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आप नौकरी कर रहे हैं या करने जा रहे हैं, तो इस खबर को जरूर पढ़ें

#. गुड़गांव की स्टार्टअप कंपनी ग्रे-ओरेंज ने बॉक्स की शक्ल वाले ऐसे रोबोट बनाए हैं, जो 30 मिनट चार्ज होकर 24 घंटे काम कर सकते हैं. इनसे गोदामों में काम लिया जाता है, जहां ये 500 किलो तक का सामान उठाकर एक से दूसरी जगह रख सकते हैं. फ्लिपकार्ट, DTDC, महिंद्रा, डिलीवरी और आरमैक्स जैसी कंपनियों के गोदामों में इस्तेमाल होने वाले इन रोबोट्स की वजह से यहां इंसानों की जरूरत 60 से 80% कम हो गई है. इन्हें ‘बटलर’ नाम दिया गया है.

#. गुजरात के विठालपुर में हॉन्डा के नए स्कूटर प्लांट में पांच नए रोबोट लगाए गए हैं, जो धातु पहचान सकते हैं और स्कूटर के फ्यूल टैंक का फ्रेम बना सकते हैं. ये रोबोट 16 घंटे में 4500 फ्यूल टैंक बना सकते हैं. इतने काम के लिए कम से कम 72 लोगों की जरूरत होगी, लेकिन हॉन्डा के प्लांट में सिर्फ 14 लोग काम करते हैं. वह भी दो शिफ्ट में. भारत में हॉन्डा का ये चौथा प्लांट दुनिया के सबसे ऑटोमेटेड प्लांट में से एक है.

भारत में हॉन्डा के एक प्लांट की तस्वीर
भारत में हॉन्डा के एक प्लांट की तस्वीर

#. इन्फोसिस ने पिछले साल 9 हजार कर्मचारियों को ‘रिलीज’ या रीओरिएंट कर दिया. सॉफ्टवेयर डिवेलपमेंट कंपनी कॉग्निजेंट (Cognizant) ने 6 हजार कर्मचारियों की छंटनी कर दी. इनमें से कुछ कर्मचारियों को उनकी खराब परफॉर्मेंस की वजह से निकाला गया, लेकिन इसमें ऑटोमेशन का भी बड़ा हाथ रहा. छोटे स्तर के कर्मचारियों की छंटनी बड़े स्तर के कर्मचारियों के लिए भी अच्छा संकेत नहीं है. अगला नंबर उन्हीं का होगा.

#. WNS जैसी कई बीपीओ कंपनियां एयरलाइंस का रेवेन्यू ऑडिट करने का काम करती हैं. अगर कोई दो एयरलाइन्स आपस में पार्टनर हैं, तो इन बीपीओ का काम बढ़ जाता है. इन्हें एक-एक पैसे का हिसाब रखना होता है, ताकि सभी कंपनियों को उनके हिस्से का पूरा मुनाफा मिले. इसके लिए सैकड़ों लोगों को बैठकर बुक किए गए एक-एक टिकट की जांच करनी पड़ती है, लेकिन चार साल पहले WNS ने ‘डेटा डंप’ नाम का टूल बनाकर इंसानों की जरूरत बहुत कम कर दी. ऑडिट के जिस काम में पहले तीन महीने का वक्त लगता था, ‘डेटा डंप’ से अब वो एक घंटे में हो जाता है.

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#. IT सर्विस इंडस्ट्री के फ्रेशर्स ने पिछले सात सालों से सैलरी में कोई बढ़त नहीं देखी है. ये लगातार सालाना 3.25 लाख से 3.45 लाख रुपए के बीच बनी हुई है. सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती सेमी-स्किल्ड लोगों को नौकरी मुहैया कराना होगा. भारत पहले से बेरोजगारी की मार झेल रहा है, वहीं ऑटोमेशन से हालात और खराब ही होंगे.

#. अगर आप कोडिंग जानते हैं, तो आप अपनी नौकरी सुरक्षित मान सकते हैं. भारत में पिछले 20 सालों से यही हो रहा है. हालत ऐसी थी कि आंध्र प्रदेश से जरूरत से ज्यादा इंजीनियर निकलने लगे. लेकिन आज ड्रोन के जरिए खेतों में पेस्टिसाइड डाले जा रहे हैं, ड्रोन के जरिए खराब पौधे पहचाने जा रहे हैं. हाईटेक एंट्री सिस्टम ने चौकीदारों का काम खत्म कर दिया. मशीनों से पित्ज़ा और बर्गर बनाए जाने लगे हैं, क्योंकि कार बनाने की तरह इसमें भी बार-बार एक ही काम करना होता है. ड्राइवर-लेस कारों पर काम हो रहा है, जो ड्राइवरों की नौकरी खत्म कर देंगी.

