकानेर के शासक पृथ्वीराज राठौड़. यह कविता पाथळ और पीथळ के बीच हुए पत्र व्यवहार पर आधारित है. कहा जाता है कि हल्दी घाटी का युद्ध हारने के बाद महाराणा प्रताप अरावली की पहाड़ियों में भटक रहे थे. खाने-पीने का कोई ठिकाना नहीं. उनके बेटे अमर सिंह भूख से बिलख रहे थे. ऐसे में जंगली अनाज की रोटी तैयार की गई. जैसे ही अमर सिंह रोटी का पहला निवाला लेने वाले थे, एक जंगली बिल्ली उस रोटी को लेकर भाग गई. भूख से बिलखते अपने बेटे को देखर प्रताप का साहस जवाब दे गया और उन्होंने फैसला किया कि वो अकबर को खत लिखकर गुलामी स्वीकार कर लेंगे. कविता का जो हिस्सा ऊपर दर्ज किया गया है वो महाराणा प्रताप के भीतर चल रहे अंतर्विरोध को दिखाता है.

इतिहास दो तरह के होते हैं. पहला इतिहास जो हम किताबों में पढ़ते हैं. जो शीलालेखों, परवानों और सरकारी रोजनामचों की मदद से लिखा जाता है. जिसे स्कूल से लेकर यूनिवर्सिटी तक में हमें पढ़ाया जाता है. दूसरा इतिहास वो होता है जो लोगों की स्मृति में दर्ज होता है. जिसे हम भाटों के मुंह से सुनते हैं. जो बंजारों की गानों में गाया जाता है. कठपुतली का खेल दिखाने वाले जिसे अपनी डोर के जरिए हमारे सामने जिंदा करते हैं. इन दोनों इतिहासों के पाठ में भेद है. इस इतिहास में महाराणा प्रताप किताब के इतिहास से ज्यादा बड़े नायक हैं. उनके बारे में कई किस्म के मिथक सुने जा सकते हैं. मसलन उनका भाला 80 किलो का था. उनका कद सात फीट था. वो 150 किलो वजनी बख्तर पहनते थे. सवाल यह है कि असल में महाराणा प्रताप कौन थे.

कुम्भलगढ़ का कीका

मालवा, गुजरात और दिल्ली के रास्ते में होने की वजह से चित्तौड़गढ़ का किला आक्रमणकारियों को स्वाभाविक रूप से आकर्षित करता था. यह बात महाराणा कुम्भा को 15वीं सदी में ही समझ में आ गई थी. लिहाजा चित्तौड़ के अलावा एक और ऐसा किला बनाया गया जहां मेवाड़ के सिसोदिया शासक खुद को सुरक्षित रख पाते. राजसमंद जिले में अरावली की पहाड़ियों के ऊपर 268 एकड़ में एक किला बनाया गया. नाम रखा गया कुम्भलगढ़. इसी कुम्भलगढ़ किले के कटारगढ़ के बादल महल में विक्रमी संवत 1596 के जेठ महीने उजली तीज के दिन महाराणा प्रताप का जन्म हुआ. अगर ग्रेगेरियन कलेंडर के हिसाब से देखा जाए तो तारीख थी 6 मई और साल था 1540.

 

कुम्भलगढ़ का निर्माण महाराणा कुंभा ने ईसा के करीब 1450 साल बाद करवाया था. यह किला 36 किलोमीटर की लम्बी दीवार से घिरा हुआ है. कई मौकों पर यह मेवाड़ के सिसोदिया शासकों के लिए सुरक्षित शरणस्थली के रूप में काम आया है.
कुम्भलगढ़ का निर्माण महाराणा कुंभा ने ईसा के करीब 1450 साल बाद करवाया था. यह किला 36 किलोमीटर की लम्बी दीवार से घिरा हुआ है. कई मौकों पर यह मेवाड़ के सिसोदिया शासकों के लिए सुरक्षित शरणस्थली के रूप में काम आया है.

प्रताप उदय सिंह के सबसे बड़े बेटे थे. उनकी मां का नाम जैवंता बाई था. जोकि पाली के सोनगरा चौहान अखेराज की बेटी थीं. अखेराज चौहान वही आदमी थे जिन्होंने उदय सिंह को मेवाड़ की गद्दी दिलवाने में मदद की थी. पहले बेटे के जन्म के बाद ही उदय सिंह जैवंता बाई से विमुख हो गए. राजकुमार होने के बावजूद प्रताप का बचपन बेहद साधारण था. उदय सिंह ने जैवंता बाई को महल में रखने की बजाए उनके रहने की व्यवस्था पास के ही गांव में कर दी. प्रताप राजमहल की चारदीवारी की बजाए महल से बाहर भील आदिवासियों के साथ बड़े हुए. दक्षिण राजस्थान के भील आदिवासियों की भाषा में छोटे बच्चे को कीका कहा जाता है. प्रताप इसी नाम से पहचाने जाने लगे. इसलिए अबुल फजल ने प्रताप को कई जगह राणा कीका लिखा है.

