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गुजरात का वो मुख्यमंत्री जिसने आपातकाल में इंदिरा गांधी का डटकर मुकाबला किया

अहमदाबाद के एलडी कॉलेज से शुरू हुआ छात्रों का आंदोलन पूरे गुजरात में फ़ैल गया. यह पूरे भारत में भ्रष्ट्राचार के खिलाफ पहला आंदोलन था, जिसने किसी मुख्यमंत्री की कुर्सी लील ली. नौ फरवरी 1974 के रोज चिमनभाई पटेल को मजबूरी में अपना इस्तीफ़ा सौंपना पड़ा. सूबे में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया लेकिन चिमनभाई पटेल के इस्तीफे के बाद आंदोलन ने और तेजी पकड़ ली.

15 फरवरी 1974 के दिन आंदोलन में नया मोड़ आया. कांग्रेस (ओ) के 16 विधायकों ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया. इस आग को हवा देते हुए जनसंघ के तीन और विधायकों ने अपनी सदस्यता छोड़ दी. छात्र हर सत्ता पक्ष के विधायकों के आवास और दफ्तर घेरकर बैठने लगे. मार्च के अंत तक कुल 167 विधायकों में से 95 अपनी सदस्यता छोड़ चुके थे.

गुजरात नव निर्माण आंदोलन के दौरान प्रदर्शन करते छात्र
गुजरात नव निर्माण आंदोलन के दौरान प्रदर्शन करते छात्र

12 मार्च के दिन मोरारजी देसाई गुजरात में विधानसभा भंग करने की मांग को लेकर दिल्ली में अनशन पर बैठ गए. चार दिन की भूख हड़ताल के बाद 16 मार्च को गुजरात विधानसभा भंग कर दी गई. सूबे में राष्ट्रपति शासन लागू था. इंदिरा गांधी नव निर्माण आंदोलन के शांत होने की बाट देखती रहीं. उनका अंदाजा गलत साबित हुआ. हर बीतते दिन गुजरात में कांग्रेस के खिलाफ आक्रोश और बढ़ता जा रहा था. साल भर बाद मोरारजी देसाई एक बार फिर से दिल्ली में अनशन करते पाए गए. वो छह अप्रैल 1975 को गुजरात में राष्ट्रपति शासन खत्म करने और नए विधानसभा चुनाव करवाने की मांग को लेकर आमरण अनशन पर बैठ गए. अंत में गुजरात में नए विधानसभा चुनाव के लिए 10 जून 1975 की तारीख मुकर्रर हुई.

एक अदालती फैसला

12 जून 1975, इलाहाबाद हाईकोर्ट में देश का राजनीतिक नक्शा बदल देने वाले मुकदमे की सुनवाई हो रही थी. कोर्ट नंबर 24 खचाखच भरा हुआ था. ठीक 10 बजे जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा कोर्ट रूम में पहुंच गए. उन्होंने आते ही यह साफ़ कर दिया कि इस मुकदमे में आरोप सही पाए गए हैं. मुक़दमा 1971 के लोकसभा चुनाव के सिलसिले में था.

साल 1971 का लोकसभा चुनाव. कांग्रेस और इंदिरा गांधी ने अपनी खोई साख फिर से हासिल की लेकिन एक लोचा फंस गया. रायबरेली में इंदिरा के खिलाफ खड़े थे फायरब्रांड समाजवादी नेता राज नारायण. राज नारायण 1,11,810 वोटों से चुनाव हार गए. फिर भी वो हार मानने को तैयार नहीं थे. उन्होंने चुनाव में फर्जीवाड़े और सरकारी मशीनरी का गलत इस्तेमाल करने का आरोप लगाते हुए इंदिरा गांधी पर मुकदमा दायर कर दिया. यह सुनवाई इसी मुकदमे के सिलसिले में हो रही थी.

12 जून को आया इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला इंदिरा की सियासी मौत का फतवा साबित होने जा रहा था.
12 जून को आया इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला इंदिरा की सियासी मौत का फतवा साबित होने जा रहा था.

18 फरवरी 1975, यह पहली बार हो रहा था कि देश की प्रधानमंत्री किसी मुकदमे में आरोपी की तरह पेश हो रही थीं. 12 जून को फैसला आया. इंदिरा गांधी का चुनाव अवैध करार दे दिया गया. इंदिरा पर अगले छह साल तक कोई भी चुनाव लड़ने से रोक लगा दी गई. इस फैसले का मतलब था इंदिरा की राजनीतिक मौत.