बर्गर बनाता रोबोट
बर्गर बनाता रोबोट

’21 साल पहले पैदा हुए 2.5 करोड़ बच्चों में से 10 लाख बच्चों की पांच साल की उम्र तक मौत हो सकती है. इस हिसाब से आज देश में 21 साल की उम्र के 2.4 करोड़ लोग हैं. इनमें से 30% भी खेती की तरफ चले जाएं या पढ़ाई छोड़ दें, तो बचे हुए लोगों को नौकरी चाहिए. यानी हमें हर साल 1.6 करोड़ नौकरियां चाहिए, जबकि देश में सालाना सिर्फ 55 लाख नौकरियां पैदा होती हैं. पिछले 10 सालों से हर साल 1 करोड़ लोग बेरोजगार हो रहे हैं और अगले 10 सालों में ये आंकड़ा 20 करोड़ के पार हो जाएगा. 2027 तक हालात बेकाबू हो जाएंगे.’

ये कहना है मणिपाल ग्लोबल एजुकेशन सर्विसेस के चेयरमैन मोहनदास पाई का, जिनकी कंपनी 52 देशों में सर्विस देती है. पाई के आंकड़े बताते हैं कि बेरोजगारी भारत के लिए कितना बड़ा खतरा बन चुकी है. लेकिन इससे भी खतरनाक बात ये है कि आज, 2017 में, वो लोग जो कहीं नौकरी कर रहे हैं, उन पर भी नौकरी गंवाने का खतरा मंडराने लगा है. ऑटोमेशन की वजह से.

मोहनदास पाई
मोहनदास पाई

दुनियाभर के अलग-अलग सेक्टर्स में नौकरी कर रहे लोग ऑटोमेशन से डरे हुए हैं. ऑटोमेशन यानी कोई भी ऐसा काम, जिसे अब तक सिर्फ इंसान करते थे, उसे इंसानों के बजाय मशीन की मदद से किया जाए. ये मशीन एक रोबोट, सॉफ्टवेयर, सैटेलाइट या इंटरनेट, कुछ भी हो सकती है. भारत में कंप्यूटर-युग की शुरुआत में मुलायम सिंह यादव ने ये कहते हुए इसका विरोध किया कि जब इंसान की जगह कंप्यूटर ले लेगा, तो इंसान क्या करेगा. यानी मुलायम के मुताबिक कंप्यूटर का आना बेरोजगारी बढ़ाने वाला था. आने वाले सालों में कंप्यूटर इंडस्ट्री और कंप्यूटर की बदौलत लाखों रोजगार पैदा हुए.

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कहते हैं इतिहास खुद को दोहराता है. आज टेक्नॉल्जी फिर उस रास्ते पर है, जहां आने वाले बदलाव से इंसानों के रोजगार पर फर्क पड़ने वाला है. एक बार फिर ये फर्क इंसानों के लिए नुकसानदेह माना जा रहा है. उदाहरण के तौर पर-

# सतीश दिल्ली में फ्लिपकार्ट के गोदाम में सामान पैक करने और उसे एक से दूसरी जगह रखने का काम करते हैं. सतीश जैसे हजारों लोग ऐमजॉन और स्नैपडील जैसी कंपनियों में यही काम कर रहे हैं. लेकिन ये कंपनियां इस काम के लिए रोबोट्स खरीदने लगी हैं. डिलीवरी भी ड्रोन से होने लगी है, जिससे सतीश जैसे लोगों की जरूरत खत्म हो रही है.

# मोहित बेंगलुरु की एक IT कंपनी में एक्सेल शीट में डेटा एंट्री करते हैं. डेटा एंट्री और डेटा के सही रख-रखाव का काम दुनिया की हर IT और ITES कंपनी में होता है. अब तक ये काम इंसान करते आए हैं, लेकिन आज ऐसे सॉफ्टवेयर डेवलप हो गए हैं कि एक कंप्यूटर के सामने मोहित का बैठा रहना गैर-जरूरी हो गया है.

# गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में कार, बाइक और ऐसी ही दूसरी चीजों के प्लांट लगे हैं. ऐसे ही एक प्लांट में काम करने वाले रोहित बताते हैं कि पुर्जे बनाने और उन्हें जोड़ने का काम अब रोबोट की मदद से होने लगा है, जो इंसानों जितने परफेक्शन के साथ काम करते हैं. इससे रोहित जैसों की नौकरी पर बन आई है.