भीलों के सहचर्य ने प्रताप को वो चीजें सिखाई जो वो महल में नहीं सीख पाते. मसलन जंगल की कठिन परिस्थिति में जीवन जीना. कमाल की तीरंदाजी. भाला चलाने के शुरुआती गुर भी प्रताप ने भीलों से ही सीखे. यह चीजें प्रताप के आने वाले जीवन में काफी सहायक साबित होने वाली थीं.

जब चट्टान बन गई राज गद्दी

प्रताप राणा उदय सिंह के सबसे बड़े बेटे थे. कायदे से उनके पिता के बाद उन्हें राणा बनना चाहिए था. लेकिन इसमें एक रोड़ा था. उदय सिंह अपनी सबसे छोटी रानी धीरबाई भटियाणी को सबसे ज्यादा पसंद करते थे. लिहाजा अपनी भटियाणी रानी की जिद्द के आगे उन्होंने प्रताप की बजाए धीरबाई के बेटे जगमाल सिंह को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया. इधर दिल्ली में अकबर हर दिन शक्तिशाली हो रहा था. मुगलों और मेवाड़ के सिसोदिया राजाओं के बीच यह अदावत तीन पीढ़ी से जारी थी. राणा सांगा को बाबर के हाथों खानवा में हार का सामना करना पड़ा था. जबकि प्रताप के पिता उदय सिंह को अकबर के हाथों चित्तौड़ हारना पड़ा था. मेवाड़ के सिसोदिया सरदार जानते थे कि अकबर के साथ युद्ध को टाला नहीं जा सकता था. इस युद्ध का नेतृत्व करने के लिहाज से प्रताप जगमाल से ज्यादा मुफीद थे.

28 फरवरी 1572. होली का दिन था और राणा उदय सिंह ने लंबी बीमारी के बाद गोगुंदा के किले में दुनिया को अलविदा कह दिया. उस समय राजवंशों में यह परंपरा थी कि राजा का सबसे बड़ा बेटा अपने पिता के अंतिम संस्कार में भाग नहीं लेता था. ऐसा सुरक्षा कारणों से किया जाता था. प्रताप भी अपने पिता के अंतिम संस्कार में नहीं गए. ज्यादातर सिसोदिया सरदार प्रताप को नया राणा बनाना चाहते थे. उदय सिंह के नौवें पुत्र जगमाल भी अपने पिता के दाह संस्कार में नहीं आए थे. इसने वहां मौजूद सिसोदिया सरदारों की भौंहों पर बल ला दिया. ग्वालियर के राम सिंह और प्रताप के नाना अखेराज सोनगरा ने इस बाबत पता किया तो पता चला कि जगमाल महल में हैं और उनके राज्याभिषेक की तैयारी चल रही है.

गोगुंदा का किला. राणा उदय सिंह का आखिरी समय यहीं बीता. इसी जगह प्रताप को मेवाड़ की राजगद्दी मिली. परम्परा के अनुसार मेवाड़ के राजा एकलिंग महादेव हैं और राणा खुद को एकलिंग का दीवान कहते हैं.
गोगुंदा का किला. राणा उदय सिंह का आखिरी समय यहीं बीता. इसी जगह प्रताप को मेवाड़ की राजगद्दी मिली. परम्परा के अनुसार मेवाड़ के राजा एकलिंग महादेव हैं और राणा खुद को एकलिंग का दीवान कहते हैं.

यह बात जानकर दोनों राजमहल पहुंचे. वहां जगमाल राणा की गद्दी पर बैठे हुए थे. दोनों जगमाल के पास गए और उनसे कहा कि आप गलत जगह बैठे हुए हैं. राजकुमारों के आसन आगे की तरफ लगे हुए हैं. इस पर जगमाल ने प्रतिरोध करने की कोशिश की. दोनों जगमाल के दोनों बाजू पकड़े और उन्हें राजकुमारों के आसन पर बैठा दिया.

इसके बाद प्रताप की खोज शुरू हुई. वो उस समय शहर के बाहर अपने कुछ आदमियों के साथ बैठे हुए थे और शहर छोड़ने की तैयारी में लगे हुए थे. सिसोदिया सरदारों ने उन्हें रोका और राणा बनने के लिए मनाया. काफी समझाने पर प्रताप इस चीज के लिए तैयार हुए. वहीं बावड़ी के पास एक चट्टान पर बैठाकर उनका राज्याभिषेक किया गया.