शाम ढलते-ढलते अखबार के दफ्तरों में एक और धमाकेदार खबर आई. नव निर्माण आंदोलन के कारण चर्चा में रहे गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजे आ चुके थे. यहां कांग्रेस को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा था. कांग्रेस 140 से गिरकर 75 पर सिमट गई. चुनाव से पहले कांग्रेस (ओ), जनसंघ, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, लोकदल और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया ने मिलकर जनता मोर्चा नाम से एक गठबंधन तैयार किया था. इस गठबंधन को 88 सीट मिली थीं. चिमन भाई पटेल की मजदूर किसान लोकपक्ष को 182 में 12 सीटों पर सफलता मिली थी. चिमनभाई ने जनता मोर्चा को अपना समर्थन देने की घोषणा की. मोर्चे की तरफ से नए मुख्यमंत्री चुने गए, बाबूभाई जशभाई पटेल.

बाबूभाई पटेल और चिमनभाई
बाबूभाई पटेल और चिमनभाई

बाबूभाई जशभाई पटेल एक साधारण किसान परिवार से आने वाले नेता थे. जनता में उनकी छवि सादगी पसंद नेता की थी. वो गुजरात की राजनीति में गांधीवाद की पाठशाला से निकले राजनेताओं की आखिरी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते थे. नौ फरवरी 1937 को अहमदबाद के पास ही नाडीयाड में जन्म हुआ था. उन्होंने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा भी यहीं ली थी. यहां से आगे की पढ़ाई के लिए बॉम्बे के विल्सन कॉलेज चले गए. बाद में बॉम्बे यूनिवर्सिटी से वकालत पढ़ी. 1940 से 1947 तक चार बार जेल गए. 1949 में बॉम्बे प्रेसिडेंसी की विधानसभा के सदस्य बने. 1956 में महागुजरात आंदोलन के दौरान विधानसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा. 1965 में हितेंद्रभाई देसाई की सरकार के मंत्री बने. कांग्रेस टूटने के बाद कांग्रेस (ओ) धड़े का हिस्सा बने.

भद्रा के किले से लाल किले को चुनौती

अहमदाबाद में रिलीफ रोड से बाएं लेकर जब आप जीजाबाई रोड पर बढ़ते हैं तो स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के सामने एक 15वीं सदी की इमारत खड़ी है. 1411 में अहमदशाह ने साबरमती के किनारे अपने नाम पर एक नया शहर बसाया, अहमदाबाद. शहर के बीचो-बीच सुलतान के लिए एक किला बनाया गया, ‘भाद्रा का किला’.

अहमदाबाद में भाद्रा का किला
अहमदाबाद में भाद्रा का किला

15 अगस्त 1975. इंदिरा गांधी स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से झंडा फहरा रही थीं. वहां से करीब 947 किलोमीटर दूर गुजरात के मुख्यमंत्री बाबूभाई पटेल भी स्वतंत्रता दिवस के दिन इस रस्म को दोहरा रहे थे. झंडा फहराने के बाद सूबे की जनता के नाम अपने संबोधन में बाबूभाई ने बोलना शुरू किया-

“हमारे देश में दो गांधी हैं. पहले महात्मा गांधी जिन्होंने हमें आजादी दिलाई. दूसरी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जिन्होंने आजादी को मसलकर रख दिया.”

पड़ोस के मुल्क में एक जनकवि हुए हैं, हबीब ज़लीब. पाकिस्तान में सैनिक तानाशाही के खिलाफ लड़ने वाले शायर. सैनिक तानाशाही के समय लोगों के डर के बारे में उन्होंने जो लिखा, वो हमारे यहां आपातकाल पर एकदम फिट बैठता है-

“जिनको था जबां पर नाज़
चुप हैं वो जबां-दराज
चैन है समाज में
बेमिसाल फर्क है कल में और आज में
अपने खर्च पर हैं कैद लोग तेरे राज में.”

