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जिस समय बाबरी मस्जिद गिराई जा रही थी, तब क्या नरसिम्हा राव पूजा पर बैठे थे?

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6 दिसंबर 1992. दोपहर 1 बजकर 40 मिनट पर बाबरी मस्जिद का पहला गुंबद गिराया जा चुका था. इसके 20 मिनट बाद का समय. दोपहर तकरीबन दो बजे तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव का फोन घनघनाता है. फोन पर दूसरी तरफ थे केंद्रीय मंत्री और कद्दावर कांग्रेस नेता माखनलाल फोतेदार.

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क्लिक करके पढ़िए दी लल्लनटॉप पर अयोध्या भूमि विवाद की टॉप टू बॉटम कवरेज.

फोतेदार ने नरसिम्हा राव से कहा-

राव साहब, कुछ तो कीजिए. क्या हम फैजाबाद में तैनात वायुसेना के चेतक हेलिकॉप्टर से कारसेवकों पर आंसू गैस के गोले नहीं दगवा सकते हैं?

जवाब में नरसिम्हा राव ने सवाल किया, ‘क्या मैं ऐसा कर सकता हूं?’

फोतेदार ने विनती के स्वर में राव से कहा-

राव साहब, कम-से-कम एक गुंबद तो बचा लीजिए. ताकि बाद में हम उसे एक शीशे के केबिन में रख सकें और भारत के लोगों को बता सकें कि बाबरी मस्जिद को बचाने की हमने अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश की.

माखनलाल फोतेदार अपनी आत्मकथा ‘द चिनार लीव्स’ में लिखते हैं कि उनके इस सुझाव के जवाब में प्रधानमंत्री चुप रहे. लंबे ठहराव के बाद उन्होंने बुझी हुई आवाज में कहा-

फोतेदार जी, मैं थोड़ी देर में आपको फोन करता हूं.

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उसके बाद नरसिम्हा राव आंखें नहीं मिला सके…
फोतेदार प्रधानमंत्री के रुख से काफी खफ़ा थे. उन्होंने राष्ट्रपति से मुलाकात का समय मांगा. उन्हें शाम को साढ़े पांच का वक्त दिया गया. राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा से मिलने के लिए फोतेदार अपने घर से निकल ही रहे थे कि उनके पास नरसिम्हा राव का फोन आया. राव ने फोतेदार को बताया कि शाम को 6 बजे कैबिनेट की मीटिंग रखी गई है. इसके बावजूद फोतेदार ने राष्ट्रपति से मिलने का फैसला किया. फोतेदार अपनी आत्मकथा ‘द चिनार लीव्स’ में लिखते हैं-

जब मैं वहां पहुंचा, तो उन्होंने (राष्ट्रपति) मुझे देखकर बच्चों की तरह रोना शुरू कर दिया. बोले, ‘PV ने ये किया क्या है?’ मैंने राष्ट्रपति से कहा कि वो देश को टेलिविज़न और रेडियो पर संबोधित करें. वो इसके लिए राज़ी भी हो गए. मगर फिर उनके सूचना अधिकारी ने बताया कि ऐसा करने के लिए उन्हें प्रधानमंत्री से अनुमति लेनी होगी और मुझे बहुत शक है कि वो इसकी अनुमति देंगे.

राष्ट्रपति से मिलने की वजह से फोतेदार कैबिनेट की बैठक में 20 मिनट की देरी से पहुंचे. जब फोतेदार वहां पहुंचे, तो मीटिंग में सन्नाटा छाया हुआ था. फोतेदार ने इस सन्नाटे पर सवाल किया, तो माधवराव सिंधिया ने जवाब दिया-

फोतेदार साहब, क्या आपको पता नहीं कि बाबरी मस्जिद गिरा दी गई है?

फोतेदार ने नरसिम्हा राव की तरफ देखते हुए पूछा-

राव साहब, क्या ये सही बात है? 

नरसिम्हा राव इसके बाद फोतेदार से आंख मिलाने से बचते रहे. ठीक इसी समय फोतेदार कैबिनेट की बैठक में फूट-फूटकर रोने लगे.

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बाबरी मस्जिद को लेकर राव के दिमाग में क्या राजनीति थी?
बाबरी मस्जिद का ढांचे गिरने के साथ राव पर आरोपों की झड़ी लग गई. कैबिनेट के उनके साथी और मीडिया, दोनों राव पर हमलावर थे. ‘इंदिरा गांधी सेंटर फॉर आर्ट्स’ के निदेशक और कभी जनसत्ता के पत्रकार रहे राम बहादुर राय बाबरी मस्जिद को गिराए जाने के कुछ दिन बाद राव के साथ हुई एक मुलाकात का जिक्र करते हैं. राय बताते हैं कि बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद तीन बड़े पत्रकार नरसिम्हा राव से मिलने के लिए पहुंचे. ये पत्रकार थे- प्रभाष जोशी, निखिल चक्रवर्ती और RK मिश्र. राम बहादुर राय को भी इस मुलाकात में जाने का मौक़ा मिला. जब इन पत्रकारों ने राव से पूछा कि उन्होंने मस्जिद क्यों गिराई जाने दी, तो इसपर राव का जवाब था-

आपको क्या लगता है कि मुझे राजनीति नहीं आती?