# किसी मॉल में काउंटर पर पैसे लेने, वहां झाड़ू-पोछा करने या किसी पेट्रोल पंप पर पैसे लेने के लिए इंसानों की जरूरत होती है, लेकिन दुनिया के कई देशों में इन कामों के लिए भी रोबोट बना लिए गए हैं और लोग नौकरियों से हाथ धो रहे हैं. अगला पड़ाव भारत है.

कार में पेट्रोल भरता रोबोट
कार में पेट्रोल भरता रोबोट

# बैंकिंग, पत्रकारिता, पढ़ाई, और लिखने जैसे बौद्धिक कामों में आप इंसानों के अलावा किसी और की कल्पना नहीं करते, लेकिन 21वीं सदी की सच्चाई ये है कि आज सॉफ्टवेयर खबर लिख रहे हैं और कंप्यूटर एक टीचर की तरह बच्चों को पढ़ा रहे हैं. यानी पत्रकार और टीचर्स की नौकरियां भी सुरक्षित नहीं हैं.

# पहले युद्ध के लिए हजारों की फौज की जरूरत होती थी, लेकिन आज दुनिया के किसी भी कोने में बैठकर एक शख्स बटन दबाकर कहीं भी मिसाइल या बम ब्लास्ट कर सकता है. उसे सिर्फ कुछ मशीनों की जरूरत पड़ेगी, इंसानों की नहीं.

ऊपर जितने भी कामों के उदाहरण दिए गए हैं, उनसे दुनिया के अरबों लोगों को रोजगार मिलता है, लेकिन जब यही काम मशीनें और रोबोट करने लगेंगे, तो कंपनियों को सिर्फ मुट्ठीभर लोगों की जरूरत पड़ेगी, जो मशीनें ऑपरेट कर सकें. इंसान काम करके थकता है, काम के दौरान खाने के लिए ब्रेक लेता है, उसे हर महीने सैलरी और छुट्टी देनी पड़ती है. रोबोट या दूसरी मशीनें अपने मालिक से ऐसी कोई मांग नहीं करतीं.

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बातें छोड़िए, आंकड़ों पर आइए

1. अगले एक दशक में अमेरिका की 47% नौकरियां हाई-रिस्क पर हैं.
किसने कहा: ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी के डॉ. कार्ल बेनेडिक्ट फ्रे और प्रोफेसर माइकल ए. ऑस्बॉर्न ने
कब कहा: 2013 में
असर किस पर होगा: अमेरिकी लेबर मार्केट पर.

2. जिन नौकरियों में कम स्किल वाले लोगों की जरूरत होती है, उन्हें ऑटोमेटेड किया जा सकता है.
किसने कहा: अमेरिकी अर्थशास्त्री और मेसाचुसेट्स यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर डेविड ऑटर ने
कब कहा: 2015 में
असर किस पर होगा: अमेरिकी लेबर मार्केट पर.

3. दुनिया के 21 OECD (इकॉनमिक को-ऑपरेशन ऐंड डिवेलपमेंट) देशों में 9% नौकरियां ऑटोमेटेड हो सकती हैं.
किसने कहा: खुद OECD ने (35 देशों का समूह, जिसे 1960 में आर्थिक प्रगति और वर्ल्ड ट्रेड के लिए बनाया गया था)
कब कहा: 2016 में
असर किस पर होगा: 21 OECD देशों पर.

4. OECD की 57% नौकरियां संदेह के घेरे में हैं. भारत में ये खतरा 69% और चीन में 77% बढ़ चुका है.
किसने कहा: सिटीबैंक ने डॉ. फ्रे और प्रोफेसर ऑस्बॉर्न के साथ
कब कहा: 2016 में
असर किस पर होगा: दुनिया के 50 से ज्यादा देशों पर.

5. 2015 से 2020 के बीच 51 लाख नौकरियां ऑटोमेशन का शिकार हो जाएंगी
किसने कहा: वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम ने
कब कहा: 2016 में
असर किस पर होगा: 15 विकसित और उभरते देशों पर.

6. दुनियाभर की जितनी नौकरियों में जितना काम हो रहा है, उसका आधा ऑटोमेटेड किया जा सकता है
किसने कहा: मैक्किन्सी ग्लोबल इंस्टीट्यूट ने, जिसे 2016 में प्राइवेट सेक्टर का सबसे बड़ा थिंक-टैंक माना गया
कब कहा: 2017 में
असर किस पर होगा: दुनिया के 46 देशों पर