खाना अपने फूंफा के साथ खाना

मेवाड़ सामरिक तौर पर बेहद महत्वपूर्ण जगह थी. एक तरफ यह गुजरात-दिल्ली के व्यापारिक रास्ते के बीच पड़ता था. दूसरी तरफ दिल्ली से मालवा और दक्षिण भारत जाने का रास्ता यहीं से निकलता है. प्रताप के गद्दी संभालने के बाद अकबर ने उनकी तरफ समझौते का हाथ बढ़ाने की कोशिश कर दी. अकबर ने अलग-अलग समय पर प्रताप के पास चार दूत भेजे. नवंबर 1572 में अकबर ने जलाल खान को प्रताप के पास भेजा. इसके बाद जून 1573 में अकबर ने अपने सेनापति और जयपुर के राजकुमार मान सिंह को दूत बनाकर भेजा. इसके बाद अक्टूबर 1573 में मान सिंह के पिता भगवंत दास प्रताप को संधि के लिए मनाने के लिए आए. सबसे आखिर में अकबर ने राजा टोडरमल को प्रताप के पास भेजा. इन चारों दूतों को असफलता हाथ लगी. इन चारों में से प्रताप और मां सिंह के बीच हुए संधि वार्ता के बारे में सबसे ज्यादा चर्चा होती है.

आमेर के शासक मान सिंह कच्छावा जिन्होंने अकबर की तरफ से राणा प्रताप के खिलाफ युद्ध किया था.
आमेर के शासक मान सिंह कच्छावा जिन्होंने अकबर की तरफ से राणा प्रताप के खिलाफ युद्ध किया था.

जून 1573 में मान सिंह गुजरात के सैनिक अभियान से लौट रहे थे. उस समय अकबर के कहने पर वो प्रताप से मिलने के लिए उदयपुर गए. उन्होंने प्रताप के सामने संधि की बड़ी आकर्षक शर्त रखी. मान सिंह ने प्रताप से कहा कि मेवाड़ के आतंरिक मामलों में अकबर का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा. दूसरा उन्हें मुगलों के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित करने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा. उस समय तक मेवाड़ का ज्यादातर इलाका मुगलों के कब्जे में चला गया था. चित्तौड़ के किले के अलावा बदनोर, मांडलगढ़, जहाजपुर और रायला का इलाका अकबर के कब्जे में था. लेकिन प्रताप ने झुकने से इनकार कर दिया.

कर्नल जेम्स टॉड ने अपनी किताब ‘Annals and Antiquities of Rajasthan’ में महाराणा प्रताप और मान सिंह की मुलाकात के दौरान एक दिलचस्प घटना का जिक्र किया है. इसके अनुसार राणा ने मान सिंह के सम्मान में उदय सागर झील पर एक भोज का आयोजन किया. लेकिन वो खुद उस भोज में नहीं गए. अपनी जगह अपने कुंवर अमर सिंह को भोज में भजे दिया. मान सिंह ने जब अमर सिंह से पिता के ना आने का कारण पूछा तो अमर सिंह ने कहा कि उनके पेट में दर्द है. इस पर मान सिंह ने कहा कि वो पेट दर्द का बहाना खूब समझते हैं. वो और प्रताप एक ही थाली में खाना खाएंगे. प्रताप ने ऐसा करने से मना कर दिया. उन्होंने मान सिंह से कहा कि वो ऐसे राजपूत के साथ खाना नहीं खा सकते हैं जिसने मुगलों के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित कर लिए हैं. जब मान सिंह भोज छोड़कर जाने लगे तो प्रताप ने मान सिंह पर कटाक्ष करते हुए कहा कि उन्हें अपने फूंफा माने कि अकबर को भी साथ लेकर आना था. मान सिंह के पिता भगवंत दास ने अपनी बहन की शादी अकबर के साथ की थी.

हालांकि इस घटना का जिक्र उस समय के किसी भी साहित्य में नहीं मिलता. ना तो अबुल फजल ने इस घटना का कोई जिक्र किया है और ना ही अब्दुल क़ादिर बदायूंनी ने. राजपूत स्त्रोतों में अमर काव्य वंशावली और राज रत्नाकर में इस मान सिंह और प्रताप के बीच की मुलाकात में किसी किस्म की अशिष्टता का जिक्र नहीं मिलता. इस कहानी का पहला जिक्र मुंहणोत नैणसी की ख्यात में मिलता है. जिसके बाद यह चारण-भाट साहित्य का हिस्सा बन गया.

फसलों को आग लगा दो

महाराणा प्रताप ने जब मेवाड़ की गद्दी संभाली तब तक मेवाड़ का ज्यादातर हिस्सा उनके हाथों से खिसक गया था. चित्तोड़गढ़, मांडलगढ़, बदनोर, रायला और जहाजपुर राणा के हाथों से जा चुका था. उनके पास कुम्भलगढ़, नए-नए बसे उदयपुर और गोगुंदा के इलाका का अधिकार बचा था. ऐसे में प्रताप ने गद्दी संभालने के साथ ही युद्ध की तैयारी शुरू कर दी. सबसे पहले उन्होंने चित्तौड़ के आस-पास के सभी खेतों में खड़ी फसलों में आग लगवा दी. उन्होंने ऐलान करवाया कि अगर कोई कास्तकार फसल उगाते हुए मिला तो उसे प्राणदंड दिया जाएगा. चित्तौड़ और गोगुंदा के बीच के सभी कुवों में कचरा डलवा दिया. ताकि मुगल सैनिकों को पानी ना मिल सके. मैदानों की सारी आबादी को अरावली के पहाड़ों पर ले गए. महाराणा अब जंग के लिए तैयार थे.