BBC को दिए एक इंटरव्यू में राम बहादुर राय ने इस बात का ज़िक्र करते हुए कहा था-

इस बात का मैं ये मतलब निकालता हूं कि नरसिम्हा राव ने अपनी राजनीति और इस रणनीति से बाबरी मस्जिद ढहाई जाने दी कि ऐसा होने पर BJP की मंदिर की राजनीति हमेशा के लिए ख़त्म हो जाएगी. उन्होंने इसे रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया. मेरा मानना है कि राव ने किसी ग़लतफ़हमी में नहीं, और न ही BJP से सांठगांठ के कारण. बल्कि ये सोचकर कि BJP से ये मुद्दा छीना जा सकता है, ये सब किया. उन्होंने एक-एक कदम इस तरह से उठाया कि बाबरी मस्जिद का ध्वंस हो जाए. 

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‘मस्जिद गिराई जा रही थी, राव पूजा पर बैठे थे’
राव की भूमिका पर सबसे गंभीर आरोप लगाए वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैय्यर ने. कुलदीप नैय्यर ने अपनी आत्मकथा ‘बियॉन्ड द लाइंस‘ में लिखा है-

मुझे जानकारी है कि बाबरी मस्जिद विध्वंस में राव की भूमिका थी. जब कारसेवक मस्जिद को गिरा रहे थे, तब वो अपने निवास पर पूजा में बैठे हुए थे. वो वहां से तभी उठे, जब मस्जिद का आख़िरी पत्थर हटा दिया गया.

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राव के पूजा करने वाली बात कहां से निकली?
कुलदीप नैय्यर का यह दावा लंबे समय तक राजनीतिक चक्कलस का हिस्सा रहा. नरसिम्हा राव बाबरी मस्जिद के मुज़रिम के तौर पर पेश किए जाने लगे. मगर नरसिम्हा राव की बहुचर्चित जीवनी ‘हाफ लायन’ लिखने वाले विनय सीतापति नैय्यर के दावे को सिरे से ख़ारिज करते हैं. अपनी किताब में वो लिखते हैं कि नैय्यर के दावे का आधार मशहूर समाजवादी नेता मधु लिमये का बयान था. मधु लिमये ने प्रधानमंत्री कार्यालय में मौजूद अपने एक सूत्र से मिली जानकारी का हवाला देते हुए कुलदीप नैय्यर को ऐसा बताया था. कि 6 दिसंबर, 1992 को राव पूरे दिन पूजा पर बैठे हुए थे.

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राव को लेकर भी साज़िश हो रही थी?
सीतापति अपनी किताब में इस दावे को राव के खिलाफ रची जा रही साज़िश का हिस्सा करार देते हैं. वो लिखते हैं कि नवंबर 1992 में दो विध्वंसों की योजना बनाई गई थी. एक, बाबरी मस्जिद की. दूसरी, नरसिम्हा राव की. एक तरफ संघ परिवार बाबरी मस्जिद गिराना चाह रहा था. दूसरी तरफ, कांग्रेस में राव के प्रतिद्वंद्वी नरसिम्हा राव को. राव को पता था कि बाबरी मस्जिद गिरे या न गिरे, उनके विरोधी उन्हें ज़रूर प्रधानमंत्री आवास से बाहर देखना चाहते थे. विनय सीतापति दावा करते हैं कि उस दिन नरसिम्हा राव गृह सचिव माधव गोडबोले और नरेश चंद्रा के संपर्क में थे और एक-एक मिनट की सूचना ले रहे थे.

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राव के डॉक्टर ने क्यों कहा कि शरीर झूठ नहीं बोलता?
विनय सीतापति के अलावा कुलदीप नैय्यर के दावे को एक और शख्स ने ख़ारिज किया. नरसिम्हा राव के निजी डॉक्टर थे श्रीनाथ रेड्डी. रेड्डी उस दिन सुबह ही नरसिम्हा राव का रूटीन चेकअप करके लौटे थे. दोपहर में घर लौटकर उन्होंने अपना टेलिविजन खोला, तो देखा कि हज़ारों कारसेवक बाबरी मस्जिद के गुंबद पर चढ़े हुए हैं. डॉक्टर रेड्डी के कान खड़े हो गए. नरसिम्हा राव दिल के मरीज़ थे. 1990 में उनके दिल का ऑपरेशन हुआ था. 6 दिसंबर इतवार का दिन था और नरसिम्हा राव अपने घर पर ही थे. डॉक्टर रेड्डी भागते हुए 7 RCR पहुंचे. तब तक बाबरी का तीसरा और आख़िरी गुंबद गिराया जा चुका था. BBC को दिए इंटरव्यू में डॉक्टर श्रीनाथ रेड्डी बताते हैं-

राव ने मुझे देखकर गुस्से में पूछा, ‘आप फिर क्यों चले आए?’ मैंने कहा, मुझे आपकी फिर जांच करनी है. ये कहकर मैं उनको बगल के छोटे कमरे में ले आया. जैसा कि मुझे अंदेशा था, उनके दिल की धड़कनें तेज़ हो गई थीं. उनकी नाड़ी भी तेज़ चल रही थी. उनका ब्लड प्रेशर भी बढ़ा हुआ था. उनका चेहरा लाल हो गया था और वो काफ़ी उत्तेजित दिखाई दे रहे थे. मैंने उनको ‘बीटा ब्लॉकर’ की अतिरिक्त डोज़ दी और वहां से तभी हटा जब वो थोड़े बेहतर दिखाई देने लगे. उनके शरीर की जांच से ये नहीं लगा कि उनकी इस ट्रेजेडी में कोई साठगांठ थी. द बॉडी डज़ नॉट लाई.

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नरसिम्हा राव की बाबरी मस्जिद तोड़े जाने में कोई सीधी भूमिका नहीं थी, लेकिन वो स्थितियों को भांपने में पूरी तरह से नाकामयाब रहे थे. एक प्रधानमंत्री के तौर पर यह उनकी बड़ी नाकामयाबी थी.


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