ऐसे दौर में जब विपक्ष से लेकर मीडिया तक इंदिरा गांधी के खिलाफ एक शब्द बोलने के लिए तैयार नहीं था, बाबूभाई सार्वजनिक मंच से मोर्चा खोलकर बैठ गए. आपातकाल के समय वो मुख्यमंत्री थे. उस समय भूमिगत रहने वाले हर राजनीतिक कार्यकर्ता के लिए गुजरात से ज्यादा सुरक्षित कोई जगह नहीं थी. बाबूभाई के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी के दबाव के सामने झुकने से इनकार कर दिया. इसका नतीजा उन्हें भुगतना पड़ा. वो दो बार मुख्यमंत्री बने. दोनों बार उन्हें कुर्सी से बेदखल करने के पीछे इंदिरा गांधी थीं.

चिमनभाई पटेल ने फिर पाला बदला

182 सदस्यों वाली गुजरात विधानसभा में बहुमत का जादुई आंकड़ा 92 पर ठहरता है. जनता मोर्चे के पास 88 विधायक थे. चिमनभाई पटेल की छवि के चलते उन्हें बाबूभाई ने अपने मंत्रिमंडल से दूर रखा हुआ था. इधर इंदिरा गांधी बाबूभाई पटेल की सरकार एक दिन के लिए भी बर्दाश्त करने को तैयार नहीं थी. इंदिरा और चिमनभाई पटेल के संबंध बहुत अच्छे नहीं कहे जा सकते थे. फिर भी सियासत में कोई भी स्थाई दोस्त या दुश्मन नहीं होता. इंदिरा ने चिमनभाई से संपर्क स्थापित किया.

चिमनभाई पटेल ने मौक़ा आने पर बाबूभाई पटेल की पीठ में छूरा भोंक दिया
चिमनभाई पटेल ने मौक़ा आने पर बाबूभाई पटेल की पीठ में छूरा भोंक दिया

यह मार्च का दूसरा सप्ताह था. गुजरात विधानसभा में बजट सत्र चल रहा था. चिमनभाई ने सबको हैरानी में डालते हुए बाबूभाई पटेल की सरकार से समर्थन वापस ले लिया. उनके लिए परेशानी तब और बढ़ गई जब पांच निर्दलीय विधायकों के अलावा उनकी पार्टी के ही कई विधायकों ने अपनी वफादारी बदल ली. बजट सत्र के दौरान ही बाबूभाई पटेल के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया. बाबूभाई 92 के जादुई आंकड़े को नहीं छू पाए और जनता मोर्चे की सरकार गिर गई. इस तरह बाबूभाई की बतौर मुख्यमंत्री पहली पारी महज़ 207 दिन में खत्म हो गई.

डूबते जहाज से भागते चूहे

1977 का लोकसभा चुनाव भारतीय राजनीति के सबसे दिलचस्प चुनावों में से एक है. अचानक से आपातकाल को खत्म करने की घोषणा के साथ इंदिरा गांधी ने नए सिरे से चुनाव करवाने की घोषणा कर दी. नतीजों में उत्तर भारत से कांग्रेस का सफाया हो गया. हालांकि गुजरात में कांग्रेस का प्रदर्शन बहुत खराब नहीं कहा जा सकता. यहां की कुल 26 लोकसभा सीटों में से 10 सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवार चुनकर आए. गुजरात के आदिवासी बाहुल्य वाले इलाकों ने कांग्रेस के प्रति अपनी वफादारी बरकरार रखी. केंद्र में स्थितियां उलट गईं. 345 सीटों के साथ जनता मोर्चा की सरकार बनी और मोरारजी देसाई नए प्रधानमंत्री चुने गए.

तब के पीएम मोरार जी देसाई
तब के पीएम मोरार जी देसाई

केंद्र में जनता पार्टी की सरकार आते ही गुजरात में वफादारी बदलने का दौर शुरू हो गया. जनता मोर्चा के बागी विधायकों ने फिर से अपनी वफादारी बदलनी शुरू की. 1975 के चुनाव में कांग्रेस को असल में 75 सीट हासिल हुई थीं. जनता मोर्चा में बगावत के चलते दिसम्बर 1976 में यह संख्या 104 तक पहुंच गई थी और माधव सिंह सोलंकी गुजरात के नए मुख्यमंत्री बने थे. केंद्र में जनता पार्टी की सरकार आने के कुछ सप्ताह बाद ही कांग्रेस के विधायकों की संख्या 75 पर पहुंच गई. चिमनभाई पटेल फिर से बाबूभाई पटेल के पक्ष में खड़े थे. बाबूभाई पटेल एक बार फिर से गुजरात के मुख्यमंत्री बने.