हल्दी घाटी की जंग

महाराणा प्रताप के सत्ता संभालने के चार साल बाद आखिरकार दोनों सेनाएं आमने-सामने थीं. अकबर दिल्ली से चलकर अजमेर आया. उसने प्रताप के खिलाफ युद्ध लड़ने के लिए मान सिंह के नेतृत्व में एक बड़ी सेना गोगुंदा की तरफ रवाना की. इस सेना ने राजसमंद के मोलेला में अपना डेरा डाला. दूसरी तरफ महाराणा प्रताप के नेतृत्व में मेवाड़ की सेना लोशिंग में डेरा डाले हुए थी. बीच में एक घाटी पड़ती थी जिसे आज हल्दी घाटी के नाम से जाना जाता है.

संख्या बल के हिसाब से महाराणा की स्थिति कमजोर थी. मेवाड़ के स्त्रोतों के मुताबिक महाराणा के पास 20,000 सैनिक थे, जबकि शाही सेना की तादाद 80,000 की थी. जबकि अबुल फज़ल और बदायूंनी के मुताबिक मुग़ल सैनिक 20000 की तादाद में थे और मेवाड़ की सेना की तादाद 4 से 4500 के बीच में थी. मुग़ल सेना की योजना थी कि वो गोगुंदा के किले पर कब्जा करे जहां प्रताप का बेस था.
प्रताप अपनी युद्ध परिषद में मुगलों के खिलाफ रणनीति बना रहे थे. युद्ध की शुरुआती योजना के अनुसार संख्याबल की कमी से निपटने के लिए यह तय किया गया कि मेवाड़ के सैनिक हल्दी घाटी के दर्रे में युद्ध लड़ेंगे ताकि संख्या बल के असंतुलन से निपटा जा सके. यह राम सिंह तंवर की सुझाई हुई युक्ति थी. इस पर कई राजपूत सरदारों ने यह कहकर एतराज जताया कि यह राजपूतों के लड़ाई लड़ने का तरीका नहीं है और उन्हें आमने-सामने की लड़ाई लड़नी चाहिए. हल्दी घाटी का दर्रा इतना संकरा था कि एक साथ दो गाड़ी उसमें से नहीं निकल सकती थीं. लिहाजा मान सिंह ने अपनी सेना वहां से नहीं गुजारी. राणा मान सिंह का इन्तजार करने की बजाए उनकी तरफ पहल कदमी कर दी.

हल्दी घाटी का संकरा दर्रा जहां राणा ने शाही से मुकाबला करने की योजना बनाई थी.
हल्दी घाटी का संकरा दर्रा जहां राणा ने शाही से मुकाबला करने की योजना बनाई थी.

महाराणा प्रताप की तरफ से उनके हरावल दस्ते का नेतृत्व कर रहे थे अफगान मूल के हाकिम खां सूर वहीं शाही सेना के हरावल दस्ते की कमान थी सैयद हाशिम के पास. मेवाड़ की सेना की बायीं बाजू कमान झाला बीदा के पास थी. दायीं बाजू की कमान ग्वालियर के राम सिंह तंवर के पास थी. बीच में राणा खुद थे और अपने घोड़े चेतक पर बैठकर युद्ध का संचालन कर रहे थे.
जिस समय मेवाड़ की सेना का खमनौर में शाही सेना से आमना-सामना हुआ मेवाड़ की सेना पहाड़ी पर थी. युद्ध शास्त्र का स्थापित नियम कहता है कि अगर आप दुश्मन से उंचाई पर हो तो मार करने की आपकी ताकत दस गुना बढ़ जाती है. शुरुआती दौर में यह एडवांटेज मेवाड़ की सेना के पास था. मेवाड़ की सेना का हमला इतना जबरदस्त था कि शाही सेना के पैर उखड़ गए. शाही सेना के सैनिकों में भगदड़ मच गई. प्रताप ने इस मौके का फायदा उठाने की सोची. उन्होंने अपनी सेना को पहाड़ से उतरने का आदेश दे दिया ताकि भागती शाही सेना को खदेड़ा जा सके. उनके सहयोगी ग्वालियर के राम सिंह तंवर ने उन्हें समझाया कि वो मैदानी इलाके में शाही सेना का मुकाबला नहीं कर पाएंगे. राम सिंह का अंदेशा सही साबित होने वाला था.