जब ये बातें तो विदेशी कह रहे हैं, तो भारतीय क्यों डरें

भारत में अभी हालात इसलिए काबू में है, क्योंकि यहां कम पैसों पर ज्यादा काम करने वालों की तादाद बहुत है. साथ ही, तकनीक अभी विकसित देशों जितनी हावी नहीं हुई है. अमेरिका, चीन और रूस जैसे देशों में ऑटोमेशन का असर दिखने लगा है और जल्द ही भारत में दिखने की आशंका है. भारत में बिजनेस करने वाली दिग्गज कंपनियों की राय भी इस बारे में अलग नहीं है. वो भी यही चिंता जता रहे हैं. पढ़िए-

ऑटोमेशन के बढ़ने से हर तरह की नौकरी प्रभावित होगी. अगले तीन-चार सालों में इसका फर्क भी दिखने लगेगा. सबसे बड़ा असर IT, ITES कंपनियों, सिक्यॉरिटी सर्विस और खेती के सेक्टर में पड़ेगा: पंकज बंसल (को-फाउंडर, पीपलस्ट्रॉन्ग)

पंकज बंसल
पंकज बंसल

यह कहना गलत है कि ऑटोमेशन की वजह से IT सेक्टर की सभी नौकरियां खत्म हो जाएंगी. इस सेक्टर में ग्रोथ हो रही है, लेकिन इसकी रफ्तार लगातार बदल रही है. पहले इंडस्ट्री 9% की दर से बढ़ती थी, तो नौकरियां भी इसी दर से बढ़ती थीं, लेकिन अब ये 3-5% ही रह जाएगी: मोहनदास पाई (चेयरमैन, मणिपाल सर्विसेस)

पुणे में GE की मल्टी-मॉडल फैक्ट्री में अभी 50 करोड़ डॉलर का प्रॉडक्शन होता है. हमारा लक्ष्य इसे अगले दो सालों में दोगुना करने का है, लेकिन 100 करोड़ डॉलर की प्रॉडक्टिविटी तक पहुंचने के लिए हमें लोगों की तादाद सिर्फ 25-30% बढ़ानी होगी. बाकी काम मशीनें कर देंगी: अमित कुमार (GE साउथ एशिया की ग्लोबल सप्लाई चेन के डायरेक्टर)

हमारी कंपनी रोबोटिक्स प्रॉसेस ऑटोमेशन (RPA) में पैसा लगा रही है, जो इंसानों के रिपीटेटिव काम कर सकता है: केशव आर. मुरुगेश (ग्रुप CEO, बिजनेस प्रॉसेस मैनेजमेंट फर्म WNS ग्लोबल सर्विसेस)

केशव आर. मुरुगेश
केशव आर. मुरुगेश

जिन लोगों ने टीमों को मैनेज करके अपना करियर बनाया है, उन पर असर पड़ेगा, क्योंकि अब संभालने के लिए ज्यादा टीमें बची नहीं हैं. 10 से 12 साल का अनुभव रखने वाले लोगों को कमर कस लेने की जरूरत है: पद्मजा अलगनंदन (PwC इंडिया की पीपल ऐंड ऑर्गनाइजेशन लीडर)

किन नौकरियों पर कितना खतरा

ज्यादा रिस्क वाली नौकरियां: प्रिडिक्टेबल फिजिकल वर्क और ऐसी नौकरियां, जिसमें कोई काम बार-बार एक ही तरीके से किया जाता है (रिपीटेटिव). डेटा प्रॉसेसिंग. डेटा कलेक्शन.

कम रिस्क वाली नौकरियां: अनप्रिडिक्टेबल फिजिकल वर्क और नॉन-रिपीटेटिव नौकरियां. स्टेकहोल्डर इंट्रेक्शंस.

सबसे कम रिस्क वाली: दूसरों को मैनेज करने वाली नौकरी (मैनेजमेंट). किसी चीज में विशेषज्ञता (एक्सपर्टीस) वाली नौकरियां.

वास्तव में चिंताजनक: वेल्डिंग, सामान उठाना-रखना, पैकेजिंग, मटीरियल सप्लाई, कारों की पुताई, कस्टमर सर्विस, IT इन्फ्रास्ट्रक्चर मेंटिनेंस, ऐप्लिकेशन डिवेलपमेंट.

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चलते-चलते

भारतीय मार्केट में प्रतिस्पर्धा ज्यादा होने की वजह से सर्विस की कीमत बहुत ज्यादा नहीं है. BRICS के दूसरे देशों के मुकाबले भारत में उत्पादन पर प्रति घंटे आने वाली लागत 1.9 डॉलर है, जो ब्राजील में 11.9, रूस में 2.5, चीन में 5.8 और दक्षिण अफ्रीका में 5.8 डॉलर प्रति घंटे है. फिर भी ये लागत देश के अलग-अलग राज्यों में तेजी से बढ़ रही है. ऑटोमेशन और भारत में ज्यादा दूरी नहीं बची है.


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