इंदिरा का बदला

1977 में बनी देश की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार 1979 के अंत आते-आते भरभरा कर गिर गई. 1980 की जनवरी में हुए चुनाव में इंदिरा गांधी ने फिर से सत्ता में वापसी की. कांग्रेस को इस चुनाव में 543 में से 353 सीट मिली. सत्ताधारी जनता पार्टी कई टुकड़ों में टूटकर महज़ 31 के आंकड़े पर सिमट गई.

इंदिरा गांधी अपने सियासी विरोधियों के प्रति रहमदिल नहीं थीं
इंदिरा गांधी अपने सियासी विरोधियों के प्रति रहमदिल नहीं थीं

गुजरात में बाबूभाई इस समय गुजरात के मुख्यमंत्री थे. उनका कार्यकाल जून 1980 में खत्म होने जा रहा था. इंदिरा गांधी ने जून आने का इंतजार नहीं किया. फरवरी 1980 में सत्ता में आने के महज़ एक महीने के भीतर इंदिरा गांधी ने गुजरात विधानसभा को भंग करने की सिफारिश राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी के पास भेजी. 17 फरवरी के दिन राष्ट्रपति ने कैबिनेट की अनुशंसा को मानते हुए गुजरात विधानसभा को भंग कर दिया और सूबे में एक बार फिर से राष्ट्रपति शासन लग गया. इस तरह बाबूभाई पटेल दूसरी और आखिरी बार मुख्यमंत्री की कुर्सी से बेदखल किए गए.

फीकी वापसी

1980 में गुजरात में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद बाबूभाई पटेल धीरे-धीरे हाशिए की तरफ धकेले जाने लगे. जनता पार्टी बिखर चुकी थी. 1984 के साल में उन्होंने लोक स्वराज मंच नाम से नया संगठन खड़ा किया. उस समय वो राजनीति को हमेशा के लिए अलविदा कह चुके थे. 1989 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को एक बार फिर से हार का सामना करना पड़ा. 1977 के असफल प्रयोग के दस साल बाद केंद्र में फिर से कांग्रेस विरोधी गठबंधन की सरकार बनने जा रही थी.

1990 में गुजरात में विधानसभा के चुनाव थे. केंद्र की तर्ज पर राज्य में भी जनता पार्टी और बीजेपी ने कई सीटों पर साझा उम्मीदवार खड़े किए. हालांकि उस समय यह आधिकारिक गठबंधन नहीं था. इसे उस समय ‘कुछ सीटों पर बनी समझदारी’ का नाम दिया गया. चुनाव से पहले बीजेपी के बुलावे पर बाबूभाई पटेल एक बार फिर से राजनीति में आए. हालांकि उन्होंने बीजेपी की सदस्यता लेने से परहेज किया. वो निर्दलीय चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे.

जनता दल और बीजेपी के गठबंधन वाली इस सरकार में केशुभाई उप-मुख्यमंत्री थे
जनता दल और बीजेपी के गठबंधन वाली इस सरकार में केशुभाई उप-मुख्यमंत्री थे.

चुनाव में जनता दल को 70 सीट मिली और बीजेपी को 67. साफ़ था कि सूबे में गठबंधन सरकार बनने जा रही है. इस बीच बीजेपी ने मुख्यमंत्री पद के लिए बाबूभाई पटेल का समर्थन किया. सूबे में जनता दल का नेतृत्व चिमनभाई पटेल के पास था. वो इसके लिए कतई तैयार नहीं हुए. आखिरी समझौते में चिमनभाई ने बीजेपी के केशुभाई पटेल को उप मुख्यमंत्री बनाने की बात कबूल की. बाबूभाई पटेल एक बार फिर से हाशिए पर धकेल दिए गए. एक साफ़ छवि वाले नेता की इस तरह की विदाई को सम्मानजनक तो नहीं ही कहा जा सकता.

मुख्यमंत्री की अगली कड़ी में पढ़िए गुजरात में जाति की राजनीति का सूत्रधार करने वाले माधव सिंह सोलंकी की कहानी. आखिर उन्हें क्षत्रिय, हरिजन, मुस्लिम और आदिवासी (खाम) जैसा जिताऊ समीकरण बनाने का आइडिया कहां से मिला?



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