बादशाह सलामत खुद आ रहे हैं

पहाड़ी से भागती सेना बनास नदी के किनारे आकर रुक गई. अब रणा और शाही सेनाएं समतल मैदान पर थीं. शाही सेना के हरावल दस्ते के पैर उखड़ चुके थे. राम सिंह के नेतृत्व में मेवाड़ की सेना की बायीं टुकड़ी ने शाही सेना की दायीं टुकड़ी को पीछे धकेल दिया था. राम सिंह ने चतुराई दिखाते हुए अपनी टुकड़ी को बायीं दिशा में बढ़ा दिया जहां झाला बीदा शाही सेना की दायीं टुकड़ी को पीछे धकेलने में लगे हुए थे.

मुग़ल सेना को भागते देख एक मुग़ल सूबेदार मिहत्तर खान ने हल्ला करना शुरू किया कि बादशाह सलामत खुद रसद और सैनिकों के साथ युद्ध में आ रहे हैं. अबू फज़ल लिखते हैं कि इस अफवाह ने जादू जैसा काम किया. मुग़ल सैनिको में लड़ने का हौसला लौट आया. इस बीच मान सिंह ने देखा कि राजपूत शाही सेना पर भारी पड़ रहे हैं. ऐसी स्थिति में उसने अपने भाई माधो सिंह के नेतृव में एक हजार घुड़सवारों की टुकड़ी को शाही सेना के केंद्रीय भाग की ओर रवाना किया, जहां प्रताप युद्ध लड़ रहे थे. मुगल सेना फिर से लड़ाई में लौट आई.

बदायूंनी खुद इस युद्ध में मौजूद थे और बाद में उन्होंने इस युद्ध का आंखो देखा ब्यौरा लिखा था. उन्होंने अपनी किताब ‘मनतख़ब-उत-तवारीख़’ में लिखते हैं कि युद्ध इतना भीषण हो गया कि दूर से देखने पर लगता कि दोनों सेनाएं एक-दूसरे में नत्थी हो गई हैं. समझ में ही नहीं आ रहा था कि कौन किसको मार रहा था. ऐसे में बदायूंनी ने मुगल जर्नल आसिफ खान से पूछा कि वो इस बात का अंदाजा कैसे लगाएं कि किस राजपूत पर वार करना है. क्योंकि मान सिंह के नेतृत्व में कछवाहा राजपूत मुग़ल सेना की तरफ से लड़ रहे थे. आसिफ ने उन्हें जवाब दिया कि तीर चलाओ किसी भी तरफ का राजपूत मरे, फायदा इस्लाम का ही होगा.

हाकिम खान सूर पठान थे और अकबर के खिलाफ थे. उन पर राणा के हरावल दस्ते की जिम्मेदारी थी, जिसमें उनके अलावा उनके 500 पठान साथी भी लड़ रहे थे.
हाकिम खान सूर पठान थे और अकबर के खिलाफ थे. उन पर राणा के हरावल दस्ते की जिम्मेदारी थी, जिसमें उनके अलावा उनके 500 पठान साथी भी लड़ रहे थे.

राम प्रसाद पर मुगलों का कब्जा

अबू फ़ज़ल और बदायूंनी दोनों ने इस बात का जिक्र किया है कि इस युद्ध में हाथियों का उपयोग किया गया था. मान सिंह खुद मर्दाना नाम के हाथी पर सवार होकर इस युद्ध का संचालन कर रहे थे. माधव सिंह के आ जाने से महाराणा प्रताप मुग़ल घेरेबंदी को भेद नहीं पा रहे थे. ऐसे में उन्होंने इस घेरेबंदी को तोड़ने के लिए युद्ध के लिए प्रशिक्षित हाथी लूणा को लाने का आदेश दिया. मुगल सेना की तरफ से लूणा को रोकने के लिए गजमुख नाम के हाथी को भेजा गया. लुणा के सर में बंदूक की गोली लगने की वजह से वो घालय हो गया. उसकी जगह पर प्रताप की सेना के मुख्य हाथी राम प्रसाद को लाया गया. गजराज जिसे लूणा घायल करने में कामयाब रहा था को पीछे बुला लिया गया. उसकी जगह पर राम प्रसाद से लड़ने के लिए गजराज नाम के हाथी को भेजा गया. गजराज ने राम प्रसाद पर जबरदस्त हमला किया. इस बीच राम प्रसाद का महावत तीर लगने की वजह से मारा गया. एक मुग़ल महावत ने बड़ी बहादुरी से छलांग लगाकर राम प्रसाद पर कब्जा कर लिया और उसे हांककर मुगल खेमे में ले गया. यहां से युद्ध का रुख बदलने लगा.

मान सिंह का हौदा टूटा

चेटक चढ़ ग्यो छाती पर
अर मान सिंह घबराए
भालो फेंक्यो महाराणा जद
ओहदो टूट्यो जाय
रण में घमासान मचवाय
बैरी रण सूं भाग्या जाय
राणा सुनता ही जाजो जी….

प्रताप को युद्ध का रुख समझ आने में देर नहीं लगी. अब इस युद्ध को जीतने का एक ही तरीका बचा हुआ था. अगर राणा किसी तरह से मान सिंह को मारने में कामयाब हो जाते हैं तो शायद वो यह हारी हुई बाजी जीत सकते हैं. प्रताप ने अपने साथ कुछ भरोसेमंद घुड़सवारों को लिया और मान सिंह की तरफ बढ़ने लगे. इस बीच वो तीन बार मुगल सैनिको से घिर गए और जैसे-तैसे वो ये घेरे तोड़ने में कामयाब रहे.

राणा का घोड़ा चेतक जैसे ही मान सिंह के हाथी के पास पहुंचा उसने अपने अगले पैर हाथी के माथे पर रख दिए. उस स्थिति में प्रताप ने अपने भाले से मान सिंह पर वार किया, कहते हैं कि राणा का भाला मान सिंह के महावत को पार करते हुए मान के हौदे के किनारे के पिलर से टकराया, इससे मान सिंह का हौदा एक किनारे से टूट गया लेकिन वो कुछ ही इंचों के फासले से बच गए. युद्ध के परिणाम को बदलने की राणा की आखिरी कोशिश भी नाकाम हो गई.

दो पीढ़ी की वफादारी

मेवाड़ की सेना की बायीं बाजू की काम संभाल रहे थे झाला बीदा. झाला बीदा और प्रताप का पीढ़ियों का साथ था. खानवा के युद्ध में जब प्रताप के दादा राणा सांगा अकबर के दादा बाबर के खिलाफ युद्ध लड़ रहे थे, उस समय युद्ध के दौरान एक तीर सांगा को आकर लगा. तीर लगने की वजह से सांगा बेहोश हो गए. उन्हें युद्ध के मैदान से बाहर ले जाया जाने लगा. इससे राजपूतों का मनोबल टूटने लगा. उस समय झाला बीदा के पिता झाला अज्जा ने राणा सांगा के राजसी चिन्ह उनसे ले लिए और उन्हें खुद पहनकर सांगा के हाथी पर चढ़ गए. इससे राजपूत सैनिकों का भरोसा लौट आया और मैदान छोड़ने की बजाए वो अंत तक वहीं डटे रहे.

झाला मान को झाला बीदा के नाम से भी बुलाया जाता था. वो महाराणा प्रताप के वफादार साथियों में से थे और कद-काठी में उनके जैसे ही दिखाई देते थे.
झाला मान को झाला बीदा के नाम से भी बुलाया जाता था. वो महाराणा प्रताप के वफादार साथियों में से थे और कद-काठी में उनके जैसे ही दिखाई देते थे.

झाला बीदा ने भी ऐसा ही कुछ किया. मान सिंह पर हमला करते वक्त वो फिर से मुग़ल सैनिकों से घिर गए, झाला बीदा उनकी जान बचाने के लिए बीच में कूद गए. राणा के मुकुट पर राजसी छतरी लगी हुई थी जिससे दुश्मन उन्हें आसानी से पहचान लेते थे. झाला बीदा ने महाराणा से उनकी राजसी छतरी ले ली और उसे अपने सिर पर पहन लिया. इससे मुग़ल सैनिक महाराणा की बजाए उन्हें निशाना बनाने लगे. प्रताप को जैसे-तैसे समझाकर जंग के मैदान से निकाला गया. बीदा प्रताप की जाने बचाते-बचाते हल्दी घाटी में वीरगति को प्राप्त हुए. बीदा और उनके पिता अज्जा के बलिदान को याद रखते हुए मेवाड़ राज राजवंश में परम्परा पड़ी कि हल्दी घाटी युद्ध के दिन मेवाड़ के राजसी चिन्ह बीदा के वंशज धारण करते हैं.

हल्दी घाटी के युद्ध में कौन जीता?

पहली नजर में यह मुकाबला मुगल सेना के पक्ष में जान पड़ता है. प्रताप को मैदान छोड़कर जाना पड़ा. उनकी आधी सेना इस जंग में मारी गई. सबसे बड़ी बात वो चित्तौड़ को स्वतंत्र नहीं करवा पाए. मेवाड़ का बचा हुआ इलाका भी उनके हाथ से फिसल गया. लेकिन यह कहानी का अंत नहीं था. महाराणा प्रताप यहां से अरावली की पहाड़ियों में चले गए. हल्दी घाटी में उनको हार का सामना करना पड़ा, लेकिन युद्ध यहीं खत्म नहीं हुआ.

हल्दी घाटी में जीत के बाद मुगल सेना ने गोगुंदा के किले पर कब्जा कर लिया. अब तक यह किला महाराणा प्रताप का बेस हुआ करता था. लेकिन उन्हें इस पर कब्जा बनाए रखने में काफी मशक्कत करनी पड़ी. महाराणा प्रताप ने इस किले की सप्लाई लाइन काट दी जिसकी वजह से यहां मौजूद मुग़ल सैनिक राशन की कमी से भूखे मरने लगे. यहां तक कि अपना पेट भरने के लिए उन्हें अपने घोड़े मारने पड़े. युद्ध से लौट रही मुग़ल सेना की टुकड़ियों को असुरक्षित पाते ही भील उन पर तीर और गोफण से हमला कर देते. ‘महाराणा प्रताप : दी इनविंसेबल वॉरियर’ लेखिका रीमा हूजा बीबीसी को दिए इंटरव्यू में कहती हैं, “ऐसा लगता था कि महाराणा सौ जगह एक साथ थे, क्योंकि वो गुप्त रास्तों से निकल कर जंगलों में घुस जाते थे.”

यह मुग़ल सेना के खिलाफ छापामार युद्ध की शुरुआत थी. भीलों की सहायता से महाराणा ने मुगल सैनिकों के मन में खौफ पैदा कर दिया था. इतिहासकार गोपीनाथ शर्मा लिखते हैं कि राणा के छापामार युद्ध की वजह से मुग़ल सैनिक मेवाड़ में कैद होकर रह गए थे. जैसे ही अकबर का  ध्यान राजपूताना से हटा राणा ने अपने खोये हुए इलाकों पर फिर से कब्जा करना शुरू कर दिया. देखते ही देखते उन्होंने कुम्भलगढ़, गोगुंदा और उदयपुर पर अपना अधिकार कर लिया.

इधर हल्दी घाटी की जंग से जीतकर लौटी शाही सेना से अकबर ने भारी नाराजगी जाहिर की क्योंकि वो राणा को पकड़ने में नाकामयाब रहे, अबुल फज़ल लिखते हैं कि अकबर ने अपने सेनापति मान सिंह और आसिफ खान और काजी खान की ड्योढ़ी बंद कर दी. ड्योढ़ी बंद करने का मतलब हुआ कि इन अधिकारीयों को दरबार में जाने की इजाजत नहीं थी. अकबर ने प्रताप को पकड़ने के लिए इसके बाद कुल छह सैनिक अभियान मेवाड़ भेजे लेकिन किसी को कामयाबी नहीं मिली. बचपन में भीलों की संगत प्रताप के काम आई और एक बेहतरीन छापामार योद्धा के तौर पर उभरे.

दीवेर की लड़ाई

हल्दी घाटी का युद्ध हराने के छह साल के भीतर ही प्रताप ने भामाशाह की मदद से 40,000 घुड़सवारों की नई सेना खड़ी कर ली. मुगलों ने मेवाड़ पर नियंत्रण रखने के लिए 36 थाने या चेकपोस्ट बनाए थे. 1582 में महाराणा प्रताप और उनके बेटे कुंवर अमर सिंह के नेतृव में मेवाड़ की सेना ने दीवेर के मुगल थाने पर हमला बोल दिया. इस हमले में मुगलों को बुरी तरह पराजित होना पड़ा. कहा जाता है कि इस युद्ध में अमर सिंह ने मुगल कमांडर सुल्तान खान पर इतना करारा वार किया कि उसके घोड़े के दो टुकड़े हो गए. दीवेर में हार के बाद मुगलों को मेवाड़ में अपने ठिकाने बंद करने पड़े.

दीवेर की लड़ाई लोक कथाओं में कुछ इस तरह से दर्ज है. कहा जाता है कि राणा प्रताप के बेटे अमर सिंह ने मुगल कमांडर पर इतना जोर से वार किया था कि वो अपने घोड़े सहित दो टुकड़े में कट गया.
दीवेर की लड़ाई लोक कथाओं में कुछ इस तरह से दर्ज है. कहा जाता है कि राणा प्रताप के बेटे अमर सिंह ने मुगल कमांडर पर इतना जोर से वार किया था कि वो अपने घोड़े सहित दो टुकड़े में कट गया.

महाराणा प्रताप को कैसे देखें

महाराणा प्रताप आज राजस्थान के हर घर में नायक की तरह पूजे जाते हैं. लेकिन आपको यह बात समझनी ही होगी कि मेवाड़ और शाही सेना के बीच हुआ युद्ध कोई धर्मयुद्ध नहीं था. हाकिम खान सूर इसका सबसे बड़ा उदहारण हैं. वो राणा के सबसे भरोसेमंद साथी थे. भारत में इस्लाम अकबर से बहुत पहले आ चुका था. खानवा की जंग में जब अकबर के दादा बाबर और प्रताप के दादा सांगा आमने-सामने थे, उस समय मेवात के नवाब हुआ करते थे हसन खान मेवाती. बाबर ने हसन खान के पास संदेश भिजवाया कि तुम मुसलमान होकर सांगा के पक्ष में क्यों लड़ रहे हो? इस पर मेवाती ने जवाब दिया कि मैं इस मिट्टी का हूं और तुम बाहर से आए हो. मैं अपने लोगों के साथ खड़ा हूं.

इसी तरह राणा सांगा की मौत के बाद जब विक्रमादित्य मेवाड़ के शासक बने तो गुजरात के शासक बहादुर शाह ने मेवाड़ पर दूसरी दफा हमला कर दिया. उस समय विक्रमादित्य की मां और महाराणा प्रताप की दादी कर्णावती ने सहायता के लिए अकबर के पिता हुमायूं के पास राखी भेजी थी. हुमायूं अपनी इस मुंहबोली बहन की सहायता के लिए आया भी. तब तक देर हो चुकी थी और कर्णावती के नेतृत्व में चितौड़ के किले में दूसरी बार जौहर हुआ. ये हुमायूं ही थे जिन्होंने चित्तौड़ का राज सिहांसन बहादुर शाह से छीनकर फिर से विक्रमादित्य को लौटाया.

खमनौर या हल्दी घटी के युद्ध चित्रकार चोखा की बनाई तस्वीर.
खमनौर या हल्दी घटी के युद्ध चित्रकार चोखा की बनाई तस्वीर.

तो महाराणा प्रताप का सारा संघर्ष अपनी रियासत बचाने के लिए था? नहीं यह कहना भी ठीक नहीं है. उन्होंने चित्तोड़ को मुगलों से आजाद करवाने की कसम खाई थी. कहा था कि जब तक वो चित्तौड़ को आजाद नहीं करवा लेते तब तक वो सोने-चांदी की थाली में खाना नहीं खाएंगे. महल की छत के नीचे नहीं सोयेंगे और नर्म बिस्तर का इस्तेमाल नहीं करेंगे. उन्होंने पूरे जीवन अपनी दाढ़ी भी नहीं कटवाई. ऐसे में प्रताप की जो ऐंठी मूंछो वाली तस्वीर आप देखते हैं वो ऐतिहासिक रूप से गलत है. यह संघर्ष सिर्फ अपनी रियासत बचाने का नहीं था. प्रोफ़ेसर सतीश चंद्रा के शब्दों में कहा जाए तो प्रताप का पूरा संघर्ष अपनी मिट्टी की जादी बचाए रखने का था. उन्होंने मुगलों की साम्राज्यवादी नीति के खिलाफ झुकने से इनकार कर दिया. शायद यही वजह है कि वो राजस्थान में आज भी सबसे लोकप्रिय ऐतिहासिक नायक हैं.

यह प्रताप की प्रतिज्ञाओं का असर है कि कई पीढ़ियों तक मेवाड़ के राणा अपनी थाली में पत्ते बिछाकर खाना खाते थे. उनके बिस्तरों के नीचे घास के तिनके रखे जाते थे. प्रताप के वंशजों ने उनकी प्रतिज्ञाओं का सांकेतिक पालन ही किया. लेकिन राजस्थान का गाड़िया-लुहार घुमंतू समुदाय आज भी उनकी प्रतिज्ञाओं के साथ जीता-मरता है. अगली बार अगर आपको सड़क के किनारे लोहे के औजार बेचते परिवार मिलें तो उनसे थोड़ा सम्मान से पेश आइएगा. ये राणा प्रताप के सैनिक हैं जिन्होंने सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद छत के नीचे रहना स्वीकार नहीं किया है. प्रताप असल में इन्ही लोगों के नायक हैं जिन्होंने उन्हें कीका नाम दिया. आखिर में कन्हैया लाल सेठिया की कविता के एक हिज्जे से बात खत्म करते हैं जिससे यह लेख शुरू हुआ था.

‘मेवाड़ धधकतो अंगारो आंध्यां में चमचम चमकै लो,
कड़खै री उठती तानां पर पग पग पर खांडो खड़कैलो,
राखो थे मूंछ्याँ ऐंठ्योड़ी
लोही री नदी बहा द्यूंला,
हूँ अथक लडूंला अकबर स्यूँ
उजड्यो मेवाड़ बसा द्यूंला,’

(जब बीकानेर के पृथ्वीराज राठौड़ ने अकबर के हाथ में राणा प्रताप के आत्मसमर्पण का खत देखा तो उन्होंने खत की सच्चाई जानने के बहाने प्रताप को एक खत लिखा. इस खत में पृथ्वीराज राठौड़ ने प्रताप को झकझोरते हुए कहा कि वो अकबर के समाने आत्मसमर्पण कैसे कर सकते हैं. पीथळ या पृथ्वीराज का यह खत पढ़कर राणा का स्वाभिमान जाग गया और उन्होंने पृथ्वीराज के खत के जवाब में कहा-

‘मेवाड़ धधकता अंगारा, अंधी में चम-चम चमकेगा. युद्ध काल में बजने वाले वाद्य यंत्र कड़खै की उठती हुई तान पर पग-पग खांडा (दुधारी तलवार) टकराने की आवाज आएगी. आपको मुगल दरबार में अपनी मूंछ नीचे करने की कोई जरूरत नहीं है. मैं खून की नदी बहा दूंगा.मैं अकबर से अथक लडूंगा और उजड़ा हुआ मेवाड़ फिर से बसा दूंगा.)


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